भारत और यूएई का समझौता क्या पाकिस्तान-सऊदी डिफ़ेंस डील का जवाब है?

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- Author, रजनीश कुमार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
यूएई (संयुक्त अरब अमीरात) के राष्ट्रपति शेख़ मोहम्मद बिन ज़ाएद अल नहयान सोमवार को चंद घंटों के लिए नई दिल्ली आए.
इस दौरे ने दिसंबर 2021 में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के दौरे की याद दिला दी, जब वह केवल पाँच घंटे के लिए भारत आए थे. पुतिन के इस छोटे दौरे की वजह कोविड महामारी बताई गई थी.
यूएई और ईरान में भारत के राजदूत रहे केसी सिंह ने द ट्रिब्यून में लिखा है कि इस यात्रा की पूर्व सूचना न होना इशारा करता है कि गल्फ़ और पश्चिम एशिया में तेज़ी से बदलते भू-राजनीतिक परिदृश्य के कारण चीज़ें सामान्य नहीं हैं.
यूएई के राष्ट्रपति जब दिल्ली के पालम एयरपोर्ट पहुँचे तो उनकी अगवानी में भारत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ख़ुद खड़े थे. पीएम मोदी ऐसी गर्मजोशी दुनिया के कम ही नेताओं के लिए दिखाते हैं.
पिछले महीने यूएई के राष्ट्रपति ने पाकिस्तान का भी दौरा किया था. यूएई के राष्ट्रपति भले नई दिल्ली कुछ घंटों के लिए ही आए लेकिन एक साथ कई समझौते हुए. इनमें से सबसे ज़्यादा चर्चा स्ट्रैटिजिक डिफेंस पार्टनरशिप के लिए लेटर ऑफ इंटेंट पर दोनों देशों के हस्ताक्षर की हो रही है.
दोनों देशों में रणनीतिक रक्षा साझेदारी पर सहमति तब बनी है, जब सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच पिछले साल सितंबर में एक डिफेंस पैक्ट हुआ था.

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पाकिस्तान-सऊदी का डिफेंस पैक्ट
यह डिफेंस पैक्ट कहता है कि सऊदी और पाकिस्तान में से किसी एक के ख़िलाफ़ "किसी भी तरह की आक्रामकता" को दोनों के ख़िलाफ़ हमला माना जाएगा. यह नेटो के अनुच्छेद-5 जैसा है, जिसका सदस्य तुर्की भी है और जिसकी सेना अमेरिका के बाद सबसे बड़ी है.
यूएई और भारत के बीच द्विपक्षीय रणनीतिक रक्षा साझेदारी को लेकर मध्य-पूर्व की न्यूज़ विश्लेषण वेबसाइट मिडिल ईस्ट आई तुर्की ब्यूरो चीफ़ रेइप सोयलु ने एक्स पर लिखा है, ''ऐसा प्रतीत होता है कि यूएई, परमाणु शक्ति संपन्न पाकिस्तान के साथ सऊदी अरब के रक्षा समझौते का संतुलन बनाने के लिए, परमाणु शक्ति संपन्न भारत के साथ साझेदारी कर रहा है.''
क्या भारत और यूएई के बीच रणनीतिक रक्षा साझेदारी को सऊदी अरब और पाकिस्तान के डिफेंस पैक्ट के बरक्स देखना चाहिए?
इस सवाल के जवाब में सऊदी अरब में भारत के राजदूत रहे तलमीज़ अहमद ने बीबीसी हिन्दी से कहा, ''यूएई के राष्ट्रपति का दौरा बहुत ही अहम था. हमारी स्ट्रैटिजिक पार्टनर्शिप तो पहले से ही थी लेकिन डिफेंस उस तरह से इसमें शामिल नहीं था. डिफेंस को उस वक़्त शामिल किया जा रहा है, जब ईरान और अमेरिका में तनातनी है, ग़ज़ा का मसला सुलझा नहीं है, सोमानीलैंड को लेकर यूएई इसराइल के साथ दिख रहा है, सऊदी और यूएई में तनाव बढ़ा हुआ है और पाकिस्तान सऊदी के डिफेंस पैक्ट में तुर्की भी शामिल होना चाहता है.''
तलमीज़ अहमद कहते हैं, ''ऐसे समय में भारत और यूएई की द्विपक्षीय रणनीतिक रक्षा साझेदारी को इन पहलुओं से जोड़ना बहुत हैरान नहीं करता है. सऊदी अरब और पाकिस्तान के डिफेंस पैक्ट में तुर्की आता है तो इसे भारत के लिए कम से कम सकारात्मक रूप में तो नहीं देखा जाएगा. बहुत ही अनिश्चतता भरा माहौल है.''

