'जंग पर बनी अच्छी फ़िल्म एंटी वॉर फ़िल्म होती है': बॉर्डर, इक्कीस और युद्ध पर सिनेमा की बहस

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- Author, वंदना
- पदनाम, सीनियर न्यूज़ एडिटर, बीबीसी न्यूज़
1971 की भारत-पाकिस्तान जंग पर बनी फ़िल्में बॉर्डर और इक्कीस सिर्फ़ वीरता की कहानियाँ नहीं कहतीं, बल्कि युद्ध की कीमत और इंसानियत के सवाल भी उठाती हैं.
1971 की भारत-पाकिस्तान जंग पर दो बॉलीवुड फ़िल्में इस साल जनवरी में आई हैं. पहली थी – इक्कीस और दूसरी बॉर्डर-2.
बॉर्डर-2 में सनी देओल ने मेजर जनरल हरदेव सिंह कलेर, वरुण धवन ने मेजर होशियार सिंह दहिया और दिलजीत दोसांझ ने निर्मलजीत सिंह सेखों का रोल अदा किया है.
बॉर्डर-2, साल 1997 में रिलीज़ हुई फ़िल्म बॉर्डर के 29 साल बाद आई है, जिसमें अक्षय खन्ना ने सेकेंड लेफ़्टिनेंट धरमवीर सिंह का रोल निभाया था. अक्षय खन्ना इन दिनों फ़िल्म धुरंधर में रहमान डकैत के रोल के लिए चर्चा में बने हुए हैं.
'जंग की फ़िल्म एंटी वॉर फ़िल्म होती है'
1971 की जंग पर ही बनी इक्कीस के डायरेक्टर श्रीराम राघवन ने पत्रकार बारदवाज रंगन से बातचीत में कहा था कि जंग पर बनी कोई भी अच्छी फ़िल्म दरअसल एंटी वॉर फ़िल्म होती है.
29 साल पहले निर्देशक जे. पी. दत्ता की फ़िल्म बॉर्डर में एक सीन है, जिसमें सुनील शेट्टी (भैरों सिंह) पूछते हैं – तुमने फ़ौज क्यों जॉइन की?
धरमवीर सिंह (अक्षय खन्ना) कहते हैं, "अपने प्यार का वास्ता देकर मुझसे वचन लिया था पिताजी ने कि मैं फ़ौज ही जॉइन करूँगा. वतन की मोहब्बत के जोश में अपने बेटे को वर्दी की ज़ंजीर पहना गए. हाथ में बंदूक थमा दी कि सामने वाले फ़ौजी को गोली से उड़ा दो. वो फ़ौजी जो मेरी तरह किसी माँ का बच्चा है, जिसको मैंने ज़िंदगी में कभी नहीं देखा. जिसने मेरा कुछ नहीं बिगाड़ा. जिसका नाम तक मैं नहीं जानता. आख़िर क्यों, किस लिए?"
भैरों सिंह (सुनील शेट्टी) जवाब देते हैं, "इसलिए क्योंकि अगर तुम उसे नहीं मारोगे तो वह तुम्हें जान से मार डालेगा?"
अपने सवालों के बावजूद, फ़िल्म में अक्षय खन्ना जंग में लड़ते भी हैं और मैदाने-जंग में उनकी मौत भी होती है.
जब दोनों ही की गलियों में, कुछ भूखे बच्चे रोते हैं…

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बॉर्डर में भारत-पाकिस्तान युद्ध के लंबे-चौड़े सीन थे. फ़िल्म में ऐसे कई डायलॉग थे, जिनमें देश पर मर मिटने का जज़्बा दिखाया गया था. इन पर थिएटरों में भर-भर कर तालियाँ बजती थीं.
मसलन, जब मेजर कुलदीप बने सनी देओल को जंग में जाने और अपने बच्चे की ख़ातिर ट्रांसफ़र रुकवाने में से एक को चुनना होता है, तो वो पत्नी से कहता है कि 'तेरा कुलदीप अपने बच्चे को देश पर कभी भी कुर्बान कर सकता है.'
या जब धरमवीर सिंह (अक्षय खन्ना) जंग के मैदान में दम तोड़ते हैं और उन्हें अपनी अंधी माँ का चेहरा दिखाई देता है, जो उनके लिए सेहरा बुन रही होती है, तो दर्शकों की आँखें नम हो जाती हैं.
लेकिन इसी फ़िल्म के आख़िर में जब ये गीत बजता है – मेरे दुश्मन मेरे हमसाए… – तो भी कई लोगों को भावुक बनाता है.
इसमें गीतकार लिखता है – हम अपने-अपने खेतों में, गेहूँ की जगह चावल की जगह ये बंदूकें क्यों बोते हैं, जब दोनों ही की गलियों में, कुछ भूखे बच्चे रोते हैं… आ खाएँ क़सम अब जंग नहीं होने पाए.
बॉर्डर फ़िल्म रिलीज़ होने के दो साल बाद ही भारत और पाकिस्तान के बीच कारगिल युद्ध हुआ. बाद में इस जंग पर शेरशाह फ़िल्म बनाई गई थी. शेरशाह कारगिल युद्ध में मरणोपरांत परमवीर चक्र हासिल करने वाले कैप्टन विक्रम बत्रा की कहानी पर आधारित थी.
दिलजीत बने निर्मलजीत सिंह सेखों

