दुनिया भर में महंगाई अचानक क्यों बढ़ रही है? - दुनिया जहान

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बात कुछ हफ़्ते पहले की है. लाखों टन सामान लिए रिकॉर्ड संख्या में जहाज़ अमेरिका के व्यस्ततम बंदरगाह के सामने कतार में खड़े थे.
एक तरफ़ हफ़्तों से जहाज़ सामानों से लदे कंटेनर उतारने का इंतज़ार कर रहे थे तो दूसरी तरफ देश के भीतर दुकानों में सामान की कमी हो रही थी. अमेरिका के जैसे ही हालात दूसरे देशों में भी थे.
अंतरराष्ट्रीय कंपनियां और ट्रेड एसोसिएशन ने चेतावनी दी कि हालात सुधरने में अभी सालों लग सकते हैं.
इस सप्ताह दुनिया जहान में हमारा सवाल यही है कि पूरी दुनिया में एक तरह का अभाव क्यों देखा जा रहा है और स्थिति के सामान्य होने में कितना वक्त लगेगा. चर्चा के लिए हमारे साथ हैं चार एक्सपर्ट्स.

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सप्लाई चेन में रुकावटें
स्टेसी रैसगन बर्नस्टीन रीसर्च में प्रबंध संचालक और वरिष्ठ विश्लेषक हैं. वो अमेरिकी सेमीकंडक्टर बाज़ार पर नज़र रखते हैं.
उनका कहना है कि वैश्विक स्तर पर एक अलग तरह का ट्रेंड देखा जा रहा है. उत्पादन के लिए ज़रूरी चीज़ों की कमी के कारण नया सामान बाज़ार में आ ही नहीं रहा और क़ीमतें बढ़ रही हैं. इसका बड़ा असर कार बाज़ार पर देखने को मिल रहा है.
वे कहते हैं, "अगर एक नन्हा-सा सेमीकंडक्टर भी कम पड़ गया तो कार का उत्पादन रुक जाएगा. मान लीजिए कि एक माइक्रोकंट्रोल चिप मात्र 50 पैसे का है, फिर भी इसके बिना आप 50 हज़ार डॉलर की कार नहीं बना सकते. इस साल सेमीकंडक्टर की कमी के कारण 10 लाख से अधिक कारें बनाई ही नहीं जा सकीं और ऑटो इंडस्ट्री को 200 अरब डॉलर से अधिक का नुक़सान उठाना पड़ा."
सेमीकंडक्टर का उत्पादन और टेस्टिंग अधिकतर ताइवान, चीन, अमेरिका, दक्षिण कोरिया और मलेशिया में होता है. इन जगहों पर कोविड महामारी के कारण लगी पाबंदियों के चलते फैक्ट्रियां बंद रहीं. बाद में काम चालू भी हुआ तो सोशल डिस्टेन्सिंग के कारण उत्पादन क्षमता कम ही रही.
हालांकि स्टेसी कहते हैं कि उत्पादन में कमी का सबसे बड़ा कारण महामारी नहीं, बल्कि उत्पादकों का लिया एक फ़ैसला है.
वे कहते हैं, "महामारी के दौरान जब लॉकडाउन लगने लगा और मांग अचानक से कम हो गई तो ऑटो इंडस्ट्री ने सेमीकंडक्टर्स के ऑर्डर कैंसिल करने का फ़ैसला लिया. बाद में बाज़ार खुले और कंपनियों ने तेज़ी से ऑर्डर देने शुरू किए, लेकिन तब तक उत्पादन क्षमता काफी कम हो चुकी थी."

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इस समस्या को महामारी ने कई गुना बढ़ा दिया.
स्टेसी के अनुसार, "वर्क फ्रॉम होम और स्टडी फ्रॉम होम बढ़ गया और बाज़ार में पर्सनल कंप्यूटर्स की मांग अचानक बढ़ी. ये पूरे सिस्टम के लिए बहुत बड़ा झटका था. 2020 में क़रीब 30 करोड़ पीसी बेचे गए. अनुमान है कि 2022 तक और 34 करोड़ कंप्यूटर्स की बिक्री होगी और ये ट्रेंड 2025 तक जारी रहेगा. दशक भर से पीसी बाज़ार सिमट रहा था लेकिन महामारी के कारण इसमें अचानक उछाल आया है."
सेमीकंडक्टर उत्पादकों को अंदाज़ा नहीं था कि एक डूब रहे सेक्टर में मांग इस कदर बढ़ेगी. वो इस इंडस्ट्री के लिए उत्पादन बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं. कुछ कंपनियां महामारी से सीख लेकर पहले से ही चिप स्टोर कर रही हैं.
स्टेसी कहते हैं, "महामारी की शुरुआत से ही उत्पादन पर असर पड़ा और अब भी चीज़ें सामान्य नहीं हुई हैं. कई कंपनियों को चिप का ऑर्डर देने के बाद साल भर तक का इंतज़ार करना पड़ रहा है. ये भी संभव है कि स्थिति सुधरने में साल भर से ज़्यादा वक़्त लगे."
कंपनियों अक्सर सामान बनाने से ठीक पहले इसमें लगने वाली चीज़ें ख़रीदना शुरू करती हैं, इससे स्टोरेज का खर्च कम होता है. लेकिन ज़रूरत के वक़्त कच्चामाल ख़रीदने की रणनीति अब असरदार नहीं रही. वैश्विक महामारी ने आधुनिक सप्लाई चेन को अभूतपूर्व रूप से जटिल बना दिया है.


