कम बालों में छिपा है इंसान की सफलता का राज़

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हम जब भी अपने आस-पास के लोगों को देखते हैं, उनके चेहरे, उनके नैन-नक़्श पर ग़ौर फ़रमाते हैं. कई बार कुछ लोगों के बदन पर ज़्यादा बाल भी हमारा ध्यान खींचते हैं. मगर आम तौर पर इंसानों के शरीर पर ज़्यादा बाल नहीं होते.

कभी आपने सोचा कि ऐसा क्यों है? इसके क्या नफ़ा-नुक़सान हैं?

इंसान के जंगली भाई-बंधुओं जैसे बंदर, चिंपैंजी या गोरिल्ला के शरीर बालों से ढंके रहते हैं. मगर हमारे बदन पर बहुत कम बाल होते हैं. हमारी चमड़ी खुली होती है. विकास की प्रक्रिया में हमारे बाल झड़ते चले गए. और आज इंसान के बदन पर बहुत कम बाल होते हैं.

पहले जब हम चिंपैंजी, गोरिल्ला और बंदरों की तरह नंगे बदन, खुले में रहते थे. तो हमारे शरीर को भी बालों की सुरक्षा की ज़रूरत थी. तो फिर ऐसा क्या हुआ कि अचानक से आदि मानव के शरीर से बाल ख़त्म हो गए?

सबसे पहले हमें चार्ल्स डार्विन ने बताया कि बंदर हमारे पुरखे थे. डार्विन ने कहा कि हमारे शरीर से बाल इसलिए ख़त्म हो गए क्योंकि आदि मानव अपने साथियों की चमड़ी पर बाल पसंद नहीं करते थे. इस वजह से धीरे-धीरे इंसान के शरीर से बाल ख़त्म होते गए.

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मगर इस थ्योरी की दिक़्क़त ये है कि बिना बाल वाली चमड़ी पसंद आने से पहले ऐसी चमड़ी वाले इंसानों का होना लाज़िमी है. पहले तो बाल ख़त्म हुए होंगे, इंसान के शरीर से. तब जाकर ऐसे साथी की मांग ज़्यादा हुई होगी.

आदि मानव से पहले जो हमारे पुरखे थे, वो बंदरों से बहुत मिलते जुलते थे. उनके लिए शरीर पर बालों की बड़ी उपयोगिता थी. ठंड के दिनों में शरीर को गर्म बनाए रखने में शरीर के बाल बहुत काम आते रहे होंगे.

इसके बाद ज़रूर कुछ ऐसा हुआ कि विकास की प्रक्रिया में हमारे शरीर से बाल ख़त्म हो गए.

आज से लाखों साल पहले धरती पर इंसान जैसी कई प्रजातियां थीं. इनमें से एक बड़ा मशहूर लूसी नाम का कंकाल अफ्रीका में मिला. ये क़रीब 32 लाख साल पुराना है.

लूसी के बारे में वैज्ञानिकों का मानना है कि वो चिंपैंजी जैसी रही होगी. हालांकि वो सीधे खड़े होकर चल सकती थी. उसका दिमाग़ भी ज़्यादा बड़ा था. माना जाता है कि उसके शरीर पर ढेर सारे बाल रहे होंगे.

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आज से क़रीब बीस लाख साल पहले इंसानों के पूर्वज अफ्रीका के खुले घास के मैदानों में रहने लगे थे. उन्हें सूरज की किरणों का ज़्यादा सामना करना पड़ता था. इसी दौर में उन्होंने शिकार करना और मांस खाना भी शुरू किया था. उस वक़्त शिकार के लिए तमाम जानवर भी उपलब्ध थे.

शायद यही वजह थी कि हमारे पुरखों के शरीर से बाल कम होने लगे. वैज्ञानिकों का मानना है कि शिकार के लिए इंसान के पुरखों को ज़्यादा दौड़-भाग करनी पड़ती थी. ज़्यादा मेहनत करने से उनके शरीर में ज़्यादा गर्मी पैदा होती थी. उनका दिमाग़ भी गर्म हो जाता था. ऐसे में ज़रूरी था कि बदन की ये गर्मी जल्दी से बाहर निकले. इस राह में शरीर के बाल रोड़े थे. इसीलिए आदि मानव के शरीर से बाल कम होने लगे.

उनके मुक़ाबले, चिंपैंजी जैसे जानवर जो धूप में भाग नहीं सकते थे. वो दिन भर पेड़ों की छांव में सुस्ताते थे. उनका दिन का बड़ा वक़्त बर्बाद हो जाता था. उनके मुक़ाबले हमारे पुरखे, खुले आसमान तले दौड़-भागकर खाने का इंतज़ाम कर लेते थे. दौड़-भाग से निकलने वाली गर्मी, उनके बदन से पसीने के तौर पर बाहर आती थी. पसीने से शरीर को ठंडक भी मिलती थी.

