क्या जानवर भी स्वार्थी या मददगार होते हैं?

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आपने कई बार लोगों को ये कहते सुना होगा कि फलां शख़्स बड़ा ख़ुदग़र्ज़ है. या फिर किसी की तारीफ़ में ये भी कहते सुना होगा कि बड़ा परोपकारी है. जब लोगों के ख़ुदग़र्ज़ या परोपकारी होने की बातें सुनते हैं, तो आपके ज़ेहन में ये सवाल नहीं आता कि आख़िर लोग ऐसे क्यों होते हैं? वो क़ुदरतन ऐसे होते हैं या आस-पास के माहौल से उनका व्यवहार तय होता है? क्या दूसरे जानवरों में भी दूसरों की मदद करने की या स्वार्थी होने की आदत होती है?
चलिए पता लगाने की कोशिश करते हैं.

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आपने अक्सर देखा होगा कि जुगाली करती गाय-भैंसों के ऊपर तमाम परिंदे बैठे होते हैं. वो उनकी चमड़ी से कुछ चुन रहे होते हैं. लोग ये सोचते हैं कि ये परिंदे, गाय-भैंसों के बदन से चिपके कीड़े साफ़ करके उनका भला करते हैं. मगर होता यूं है कि वो अपनी चोंच से गाय-भैंसों का मांस भी नोचते रहते हैं. इस तरह ये परिंदे बड़े जानवरों का भला करने से ज़्यादा उन्हें नुक़सान पहुंचा रहे होते हैं.
क़ुदरत में दो जानवरों के बीच परोपकार का रिश्ता कम ही देखने को मिलता है. क्योंकि प्रकृति चार्ल्स डार्विन के 'सरवाइवल ऑफ फिटेस्ट' के सिद्धांत पर चलती है. इसका मतलब है कि ज़िंदगी की रेस में जो सबसे बेहतर होगा वही बचेगा. उसी की नस्लें आगे बढ़ेंगी. अब जब मुक़ाबला इतना गला-काट हो, तो भला दूसरों की भलाई की किसे सूझेगी? सब तो ख़ुद को आगे बढ़ाने के बारे में ही सोचेंगे.
फिर इंसान कैसे परोपकार की सोचता है, करता है? आख़िर इंसान भी तो इसी क़ुदरती प्रक्रिया का हिस्सा है, जिसमें वही बचेगा जो सबसे बेहतर होगा. फिर हम दूसरों की भलाई करने के बारे में कैसे सोचते हैं?

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चार्ल्स डार्विन को भी इस सवाल ने बहुत सताया था. उन्होंने अपनी क़िताब 'द डीसेंट ऑफ़ मैन' में इस बारे में विस्तार से लिखा है.
डार्विन के मुताबिक़ दूसरों की भलाई के लिए जान देने वाले, जब ख़ुद को दूसरों के लिए क़ुर्बान करते हैं. तो फिर उनका ये गुण अगली पीढ़ी में कैसे जाएगा? जब वो अपनी ज़िंदगी दूसरों पर न्यौछावर कर देंगे, तो, उनकी नस्ल तो आगे बढ़ेगी नहीं. ऐसे में दूसरों की भलाई हमारी अपनी हस्ती को मिटा देने वाली होती है.
मगर क़ुदरत में ऐसी बहुत सी मिसालें मिलती हैं, जब जानवर एक दूसरे की मदद करते हैं. कई बार अपनी जान पर खेलकर जानवर दूसरों की मदद करते हैं. जैसे कि बंदरों की तमाम प्रजातियां दूसरे साथियों के बच्चों को पालती हैं. परिंदे, किसी ख़तरे को देखकर शोर मचाकर दूसरों को आगाह करते हैं. इसी तरह अफ्रीकी जंगली कुत्ते, दूसरे साथियों के बच्चों की रखवाली करते हैं.

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वैसे दूसरों की भलाई के जानवरों के ये काम उन्हें नुक़सान पहुंचाने वाले नहीं होते. लेकिन इसकी मिसालें भी मिलती हैं.
जैसे अमरीका में पाई जाने वाली बेल्डिंग गिलहरी को ही लीजिए. इसके झुंड के ऊपर जब कोई ख़तरा मंडराता है, तो उस ख़तरे को सबसे पहले देखने वाली गिलहरी ख़ूब शोर मचाकर दूसरों को आगाह करती है. कई बार वो गिलहरी ख़ुद रुकी रहती है और दूसरों को जाने देती है. ताकि ख़ुद की बलि देकर बाक़ियों को बचा सके. इसमें ख़तरा ये रहता है कि गिलहरियों के शिकार के लिए आया जानवर, इस शोर मचाने वाली को पकड़कर खा सकता है. मगर बेल्डिंग गिलहरियां, जान का ये जोखिम उठाकर भी साथियों को ख़तरे से बचाती हैं. ये परोपकार का ही काम हुआ. जिसमें बेल्डिंग गिलहरियां अपनी ज़िंदगी को दांव पर लगा देती हैं.