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कामगारों की समस्या
डॉक्टर नेला रिचर्डसन एडीपी रीसर्च इंस्टीट्यूट में प्रमुख अर्थशास्त्री हैं. वे कहती हैं कि लोग महीनों से सामानों की कमी जैसी स्थिति से जूझ रहे हैं.
वे कहती हैं, "महामारी के दौरान राशन की दुकानों में सामान की कमी थी. दुकानदार सीमित मात्रा में सामान ख़रीद रहे थे. अब लॉकडाउन खुल रहा है और लोग घरों से बाहर निकलने लगे हैं, उनकी मांगे बढ़ रही हैं. लेकिन अब कामगारों की कमी है. उत्पादन से लेकर सप्लाई और ट्रांसपोर्ट से दुकान तक... हर स्तर पर कामगारों की भारी कमी है."
लेकिन, अगर काम रुका हुआ है और कामगारों की ज़रूरत है तो फिर कमी क्यों?
कुछ तरह के काम में ख़ास कौशल या लाइसेंस की ज़रूरत होती है, जैसे कि ट्रक ड्राइविंग. वैश्विक स्तर पर बेरोज़गारों की संख्या बढ़ी ज़रूर है, लेकिन सभी लोग उत्पादन या सप्लाई का काम नहीं कर सकते क्योंकि लाइसेंस लेने या काम सीखने में वक़्त लगता है.
नेला कहती हैं, "आप लेबर मार्केट को बड़ी अड़चन कह सकते हैं. अमेरिका में 1 करोड़ से अधिक पद खाली पड़े हैं, ये रिकॉर्ड संख्या है. महामारी की शुरुआत में 77 लाख लोगों की नौकरियां चली गई थी. फिर भी काम करने वालों की कमी है. वायरस के डेल्टा वेरिएंट के आने से लोग डरे हुए हैं, वो काम पर लौटना नहीं चाहते. लाखों लोगों ने वक़्त से पहले रिटायरमेंट ले ली है, महामारी न होती तो ये लोग काम पर होते."
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महामारी ने महिलाओं पर परिवार की देखभाल का अधिक बोझ डाला है, वो भी काम पर लौट नहीं पा रही हैं. कई लोगों ने घर पर रह कर काम करने जैसी नौकरियां चुनीं, कुछ ने खाना बनाने और होम डिलीवरी जैसे काम चुने जो लॉकडाउन के दौरान बंद नहीं हुए.
यानी नौकरियां तो हैं लेकिन काम करने वाले लोग हैं ही नहीं.
नेला कहती हैं, "वैश्विक लेबर मार्केट में लोगों के अप्रवासन और स्थानांतरण की भी समस्या रही है. देशों की सीमाएं बंद होने के कारण लोगों का एक जगह से दूसरी जगह जाना बंद हो गया था."
स्वास्थ्य चिंताओं को लेकर नौकरियां छोड़ना, नई नौकरियों के लिए कौशल की कमी, पुराने कर्मचारियों का रिटायरमेंट लेना और अप्रवासन की समस्या - ये सभी किसी न किसी स्तर पर कामगार की कमी का कारण हैं. और ऐसा नहीं लगता कि स्थिति जल्द सुधरने वाली है.
वे कहती हैं, "अब तक जो आकलन मैंने देखे हैं उनके अनुसार अगले साल इसी समय के दौरान स्थितियां सामान्य की तरफ़ बढ़ती दिख सकती हैं. लोगों का पैसा बढ़ेगा और उनका लेबर मार्केट में आना शुरू होगा."
कुछ जगहों पर कामगारों का पैसा तो बढ़ा है लेकिन इसका असर होता नहीं दिखता. अर्थशात्री मानते हैं कि पैसा बढ़ने से लेबर मार्केट बेहतर होता है लेकिन मौजूदा स्थिति पहले से बेहद अलग है.


