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क्रिकेट का चस्का और बैंक की परीक्षा | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
मेरी पैदाइश और परवरिश दूरदराज के एक ऐसे गाँव में हुई है जहाँ से कोई ब्लॉक या तहसील शहर कम से कम आठ-दस किलोमीटर की दूरी पर थे. गाँव में कोई टेलीविज़न होना तो दूर की बात है, रेडियो भी गिने चुने थे. जैसा मुझे बताया गया था कि मेरे दादा 1960 के दौर में जब हज करने गए थे तो वहाँ से एक बड़ा सा रेडियो लाए थे जो किसी अचंभे से कम नहीं था और लोग उसके इर्द-गिर्द जमा होकर कार्यक्रम सुना करते थे. जब मैंने शौक संभाला तो पहले तो मरफ़ी रेडियो घर में पाया, बाद में पैरामाउंट रेडियो में साफ़ आवाज़ सुनाई देती थी. गाँव में बचपन तो कबड्डी और कंचे खेलते हुए बीता लेकिन संगीत सुनने के शौक की वजह से रेडियो साथ रखने की जैसे आदत हो गई. उस ज़माने में हॉकी का खेल भी काफ़ी लोकप्रिय था और ख़ासतौर से जसदेव सिंह जब हॉकी के किसी मैच का आँखों देखा हाल सुनाते थे तो खेल की दुनिया में रुचि भी बढ़ी. मौक़ा 10वीं तक की शिक्षा गाँव में ही हुई और तब तक वॉलीबॉल, फुटबॉल और दौड़-कूद जैसे खेलों में काफ़ी बढ़चढ़कर हिस्सा लेने का मौक़ा मिलता रहा. मगर वॉलीबॉल पर ज़्यादा ध्यान रहता क्योंकि इसे ही गाँव में ज़्यादा लोग खेलते थे और मुझे कई प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने का भी मौक़ा मिला. लेकिन 11वीं कक्षा में जब अमरोहा के एक कॉलेज में दाखिला मिला तो देखा कि क्रिकेट प्रतियोगिताएँ बहुत संगठित तरीके से होती थीं और हमारे कॉलेज की टीम भी ख़ासी मज़बूत मानी जाती थी. कुछ खिलाड़ी मेरी कक्षा के भी थे. मगर मैं क्रिकेट को देखने तक ही सीमित था और कभी क्रिकेट खेलने का मौक़ा नहीं मिला या यूँ कहिए कि क्रिकेट खेलने का कोई शौक जागा ही नहीं. स्नातक करने के बाद जब नौकरी की तलाश में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी शुरू की तो सामान्य ज्ञान की तैयारी में खेल का भी काफ़ी हिस्सा रहता था और क्रिकेट को तो काफ़ी जगह मिलती थी. क्रिकेट का बुख़ार इतना तेज़ होता था कि जहाँ कहीं जाएँ, लोग रेडियो पर कमेंटरी सुनते नज़र आते थे. कामधंधा सब चौपट, और ऐसे माहौल में हम जैसे लोग अगर किसी दफ़्तर या दुकान पर कुछ काम के लिए पहुँच जाते तो लोग हमें ऐसी नज़रों से देखते कि हमें अपने आप पर शर्म आने लगती, क्रिकेट की दीवानगी हमें क्यों नहीं है. कुछ इसी तरह के माहौल में क्रिकेट में दिलचस्पी शुरू हुई मगर फिर भी खेलने का तो मौक़ा नहीं मिला, हाँ, कमेंटरी के लिए दीवानगी ज़रूर पैदा हो गई. मेरे परिजन यह देखकर काफ़ी चकित थे कि महबूब रेडियो पर गाने सुनने के बजाय क्रिकेट कमेंटरी सुनने लगा है. बैंक की नौकरी यह 1987 की बात है जब मैंने स्नातक करने के साथ ही प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी शुरू की थी. किसी छोटे शहर में रहने वाले अन्य युवकों की ही तरह मैं भी नौकरी पाने के सपने देखने लगा था.
बैंक की नौकरी काफ़ी अच्छी समझी जाती थी इसलिए मैं उसकी तैयारी ख़ूब ज़ोरशोर से कर रहा था. उन्हीं दिनों क्रिकेट के विश्व कप का ख़ुमार हर कहीं नज़र आ रहा था और उससे मैं भी बचा नहीं रह सका. मुश्किल बात ये थी कि नौकरी की तैयारी को क्रिकेट की भेंट चढ़ाना बहुत ख़तरे से भरा हुआ था मगर फिर भी क्रिकेट कमेंटरी सुनने का लालच नहीं छोड़ सका. इस तरह दोहरी मेहनत करनी पड़ी यानी क्रिकेट को भी समय दिया और बैंक की परीक्षा के लिए भी. मुझे अच्छी तरह याद है वो रविवार, आठ नवंबर 1987 का दिन था जब ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड के बीच फ़ाइनल होना था और इत्तेफ़ाक से उसी दिन मोदीनगर में बैंक की परीक्षा भी थी. मुझे याद नहीं कि बैंक परीक्षा में मैंने कितने सवाल सही और कितने ग़लत किए लेकिन क्रिकेट के फ़ाइनल का भूत मेरे सिर से नहीं उतर रहा था. हालाँकि इससे मुझे कोई फ़ायदा तो नहीं होने वाला था कि क्रिकेट में कौन सी टीम जीतती है लेकिन न जाने क्यों, ऐसा लगने लगा था कि अगर जोश-ओ-ख़रोश के साथ कमेंटरी नहीं सुनी और उस पर गरमागरम टिप्पणियाँ नहीं कीं तो शायद मैं अपने दोस्तों में पिछड़ जाउंगा. बहरहाल फाइनल का नतीजा तो उसी दिन मिल गया था जिसमें ऑस्ट्रेलिया की जीत हुई थी मगर बैंक परीक्षा का नतीजा आने में कई महीने लगे और तब तक क्रिकेट का नशा भी हल्का हो चुका था. आज मैं सोचता हूँ कि अगर बैंक की परीक्षा में पास हो गया होता तो पत्रकार नहीं बन पाता. या ये भी हो सकता है कि बैंक परीक्षा में पास हो जाता तो तरह-तरह के नोटों से खेल रहा होता. कौन जाने क्या होता... लंदन आकर एक दिन रविवार को कुछ दोस्तों ने आपस में ही क्रिकेट मैच खेलने का फ़ैसला किया तो ज़बरदस्ती मुझे भी बल्ला थमा दिया गया. मैं मना करता रहा, मेरी एक ना सुनी. शायद वो हँसने-हँसाने का इंतज़ाम कर रहे थे. जो भी गेंदें फेंकीं गईं, मुझे पता ही नहीं चला कि वो कब और कहाँ से गुज़र गईं. बहरहाल मैदान में ख़ूब ठहाके तो गूँजे... |
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