जलवायु परिवर्तन: अपने जंगलों को कैसे बचा पाएंगे हम - दुनिया जहान

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दक्षिण अमेरिका के 60 लाख वर्ग किलोमीटर के इलाक़े में अमेज़न के वर्षावन फैले हुए हैं. ये जंगल पूर्व में अटलांटिक सागर से लेकर पश्चिम में एंडीस पर्वत श्रंखला और उत्तर में गाइना हाइलैंड्स से लेकर दक्षिण में ब्राज़ील के पठारों तक फैले हैं.
दुनिया की ऑक्सीजन की ज़रूरत का 15 फीसदी से अधिक पूरा करते हैं. हाल के सालों में ये वर्षावन आग और पेड़ों की कटाई के कारण चर्चा में रहे हैं.
आग लगने की 67 फीसदी घटनाएं उन इलाक़ों में हुईं जहां पेड़ों की कटाई की गई थी. वर्ल्ड वाइल्डलाइफ़ फंड के आकलन के अनुसार हाल ऐसा ही रहा तो 2030 तक अमेज़न के 27 फीसदी जंगल ख़त्म हो जाएंगे.
भारत की बात करें तो देश की 7 लाख वर्ग किलोमीटर भूमि वनक्षेत्र है जो देश के कुल भौगोलिक क्षेत्र का क़रीब 21 फीसदी है. यहां विकास योजनाओं, उद्योग, सड़क और सिंचाई परियोजनाओं के अलावा आग, वनक्षेत्र के कम होने का बड़ा कारण है.
साल 2014 में वैश्विक समुदाय में इस बात पर सहमति बनी कि 2020 तक पेड़ों की कटाई को कम से कम आधा और 2030 तक इसे पूरी तरह ख़त्म किया जाएगा. लेकिन ये लक्ष्य हासिल नहीं हो सका.
इस सप्ताह पड़ताल इस बात की कि जंगलों को बचाने की हमारी रणनीति क्या वाकई कारगर है. 2030 तक वनक्षेत्र बढ़ाने का जो लक्ष्य है क्या हम वो हासिल कर पाएंगे.

नष्ट होते जंगल
मिकेला वाइस ग्लोबल फॉरेस्ट वॉच में प्रोजेक्ट मैनेजर हैं. साल 2000 के बाद से इस संगठन ने सैटलाइट तस्वीरों के ज़रिए ये समझने की कोशिश की है कि वक्त के साथ जंगल कैसे बदल रहे हैं.
एक आकलन के अनुसार 1990 के बाद से दुनिया में 42 लाख वर्ग किलोमीटर ज़मीन से जंगल ख़त्म हो गए हैं. इसमें अधिकतर अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका और दक्षिण पूर्व एशिया के हिस्से हैं.
मिकेला कहती हैं, "ये भारत के कुल विस्तार से भी बड़ा है. कुछ हिस्से प्राकृतिक रूप से जंगल की आग की भेंट चढ़े तो कुछ पेड़ उम्र पूरी होने पर गिर गए. लेकिन प्राकृतिक तौर पर यहां पेड़ फिर उगेंगे."
मिकेला कहती हैं कि चिंता तब बढ़ जाती है जब जंगलों के अनछुए हिस्सों में पेड़ों की कटाई होती है या उन्हें जलाया जाता है. वो कहती हैं, ऊष्णकटिबंधीय जंगलों के बड़े हिस्से इस तरह के बड़े बदलाव झेल रहे हैं.
वो कहती हैं, "साल 2000 के बाद ब्राज़ील, इंडोनेशिया और कॉन्गो गणराज्य ने सबसे अधिक जंगल खोए हैं. ऊष्णकटिबंधीय जंगलों का एक बड़ा हिस्सा इन देशों में हैं. ब्राज़ील में बड़े पैमाने पर जंगल काटे जा रहे हैं, इंडोनेशिया में पाम ऑयल की खेती के लिए जंगल साफ किए जा रहे हैं. कॉन्गो में छोटे पैमाने पर खेती बढ़ रही है और देश के भीतर जारी संघर्ष के कारण लोग जंगलों का रुख़ कर रहे हैं और जंगल साफ कर खेत बना रहे हैं."
लेकिन इन देशों में हो रही जंगलों की कटाई का असर पूरी दुनिया पर पड़ रहा है?
मिकेला समझाती हैं, "ये जलवायु परिवर्तन का मामला है. ऊष्णकटिबंधीय जंगलों में पेड़ों की कटाई से हर साल पांच गिगाटन कार्बन डाईऑक्साइड उत्सर्जित होता है. यदि इन वनों को एक देश मानें तो ये दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कार्बन उत्सर्जक होगा. लेकिन जंगल, पर्यावरण से कार्बन डाईऑक्साइड सोखने का काम भी करते हैं. पेड़ों की कटाई रोकने और बेहतर प्रबंधन से काफी फायदा हो सकता है. ये जंगल 2030 तक कार्बन उत्सर्जन कम करने के हमारे लक्ष्य का 23 फीसदी पूरा कर सकते हैं."