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डार्विन ने जब अपनी 'थ्योरी ऑफ इवोल्यूशन' लिखी थी तब से ये सवाल वैज्ञानिकों को परेशान किए हुए था. क़रीब सौ बरस बाद इसका जवाब दिया जे बी एस हाल्डेन नाम के वैज्ञानिक ने. जब हाल्डेन से पूछा गया कि क्या अपने भाई की जान बचाने को आप अपनी ज़िंदगी को दांव पर लगाएंगे? तो हाल्डेन ने कहा कि एक भाई को बचाने के लिए तो नहीं, मगर दो भाइयों या फिर आठ चचेरे भाइयों को बचाने के लिए वो ऐसा ज़रूर करेंगे.
1963 में मशहूर जीव वैज्ञानिक डब्ल्यू डी हैमिल्टन ने 'किन सेलेक्शन' का सिद्धांत दिया था. जिसके मुताबिक़ अपने ख़ानदान को बचाने के लिए लोग अक्सर अपनी ज़िंदगी को दांव पर लगाने को तैयार रहते हैं. ये काम कई जानवर भी करते हैं. जैसे कि बेल्डिंग गिलहरी. जो एक बलिदान देकर परिवार के दूसरे कई सदस्यों की जान बचाने को तैयार रहती है. ताकि उनकी नस्ल चलती रहे.

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होता ये है कि जानवरों के परिवार के सदस्यों के कई जीन एक दूसरे से मिलते हैं. ऐसे में जब बाक़ी लोग ज़िंदा रहेंगे, तो जानवरों के वो जीन अगली पीढ़ी तक जा सकेंगे. उनकी प्रजाति बची रहेगी. यही वजह है कि गिलहरियां, अपने परिवार के लोगों के लिए जान क़ुर्बान करने को राज़ी होती हैं.
हालांकि सत्तर के दशक में कॉर्नेल यूनिवर्सिटी के पॉल शर्मन ने एक और ही दावा किया. उन्होंने बेल्डिंग गिलहरियों के इस परोपकारी भाव पर गहराई से नज़र रखी तो पाया कि ये गिलहरियां हर बार अपने परिवार-रिश्तेदारों के लिए ही नहीं जान पर खेलतीं. अक्सर ये उन गिलहरियों को भी बचाती हैं जिनसे इनका ख़ून का रिश्ता नहीं होता.
वैसे दूसरों की भलाई के लिए अपने हित क़ुर्बान करने का जज़्बा मधुमक्खियां भी दिखाती हैं. जिनके झुंड में सिर्फ़ एक रानी मक्खी हो सकती है जो नस्ल को आगे बढ़ाने की ज़िम्मेदारी निभाती है. बाक़ी मधुमक्खियां तो उसकी सेवा-टहल और छत्ता बनाने में ज़िंदगी बिता देती हैं. ये दूसरों के लिए अपने हक़ की क़ुर्बानी देना ही हुआ.

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सिर्फ़ नस्ल बचाने के लिए नहीं, जानवर कई बार अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए भी परोपकार करते हैं. इसके लिए 1984 में अमरीकी वैज्ञानिक जेराल्ड विल्किंसन के एक तजुर्बे की मिसाल दी जाती है. जेराल्ड ने वैम्पायर चमगादड़ों पर रिसर्च की थी. उन्होंने देखा कि ये चमगादड़ 36 घंटे से ज़्यादा भूखे नहीं रह पाते. ऐसे में उन्होंने देखा कि कई चमगादड़ अपने भूखे साथियों को अपने मुंह से ख़ून निकालकर पिलाते हैं. ये तरीक़ा होता बड़ा गंदा है. मगर इससे भूखे चमगादड़ों की जान बच जाती है. जो चमगादड़ अपने ख़ून से दूसरे साथियों का पेट भरते हैं, वो ऐसा शायद इस उम्मीद में करते हैं कि जब उन्हें ख़ाना नहीं मिलेगा, तो शायद इनके पेट भरे हों, तब उन्हें इन भूखे चमगादड़ों से मदद की उम्मीद रहती है.
मशहूर वैज्ञानिक रॉबर्ट ट्राइवर्स इसे लेन-देन वाला परोपकार कहते हैं. वो कहते हैं कि भलाई का ये काम करके चमगादड़ अपने बुरे वक़्त के लिए निवेश कर रहे होते हैं. बहुत से इंसान भी ऐसा करते हैं.

