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दादाजी ने सिखाया क्रिकेट का ककहरा | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
क्रिकेट, जितना मुझे याद है ये नाम मेरे जेहन में तब से है जब मैं लगभग आठ साल का था. इससे पहले तक गाँव के गलियारों में बेहद लोकप्रिय गिल्ली-डंडा ही चलाता रहा. गोली या कंचे खेलने में ख़ासी दिलचस्पी रही. मेरे पिता जी को तो क्रिकेट में कोई दिलचस्पी नहीं है, लेकिन मेरे बाबा पर इस खेल का भूत सवार था. मुझे भी क्रिकेट का ककहरा उन्हीं से समझ में आया. गाँव के मैदान में हर साल क्रिकेट प्रतियोगिता आयोजित होती थी जो अब भी जारी है. इस प्रतियोगिता का मैच देखने मैं भी जाया करता था. इसे देखते देखते ही क्रिकेट के प्रति मेरी दिलचस्पी बढ़ी. सबसे पहला बल्ला बनाया ताड़ के पत्ते के डंठल से. बहुत कहने पर घर वालों ने मेले से प्लास्टिक की गेंद ख़रीद दी जो हवा तेज़ चलने पर ज़बरदस्त ‘स्विंग’ करती थी. कई बार मैंने देखा कि मेरे दादाजी सुबह सुबह फिलिप्स का जर्जर रेडियो कान में लगाए कुर्सी पर बैठे हुए हैं. पूछा तो पता चला ऑस्ट्रेलिया में मैच चल रहा है. वैसे साफ बताऊँ मुझे वो मैच याद नहीं है जिसका प्रसारण मैंने पहली बार रेडियो पर सुना था. लेकिन 87-88 का जमाना याद है. क्रिकेट के बारे में कुछ कुछ पता चल रहा था तभी गावस्कर रिटायर हुए. इसके बाद सचिन का पदार्पण हुआ. जादू अगर आप पूछें कि भारत का वो पहला खिलाड़ी कौन है जिसे मैं फोटो देख कर पहचान सकता था, तो वो हैं श्रीकांत. 1989-90 में गाँव में टेलीविज़न आया. एक मैच के प्रसारण के दौरान जो पहला खिलाड़ी दिखा, उसके बारे में पूछने पर कुछ यूँ बताया गया-‘अस्थिर’ से बैठ श्रीकांत है. इसके बाद तो सचिन का जलवा चला और इसका जादू मुझ पर भी हावी हुआ. इसी दौरान गिल्ली डंडे से मैं पूरी तरह क्रिकेट की ओर रुख कर चुका था. अब बल्ला बना लकड़ी का. गाँव के बढ़ई से बनवाया था. गेंद निकाली बाँस की जड़ को तराश कर. आठवीं-नौवीं कक्षा में जब था तब हर शाम स्कूल के बाद क्रिकेट के मैदान पर दिखता था. घर में लोगों को लगा लड़का निकला हाथ से. एक जुमला जो मेरे पिता जी अक़्सर मेरे लिए इस्तेमाल करते थे वो बताना चाहूँगा – अरे जिसे क्रिकेट और सिनेमा से इश्क हो गया वो पढ़ाई क्या करेगा. लेकिन मैट्रिक पास होने के बाद खेलने पर कोई ख़ास बंदिश नहीं रही. पर तब खेलने के लिए समय नहीं था क्योंकि हर दिन यही सुनता था, “सोंच लो नौकरी नहीं मिली तो ज़मीन भी नहीं है जिसे जोतोगे.” ख़ैर खेलने का सिलसिला तो ख़त्म हो चुका है, लेकिन क्रिकेट की समझ और इसमें दिलचस्पी ज़रूर बढ़ी है. |
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