अमीर लोगों की वजह से पर्यावरण को हो रहा है ज़्यादा नुक़सानः रिपोर्ट

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    • Author, लॉरा पैडीसन
    • पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर

साल 2018 में सेफ़ान गॉस्लिंग और उनकी टीम ने महीनों तक पेरिस हिल्टन से लेकर ओपरा विन्फ़्रे जैसे अमीर लोगों की सोशल मीडिया प्रोफ़ाइल को खंगाला. स्वीडन के लाइनेअस विश्वविद्यालय में टूरिज़्म के प्रोफ़ेसर गॉस्लिंग जानना चाहता थे कि ये लोग हवाई जहाज़ से कितनी यात्रा करते हैं.

उन्होंने पाया कि इसकी संख्या बहुत ज़्यादा थी. बिल गेट्स, जो कि दुनिया भर में पर्यावरण के मुद्दों पर मुखरता से बात करते हैं, साल 2017 में 59 बार हवाई यात्रा की.

गॉसलिंग की गिनती के मुताबिक उन्होंने 343,500 किलोमीटर की दूरी तय की. ये आठ बार से ज़्यादा पूरी दुनिया का चक्कर काटने के बराबर है और इससे 1,600 टन ग्रीनहाउस गैस का उत्सर्जन हुआ. ये औसतन 105 अमेरिकी के साल भर किए जाने वाले उत्सर्जन के बराबर है.

गॉसलिंग की कोशिश थी ये पता करने की एक बहुत पैसे वाला व्यक्ति जिसकी ज़िंदगी के बारे में हमें बहुत पता नहीं चलता, उनका जीने के तरीकों से कितना ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन होता है. उनकी रिसर्च पर्यावरण एक्टिविस्च ग्रेटा थनबर्ग के साथ मेल खाती है जो व्यक्तिगत जवाबदेही पर ज़ोर देती हैं. हवाई जहाज सबसे अधिक ग्रीनहाउस गैस का उत्सर्जन करते हैं इसलिए इसे जवाबदेही से जोड़ा जा रहा है.

थनबर्ग ने 2019 में गार्डियन अख़बार में लिखा था, "जितना अधिक आपका कार्बन फ़ुटप्रिंट है, उतनी ही बड़ी आपनी नैतिक ज़िम्मेदारी."

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कार्बन उत्सर्जन में असामनता

पिछले कुछ दशकों में दुनियाभर में फ़ैलती असमानता पर बातें हो ही हैं. 2008 के आर्थिक संकट के महामारी तक और जलवायु परिवर्तन का असर सबसे ज़्यादा ग़रीबों पर हो रहा है.

लेकिन असमानता को कम करने की बहस में हम अधिक उपभोग को भूल जाते हैं. बर्लिन के थिंक टैंक हॉट और कूल के मैनेजिंग डायरेक्टर लुइस अकेंजी कहते हैं, "आपका हर एक यूनिट का ज़्यादा इस्तेमाल इस ओर इशारा करता है कि कोई व्यक्ति कहीं अपना हिस्सा छोड़ रहा है."

इसलिए कार्बन फ़ुटप्रिंट के मामले में भी असामनता है और दुनिया के जलवायु परिवर्तन से निपटने की कोशिशों के लिए ये एक ख़तरा है.

इससे जुड़े आंकड़े चौंकाने वाले हैं. 2020 की ऑक्सफ़ैम और स्टॉकहोम पर्यावरण इंस्टीट्यूट की एक रिपोर्ट के मुताबिक 2015 में दुनियाभर के आधे ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन के लिए 10 प्रतिशत सबसे अमीर लोग ज़िम्मेदार थे. सबसे ऊपर के एक प्रतिशत अमीर 15 प्रतिशत उत्सर्जन के लिए ज़िम्मेदार थे.ये सबसे ग़रीब 50 प्रतिशत लोगों के उत्सर्जन का दोगुना है जिन्होंने सात प्रतिशत उत्सर्जन किया. लेकिन जलवायु परिवर्तन से होने वाले दुष्प्रभाव का उनपर भी असर पड़ेगा.