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अगर बात करें बॉर्डर-2 की, तो ये 1971 के भारत-पाक युद्ध पर बनी फ़िल्म है.
फ़्लाइंग ऑफ़िसर निर्मलजीत सिंह सेखों (दिलजीत दोसांझ) 1971 की जंग के दौरान श्रीनगर में तैनात थे.
पंजाब में लुधियाना के इसेवाल गाँव में जन्मे निर्मलजीत सिंह सेखों भारतीय वायुसेना के एकमात्र परमवीर चक्र विजेता हैं.
पंजाब में लुधियाना के इसेवाल गाँव में जन्मे निर्मलजीत सिंह सेखों 1971 की जंग के दौरान श्रीनगर में तैनात थे.
भारतीय रक्षा मंत्रालय के नोट के मुताबिक़, "जब 14 दिसंबर 1971 को पाकिस्तान की ओर से हवाई हमला हुआ तो पाकिस्तान के छह विमान मंडरा रहे थे. इसी बीच फ़्लाइंग ऑफ़िसर सेखों ने उड़ान भरी. कॉम्बैट के बाद पाकिस्तानी विमानों को वहाँ से हटना पड़ा और बेस पर हमले की योजना को छोड़ना पड़ा. लेकिन फ़्लाइंग ऑफ़िसर सेखों का विमान क्रैश हो गया, जिसमें उनकी मौत हो गई."
बॉर्डर में अक्षय खन्ना की मौत, पर असल धरमवीर जंग में रहे थे ज़िंदा
बॉर्डर-2 की तरह बॉर्डर फ़िल्म में भी दिखाया गया था कि मुख्य किरदारों, अक्षय खन्ना और सुनील शेट्टी की जंग के मैदान पर मौत हो जाती है.
हालांकि असल ज़िंदगी में लुधियाना के घुड़ाणी कलां गाँव में जन्मे धरमवीर सिंह कर्नल के रैंक तक पहुँचे थे और उनकी मौत मई 2022 में हुई थी.
कर्नल धरमवीर सिंह ने 2017 में हिंदुस्तान टाइम्स को दिए इंटरव्यू में बताया था, "जब 1997 में बॉर्डर रिलीज़ होने वाली थी तो निर्देशक जे. पी. दत्ता ने मुझे कॉल किया कि सेंसर बोर्ड फ़िल्म रिलीज़ नहीं कर रहा, क्योंकि इसमें उनके किरदार को शहीद होते हुए दिखाया गया है."
"जे. पी. दत्ता ने कहा कि मुझे फ़ैक्स करना होगा कि उन्हें कोई ऐतराज़ नहीं है. कई लोगों ने मुझसे क़ानूनी एक्शन लेने को कहा. लेकिन मैंने सबसे यही कहा कि ये जेंटलमैन जैसा व्यवहार नहीं होगा."
इसी तरह 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में बीएसएफ़ के हीरो रिटायर्ड नाइक भैरों सिंह राठौड़ का किरदार बॉर्डर में सुनील शेट्टी ने निभाया था और असल में उनकी मौत 19 दिसंबर 2022 को हुई.
उन्हें 1972 में सेना मेडल दिया गया था.
'राज़ी की सहमत – मुल्क़ के आगे कुछ नहीं, ख़ुद भी नहीं'

