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शुक्रवार, 02 फ़रवरी, 2007 को 18:44 GMT तक के समाचार
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भूल नहीं पाती वो क्रिकेट कमेंट्री

कमेंट्री सुनता क्रिकेट प्रशंसक
क्रिकेट कमेंट्री को लेकर अभी भी उत्साह है
क्रिकेट की पुरानी यादों के साथ उस घर की भी यादें जुड़ी हैं जहाँ मेरे दादा, दादी और फुफेरे भाई वग़ैरह रहते थे.

साठ के दशक की बात होगी. गर्मी की छुट्टियों में हम सब भाई बहन अपने दादा के यहाँ लखनऊ पहुँच जाते थे.

यह वह ज़माना है जब टेलीविज़न का चलन नहीं था. क्रिकेट मैच की कमेंट्री रेडियो पर सुनने का रिवाज था.

मेरी सबसे बड़ी बुआ के बेटे अब्बू भाई, भाभी और भाभी के दो भाई. ये सब क्रिकेट के दीवाने थे.

सभी के कान रेडियो पर लगे रहते थे. मुझे क्रिकेट से तो कोई ख़ास दिलचस्पी नहीं थी लेकिन कमेंट्री का स्टाइल मुझे ज़रूर आकर्षित करता था.

हर बॉल और हर रन पर लोगों की बेचैनी, हर छक्के और चौके पर तालियाँ और आउट होने वाले के साथ या तो सहानुभूति या ख़ुशी का इज़हार, और साथ ही कमेंटेटर की जोशीली आवाज़, सब आज भी वैसा ही याद है.

कमेंट्री सुनने वाले साथ में एक डायरी ले कर बैठते. पूरा चार्ट बना होता जिसमें किसने कितने रन बनाए, कितने चौके-छक्के लगाए या किसने कितने विकेट लिए सब कुछ दर्ज रहता.

साथ-साथ विशेषज्ञ टिप्पणी भी चलती रहती. एक भाई आगे का क़यास लगाते तो दूसरे तुरंत उसके विपरीत भविष्यवाणी कर देते.

नारी कॉंट्रैक्टर, पॉली उमरीगर और जयसिम्हा. ये कुछ वे नाम हैं जो उस समय क्रिकेट के मैदान की शान हुआ करते थे.

उत्साह

मेरी उम्र तो ख़ैर कम थी लेकिन मेरी बड़ी ममेरी और मौसेरी बहनें जब नारी कॉंट्रैक्टर की अख़बार में छपी तस्वीरें देखतीं तो काट कर अपनी स्क्रैप बुक में चिपका लेतीं.

उस ज़माने में इन क्रिकेटरों का वही रुतबा था जो फ़िल्मी सितारों का. उनसे जुड़ी कहानियाँ बड़े चटख़ारे ले कर पढ़ी जातीं.

शाम को जब मैच ख़त्म हो जाता तो भी ख़ुमार बाक़ी रहता. हम सब बच्चों को जमा कर के घर के आंगन में ही मैच खेला जाता.

एक के ऊपर एक ईंट जमा कर विकेट तैयार किए जाते. मैं तेज़ी से आती गेंद से घबराती तो मेरे लिए गेंद नीचे से ही लुढ़काई जाती.

वैसे अब यह भी याद आता है कि मुझे कोई अपनी टीम में रखने को आसानी से तैयार नहीं होता था. अगर मुझे लगता था कि सामने से आती गेंद मुझे चोट पहुँचा सकती है तो मैं दौड़ कर एक किनारे हो जाती.

अब भी घर पर टेलीविज़न पर मैच देखा जाता है. जोशो ख़रोश आसमान छू रहा होता है. लेकिन रेडियो की उस कमेंट्री के दौरान जो माहौल होता था, जब सारा घर क्रिकेटमय हो जाता था, वे दिन आज भी बहुत याद आते हैं.

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