कैप्टन कोहली ने भारतीय क्रिकेट टीम को कितना बदला

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- Author, सुरेश मेनन
- पदनाम, वरिष्ठ खेल पत्रकार
विराट कोहली ने भारतीय क्रिकेट टीम का मिज़ाज, तौर तरीका या कहें संस्कृति को बदलकर रख दिया है.
उनसे पहले ऐसा ही कारनामा बतौर कप्तान टाइगर पटौदी ने कर दिखाया था. उन्होंने साठ के दशक में प्रतिभाशाली क्रिकेटरों के अंदर जीत का आत्मविश्वास भरा था.
इस आत्मविश्वास से ही उस वक्त भारतीय क्रिकेट टीम एक ऐसी टीम के तौर पर उभरी जिसके पास जादुई स्पिन गेंदबाज़ों की चौकड़ी थी और जोख़िम लेने को तैयार बल्लेबाज़.
बहरहाल, बात कोहली की, जिनकी कप्तानी में भारत ने पहली बार ऑस्ट्रेलिया में कोई टेस्ट सिरीज़ जीती है.
इस टीम में तेज़ गेंदबाज़ों की तिकड़ी है और चेतेश्वर पुजारा जैसा भरोसेमंद बल्लेबाज़ जो विकेट पर खूंटा गाड़ना जानता है.
कोहली को जब टेस्ट मैचों की कप्तानी मिली थी, तब भारतीय टीम का, साउथ अफ्रीका, इंग्लैंड, न्यूज़ीलैंड और ऑस्ट्रेलिया- इन चार देशों में जीत हासिल करने का रिकॉर्ड बेहद खराब था, लेकिन विदेशों में जीत हासिल करने की चाह के चलते कोहली अपनी आत्मविश्वास से भरी टीम को आक्रामक और काफ़ी हद तक दंभ से भर दिया.

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मैन ऑफ़ द सिरीज़
दशकों तक भारतीय क्रिकेट का तरीका हुआ करता था- अच्छा दिखो और अच्छा खेलो. कोहली ने इसे बदल दिया.
टेनिस के एक कोच ब्रैड गिलबर्ट हमेशा एक मुहावरा इस्तेमाल करते थे जिसके मुताबिक, अगर आपके सामने विकल्प अच्छा दिखते हुए हारने का हो, तो खराब दिखते हुए जीतना महत्वपूर्ण है.
आप इस नई संस्कृति की झलक चेतेश्वर पुजारा में देख सकते हैं, उन्होंने इस सिरीज़ में तीन शतक लगाकर मैन ऑफ़ द सिरीज़ का अवॉर्ड जीता.
उन्होंने चार टेस्ट मैचों में कुल मिलाकर 28 घंटे से ज़्यादा देर तक बल्लेबाज़ी की है और 1258 गेंदों का सामना किया है.
भारत का कोई भी बल्लेबाज़ अब तक ऑस्ट्रेलिया में किसी सिरीज़ में इस मुकाम तक नहीं पहुंचा था.
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भारतीय क्रिकेट टीम
ये भी संभव है कि विराट कोहली का अपनी टीम पर उतना असर हो, जितना भारत के किसी भी कप्तान का टीम पर नहीं रहा हो.
शारीरिक फिटनेस के लिए विराट कोहली ने जो खान पान का तरीका अपनाया हुआ है, उसका असर टीम के दूसरे साथियों पर होता ही होगा.
इतना ही नहीं, विराट कोहली ने जब अपनी दाढ़ी बढ़ाई तो देखिए टीम में एक साथ कितने दाढ़ी वाले खिलाड़ी नजर आ रहे हैं.
कहा जाता है कि एक मज़बूत कप्तान अपनी छवि जैसी टीम बनाता है, आज की भारतीय क्रिकेट टीम के लिए ये बात सटीक बैठ रही है.
हालांकि कोहली ने सबसे ज़्यादा खिलाड़ियों की मानसिकता पर असर डाला है.
अतीत में भी भारतीय टीम में आक्रामक खिलाड़ी रहे हैं, कई खिलाड़ी स्लेजिंग का जवाब बखूबी देते रहे थे कई मैदान पर इसकी शुरुआत करने वाले भी थे.