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जंग और देश के लिए जासूसी पर बनी बहुत-सी फ़िल्मों में हीरोइज़्म एक अहम हिस्सा होता है. भारत-पाकिस्तान के इर्द-गिर्द बनी 'धुरंधर' ने तारीफ़ और आलोचना दोनों बटोरी.
वरिष्ठ फ़िल्म पत्रकार पंकज शुक्ल मानते हैं कि सिनेमा वो होता है, जो अपना अलग-सा, इंसानियत को बचाने वाला नैरेटिव लेकर आए.
हालांकि इस पर राय बंटी हुई है. अनुराग अवस्थी भारतीय सेना में कर्नल के पद पर तैनात रहे हैं.
एक्स पर वो लिखते हैं, "फ़िल्म इक्कीस परमवीर चक्र विजेता सेकेंड लेफ़्टिनेंट अरुण खेत्रपाल के 'आइकॉनिक शौर्य और विरासत' को केंद्र में रखने के बजाय ग़ैर-ज़रूरी 'पैसिफ़िस्ट प्रूडेंस' पर ज़्यादा ज़ोर देती है."
वहीं वरिष्ठ फ़िल्म पत्रकार अजय ब्रह्मात्ज कहते हैं, "इक्कीस अरुण खेत्रपाल की शहादत की कहानी तो है ही, लेकिन ये युद्ध की विभीषिका के साथ ही मानवता की कहानी भी है. माफ़ कर देने की कहानी है. ये आख़िरकार युद्ध के ख़िलाफ़ जाती है."
युद्ध और जासूसी पर बनी फ़िल्मों की बात करें तो फ़िल्म राज़ी भी याद आती है. ये फ़िल्म एक असल भारतीय अंडरकवर महिला एजेंट पर आधारित हरिंदर सिक्का के उपन्यास पर बनी थी.
सहमत (आलिया भट्ट) पाकिस्तान में अंडरकवर एजेंट बनकर रहती हैं और एक पाकिस्तानी फ़ौजी से शादी कर वहाँ से भारत के लिए जासूसी करती हैं.
उनका किरदार फ़िल्म में एक जगह कहता है – मुल्क़ के आगे कुछ नहीं, ख़ुद भी नहीं.
'न रिश्तों की क़दर है न जान की'

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राज़ी फ़िल्म के उस सीन ने कई दर्शकों को असहज कर दिया था, जब अपना सब कुछ खो जाने पर सहमत सवाल उठाती है, "नहीं समझ आती आपकी ये दुनिया. न रिश्तों की क़दर है न जान की. इससे पहले मैं पूरी तरह आप जैसी बन जाऊँ, मुझे इस सब से निकलना है. मुझे अपने घर जाना है."
इसी तरह फ़िल्म बॉर्डर, जंग और सैनिकों की कहानी होते हुए भी, इन फ़ौजियों के सपनों, बैरकों में होने वाली दोस्तियों और दिल के अधूरे अरमानों को भी जगह देती है.
जब रेगिस्तान में लंबे इंतज़ार के बाद सैनिकों की चिट्ठी आती है, तो नौ मिनट लंबा 'संदेसे आते हैं' गाना हर फ़ौजी के दिल की कहानी कह जाता है.
यहाँ बॉर्डर का एक सीन याद आ जाता है, जिसे लंबाई की वजह से फ़िल्म से हटाना पड़ा था.
सनी देओल ने रणवीर इलाहाबादिया के साथ पॉडकास्ट में बताया था, "युद्ध ख़त्म होने के बाद मैं वहाँ बने मंदिर में जाता हूँ. पीछे टूटा हुआ टैंक है. मुझे वो सारे सैनिक बैठे हुए दिखते हैं, जो मारे गए हैं. मैं उनसे कहता हूँ – तुम लोग अभी जिस दुनिया में हो, वो जन्नत है, वहाँ कोई जंग नहीं होती."
इस तरह की फ़िल्मों को लेकर सोशल मीडिया पर बहस जारी है.
इस बहस को समेटते हुए वरिष्ठ पत्रकार पंकज शुक्ल कहते हैं, "धुरंधर जियो स्टूडियो ने बनाई और 'इक्कीस' को डिस्ट्रिब्यूट भी जियो स्टूडियोज़ ने ही किया है. दोनों का नफ़ा-नुक़सान एक ही कंपनी का है, तो दोनों फ़िल्मों की तुलना करके सोशल मीडिया पर आपस में मत लड़िए."
बीबीसी के लिए कलेक्टिवन्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.












