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दो परिवारों की दोस्ती और दुश्मनी | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
एक समय था जब वह देश के दो सबसे चर्चित परिवारों की दोस्ती थी और अब वह दो परिवारों की इस समय की सबसे चर्चित दुश्मनी है. दोस्ती का दुश्मनी में बदलना हालांकि खामोशी से हो गया था और आम लोग इसके बारे में ज़्यादा कुछ नहीं जानते थे. लेकिन पिछले दिनों यह पिटारा खुल गया और अब गाँधी नेहरु तथा बच्चन परिवार के बीच पिछले कुछ दिनों से वाकयुद्ध चल रहा है. इसकी शुरुआत की जया बच्चन ने. उन्होंने उपचुनावों के दौरान समाजवादी पार्टी यानी अपनी पार्टी के मंच से कहा, "जो हमें राजनीति में लेकर आए उन्होंने हमें बीच मंझधार में छोड़ दिया. उन्होंने हमें तब छोड़ा जब हम मुसीबत में थे. वे तो लोगों से विश्वासघात करने के लिए जाने जाते हैं." ज़ाहिर है कि बात गाँधी-नेहरु परिवार की ही हो रही थी. इसके जवाब में राजीव और सोनिया गाँधी के बेटे और अमेठी के सांसद राहुल गाँधी ने कहा कि यह सच नहीं है. राहुल गाँधी ने कहा, "गाँधी परिवार चालीस सालों से राजनीति में है, गाँधी-नेहरु परिवार ने किसी को धोखा नहीं दिया, लोग जानते हैं कि किसने किसके साथ विश्वासघात किया." राजा और रंक फ़िल्मों के महानायक बन चुके अमिताभ बच्चन अब तक परिदृश्य से बाहर थे. वे असल जीवन में भी किसी नायक की तरह आए और कहा, "वे (गाँधी परिवार) राजा हैं और हम (बच्चन परिवार) रंक और किसी भी स्थिति में राजा ही यह आधार बनाता है कि वह किससे कैसा संबंध रखेगा. रंक यह तय नहीं करता."
अमिताभ बच्चन ने बनारस में जो कुछ कहा उसका सीधा मतलब यह था कि गाँधी-नेहरु परिवार दोस्ती ख़ुद तोड़ी है और दूसरे यह कि उन्हें इस मामले में किसी का भी बोलना पसंद नहीं आ रहा है, उनकी पत्नी जया बच्चन का भी नहीं. उन्होंने कहा, "गाँधी-नेहरु परिवार से बच्चन परिवार की दोस्ती बाबूजी (हरिवंशराय बच्चन) के समय की है तब न श्रीमती जया बच्चन थीं, न श्रीमती सोनिया गाँधी थीं, न श्री राहुल गाँधी थे और न प्रियंका गाँधी." ज़ाहिर है कि चोट गहरी है. तीन पीढ़ियाँ और क्यों न हो, आख़िर तीन पीढ़ियों के प्रगाढ़ संबंधों का मामला है. हालांकि अब अमिताभ बच्चन और उनका परिवार समाजवादी पार्टी के महासचिव अमर सिंह का दोस्त है लेकिन हरिवंश राय बच्चन और अमिताभ बच्चन की जीवनियों और सोनिया गाँधी की राजीव पर आई किताब के हवाले से इस दोस्ती को देखें तो पता चलता है कि वह दोस्ती से बढ़कर कुछ थी.
इंदिरा गाँधी और तेजी बच्चन की दोस्ती तब से थी जब इंदिरा गाँधी की शादी भी नहीं हुई थी. इसके बाद दोनों परिवारों के बच्चों के बीच गहरी दोस्ती बनी रही. वे अलग अलग स्कूलों में पढ़ा करते थे लेकिन वे छुट्टियाँ एक साथ बिताते थे. जब राजीव गाँधी ने शादी नहीं की थी तो इटली से आकर सोनिया ने कुछ दिन बच्चन परिवार के साथ बिताए थे. वह सोनिया के लिए किसी आम भारतीय परिवार के साथ बिताए पहले-पहले दिन थे. इसके बाद जब राजीव गाँधी की शादी हुई तो इंदिरा गाँधी 1, सफ़दरजंग रोड में रहने आ गई थीं जबकि बच्चन परिवार का निवास पास ही 13,विलिंगडन क्रिसेंट में था. शादी की कुछ रस्में बच्चन परिवार के घर से ही पूरी हुई थीं. दोनों परिवारों की दोस्ती ही थी कि जब 'कुली' फ़िल्म की शूटिंग के दौरान जब अमिताभ घायल होकर ब्रीच कैंडी अस्पताल में पड़े थे तब राजीव गाँधी अमरीका से उन्हे देखने आए और इंदिरा गाँधी दिल्ली से वहाँ पहुँचीं थीं. लोगों को आज भी नहीं भूला है कि किस तरह सुपर स्टार बन चुके अमिताभ बच्चन ने इंदिरा गाँधी की मौत के बाद किस तरह राजीव गाँधी के कहने पर इलाहाबाद से चुनाव लड़ा और हेमवती नंदन बहुगुणा जैसे दिग्गज को हराया था.
राजीव गाँधी के कार्यकाल में ही बोफ़ोर्स तोप में दलाली के आरोपों के बाद अमिताभ बच्चन का राजनीति से मोह भंग हो गया लेकिन यह दोस्ती बरकरार रही. यहाँ तक कि राजीव गाँधी की मौत के बाद अमिताभ बच्चन गाँधी-नेहरु परिवार के क़रीब बने रहे. इस बीच अमिताभ बच्चन ने अपनी कंपनी एबीसीएल बनाई और भारी कर्ज में डूब गए. वे अमिताभ के मुसीबत के दिन थे और उन्हीं दिनों उनकी दोस्ती अमर सिंह से हुई. पता नहीं कब, पता नहीं किस बात पर गाँधी-नेहरु परिवार और नेहरु परिवार के बीच कोई फ़ांस आ गई. अब जिस तरह का माहौल दिखता है उसमें लगता नहीं कि गाँधी-नेहरु परिवार और बच्चन परिवार के बीच मधुरता के पुराने दिन अब कभी लौटेंगे. |
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