जंगल की आग इंसान के लिए बेहद ज़रूरी!

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आग से हमारा नाता बड़ा पेचीदा रहा है. आग से हमें गर्मी मिलती है. सुरक्षा मिलती है. पीने का साफ़ पानी मिलता है. इसकी मदद से हमें पका हुआ खाना मिलता है. लेकिन आग तबाही भी लाती है.
जंगल की आग भारी तबाही मचाने वाली हो सकती है. इसीलिए ज़्यादातर लोग सोचते हैं कि जंगल की आग को बढ़ने से पहले हर क़ीमत पर रोकना चाहिए.
और ऐसा हो भी रहा है. लेकिन जितना ही हम जंगल की आग रोकने की कोशिश करते हैं, उतना ही इसका दायरा बढ़ता जाता है.
इससे एक सवाल खड़ा होता है. क्या जंगल की आग रोकने की हमारी कोशिशें ही बार-बार आग भड़कने के लिए ज़िम्मेदार हैं?

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हर ऐसी जगह जहां जाड़ों में बारिश होती है और गर्मियों में सूखा मौसम रहता है, वहां आग लगती रहती है. बारिश की वजह से पेड़-पौधे ख़ूब बढ़ जाते हैं. गर्मियों में झाड़ियां और घास-फूस सूखकर आग लगने का माहौल तैयार कर देते हैं.
इसका मतलब ये है कि करोड़ों साल पहले विकास की प्रक्रिया के तहत, जब पौधे समंदर से ज़मीन पर आए, तब से ही इनमें आग लगने का सिलसिला चलता आ रहा है. पिछले साढ़े बारह करो़ड़ सालों से आग झेलते हुए, पेड़-पौधे भी इनके आदी हो गए हैं. उनमें आग के दौरान ख़ुद को बचाने और आग के बाद फिर से फलने-फूलने का हुनर आ गया है.
घास और झाड़ियों के मैदानों में सबसे ज़्यादा आग लगती है. इसी वजह से अफ्रीका के सवाना जैसे घास के मैदानों में बार-बार आग लगती रहती है. लेकिन घास-फूस जल्दी जलने से आग का असर ज़मीन के अंदर, घास-फूस की जड़ों तक नहीं पहुंचता. यही वजह है कि आग ख़त्म होते ही घास के मैदान फिर से हरियाली से भर जाते हैं.

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जैसे ही घास के मैदानों में हरियाली लौटती है, जंगली जीव-जंतु भी फिर वहां बसेरा करने आ जाते हैं. ताज़ा नर्म घास, इन पर पलने वाले जानवरों के विकास में मददगार होती है.
अगर घास के मैदानों में आग नहीं लगेगी, तो जल्द ही ये जंगलों में तब्दील हो जाएंगे. लेकिन बहुत से जंगल भी भयंकर आग से निपटने की क़ाबिलियत रखते हैं. जैसे कि पश्चिमी अमरीका और कनाडा के पोंडेरोसा के जंगल. इन पेड़ों की छाल बहुत मोटी होती है. यहां के जंगलों में लगने वाली आग से ये छाल इन पेड़ों का बचाव करती है. फिर आग फैलने पर इन पेड़ों की नीचे की टहनियां गिर जाती हैं. जिससे आग इनके सबसे ऊपर के हिस्से तक नहीं पहुंचती. जहां पर इन पेड़ों के बीज होते हैं.

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पोंडेरोसा के ये जंगल इस बात की मिसाल हैं कि कई बार पर्यावरण के लिए आग का लगना ज़रूरी होता है.
उसी तरह अमरीका के कैलिफ़ोर्निया के जंगल और लॉजपोल चीड़ के पेड़ भी आग से निपटने का हुनर अपने अंदर रखते हैं. हर 80 से दो सौ साल बाद यहां भयंकर आग लगती है. इस आग में ज़्यादातर पेड़ तबाह हो जाते हैं. लेकिन इन पेड़ों पर गोंद की परत वाले कोन होते हैं. जिनके अंदर के बीज भयंकर आग में भी सुरक्षित रहते हैं. आग ख़त्म होने के बाद ये कोन खुलते हैं और इनके अंदर के बीजों से नए पेड़ जन्म लेते हैं.

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बहुत से ऐसे पेड़ पौधे भी होते हैं जो आग के बीच ही फलते-फूलते हैं. जैसे लॉजपोल चीड़ के पेड़. इनके बीज बंद कोन के भीतर सुरक्षित रहते हैं. ये कोन आग लगने पर ही फटता है और बीज दूर-दूर तक बिखर जाते हैं. फिर आग ख़त्म होने पर इन बीजों से नए पेड़ उगते हैं. आग से हुई राख बेहतरीन खाद होती है. इनमें पेड़-पौधे ख़ूब फलते-फूलते हैं.
इसी तरह ऑस्ट्रेलिया में मिलने वाले यूकेलिप्टस के पेड़ भी जंगल की आग की वजह से ही फलते-फूलते हैं. यूकेलिप्टस के पेड़ों में तेल होता है जो आग को और भड़काता है. फिर इसकी पत्तियां भी आग में जलकर इसे और हवा देती हैं. आग इतनी फैल जाती है कि पूरा का पूरा जंगल तबाह हो जाता है. यूकेलिप्टस के बीज, आग लगने के बाद ही ख़ोल से बाहर आ पाते हैं. जैसे ही आग ख़त्म होती है, ये बीज नए पौधों को जन्म देते हैं.
इसी तरह भूमध्यसागर के आस-पास झाड़ियों वाला जो इलाक़ा है वो भी आग से निपटने में सक्षम है. यहां हर बीस साल में भयंकर आग लगती है. फिर यहां के पौधे नए सिरे से फलते-फूलते हैं. यहां मिलने वाले स्ट्रॉबेरी के पेड़ में कलियां ज़मीन के नीचे जड़ों मे होती हैं. जो भयंकर आग में ख़ुद को बचाए रखती हैं.