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वैज्ञानिक मानते हैं कि दिन में खाने की तलाश आसान थी. इसीलिए विकास की रेस में इंसान बाक़ी जानवरों से आगे निकल गया. क्योंकि वो ज़्यादा दौड़-भाग सकता था. इससे पैदा होने वाली गर्मी उसके शरीर से पसीने के तौर पर निकल जो जाती थी. और खाने का ज़्यादा इंतज़ाम करने से ही इंसान का दिमाग़ इतना विकसित हुआ.

आज जितने स्तनधारी जीव हैं, उनमें से इंसान को सबसे ज़्यादा पसीना निकलता है. हमारे शरीर में पसीने की क़रीब पांच लाख ग्रंथियां होती हैं. इनसे बारह लीटर तक पसीना रोज़ निकल सकता है.

अमरीका की पेन्सिल्वेनिया यूनिवर्सिटी की वैज्ञानिक नीना जबलोंस्की कहती हैं कि दूसरे स्तनधारी जीवों के भी पसीना निकलता है. मगर इंसान के बराबर नहीं. जैसे कि बंदर की एक नस्ल पटास के काफ़ी पसीना निकलता है. मगर उसके शरीर पर बाल कम नहीं हुए.

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कुछ वैज्ञानिक मानते हैं कि जब इंसान ने सीधे खड़े होकर चलना सीखा तो उसके शरीर पर सूरज की किरणें सीधे-सीधे पड़ने लगीं. इस वजह से भी उसके शरीर पर बाल कम हुए. हालांकि कई वैज्ञानिक इससे इत्तेफ़ाक़ नहीं रखते.

हालांकि सीधे चलने के कई फ़ायदे आदि मानव को मिले. वो तेज़ी से दौड़कर शिकार कर सकता था.

इंसान के सीधे पुरखे, यानी होमो इरेक्टस, धरती पर क़रीब अठारह लाख साल पहले रहते थे. वो सीधे चलते थे. उनका दिमाग़ बड़ा था. वो मानवों की पहली प्रजाति थे जो अफ्रीका से बाहर निकले. लेकिन, रात की ठंड से बचने के लिए उन्हें भी दो गर्मी की ज़रूरत थी. वो बिना बालों वाले बदन के कैसे हासिल होती होगी?

इस सवाल का जवाब दो वैज्ञानिकों डेविड बैरेट और रॉबिन डनबार ने तलाशने की कोशिश की है. वो कहते हैं कि तब इंसान ने खाने को पकाकर खाना शुरू कर दिया था. इसके लिए वो आग जलाता था. इससे इंसान को दोहरा फ़ायदा होता होगा. एक तो पका हुआ खाना आसानी से पचता था. दूसरा आग से उसके बदन को गर्मी भी मिलती रही होगी.

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माना जाता है कि इंसान ने खाना पकाना आज से बीस लाख साल पहले सीखा था. ये कमोबेश वही वक़्त था, जब इंसानों की होमो इरेक्टस नस्ल, अफ्रीका से निकलकर दुनिया के दूसरे देशों में फैली. इस थ्योरी में दिक़्क़त बस इतनी है कि इस बात के कोई सबूत नहीं मिलते कि बीस लाख साल पहले इंसान खाना पकाकर खाने लगा था.

कुछ वैज्ञानिक तो कहने हैं कि इंसान ने खाना पकाना उतने पहले नहीं बल्कि क़रीब पांच लाख साल पहले ही सीखा था.

इन बातों से साफ़ है कि पसीना निकालकर बदन को ठंडा करने की थ्योरी, हमारे शरीर से बाल कम होने के मामले में सबसे सटीक लगती थी.

हालांकि अब वैज्ञानिक जेनेटिक्स यानी हमारे जीन के अंदर पड़ताल करके इस सवाल का एकदम सही जवाब तलाशने में लगे हैं.

इंसान की चमड़ी के काले रंग के लिए जवाबदेह एक जीन है एमसी1आर. ये पिछले बारह लाख सालों से इंसान के डीएनए में है. यानी उस वक़्त इंसान की चमड़ी काली होने लगी थी. जबकि बाल ग़ायब होने के बाद सबसे पहले इंसान की चमड़ी गुलाबी सी रही होगी.

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कहने का मतलब ये कि इंसान के शरीर से बाल ग़ायब हुए होंगे आज से क़रीब बारह से पंद्रह लाख साल पहले. तभी तो सूरज की सीधी रौशनी पड़ने से चमड़ी काली पड़ने लगी होगी.

दूसरी बात ये कि हमारे शरीर में पसीने की ग्रंथियां और बाल दोनों ही हमारी चमड़ी से बनते हैं. यानी हमारी त्वचा तय करती है कि कितनी पसीने की ग्रंथियां होंगी और कितने बाल होंगे. जितने ज़्यादा बाल होंगे, पसीने की ग्रंथियां उतनी कम होंगी.

मतलब साफ़ है कि हमारे शरीर में बालों की तादाद का सीधा ताल्लुक़ पसीना निकलने से है. और ये इंसान के विकास की रफ़्तार में आगे निकलने की बड़ी वजह है.

बाल कम होने की वजह से ही हम तरक़्क़ी की रेस में बाक़ी जानवरों से आगे निकलकर आज जहां हैं, वहां पहुंचे हैं.

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