गरीबों की ज़रूरते भी नहीं हो रही पूरी

स्टॉकहोम पर्यानरण इंस्टीट्यूट की स्टाफ़ वैज्ञानिक एमिली घोष कहती हैं कि दुनिया का तापमान 1.5 डिग्री सेल्सियस से अधिक न बढ़े इसके लिए जो "कार्बन बजट" है, उसका बड़ा हिस्सा अमीर इस्तेमाल करने की कोशिश में हैं. और वो ग़रीब 50 फ़ीसद आबादी के लिए इनती जगह नहीं छोड़ रहे कि वो अपनी ज़रुरतों को पूरा करने के लिए अपने तय कार्बन उत्सर्जन तक पहुंचे"

हॉट एंड कूल इंस्टीट्यूट के मुताबिक ज़्यादातर अमीर देशों के लोग जिस तरीके से चीज़ों का इस्तेमाल कर रहे हैं उसका धरती के वातावरण पर बहुत बुरा असर हो रहा है. अगर आयात किए गए सामानों से उत्सर्जन की बात करें तो ब्रिटेन में एक व्यक्ति हर साल औसतन 8.5 टन कार्बन का उत्सर्जन करता है. कनाडा में ये आंकड़ा बढ़कर 14.2 टन हो जाता है. अगर हम 1.5 डिग्री सेल्सियस से अधिक धरती के तापमान को नहीं बढ़ने देना चाहते तो उत्सर्जन को कम कर 0.7 टन पर लाना पड़ेगा.

लेकिन बदलाव सिर्फ़ लोगों की लाइफ़स्टाइल बदलने से आएगा या फिर इसके लिए सरकारों को कदम उठाने होंगे. अकेंजी कहते हैं, "लाइफ़स्टाइल ऐसे ही बदलती, इसका एक संदर्भ होता है. ज़्यादातर लोग एक अस्थिर आर्थिक और राजनीतिक हालात में जी रहे हैं. लेकिन बिना अमीरों और सबसे ज़्यादा उत्सर्जन के लिए ज़िम्मेदार लोगों की जीवनशैली में बदलाव की बात किए हम बेहतरी उम्मीद नहीं कर सकते."

अमेरिका के क्लार्क विश्वविद्यालय की प्रोफ़ेसर इमिरेट्स हैलीना शेज़वॉल्ड ब्राउन कहती हैं,"अमीर लोगों की शैली से दूसरे प्रेरणा लेते हैं. इसलिए ये एक ख़राब ट्रेंड है."

गॉसलिंग कहते हैं, "हवाई सफ़र की बात करें तो जैसे कि आप हवाई जहाज़ से यात्रा करने लगते हैं, आप एलीट हो जाते हैं."

दुनिया के 90 प्रतिशत से अधिक लोगों ने कभी हवाई सफ़र नहीं किया और दुनिया की एक प्रतिशत आबादी हवाई सफ़र से होने वाले उत्सर्जन के लिए ज़िम्मेदार है. उद्योगपति और सेलीब्रिटी जो कि अपनी ख़ुद की ब्रांडिंग के लिए दुनिया के अलग अलग हिस्सों में जाते हैं, वो लोगों में नई आकांक्षाएं पैदा कर रहे हैं."

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अमीर लोगों की बड़ी गाड़ियां

राष्ट्राध्यक्षों, बड़े उद्योगपतियों और सेलिब्रिटियों के लिए इस्तेमाल होने वाली एसयूवी को ख़रीदने के सपने मिडिस क्लास के लोग देखने लगे हैं - जबकि इनका वातावरण पर बुरा असर होता है. साल 2019 में गाड़ियों की बिक्री दुनियाभर में 42 फ़ीसद बढ़ी. एसयूवी का सेक्टर इकलौता सेक्टर था जिसमें उत्सर्जन बढ़ा. लोगों के बड़ी संख्या में एसयूवी ख़रीदने से इलेक्ट्रिक कार की बढ़ी बिक्री के फ़ायदे को ख़त्म कर दिया.

बड़े घरों के कारण भी ये समस्या बढ़ रही है क्योंकि वहां ख़पत अधिक होती है. एक हालिया स्टडी को को-ऑथर किम्बरले निकोलस कहती हैं, "घर सोशल स्टेटस बताने का ज़रिया बच गया है."

घरों ले होने वाले उत्सर्जन का 11 प्रतिशत 1 प्रतिशत बड़े घरों से होता है.

हालांकि पिछले कुछ सालों में बदलाव भी आए हैं. थनबर्ग के प्रयासों से प्रेरणा लेकर स्वीडन में फ़्लैगस्केम (स्विडिश में अर्थ - हवाई यात्रा में शर्म) का कॉन्सेप्ट आया है जो कि लोगों को तय करने के लिए कहता है कि उन्हें कितनी हवाई यात्रा करनी चाहिए.

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बदलाव हो रहे हैं

इस मूवमेंट के कारण 2018 में स्वीडन एयरपोर्ट से यात्रा करने वालों की संख्य चार प्रतिशत घटी - जो कि आम बात नहीं है.

कोविड - 19 ने हमें ये सिखाया है कि वीडियो कॉल मीटिंग की जगह ले सकता है. ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के मुताबिक 84 प्रतिशत कंपनिया अब काम से जुड़ी यात्राओं पर कम ख़र्च कर रही हैं.