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इन मिसालों से साफ़ है कि कई बार क़ुदरती माहौल बनाए रखने के लिए आग का भड़कना ज़रूरी होता है. लेकिन बहुत से लोग ये सोचते हैं कि आग लगने पर इस पर फ़ौरन क़ाबू पाया जाना ज़रूरी है ताकि इकोसिस्टम को बचाया जा सके, मगर ये हक़ीक़त नहीं.
सच तो ये है कि आग को रोककर हम अपने इकोसिस्टम को नुक़सान पहुंचाते हैं. जैसे कि अमरीका में रेडवुड के जंगलों में लगने वाली आग रोककर हम इनके जंगलों को तबाह कर रहे हैं. क्योंकि ये पेड़ जंगल की आग से तो बच जाते हैं. फिर इंसान इन्हें इमारती लकड़ी के लिए इस्तेमाल करने के लिए काट डालते हैं.
ग्लोबल वॉर्मिंग और धरती के बदलते माहौल की वजह से भी जंगल में आग लगने की घटनाएं बार-बार हो रही हैं. फिर पिछली एक सदी से आग पर क़ाबू पाने की हमारी कोशिशों की वजह से भी आग बहुत भड़क रही है.

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बार-बार आग लगने की घटनाएं इस बात की गवाह हैं कि जंगल की आग से निपटने की हमारी कोशिशें नाकाम और महंगी होती जा रही हैं. जंगल की आग अब हमारे क़ाबू में नहीं आ रही. इन्हें रोकने का ख़र्च बढ़ता जा रहा है. अमरीका में ही पिछले दो दशक में जंगल की आग रोकने का ख़र्च तीन गुना हो गया है.
इसलिए अब हमें जंगल की आग को नए नज़रिए से देखने की ज़रूरत है.
इसके लिए जानकार, तीन विकल्प सुझाते हैं. पहला तो ये कि जंगलों की मशीन से नियमित रूप से सफ़ाई की जाए. इससे ज़मीन पर जो सूखे पौधे और घास-फूस जमा हो जाते हैं वो हट जाएंगे तो आग को भड़कने का माहौल नहीं मिलेगा. मगर ये विकल्प बेहद महंगा है.
दूसरा तरीक़ा है कि ख़ुद से ही नियंत्रित करके जंगलों में आग लगाई जाए.
तीसरा तरीक़ा ये है कि अगर जंगल में आग लगे तो उसके ख़ुद ब ख़ुद ख़त्म होने का इंतज़ार किया जाए.
हालांकि इसमें माल के नुक़सान का डर रहेगा. मगर इसकी भरपाई जंगलों की नियंत्रित सफ़ाई-कटाई से की जा सकती है.

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दिक़्क़त ये है कि अभी आम लोग, जंगलों में लगने वाली आग की अहमियत ठीक से नहीं समझते. बहुत से नेता भी इनकी अहमियत नहीं समझते. इसलिए आग से निपटने के नए तरीक़ों पर अमल बहुत मुश्किल है.
हमारा पर्यावरण बचा रहे, इसके लिए जंगल की आग को नए नज़रिए से देखने की ज़रूरत है.
पहले के ज़माने में लोग आग की अहमियत समझते थे. ऑस्ट्रेलिया के मूल निवासी ख़ुद ही सूखे के वक़्त आग लगाकर घास-फूस और जंगलों को नष्ट करते थे. लेकिन सत्रहवीं सदी में ऑस्ट्रेलिया में यूरोपीय लोगों के बसने के बाद इस चलन पर रोक लगा दी गई.
इसी तरह दक्षिण अफ्रीका और दक्षिण अमरीका में भी जंगलों में ख़ुद से आग लगाने की परंपरा थी. आज भी कई देशों में ऐसा हो रहा है. इस वजह से उनका पर्यावरण बचा हुआ है.

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मगर, पिछले कुछ सौ सालों से हम आग की अहमियत समझने के बजाए इसे अपना दुश्मन मान बैठे हैं. जबकि क़ुदरत के फलने-फूलने के लिए आग बेहद ज़रूरी है.
तो अगली बार जब आपके आस-पास जंगल की आग भड़के तो इसे नए नज़रिए से देखने की कोशिश करें.
(अंग्रेज़ी में मूल लेख पढ़ने के लिए <link type="page"><caption> यहां क्लिक</caption><url href="http://www.bbc.com/earth/story/20160722-why-we-should-let-raging-wildfires-burn" platform="highweb"/></link> करें, जो <link type="page"><caption> बीबीसी अर्थ</caption><url href="http://www.bbc.com/earth/uk" platform="highweb"/></link> पर उपलब्ध है.)
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