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जलवायु परिवर्तन और उत्पादन
बीते साल और इस साल धरती ने महामारी के अलावा जलवायु परिवर्तन का असर भी देखा है. दुनिया के कई हिस्सों में फ़सलें बर्बाद हुई हैं. बारिश और तूफ़ान ने भारत में सब्जियों को नुक़सान पहुंचाया, तो अमेरिका में आंधी तूफ़ान ने कपास की खेती नष्ट कर दी. वहीं ब्राज़ील में कॉफ़ी की फ़सल बर्फ़ की भेंट चढ़ी.
जोसे सेटी इंटरनेशनल कॉफ़ी ऑर्गनाइज़ेशन के कार्यकारी निदेशक हैं.
वे कहते हैं, "1840 के दशक से ही ब्राज़ील दुनिया का सबसे बड़ा कॉफ़ी उत्पादक और निर्यातक रहा है. बीते साल अराबिका कॉफ़ी उगाने वाले इलाक़े में भयंकर सूखा पड़ा और क़रीब 30 फ़ीसदी फ़सल बर्बाद हो गई. सूखे के कारण क़ीमतें बढ़ीं, लेकिन फ़िर बर्फ़बारी ने स्थिति को और गंभीर कर दिया."

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इस साल ब्राज़ील में अचानक बर्फ़बारी हुई. इससे पहले 1975 में यहां बर्फ़बारी से कॉफ़ी की आधी फ़सल नष्ट हो गई थी.
जोसे कहते हैं, "1975 में जो हुआ वो बेहद भयानक था और बड़े पैमाने पर हुआ था. पहले किसी ने ऐसा कुछ नहीं सुना था. इसके बाद सरकार ने कॉफ़ी किसानों का हौसला बढ़ाया कि वो ठंडे दक्षिणी इलाक़ों की बजाय, देश के उत्तर की तरफ़ जाएं. इसके बाद से ब्राज़ील में अधिक बर्फ़बारी की ख़बरें नहीं सुनी गई थीं. लेकिन इस साल जुलाई में अचानक तीन बार भारी बर्फ़बारी हुई जिसका असर बाज़ार पर पड़ा."
जोसे कहते हैं कि कॉफ़ी की कीमतों के दो-तीन साल तक कम होने की उम्मीद नहीं है. लेकिन चीज़ों के महंगे होने की एक और वजह है- और वो है ट्रांसपोर्ट व्यवस्था. वियतनाम के निर्यातकों ने बीते साल इस चुनौती का सामना किया.
वे कहते हैं, "महामारी से पहले उत्तर अमेरिका या पश्चिमी यूरोप को एक शिपिंग कंटेनर भेजने का खर्च क़रीब 800 डॉलर तक पड़ता था. लेकिन अब ये खर्च कम से कम दस गुना बढ़कर 8,000 से 10,000 डॉलर तक हो गया है."


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शिपिंग सिस्टम पर बढ़ता दबाव
ऐलन मैक्किनॉन हैमबर्ग के कुइने लॉजिस्टिक्स यूनिवर्सिटी में लॉजिस्टिक्स के प्रोफ़ेसर हैं. सामान एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाने के तरीक़ों, ख़ास कर शिपिंग इंडस्ट्री में उन्हें विशेष दिलचस्पी है.
दुनिया का अधिकांश व्यापार समुद्री मार्ग से होता है और इसकी अहम कड़ी हैं मालवाहक जहाज़, जो लाखों टन सामान एक से दूसरे देश पहुंचाते हैं.
प्रोफ़ेसर ऐलन कहते हैं कि दुनिया में क़रीब 80 मेगा कार्गो शिप हैं लेकिन उन पर लदा सामान उतारने के विकल्प कम हैं.
वे कहते हैं, "सभी बंदरगाहों में इतने बड़े जहाज़ से सामान उतारने की क्षमता नहीं है.
जो बंदगरगाह इतनी क्षमता रखते हैं उन्हें हब कहा जाता है और ये विशाल कंटेनर शिप इन हब के बीच आते-जाते हैं. चीन के बंदरगाहों से सामान अमेरिका और यूरोप के बंदरगाहों तक पहुंचता है, फिर वहां से अलग जगहों तक और छोटे बंदरगाहों तक पहुंचता है."
व्यापार अबाध्य तरीक़े से चले इसके लिए हब बंदरगाहों का काम कुशलता से चलना बेहद ज़रूरी है. और महामारी से पहले तक चीज़ें बेहतर थीं.
अमेरिका के किसी हब बंदरगाह के सामने एक भी जहाज़ खड़ा नहीं रहता था, लेकिन बीते महीने अमेरिका के दो बंदरगाहों पर 70 से ज़्यादा जहाज़ माल उतारने की अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे थे, इनमें मेगा शिप भी शामिल थे.
प्रोफ़ेसर ऐलन कहते हैं, "महामारी के कारण दक्षिणी चीन और अमेरिका में कई तरह की पाबंदियां लगाई गईं. अगर जहाज़ डॉक तक पहुंच भी जाए तो सामान उतारने में काफ़ी वक़्त लगता है. वहीं अगर ज़मीन पर सप्लाई चेन को देखें तो यहां भी लेबर की कमी रही है, कहीं ट्रक ड्राइवर नहीं हैं तो कहीं गोदाम कर्मचारी नहीं है. इन कारणों से अंतरराष्ट्रीय व्यापार प्रभावित होता है."