लोग अपने खान-पान पर भी ध्यान देने लगे हैं जिसके कारण वनस्पति से बनने वाले मीट के मार्केट में बढ़त देखी गई. ससेक्स विश्वविद्यालय के पीटर नेवल कहते हैं, "ये बदलाव किसी सरकारी पॉलिसी का कारण नहीं आया है."

लेकिन बदलाव बहुत धीरे हो रहे हैं. केनर के मुताबिक, "हम जलवायु परिवर्तन के ऐसे प्वाइंट पर पहुंच गए हैं, जब जानवर विलुप्त होने लगे हैं. मुद्दा तेज़ी लाने का है और इसके लिए सरकारों को कदम उठाने होंगे. "

उदाहरण के लिए सरकार अधिक हवाई यात्रा पर टैक्स लगा कर उस पैसे का इस्तेमाल बेहतर पब्लिक ट्रांसपोर्ट के लिए कर सकती है. बड़े घरों से इकट्ठा किए गए टैक्स से घरों को इंसूलेट करने और ईंधन की ग़रीबी दूर करने के लिए की जा सकती है. लेकिन दिक्कत ये है कि अमीर लोग ये पैसा आराम से देने को तैयार हो जाएंगे और पहले की तरह ही काम करने लगेंगे.

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सरकारों को उठाने होंगे कदम

एक तरीका है पर्सनल कार्बन अलाउंस यानी कि हर व्यक्ति को एक कार्बन अलाउंस दिया जाए जिसे वो बेच या ख़रीद सकता है. अगर लोगों को अधिक उत्सर्जन करना है तो वो उनसे ख़रीद सकते हैं जिनके पास उनका उपयोग नहीं हो. इस तरीके को लेकर आयरलैंड, फ्रांस और कैलिफ़ोर्निया में प्रयोग किए जा रहे हैं. हालांकि ब्रिटेन सरकार का विश्लेषण कहता है कि ये तरीका आर्थिक तौर पर कारगर साबित नहीं होगा और सामाजिक तौर पर भी इसे स्वीकार नहीं किया जाएगा.

एक और तरीका है जिसके अंतर्गत सरकार प्राइवेट जेट और बड़े जहाज़ों को मार्केट में आने से रोक दे. इसकी जगह पर कम उत्सर्जन वाले साधन के इस्तेमाल पर ज़ोर दिया जाए.

जलवायु परिवर्तन का असर दिखने लगा है लेकिन कई सरकारों को चिंता है कि इस तरह से कदम उनके वोटरों को नाराज़ कर देंगे और अमीर लोगों की नाराज़गी का सामना भी करना पड़ सकता है.

कई सरकारें बड़े कदम उठा भी रही हैं. ब्रिटेन में वेल्स की सरकार ने नए रोड के प्रोजेक्ट रोक दिए हैं ताकि उत्सर्जन कम करने के लक्ष्य तक पहुंचा जा सके. नीदरलैंड्स की सरकार ने पशुपालन को तीस प्रतिशत घटा दिया है. ब्रिटेन के नॉर्विच और एक्स्टर शहरों में कम उत्सर्जन करने वाले घर बनाने पर ज़ोर है.

साल 2021 में एमस्टरडम में एसयूवी और छोटी दूरी की फ्लाइट जैसे उत्सर्जन करने वाली चीज़ों के विज्ञापन पर रोक लगा दी है. ब्राज़ील के साओ पाओलो और भारत में चेन्नई जैसे शहरों में भी बिलबोर्ड पर ऐसे विज्ञापन दिखाने पर रोक लगाई है.

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बड़े बदलावों की ज़रूरत

लेकिन अकेंजी कहते हैं कि ये काफ़ी नहीं है. जिस तेज़ी से जलवायु परिवर्तन के कारण बदलाव आ रहे हैं, सरकारों को बुनियादी ढाँचे को सुधारने पर ध्यान देना चाहिए. इसका मतलब है कि नीति में सतत विकास की बात होनी चाहिए, बेहतर सार्वजनिक परिवहन, कोयले पर बिजली के लिए निर्भरता कम करना, बेहतर घर, ईंधन से चलने वाली गाड़ियों को हटाना जैसे कदम उठाने पड़ेंगे.

अकेंजी कहते हैं, "कोई भी जानबूझ कर पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुंचाता. लोग उत्पादों का इस्तेमाल अपनी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए करते हैं, बेहतर महसूस करने के लिए करते हैं या फिर विज्ञापन और समाज के दबाव में करते हैं. "

उनका कहना है कि व्यक्तिगत तौर पर उठाए गए क़दमों से बहुत मदद नही मिलेगी और सिर्फ इसे लेकर बुरा महसूस करने से भी कुछ नहीं होगा.

"हम सभी को एक कार्यकर्ता की तरह काम करना होगा. हमें अपने सरकारों के पीछे जाना होगा कि वो अपने वादों पर खरे उतरें"

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