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शुक्रवार, 02 फ़रवरी, 2007 को 20:02 GMT तक के समाचार
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नहीं बदला है क्रिकेट को लेकर दीवानापन

क्रिकेट
क्रिकेट के प्रति दीवानगी नहीं कम हुई है
अब तो मैं चाय की चुस्कियां लेते हुए क्रिकेट पर गर्मागर्म बहस में भी हिस्सा लेता हूँ और मैच हारने पर टीम की रणनीति में ख़ामियां निकाल कर अपने “ क्रिकेट ज्ञान“ का प्रदर्शन भी करता हूँ.

लेकिन एक समय था जब मेरे लिए क्रिकेट का अर्थ मित्र मंडली के साथ भरी दोपहरी में छत पर बैट-बाल खेलना ही था.

पड़ोस में रहने वाले एक भैया अंपायर का रूप धारण करते और व्यर्थ के विवादो से हमारा बचाव कराते. वैसे मौक़ा मिलने पर छत फाँद कर हमारी गेंदो को अपने बल्ले से दूर तक पहुँचाने से उन्होनें कभी गुरेज़ नहीं किया.

लेदर की गेंद से खेलने पर मुझे डर लगता था इसलिए मामला प्लास्टिक की गेंद तक ही सीमित था.

लेकिन इसके बावजूद क्रिकेट के प्रति दीवानगी और समर्पण में कहीं कोई कमी नहीं थी. पेशेवर खिलाड़ियो की तर्ज़ पर माथे से पसीना पोंछा जाता और गेंद को पैंट से रगड़ा जाता.

शायद अपने अहम की तुष्टि करने का वो एक असफल प्रयास था. एक बार ज़िला स्तर पर आयोजित प्रतियोगिता में भाग लेने का मौक़ा मिला.

लेकिन पहले ही मैच में मेरी टीम ने मुझे “ मैन आफ द मैच “ चुना क्योंकि मैंने एक ही ओवर में 23 रन दिए थे और हमारी टीम 11 रनो से मैच हार गई. इतना अच्छा प्रदर्शन करने के बावजूद मुझे फिर मौक़ा क्यों नहीं दिया गया इसका जवाब मेरे पास नहीं है.

मैदान से विमुख होने के बाद जब क्रिकेट से जुड़ी जानकारी एकत्र करने के शौक ने जन्म लिया तो क्रिकेट सम्राट पत्रिका पढ़ी जाने लगी. वैसे घर में अख़बार आता तो पहले पन्ने पर छपी ख़बर से अधिक दिलचस्पी खेल पृष्ठ को पढ़ने में ही होती.

टेलीविज़न पर मैच के प्रसारण के दौरान एकाग्रचित्त हो कर मैच की हर बारीकी पर ध्यान दिया जाता ताकि दोस्तो के साथ होने वाले विश्लेषण में कहीं कोई कमी ना रह जाए.

कई बार ऐसा हुआ कि मैच देखने के लिए तबीयत ख़राब होने का ऐसा सजीव अभिनय किया कि उसकी सुखद परिणति मैच का सजीव प्रसारण देखकर ही हुई.

शुरूआती दिनो में निजी चैनल तो थे नहीं ऐसे में अगर लाइट चली जाती तो अम्पायर बनने वाले भैया की तलाश होती जो अपने पास ट्राँज़िस्टर रखते थे.

कानो पर ट्राँज़िस्टर लगाए बस उन्ही को पता होता था कि मैच में हो क्या रहा है.आसपास खड़े लोग मैच का हाल जानने के लिए बस उनके चेहरे के भावो को पढ़ने का प्रयास करते.चौका - छक्का लगता तो ख़ुशी से वो अपना हाथ घुमाते और आउट होने पर धीरे से अपनी गर्दन.

क्रिकेट मैच का स्कोर जानने के लिए अब तो ना जाने कितने माध्यमो का प्रयोग किया जाता है लेकिन इस सबके बावजूद समय के साथ अगर कुछ नहीं बदला है तो वो है क्रिकेट के प्रति लोगो का दीवानापन.

आज भी मैच जीतने पर दीवाली के पटाखो की गूँज और होली के रंगो की धूम होती है .एक ही पल में कई त्यौहारो की खुशियां समेटने का माद्दा क्रिकेट में आज भी है.

क्रिकेट प्रेमियो की सदभावनाएं और उनकी उम्मीदें 2007 के विश्व कप में भारत के लिए प्रेरणा का रूप लेती है या दबाव का ,इसका जवाब आने वाले दिनो में मिल जाएगा.

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