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सऊदी और पाकिस्तान से जोड़ने पर भारत ने क्या कहा?
''मुझे लगता है कि यूएई के राष्ट्रपति से भारत के प्रधानमंत्री की सऊदी और पाकिस्तान के डिफेंस पैक्ट पर ज़रूर बात हुई होगी. भारत को कैसे रिएक्ट करना है, इसे भी गंभीरता से सोचना होगा. पाकिस्तान को अचानक से प्रासंगकिता मिल गई है. पाकिस्तान को सऊदी बुला रहा है, तुर्की साथ चाहता है और राष्ट्रपति ट्रंप भी तवज्जो दे रहे हैं. ऐसे में भारत की रणनीति पश्चिम एशिया में कैसी होगी, यह बड़ा सवाल है.''
पिछले साल से तुर्की और सऊदी अरब के संबंध गहरा रहे हैं. लेकिन इसके पीछे की वजह क्या है?
मिडिल ईस्ट इंस्टिट्यूट टर्किश प्रोग्राम की फाउंडिंग डायरेक्टर गोनुल तोल मानती हैं कि सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ संबंध, अमीराती नेता मोहम्मद बिन ज़ाएद की तुलना में अधिक मज़बूत हैं. इस समीकरण को तुर्की के अधिकारी वॉशिंगटन के साथ लंबित मुद्दों के समाधान में संभावित रूप से उपयोगी मानते हैं. इन्हीं कारणों से प्रेरित होकर हाल के वर्षों में तुर्की और सऊदी अरब के बीच रक्षा और वित्तीय संबंध गहरे हुए हैं.
यूएई पश्चिम एशिया में और जीसीसी में अलग नीति पर चल रहा है. यूएई ने 2020 में इसराइल को एक संप्रभु देश के रूप में मान्यता देते हुए राजनयिक संबंध स्थापित किया था. अभी इसराइल ने सोमालिया के भीतर सोमानीलैंड को मान्यता दी तो पश्चिम एशिया के लगभग सभी इस्लामिक देशों ने निंदा की थी लेकिन यूएई चुप रहा.
तलमीज़ अहमद को लगता है कि पाकिस्तान और सऊदी के डिफेंस पैक्ट की सीमा होगी क्योंकि इसराइल भी इसे लेकर बहुत सहज नहीं होगा.
यूएई के राष्ट्रपति के जाने के बाद भारत के विदेश सचिव विक्रम मिसरी ने पत्रकारों को संबोधित किया और कई सवालों के जवाब दिए. विक्रम मिसरी से पूछा गया कि क्या भारत और यूएई की रक्षा साझेदारी भविष्य में गल्फ़ के किसी टकराव में खींच सकती है?
इसके जवाब में विक्रम मिसरी ने कहा, "मैं इसे दोनों देशों के बीच पहले से मौजूद पर्याप्त रक्षा सहयोग का स्वाभाविक विकास मानूंगा, न कि क्षेत्र में घटित किसी विशेष घटना की प्रतिक्रिया के रूप में या भविष्य के किसी काल्पनिक स्थिति में शामिल होने के इरादे के तौर पर."
17 सितंबर, 2025 को रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर होने के बाद सऊदी-पाकिस्तान रक्षा सहयोग और मज़बूत हुआ है. सऊदी-पाक सैन्य गठबंधन यमन में सक्रिय रहा है, जिससे यमन में सऊदी अरब के पूर्व सहयोगी रहे यूएई पर दबाव बढ़ा है.

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भारत के लिए सऊदी और यूएई दोनों अहम
सऊदी अरब और यूएई, दोनों ही भारत के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा आपूर्तिकर्ताओं में शामिल हैं और इसके अलावा बड़ी संख्या में भारतीय प्रवासी कामगार भी इन देशों में रहते हैं. भारत ने अपने महत्वपूर्ण हितों को देखते हुए खाड़ी क्षेत्र में संघर्षों और शत्रुता के मामलों में परंपरागत रूप से सतर्क रुख़ अपनाया है.
विक्रम मिसरी ने कहा कि भारत की रक्षा भागीदारी केवल यूएई के साथ ही नहीं बल्कि "क्षेत्र के कुछ अन्य देशों के साथ भी" बढ़ी है.
दिलचस्प है कि यूएई के राष्ट्रपति के नई दिल्ली आने के बाद सऊदी अरब के विदेश मंत्री की पाकिस्तान और तुर्की के विदेश मंत्री से बात हुई. सऊदी अरब के विदेश मंत्रालय ने इस बातचीत की जानकारी देते हुए कहा है कि दोनों देशों के विदेश मंत्रियों से इलाक़े में हालिया घटनाक्रम पर चर्चा हुई है.
तलमीज़ अहमद कहते हैं कि पाकिस्तान की तरह सऊदी अरब से भी भारत के अच्छे संबंध हैं लेकिन पाकिस्तान सऊदी अरब को सुरक्षा की गारंटी देता है और भारत ऐसा नहीं करता है. परमाणु परीक्षण के बाद लगे कड़े प्रतिबंधों का मुक़ाबला करने के लिए भी सऊदी अरब ने पाकिस्तान की मदद की थी.
सामरिक मामलों के विशेषज्ञ ब्रह्मा चेलानी मानते हैं कि मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद भारत और यूएई के संबंधों में ऐतिहासिक परिवर्तन आया है.
चेलानी ने एक्स लिखा है, ''संयुक्त अरब अमीरात अब भारत का तीसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार और दूसरा सबसे बड़ा निर्यात गंतव्य है, साथ ही वह भारत का एक महत्वपूर्ण ऊर्जा साझेदार भी है. यह भारत के रणनीतिक तेल भंडारण कार्यक्रम में भाग लेने वाला पहला देश भी था. दोनों देशों ने रुपये और दिरहम में व्यापार को सक्षम बनाया है, जिससे अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम हुई है.''