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मैदान पर टकराव
लेकिन पूरी टीम इतनी आक्रामक रही हो, ऐसा इससे पहले कभी नहीं देखने को मिला.
इस बार ख़ास बात ये भी है कि टीम के खिलाड़ी केवल ज़ुबान ही नहीं चला रहे हैं बल्कि मैदान में प्रदर्शन भी कर रहे हैं.
वे इस तरह खेल रहे हैं जैसे 22 गज की पिच उनकी अपनी संपत्ति है, किसी दूसरे के दावे को वे बाहरी हमले की तरह देख रहे हैं.
इससे मैदान पर टकराव या झड़प की स्थिति भी देखने को मिलती है, तो कई बार ये मज़ेदार भी होता है. ऑस्ट्रेलिया में ये सब एकसाथ देखने को मिला.
मैदान में केवल आक्रामकता जीत नहीं दिलाती- कई बार ये बेमतलब की उछल कूद भी लगती है लेकिन इससे टीम का मनोबल बढ़ता है.
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आक्रामकता की ज़रूरत
अब जब भारतीय टीम कई मैच जीत चुकी है ऐसे में उसे आक्रामकता को हथियार बनाने के आगे भी देखना होगा.
इस सिरीज़ में कामयाबी हासिल करने वाले पुजारा रहे हों या फिर भारतीय तेज़ गेंदबाज़- इन्हें ज़ुबानी आक्रामकता की ज़रूरत ही नहीं पड़ी.
हमेशा मुस्कुराने वाले जसप्रीत बुमराह ने इस सिरीज़ में 21 विकेट झटके, जबकि बिना किसी ड्रामे के स्थिर भाव से गेंदबाज़ी करने वाले मोहम्मद शमी ने 16 विकेट चटकाए.
इनकी आक्रामकता इनकी गेंदों की तेजी में झलक रही थी.
कई मौकों पर इन्होंने 148 किलोमीटर प्रति घंटे की भी तेज़ रफ्तार से गेंदबाज़ी की और ऑस्ट्रेलिया के गिरते विकेटों से साफ़ था कि संदेश उन तक पहुंच रहा है.
कोहली आक्रामक शैली वाले कप्तान हैं, ऐसे में आक्रामक तेज़ गेंदबाज़ उनके टेंपरामेंट के मुताबिक बैठते हैं. वे अपने तेज़ गेंदबाज़ों का किफायत से इस्तेमाल करते हैं.

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तेजी से सीखने वाले कप्तान
पुराने दिनों में भारतीय कप्तान अपनी टीम में एक मीडियम पेसर से खुश रहा करते थे.
जब कपिल देव जैसा तेज़ गेंदबाज़ मिल जाए तो भारतीय कप्तान उनसे काफ़ी ज़्यादा ओवर डलवाते थे. कपिल को हमेशा ज़्यादा ओवरों तक गेंदबाज़ी करनी पड़ी.
कोहली अभी 30 साल के हैं, कप्तान के तौर पर उनके सबसे अच्छे साल अभी आने वाले हैं. वे तेज़ी से सीखने वाले कप्तान हैं.
अब जबकि भारतीय क्रिकेट टीम टॉप पर है, अब उन्हें ये तय करना होगा कि इस पोज़ीशन को डिफेंड करना है या फिर टीम को आगे लेकर जाना है.
इसके अलावा एक पहलू और है, जिस पर उन्हें ध्यान देना होगा. आप उनके चेहरे पर मैच का हाल देख सकते हैं.
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रणनीतिक तौर पर कुशल
मैच के दौरान अगर आप उनकी एक झलक देख लें तो आपको पता चल जाएगा कि मैच पर नियंत्रण है या वे मैच हार रहे हैं.
जबकि महान कप्तानों की खूबी ये रही है खुद पर नियंत्रण, मैच चाहे जहां जा रहा हो, वे खुद को ऐसे पेश करते रहे हैं कि जीत हमारी ही होगी.
इससे टीम के खिलाड़ियों का भरोसा बना रहता है. लेकिन ये विराट कोहली हैं, इनसे एलन बॉर्डर या फिर ग्रीम स्मिथ होने की उम्मीद करना भी सही नहीं होगा.
इसके अलावा ये भी देखा गया कि जब चीज़ें तेजी से अपने मुताबिक नहीं हो रही हो तो वे धैर्य खो बैठते हैं.
कप्तानों में सबसे चतुर माने जाने वाले इंग्लैंड के माइक ब्रेयरली के मुताबिक विराट कोहली रणनीतिक तौर पर कुशल हैं और नए प्रयोग भी आज़माते रहते हैं.
वे आक्रमण करने के मौके तलाशते रहते हैं.