लेकिन जंगलों के ख़त्म होने से केवल जलवायु परिवर्तन का ही ख़तरा है ऐसा नहीं है. ये जंगल सैंकड़ों आदिवासी समुदायों का ठिकाना रहे हैं. जानवरों की हज़ारों प्रजातियां भी इन जंगलों में हैं.
मिकेला कहती हैं कि सभी जगहों पर हालात इतने बुरे नहीं. रूस, अमेरिका और चीन जैसे देशों में कुल वनक्षेत्र बढ़ा है. 1982 के बाद से इन देशों ने दुनिया भर के जंगलों में 7 फीसदी का इज़ाफ़ा किया है.
वो कहती हैं, "सोवियत संघ के विघटन के बाद रूस और पूर्व के सोवियत संघ में रहने वाले कई परिवारों ने खेती की ज़मीन छोड़ दी और वहां फिर से जंगल खड़े हो गए."
औद्योगिकरण की राह पर चलने वाले चीन को ग्रीन चैंपियन की तरह नहीं देखा जाता. लेकिन जंगलों को लेकर उसने वनीकरण की एक बड़ी योजना लागू की है.


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पेड़ लगाने की चीन की योजना
एलिस ह्यूस, चाइनीज़ अकेडमी ऑफ़ साइंसेज में प्रोफ़ेसर हैं. वो कहती हैं कि बीते दो दशकों में चीन में अपने जंगलों का दायरा बढ़ाया है.
वो कहती हैं, "1997 में चीन ने एक भयंकर संकट का सामना किया. केंद्रीय चीन के इलाक़ों में भारी बाढ़ आई. सरकार ने फ़ैसला किया कि दोबारा ऐसा न हो इसके लिए पहाड़ों पर पेड़ों की संख्या बढ़ानी होगी. बड़े पैमाने पर पेड़ लगाने की मुहिम शुरू की गई. कई जगहों पर ड्रोन या प्लेन से भी बीज फेंके गए."
लेकिन अगर ऐसा करने से जंगल बढ़ता है तो फिर मुश्किल क्या है?
एलिस कहती हैं, "ये नया वनक्षेत्र भी बड़ा मुद्दा है, क्योंकि सरकार की कोशिशों में उत्तरी प्रांतों को ध्यान में रखा गया जबकि दक्षिण की तरफ जहां बड़ी संख्या में जानवरों की प्रजातियां हैं, वहां वनों की कटाई बदस्तूर जारी है. ग्वांगडोंग और ग्वांशी जैसे प्रांतों में 20 फीसदी तक जंगल कम हुए हैं."
एलिस कहती हैं चीन के नए जंगलों के साथ इससे भी बड़ी एक और परेशानी है. वनीकरण की पूरी मुहिम के दौरान अधिकतर तीन तरह के पेड़ लगाए गए - जैपनीज़ लार्च, चीड़ और देवदार की एक प्रजाति.
ऐसे में उन्हें एक तरह की बीमारियों और किटाणुओं का ख़तरा अधिक था और साल भर के भीतर करीब एक अरब पेड़ केवल इस कारण ख़त्म हो गए कि वो एक जैसी प्रजाति के थे. जिन इलाक़ों में ये पेड़ नहीं लगाए वहां किसानों को मुफ्त में रबर के बीज बांटे गए.
एलिस कहती हैं, "किन लोगों ने ये बीज लगाने के लिए पारंपरिक जंगलों को काट दिया. सही मायनों में उन्होंने वहां से कई जंगली प्रजातियों को हटाकर बराबर दूरी पर रबर के पेड़ लगाए. उन्होंने ज़मीन को साफ किया और केमिकल सप्रे किया ताकि कीट-पतंगे न आएं. लेकिन इस प्रक्रिया में वहां का पारिस्थितिकी तंत्र बिगड़ गया."
एक इलाक़े में एक ही नस्ल के पेड़ लगाने से तैयार हुई ज़मीन को भी वनीकरण के दायरे में शामिल किया गया. एलिस कहती हैं कि इसके लिए संयुक्त राष्ट्र की फूड एंड एग्रीकल्चर ऑर्गेनाइज़ेशन (एफ़एओ) ज़िम्मेदार है. एफ़एओ के अनुसार अगर आधे हेक्टेयर की ज़मीन का 10 फीसदी या उससे अधिक ऐसे पेड़ों से भरा है जो कम से कम पांच मीटर लंबे हैं तो उसे जंगल कहा जाएगा.
