भूख..., 'मां भी दिन में एक बार ही खा पाती'

किसी अनजान भूखे आदमी से बात करना एक चीज़ है और जब वो आप ही के परिवार से हों तो बात अलग हो जाता है.
ऐसा ही कुछ अनुभव किया बीबीसी के व्लादिमीर हरनैनडिज़ ने जब वो रिपोर्टिंग करने के लिए अपने देश वेनेज़ुएला गए.
मुल्क का दौरा करते वक्त मैंने देखा कि खाना ख़रीदने के लिए सुपरमार्केट्स और सरकारी भंडारों के सामने लोगों की लंबी कतारें हैं.
एक जगह मुझे कुछ लोगों ने रोककर कहा कि वो पिछले तीन दिनों से केवल आम खाकर रह रहे हैं.
मैंने एक मां के चेहरे पर नाउम्मीदी का भाव देखा. लंबे वक्त से बहुत कम खाने से वो अपने बच्चे को दूध भी नहीं पिला पा रही थीं.
एक महिला से मिली जिन्हें लोग प्यार से 'ला गोर्दा' यानी 'मोटी' कहते थे. लेकिन पिछले एक साल में उनका वज़न इतना घट गया कि गाल पूरी तरह पिचक गए थे.
मुझे इन सारे लोगों पर बहुत दया आ रही थी, लेकिन सही मायने में मेरे परिवार के हालात ने मेरी आंखें खोल दीं.

मेरे भाई ने मुझसे कहा कि उनके सारे पैंट अब बहुत ढीले हो गए हैं. मेरे पिता, जो कभी शिकायत नहीं करते, कहने लगे कि हालात बेहद कठिन हैं.
मेरी मां ने भी कहा कि कभी-कभी वो दिन में केवल एक ही बार खाना खाती हैं.
वो सभी वेनेज़ुएला के अलग-अलग हिस्सों में रहते हैं, लेकिन किसी को भरपेट खाना नसीब नहीं हो रहा है. ये पूरे देश की समस्या है.
देश की तीन प्रमुख यूनिवर्सिटीज़ का अध्ययन बताता है कि 90 फीसदी लोग पिछले साल के मुक़ाबले इस साल बहुत कम खाना खा रहे हैं.
अध्ययन से ये भी पता चलता है कि 2014 की तुलना में वेनेज़ुएला में भूखमरी 53 फीसदी बढ़ गई है.
इसके कई कारण हैं - रोज़मर्रे के सामानों की क़िल्लत, ख़राब व्यवस्था, सट्टेबाज़ी, जमाख़ोरी और देश के तेल व्यापार में आई भारी गिरावट.
और साथ ही दुनिया में उच्चतम मुद्रास्फीति की दर. दिसंबर में वेनेज़ुएला की आधिकारिक मुद्रास्फीति की दर 180 फीसदी थी.
लेकिन अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष का अनुमान है कि साल के अंत तक ये 700 फीसदी हो जाएगा.

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सट्टेबाज़ी और जमाख़ोरी को रोकने के लिए सरकार ने सालों पहले कई वस्तु जैसे आटा, चिकन और ब्रेड की कीमतें तय कर दी थीं.
लेकिन लोग इस तय क़ीमत पर इन सामानों को केवल हफ्ते में एक ही बार खरीद सकते हैं, अपने पहचान पत्र के आख़िरी नंबर के आधार पर.
उदाहरण के तौर पर अगर वो 0 या 1 है तो वो सोमवार को ख़रीद सकते हैं. 2 या 3 हो तो मंगलवार और ऐसे ही.
इस डर से की सामान ख़त्म ना हो जाए, लोग तरके ही सुपरमार्केट पहुंच जाते हैं, शायद उससे भी जल्दी.
काराकास की एक सुबह 6 बजे मैं एक व्यक्ति से मिला जो तीन घंटों से क़तार में खड़े थे. तेज़ बारिश हो रही थी और उनके पास छाता भी नहीं था.
उन्होंने कहा, "मैं उम्मीद कर रहा हूं कि मुझे चावल मिल जाएगा. कई बार ऐसा भी हुआ कि मैं क़तार में खड़ा रहा और जब मेरी बारी आई तो चावल ख़त्म हो चुके थे."
अगर उनकी किस्मत साथ दे भी दे तो रोज़ उन्हें तय सीमा से ही सामान मिलेगा.
जिन लोगों को पर्याप्त खाद्य सामान नहीं मिलता उन्हें अपनी बारी दोबारा आने के लिए पूरा हफ्ता इंतज़ार करना पड़ता है.

