शाह अब्दुल्लाह: अमरीका का विरोध भी, समर्थन भी

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दुनिया के सबसे रूढ़ीवादी देशों में से एक सऊदी अरब के सुल्तान शाह अब्दुल्लाह बिन अब्दुल अज़ीज़ ने पश्चिमी जगत से रिश्ते सुधारने और अपने घरेलू आकांक्षाओं के बीच संतुलन बनाया.
पारंपरिक इस्लामिक विचारों के साथ बड़ा होने के बाद भी उन्हें एक सुधारवादी के रूप में देखा जाता है. वो मध्य-पूर्व में शांति के प्रखर समर्थक थे.
शाह अब्दुल्लाह का जन्म अगस्त, 1924 में सऊदी अरब की राजधानी रियाद में हुआ था. हालांकि उनके जन्मदिन को लेकर स्थिति साफ़ नहीं है.
आधुनिक सऊदी अरब

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वो अपने पिता और आधुनिक सऊदी अरब के संस्थापक शाह अब्दुल अज़ीज़ अल-सऊद के 37 बेटों में से 13वें नंबर के बेटे थे. उनके पिता की 16 पत्नियां थीं.
अपने पिता के नक्शेक़दम पर चलते हुए शाह अब्दुल्लाह ने इस्लामिक विद्वानों से धर्म, साहित्य और विज्ञान की शिक्षा ली.
उनके सौतेले भाई शाह फ़ैसल 1958 में देश के प्रधानमंत्री बने. उन्होंने शाह अब्दुल्लाह को 1962 में सऊदी नेशनल गार्ड का कमांडर नियुक्त किया.
शाह अब्दुल्लाह ने सऊदी नेशनल गार्ड में नई भर्तियां कर उसका आकार बढ़ाया और उसे आधुनिक हथियारों से लैस किया.
राजनीतिक सफ़र

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मार्च 1975 में तत्कालीन राजा शाह फ़ैसल की हत्या के बाद उनके उत्तराधिकारी और भाई शाह ख़ालिद ने अब्दुल्लाह को देश का द्वितिय उप-प्रधानमंत्री नियुक्त किया.
उनका राजनीतिक क़द 1970 के दशक में तब काफ़ी बढ़ा जब उन्होंने मध्य-पूर्व को लेकर अमरीकी नीतियों की खुली आलोचना करते हुए अरब देशों की एकता की वकालत की.
उनका मानना था कि अरब देशों की एकता से ही तेल और अरब देशों की संपन्नता को पश्चिमी देशों का मुक़ाबला करने वाली ताक़त बनाया जा सकता है.
अब्दुल्लाह ने 1980 में जॉर्डन और सीरिया के बीच संभावित युद्ध को टालने में अहम भूमिका निभाई.
साल 1982 में शाह ख़ालिद की मौत के बाद नए राजा शाह फ़हद ने अब्दुल्लाह को युवराज नियुक्त कर देश का प्रथम उप प्रधानमंत्री बनाया. हालांकि इस नियुक्ति का फ़हद के सात सगे भाइयों ने विरोध किया था. इस विरोध को शाह अब्दुल्लाह ने कुशलतापूर्वक निपटाया.
शाह अब्दुल्लाह ने मध्य पूर्व में हिंसा के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाते हुए कहा, ''हम चरमपंथी कार्रवाइयों की निंदा करते हैं, जिनका मक़सद खाड़ी क्षेत्र की स्थिरता को कमज़ोर करना है.''
मध्य-पूर्व में शांति

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इराक़ ने 1991 में जब क़ुवैत पर आक्रमण किया तो, शाह अब्दुल्लाह सऊदी अरब में अमरीकी सैनिकों की मौजूदगी से ख़ुश नहीं थे. उनका मानना था कि युद्ध की जगह सद्दाम हुसैन से बातचीत कर समस्या का समाधान किया जाए. लेकिन शाह फ़हद ने उनकी बात नहीं मानी.
युवराज के रूप में शाह अब्दुल्लाह ने फ़लस्तीनियों का हमेशा समर्थन किया. फ़लस्तीनी नेता यासिर अराफ़ात से उनके निजी संबंध थे. हालांकि 1994 में ग़ज़ा पट्टी में इसराइल के साथ झड़पों के बाद उन्होंने फ़लस्तीनी नेताओं की आलोचना भी की.
नवंबर 1995 में शाह फ़हद को दिल का दौरा पड़ने के बाद बादशाह की सारी ज़िम्मेदारी और अधिकार अब्दुल्लाह के पास आ गए थे, हालांकि इस सत्ता हस्तांतरण को जनवरी 1996 तक गुप्त रखा गया था.
इराक़ पर अमरीकी हमले के बाद सऊदी अरब ने कहा था कि वो संयुक्त राष्ट्र में इस युद्ध के संबंध में प्रस्ताव पास हुए बिना अमरीकी जहाज़ों को प्रिंस सुल्तान एयर बेस से हमले के लिए उड़ान नहीं भरने देगा.
साल 2002 में अरब लीग ने शाह अब्दुल्लाह के अरब-इसराइल विवाद को ख़त्म करने के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया.
महिलाओं के अधिकार

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सऊदी अरब में 2003 में सिलसिलेवार चरमपंथी हमलों के बाद उन्होंने सुरक्षा व्यवस्था में व्यापक बदलाव किया. माना जाता है कि ये हमले इस्लामिक चरमपंथियों ने किया था, जो शाह अब्दुल्लाह की पश्चिम समर्थक नीति से नाराज़ थे.
साल 2005 में शाह फ़हद की मौत के बाद वो आधिकारिक रूप से सऊदी अरब के राजा बन गए.
शाह अब्दुल्लाह बिन अब्दुल अज़ीज़ को सऊदी अरब में एक सुधारवादी राजा के रूप में देखा जाता है. वो महिला अधिकारों के समर्थक थे. साल 2011 में उन्होंने महिलाओं को मतदान और स्थानीय निकाय का चुनाव लड़ने का अधिकार दिया.
उन्होंने एक साक्षात्कार में कहा था, ''मैं महिला अधिकारों का प्रबल समर्थक हूं, मेरी माँ एक महिला है, मेरी बहन एक महिला है, मेरी बेटी एक महिला है, मेरी पत्नी एक महिला है.''
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