एलिस कहती हैं, "एक नस्ल के पेड़ों का लगाया जाना एफ़एओ की वनीकरण की परिभाषा के दायरे में आता है. इस परिभाषा की मानें को दुनिया भर में वनीकरण से जुड़े जो आंकड़े सामने आते हैं उनमें इस तरह के कृत्रिम वृक्षारोपण को भी शामिल किया जाता है. पारिस्थितिकि तंत्र के नज़रिए ये से बेमानी है."
एलिस कहती हैं कि चीन अब अपना अप्रोच बदल रहा है. वो मानती हैं कि दुनिया के दूसरे इलाक़ों के मुक़ाबले चीन के जंगल बेहतर स्थिति में हैं और यहां उम्मीद बाक़ी है.
लेकिन एक तरफ चीन अपने जंगलों को बचा रहा है तो दूसरी तरफ वो बड़े पैमाने पर लकड़ी और सोयाबीन का आयात करता है, जो दूसरे मुल्कों में जंगलों के कटने का कारण है. इसका ख़ास असर इंडोनेशिया पर दिखता है.


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इंडोनेशिया का उदाहरण
फ्रांसिस सीमोर वर्ल्ड रीसोर्सेस इंस्टीट्यूट में सीनियर फेलो हैं.
वो कहती हैं, "1970 के दशक से यहां वनक्षेत्र का कम होना शुरू हुआ. सुमात्रा और कालीमंथन में बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई हो रही थी. पेड़ काटने वालों के लिए यहां के पारंपरिक जंगलों के बड़े दरख्त बेहद कीमती थे."
80 के दशक में जंगलों की कटाई का बड़ा कारण प्लाईवुड था. इसके बाद कागज़ बनाने के लिए और फिर पाम ऑयल की खेती के लिए जंगल साफ किए गए. इससे आग लगने का ख़तरा बढ़ गया.
फ्रांसिस कहती हैं, "यहां के जंगलों में पहली बार ऐसा हुआ कि पेड़ों की कटाई के बाद जो वेस्ट बचा उसे जंगलों में ही छोड़ दिया गया. देखा जाए तो वर्षावनों में आग लगना आसान नहीं होता क्योंकि यहां पेड़ों में पानी की मात्रा अधिक होती है, लेकिन सूखी लकड़ी के वेस्ट ने ये काम आसान कर दिया."
80 के दशक में जंगलों में आग लगने की घटनाएं बढ़ने लगीं. यहां की पारिस्थितिकि में कार्बन प्रचुर मात्रा में है, ऐसे में यहां आग लगने का मतलब है बड़ी मात्रा में ग्रीनहाऊस गैस का उत्सर्जन.
2011 में सरकार ने जंगलों की सफाई के लिए लाइसेंस देना शुरू किया और संरक्षित वनों को चिन्हित करने का काम भी चालू किया. लेकिन जंगलों की कटाई में कमी नहीं आई.
फ्रांसिस कहती हैं, "2015 में जंगलों में आग लगने की घटनाओं के बाद इस मुद्दे को सरकार ने गंभीरता से लेना शुरू किया और पहले से मौजूद क़ानूनों को लागू करना और उसका पालन सुनिश्चित करने का काम शुरू किया."
2015 में जंगलों में लगी आग इतनी भयंकर थी कि इस कारण पूरे दक्षिण पूर्व एशिया के आसमान पर धुंआ छा गया था. सरकार के लिए हालात को नज़रअंदाज़ करना मुश्किल था.
फ्रांसिस कहती हैं, "इस साल अक्तूबर में कई सप्ताह तक इंडोनेशिया के जंगल रोज़ाना पूरे अमेरिका की अर्थव्यवस्था से कहीं अधिक कार्बन का उत्सर्जन कर रहे थे. विश्व बैंक के आकलन के अनुसार इससे इंडोनीशिया की अर्थव्यवस्था को 16 अरब डॉलर का नुकसान हुआ. सांस लेने में दिक्कत की शिकायत लेकर बड़ी संख्या में लोग अस्पतालों में पहुंचे. एक स्टडी के अनुसार इस कारण दक्षिण पूर्व एशिया में क़रीब एक लाख भ्रूण की मौत जन्म से पहले हुई."
16 अरब डॉलर का नुकसान झेलने के बाद सरकार ने जंगलों की कटाई को लेकर सख्त रवैय्या अपनाया. साथ ही भ्रष्टाचार रोकने के लिए भी कदम उठाए.
इन कठोर कदमों का फायदा भी हुआ और वनों की कटाई 60 फीसदी तक कम हुई. इंडोनेशिया अचानक जंगलों को बचाने वाले एक सफल देश का उदाहरण बन गया.