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जैसे ही मुद्रास्फीति की दर बढ़ती है तो रेग्यूलेटेड क़ीमत में सामान ख़रीदने की होड़ मच जाती है और फिर उसकी काला बाज़ारी होती है.
काला बाज़ारी के कारण आटा के एक पैकेट की कीमत 100 गुना बढ़ सकती है.
सरकार ने इसके खिलाफ़ मुहिम चलाने का वादा तो किया है, लेकिन अब तक इसे रोकने में कामयाब नहीं हुए.
सालों से इस तेल के धनी देश में बाहर से खाने का सामान मंगाया जाता है जिससे लोगों को खाने की मूल वस्तुओं की सप्लाई की जा सके.
लेकिन आलोचकों का मानना है कि क़ीमतों में नियंत्रण और दिवंगत राष्ट्रपति ह्यूगो शावेज़ के राष्ट्रीयकरण के कार्यक्रम की वजह से ये संकट आया.
शावेज़ की मौत के बाद तीन साल पहले बहुत कम अंतर से जीतने वाले राष्ट्रपति निकोलस मदुरो को तेल के घटते दामों से जूझना पड़ रहा है जिससे विदेशी मुद्रा की कमाई में करीब दो तिहाई की कमी आ गई है.
निकोलस मदुरो के ताज़ा कदम से क्लैप (clap) शुरू की जा रही है. इसके तहत सरकार बाहर से आने वाले खाद्य सामान को सुपरमार्केट के बजाए स्थानीय कम्युनिटी काउंसिल को भेजेगी.
काउंसिल अपने समुदाय के लोगों को रेजिस्टर करेगी, उन्हें शॉपिंग के लिए एक तय दिन दिया जाएगा.
फिर उन्हें एक तय क़ीमत पर प्लास्टिक बैग बेचा जाएगा जिसमें कई वस्तु होंगे जैसे आटा, पास्ता और साबुन.

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आप ख़ुद से तय नहीं कर सकते कि आपको क्या ख़रीदना है. आपको वही मिलेगा जो बैग में होगा. लेकिन ये भी महीने में एक ही बार मिलेगा.
पश्चिमी वेनेज़ुएला के तेल बहूल प्रांत ज़ूलिया में मैंने कई छोटे शहरों का दौरा किया जहां लोगों को ये तक पता नहीं था कि अगले दिन वो क्या खाएंगे.
स्थानीय नेता ज़ूले फ्लोरिडो कहती हैं, "यहां हम हमेशा से ही गरीब थे, ये सच है, लेकिन हम कभी भी भूखे नहीं रहे."
"जब से मदुरो ने सत्ता संभाली है हमारे हालात बेहद खराब हैं. हम इसे 'मदुरो डायट' कहते हैं. शावेज़ जब सत्ता में थे तो ऐसा नहीं हुआ."
ज़ूलिया में खाद्य सामान पहले से ही सुपरमार्केट के बजाए कम्युनिटी काउंसिल के हाथ में था.
क्लैप का उद्देश्य समुदायों को परिपूर्ण बनान है जहां लोग खुद अपने खाने का सामान उगाए.
सरकार के कट्टर समर्थकों के एक समूह के सदस्य एलीजैंड्रो अरमाओ मुझे ऐसे ही एक जगह पर ले गए.
ये समूह अक़्सर हथियार उठाते हैं और उनपर विपक्षी कार्यकर्ताओं के खिलाफ़ हिंसा करने के आरोप लगते रहे हैं.
अरमाओ ने मुझे समूह के कई सदस्यों से मिलवाया. लग रहा था कि ये सभी हथियारों से लैस हैं और उनके पास वॉकी-टॉकी भी थी.

मुझे इलाके से धक्के मारकर निकालने की धमकी देने के बाद वो आखिरकार मान गए मुझे दिखाने के लिए कि क्लैप का उद्देश्य क्या है.
मुझे एक बंजर ज़मीन दिखाने के लिए ले गए जहां वो आठ महीनों में फसल उगाने की बात कह रहे हैं. यहां मिर्च के पौधे भी लगाए जाएंगे.
ये देखकर मैं बहुत हताश हो गया.
मुझे अपने मां की याद आई और मैंने सोचा कि क्या ये उनके जैसे लोगों की समस्याओं का समाधान हो सकता है, जो तीन वक्त के खाने के लिए जद्दोजहद कर रहे हैं.
मेरी मां जो सरकार की कट्टर समर्थक हैं, इस बात पर पूरी तरह यकीन करती हैं. वो कहती हैं, "इसमें समय लगेगा, लेकिन ये होगा."
लेकिन मैं ये सोचने से खुद को नहीं रोक सका कि क्या दूसरे वेनेज़ुएला वासी इतने ही धैर्य रख पाएंगे.
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