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वैसे, इंसानों और चमगाद़ड़ों की तरह स्वार्थ सिद्धि वाली भलाई का काम करने की मिसालें क़ुदरत में कम ही मिलती हैं. क्योंकि ज़िंदगी में आगे चलकर क्या होगा, इसका किसको पता?
हालांकि नि:स्वार्थ भलाई हो या फिर लेन-देन वाला परोपकार, दोनों में ही भलाई करने वाले का भला छुपा होता है. जो गिलहरी अपनी जान देकर दूसरों को बचाती है, वो अपनी नस्ल के लिए फ़िक्रमंद होती है. वहीं जो चमगादड़ अपने ख़ून से दूसरे साथियों का पेट भरते हैं, वो आगे चलकर उससे मदद की उम्मीद लगाए रहते हैं.
यानी हर परोपकार के पीछे ख़ुदग़र्ज़ी छुपी होती है. तो क्या इंसान, बिना अपने स्वार्थ की सोचे, दूसरों की मदद करते हैं. शायद नहीं. क्योंकि भलाई करने वाले भी यही सोचते हैं कि उनका लोक-परलोक सुधरेगा. अक्सर लोग यही सोचकर दान देते हैं.
हालांकि लंदन स्कूल ऑफर इकोनॉमिक्स में दर्शन शास्त्र के प्रोफ़ेसर जोनाथन बिर्च मानते हैं कि इंसान ख़ुद की सोचे बग़ैर दूसरों की भलाई के लिए काम करते हैं. वो कहते हैं कि ये वो परोपकार का गुण नहीं, जो क़ुदरती तौर पर हमें मिला है. असल में ये दूसरों की भलाई का वो जज़्बा है जो हमारे दिमाग़ की उपज है. इंसान सामाजिक प्राणी है. वो जिस समाज में पला-बढ़ा है उसमें दूसरों की भलाई की बातें अच्छी मानी जाती हैं. इसलिए कई बार लोग अपनी भलाई की सोचे बिना दूसरों की मदद करते हैं.
अमरीका की ड्यूक यूनिवर्सिटी के माइकल प्लैट ने इस बारे में काफ़ी काम किया है. वो मानते हैं कि दूसरों की भलाई के मामले में इंसान और दूसरे जानवरों में ज़्यादा फ़र्क़ नहीं. उनके मुताबिक़, इस मसले पर इंसान हो या बंदर या फिर चूहे, उनके दिमाग़ में कोई अंतर नहीं होता.
उन्होंने र्हीसस बंदरों पर रिसर्च की है. बंदर भी इंसानों की तरह सामाजिक प्राणी हैं. झुंड में रहते हैं. उनके और इंसान के दिमाग़ में भलाई की बात एक ही जगह से उठती है. डार्विन ने लिखा था कि नैतिकता का ख़याल हमें बाक़ी जानवरों से अलग करता है. मगर माइकल प्लैट का तजुर्बा तो हमें अपने बाक़ी क़ुदरती रिश्तेदारों के क़रीब ले जाता है.

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अब चिंपैंजी को ही लीजिए. ये अपने बाक़ी साथियों की उसी तरह मदद करते हैं, जैसे बच्चे एक दूसरे के साथी बनकर मदद का हाथ बढ़ाते हैं. यानी चिंपैंजी और इंसानों में भलाई करने के मामले में कोई फ़र्क़ नहीं होता. वो मुश्किल वक़्त में एक दूसरे का हाथ थामते हैं.
माइकल प्लैट कहते हैं कि अगर हम ये सोचते हैं कि हम भलाई का काम बिना किसी लालच के कर सकते हैं. तो कई जानवर भी ऐसा करते हैं.
यानी भलाई के मामले में इंसान और जानवरों में फ़र्क़ करना ज़रा मुश्किल है. वैसे इस मुद्दे पर अभी तमाम रिसर्च जारी हैं. इसलिए किसी नतीजे पर पहुंचना भी ग़लत होगा.
फिलहाल तो आप भलाई करते रहिए. आपको अच्छा महसूस होगा.
(अंग्रेज़ी में मूल लेख पढ़ने के लिए <link type="page"><caption> यहां क्लिक</caption><url href="http://www.bbc.com/earth/story/20160718-there-is-no-such-thing-as-a-truly-selfless-act" platform="highweb"/></link> करें, जो <link type="page"><caption> बीबीसी अर्थ</caption><url href="http://www.bbc.com/earth/uk" platform="highweb"/></link> पर उपलब्ध है.)
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