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'किसान' अमिताभ की ज़मीन... | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
उत्तर प्रदेश के बाराबंकी ज़िले की उस विवादित ज़मीन पर फ़ैसला गुरुवार तक के लिए टाल दिया गया है जिसके बारे में अभिनेता अमिताभ बच्चन का दावा है कि यह उनकी ज़मीन है. फ़ैज़ाबाद में इस मामले की सुनवाई अतिरिक्त आयुक्त के यहाँ मंगलवार को पूरी हो गई है पर फ़ैसला सुनाने के बजाए इसे 31 मई के लिए सुरक्षित रखा गया है. ग़ौरतलब है कि बच्चन परिवार इस भू-खंड के बारे में दावा करता है कि यह उनकी खेती की ज़मीन है और इस आधार पर किसान हैं. पर स्थानीय प्रशासन ने पिछले वर्ष इस ज़मीन को परती की ज़मीन घोषित करते हुए बच्चन परिवार के उस दावे को खारिज कर दिया था और कहा था कि यह भूखंड बच्चन परिवार का नहीं है. बाद में अमिताभ बच्चन की ओर से इस बारे में फ़ैज़ाबाद के अतिरिक्त आयुक्त के यहाँ एक याचिका दायर की गई थी. विवाद दरअसल, इस विवाद की शुरुआत होती है पुणे में बच्चन परिवार की ओर से एक आठ हेक्टेअर की ज़मीन को ख़रीदने की कोशिश से. पुणे के पास स्थित इस मवाल क्षेत्र में ज़मीन ख़रीदने के लिए ख़रीददार का किसान होना ज़रूरी है. बच्चन परिवार यहाँ पर एक फार्म हाउस बनाना चाहता था. ख़ुद को किसान बताने के लिए उन्होंने जो काग़ज़ात जमा किए उनमें बताया गया था कि अमिताभ बच्चन बाराबंकी में एक भूखंड के मालिक हैं जो कृषि कार्य में इस्तेमाल होती है. ज़मीन के दस्तावेज के मुताबिक 11 जनवरी, 1983 से अमिताभ इस ज़मीन के मालिक हैं.
इस दस्तावेज को जाँच के लिए संबंधित अधिकारी ने बाराबंकी के कलेक्टर के कार्यालय भेजा. तत्कालीन कलेक्टर ने इसकी जाँच की और पाया कि यह बात मूल दस्तावेजों में बाद में दर्ज की गई थी. जाँच में यह भी कहा गया कि जिस स्याही से अमिताभ का नाम सरकारी कागज़ों में दर्ज है वो नई है और लिखावट भी दूसरी है. इसके बाद संबंधित लेखपाल को बर्ख़ास्त कर दिया गया और इसे फ़र्ज़ी चकबंदी घोषित करते हुए निरस्त कर दिया गया. यह भी आरोप लगे कि अमिताभ को इस मामले में राज्य की तत्कालीन सरकार से अच्छे संबंधों के चलते यह लाभ मिला. हालांकि बाद में कलेक्टर बदलने के बाद अमिताभ को कुछ राहत मिली और उन्हें इस मामले में पेश होकर अपनी बात रखने का मौका दिया गया. सुनवाई इसके बाद इस वर्ष आठ मई को अमिताभ बच्चन की ओर से फ़ैज़ाबाद में एक याचिका दायर की गई कि इस ज़मीन पर उनका मालिकाना हक़ बहाल किया जाए. पर कुछ दिनों बाद ही राज्य में सत्ता परिवर्तन हो गया और अब राज्य प्रशासन इस मामले की तेज़ी से सुनवाई कर रहा है. जानकारों का मानना है कि इस बारे में फ़ैसला दो बातों पर आधारित हो सकता है. एक तो यह कि इस मामले में बच्चन परिवार से ज़मीन जाँच रिपोर्ट के आधार पर वापस ले ली जाए और दूसरा यह कि कुछ लोगों के ख़िलाफ़ सरकारी दस्तावेज़ों के साथ छेड़छाड़ और धोखाधड़ी करने या करवाने का मामला दर्ज हो जाए. वैसे इसी ज़मीन को लेकर एक और विवाद भी बच्चन परिवार के साथ जुड़ा है. वर्ष 2006 में जब जया बच्चन ने राज्यसभा सदस्यता के लिए अपना नामांकन दाखिल किया था तो उसके साथ जमा किए गए संपत्ति के ब्यौरे में इस ज़मीन का उल्लेख नहीं था. कांग्रेस पार्टी के एक कार्यकर्ता ने इस शपथ-पत्र में जया बच्चन की ओर से साक्ष्य छिपाने की शिकायत दर्ज कराई थी. |
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