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इस दौरे को पाकिस्तान सऊदी से जोड़ना कितना सही?
चेलानी ने लिखा है, ''शीर्ष स्तर पर संवाद और सहभागिता तेज़ी अभूतपूर्व रही है और यही द्विपक्षीय संबंधों की इस "नई ऊंचाई" का मुख्य कारक है. पिछले एक दशक में प्रधानमंत्री मोदी ने यूएई की सात बार यात्रा की है जबकि यूएई के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन ज़ाएद अल नहयान पांच बार भारत आए हैं.''
यूएई में भारत के राजदूत रहे केसी सिंह ने लिखा है, ''यूएई ने बिना टकराव वाली विदेश नीति अपनाई है. खाड़ी और पश्चिम एशिया, अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों से और अधिक अस्थिर हो गए हैं और यह भारत के लिए भी किसी चुनौती से कम नहीं है.''
दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के पश्चिम एशिया अध्ययन केंद्र में असोसिएट प्रोफ़ेसर मोहम्मद मुदस्सिर क़मर यूएई और भारत के बीच रणनीतिक रक्षा साझेदारी को पाकिस्तान और सऊदी अरब के डिफेंस पैक्ट का जवाब नहीं मानते हैं.
मुदस्सिर क़मर कहते हैं, ''हम पश्चिम एशिया में भारत की हर नीति को पाकिस्तान के आईने में नहीं देख सकते हैं. पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच भले डिफेंस पैक्ट पर पिछले साल सितंबर में हस्ताक्षर हुए थे लेकिन दोनों देशों के बीच सैन्य संबंध दशकों से है.''
मुदस्सिर क़मर कहते हैं, ''ये बात ज़रूर है कि पश्चिम एशिया में अभी जो हालात हैं, उनमें यूएई, इसराइल और भारत एक साथ दिख रहे हैं. दूसरी तरफ़ पाकिस्तान उस खेमे में दिख रहा है, जिसमें ज़्यादातर इस्लामिक देश हैं. लेकिन इसे हम स्थायी हालात के रूप में नहीं देख रहे हैं. यूएई और सऊदी अरब का तनाव भी एमबीज़ेड और एमबीएस के बीच पर्सनल ईगो के कारण है. दोनों के बीच स्थिति कुछ ही महीनों में बेहतर हो सकती है. यमन से यूएई का चुपचाप निकल जाना बताता है कि वह सऊदी अरब से टकराव नहीं चाहता है. ऐसे में यूएई और भारत की दोस्ती को हम पश्चिम एशिया के हालिया हालात से सीधे नहीं जोड़ सकते हैं.''
यूएई भारत का तीसरा सबसे बड़ा कारोबारी साझेदार है जबकि भारत यूएई का दूसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है. वित्त वर्ष 2024–25 में भारत का यूएई से आयात 63 अरब डॉलर से अधिक रहा.
भारत के लिए यूएई दूसरा सबसे बड़ा निर्यात गंतव्य है, जहाँ उसी वित्त वर्ष में निर्यात 37 अरब डॉलर तक पहुंच गया. दोनों देशों ने 2032 तक द्विपक्षीय व्यापार 200 अरब डॉलर तक ले जाने का लक्ष्य रखा है.
फ़रवरी 2022 में दोनों देशों के बीच व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते पर हस्ताक्षर होने के बाद इस मज़बूत व्यापारिक रिश्ते को और बल मिला, जिससे व्यापार और निवेश के नए अवसर खुले. यूएई दुनिया में भारतीय पासपोर्ट धारकों की सबसे बड़ी संख्या की मेज़बानी करता है, जहां 43 लाख से अधिक भारतीय प्रवासी रहते हैं, जो देश की कुल आबादी का लगभग 35 प्रतिशत हैं.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.