सरकार का समर्थन क्यों है ज़रूरी
टैसो अज़वेडो साल 2003 में ब्राज़ील के पर्यावरण मंत्रालय में राष्ट्रीय वन कार्यक्रम के निदेशक थे. उस वक्त जंगल काटने में आगे रहे ब्राज़ील में उन्होंने बदलाव लाने शुरू किए. उनका पहला काम था सैटलाइट मॉनिटरिंग सिस्टम बनाना.
वो कहते हैं, "इसके अलावा मैंने ज़मीन के संबंध में उन लोगों की कोशिशों को रोकने की कोशिश की जो जंगल काट रहे थे. लोग अपने पूर्वजों की ज़मीन बताते हुए सरकारी ज़मीनों पर कब्ज़ा करते और बाद में जंगल काट देते. ये अधिकतर ग़ैर-आदिवासी थे. इसलिए हमने आदिवासियों के ज़मीनों की पहचान शुरू की."
टैसो कहते हैं कि आदिवासी समुदाय अपने ज़मीन की सुरक्षा खुद करते हैं. ऐसे में अगर ज़मीन पर उनके हक को मान्यता दी गई तो कोई और उस पर आसानी से कब्ज़ा नहीं कर पाएगा.
टैसो कहते हैं कि आदिवासी समुदाय अपने ज़मीन की सुरक्षा खुद करते हैं. ऐसे में अगर ज़मीन पर उनके हक को मान्यता दी गई तो कोई और उस पर आसानी से कब्ज़ा नहीं कर पाएगा.
वो कहते हैं, "बेहद कम वक्त में जर्मनी के क्षेत्रफल जितनी बड़ी जगह को संरक्षित किया गया. इसमें अमेज़न के इलाक़े भी शामिल थे. इसके बाद ये सुनिश्चित किया गया कि लोग क़ानून का पालन करें."
जंगलों की कटाई 65 फीसदी तक कम हुई. टैसो और उनकी टीम ने उन इलाक़ों में आर्थिक प्रतिबंध लागू किए जहां जंगलों की कटाई अधिक होती थी. चार साल बाद इसका असर भी दिखने लगा.
टैसो कहते हैं, "उस वक्त लगा कि स्थिति नियंत्रण में है. लेकिन उसके बाद नीतियों में काफी बदलाव आए हैं. जंगलों की कटाई का आंकड़ा भी बढ़ने लगा है. मैं कह सकता हूं कि बीते कुछ वक्त में स्थिति काबू से बाहर हो गई है."
2018 में ज़ायर बोलसोनारो ब्राज़ील के राष्ट्रपति चुने गए. वो अमेज़न के जंगलों को आर्थिक संसाधन के रूप में देखते हैं. उन्होंने खनन और जंगलों की कटाई की इजाज़त दी. साथ ही आदिवासियों को दिए हक भी वापिस लिए, जिसके बाद जंगलों की कटाई बेतहाशा बढ़ी है.
लेकिन अगर सरकार का समर्थन न मिले तो जंगलों को कैसे बचाया जाए?
टैसो कहते हैं, "अगर सरकार से समर्थन नहीं मिलता को बाज़ार इस काम को कर सकती है. इसके लिए व्यापार को भी ज़िम्मेदार होना होगा. सोयाबीन इसका उदाहरण है. हाल में वैश्विक ट्रेडिंग कंपनियों ने फ़ैसला किया कि वो उन जगहों पर उगाई सोयाबीन नहीं खरीदेंगी जहां अमेज़न के जंगलों को काट कर खेती की गई हो. ये तरीका असरदार रहा है."


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लौटते हैं अपने सवाल पर- हम अपने जंगलों को कैसे बचा सकते हैं.
ये कोई रॉकेट साइंस नहीं है. ब्राज़ील और इंडोनेशिया में अमल में लाई गई योजनाओं की हमें जानकारी है.
जंगलों की रीयल टाइम मॉनिटरिंग के लिए आधुनिक तकनीक, ज़मीन पर आदिवासियों का हक, क़ानून का उल्लंघन करने वालों के लिए आर्थिक दंड का प्रावधान और जहां वनीकरण की ज़रूरत हो वहां पर्यावरण के प्रति संवेदनशील होना- इन कदमों से हालात बेहतर बनाने में मदद मिल सकती है.
इसके अलावा सप्लाई चेन पर इसके असर के बारे में कंपनियों और उपभोक्ताओं को जागरूक करना भी अहम है.
लेकिन ब्राज़ील इस बात का उदाहरण है कि राजनीतिक समर्थन न मिले तो ये रास्ता बेहद कठिन हो सकता है.
प्रोड्यूसर - मानसी दाश
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