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टेस्ट का अंतिम दिन जीत
ऑस्ट्रेलिया के पिछले दौरे पर, भारत को एडिलेड टेस्ट के अंतिम दिन जीत के लिए 364 रन बनाने थे.
कोहली ने इस टेस्ट में अपनी दूसरी शतकीय पारी खेलते हुए भारत को मुक़ाबले में ला दिया, लेकिन भारत ये मैच 48 रनों से हार गया था.
संयोग ये भी कि कप्तान के तौर पर ये विराट कोहली का पहला टेस्ट मैच था. पटौदी के बाद जीत के लिए हार का जोख़िम उठाने वाले पहले कप्तान हैं कोहली.
इस बीच में किसी कप्तान ने इतना साहस नहीं दिखाया था. अनुभव के साथ कोहली रणनीतिक तौर पर ज़्यादा परिपक्व होते जाएंगे.
चाहे वो फ़ील्डिंग सजाने की बात हो या फिर गेंदबाज़ी में अप्रत्याशित बदलाव करने की. वे इन तौर तरीकों को और भी बेहतर करेंगें. साथ ही उन्हें अपने में संयम लाना होगा.
इसके साथ ही उन खिलाड़ियों के प्रति थोड़ी नरमी भी दिखानी होगी, जिनका प्रदर्शन उनके खुद के सबस अच्छे रहे प्रदर्शन के पास नहीं पहुंच रहा है.
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क्रिकेट के बड़े समर्थक
कोहली आज क्रिकेट की दुनिया में सबसे ज़्यादा ताक़तवर शख़्सियत माने जा सकते हैं.
अगर भारत क्रिकेट की दुनिया का सबसे शक्तिशाली देश है, तो भारतीय क्रिकेट बोर्ड का दबदबा दिखेगा.
हालांकि इन दिनों भारतीय क्रिकेट बोर्ड इन दिनों अव्यवस्थित दिख रहा है, ऐसे में कोहली हैं जो सीधे फ़ैसले ले रहे हैं.
इसका जो भी असर हो, लेकिन ये किसी ईश्वरीय वरदान से कम नहीं है. वैसे कोहली से जुड़ी एक और बात ध्यान देने लायक है.
वनडे क्रिकेट में शानदार रिकॉर्ड के बावजूद कोहली का भरोसा टेस्ट क्रिकेट में रहा है, वे टेस्ट क्रिकेट के बड़े समर्थक हैं.
यह फॉरमेट मुरझाए या फिर भारतीय क्रिकेट टीम का इस फॉरमेट में प्रदर्शन कमतर हो- ऐसा कोहली कभी नहीं चाहेंगे.
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(सुरेश मेनन, विज़डन इंडिया अल्मैनेक के एडिटर और द हिंदू केकॉन्ट्रीब्यूटिंग एडिटर हैं)
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