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लेकिन क्या वाकई महामारी के कारण ऐसा हुआ? या फिर महामारी ने पहले से ही सिस्टम में मौजूद खामियों को सामने ला दिया है.
वे कहते हैं, "इसे लेकर पहले भी शिकायतें की जाती रही हैं कि न तो मेगा कार्गो शिप के लिए बड़े बंदरगाहों की क्षमता बढ़ाने पर निवेश किया जा रहा है और न ही बंदरगाहों पर जहाज़ों की भीड़ संभालने के लिए उनका विस्तार किया जा रहा है. ये स्थिति महामारी से पहले भी थी."
जब महामारी के दौरान लगी पाबंदियां हटीं और अर्थव्यवस्थाएं फिर से पटरी पर लौटने की कोशिश करने लगीं तो अचानक मांग भी बढ़ने लगी.
प्रोफ़ेसर ऐलन कहते हैं, "कई जगहों पर खाली कंटेनर पड़े हुए हैं. लॉकडाउन के दौरान कई फैक्ट्रियां बंद हो गई थीं. महामारी के कारण कंटेनर खाली कर उन्हें वापिस बंदरगाह तक पहुंचाने का काम बाधित हुआ है जिससे ये कंटेनर उत्पादक देशों तक पहुंच ही नहीं पाए हैं. महामारी से पहले कंटेनर के चीन से अमेरिका जाकर लौटने में दो महीनों के वक़्त लगता था, अब इसमें तीन महीनों से अधिक का वक़्त लग रहा है."
यानी अगर सामान का उत्पादन हो भी रहा है तो उसे दूसरी जगह पहुंचाया नहीं जा पा रहा है. नए कंटेनर बनाकर समस्या को सुलझाया जा सकता है, लेकिन इसमें भी वक़्त लगता है.
ऐसे में सवाल ये है कि हालात ऐसे रहे तो सामान की आवाजाही सामान्य होने में और कितना वक़्त लगेगा.
प्रोफ़ेसर ऐलन के अनुसार, "आशावादियों की मानें तो इस साल क्रिसमस के बाद से या फिर अगले साल की शुरुआत तक स्थिति बेहतर हो सकती है. लेकिन मुझे लगता है कि अगले साल के मध्य तक हम सुधार देख सकते हैं."


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लौटते हैं अपने सवाल पर- पूरी दुनिया में आख़िर सामान की कमी क्यों हो रही है.
कोविड महामारी का बड़ा असर उत्पादन पर पड़ा है. साथ ही ग्लोबल वॉर्मिंग और जलवायु परिवर्तन ने इस साल फ़सलों को बर्बाद किया है.
वहीं अचानक बढ़ी मांग ने वैश्विक सप्लाई चेन की कमज़ोरियों को सामने ला दिया है. बंदरगाह सामान से लदे जहाज़ों की कतार से जूझ रहे हैं तो उत्पादकों के लिए उत्पादन और निर्यात मुश्किल का सबब बना हुआ है. स्वास्थ्य चिंताएं और कामगारों की कमी ने इस मुश्किल स्थिति को और गंभीर कर दिया है.
आने वाले वक़्त में इस तरह की समस्या न हो इसके लिए अंतरराष्ट्रीय व्यापार को तो बेहतर किया ही जाना चाहिए, बल्कि जलवायु परिवर्तन जैसे गंभीर मुद्दों पर भी समय रहते काम करने की ज़रूरत है.
प्रोड्यूसर - मानसी दाश
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