COP26 क्या सच में धरती को बचाने में कामयाब हो पाएगा?

जलवायु

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    • Author, डेविड शूकमैन
    • पदनाम, साइंस एडिटर

COP26 ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन के उम्मीद के मुताबिक "टर्निंग पॉइंट" साबित होगा या ग्रेटा थनबर्ग की आलोचना की तरह "ब्ला ब्ला ब्ला" बन कर रहा जाएगा.

तीन दशकों से चल रही चर्चा के बावजूद धरती औद्योगिक क्रांति के पहले के दौर की तुलना में 1.1 डिग्री सेल्सियस गर्म हो चुकी है.

अगर सभी देश अपने वादे पर अमल करते हैं, तब भी हम तेज़ी से शताब्दी के अंत तक 2.7 डिग्री सेल्सियस की बढ़त की ओर जा रहे हैं.

लेकिन इस कॉन्फ्रेंस से उम्मीदें पहले से बहुत ज़्यादा हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि अब ख़तरा महसूस होने लगा है.

इस साल बाढ़ से जर्मनी में 200 लोगों की जान चली गई. तेज़ गर्मी ने कनाडा और साइबेरियन इलाकों पर असर डाला है.

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अब वैज्ञानिकों के पास इस बात के सबूत भी हैं कि ये बदलाव इंसानी गतिविधियों के कारण हो रहे हैं और ये आने वाले समय में बहुत ख़तरनाक साबित हो सकते हैं.

अब ये बात भी साफ़ है कि तापमान को बढ़ने से रोकने के लिए कार्बन उत्सर्जन को आधा करना होगा - और वो भी एक तय समय सीमा में.

हम कुछ ऐसी चीज़े देख रहे हैं, जिसके बारे में कुछ साल पहले तक हम नहीं सोचते थे. कई देश और कंपनियां सदी के मध्य तक नेट ज़ीरो करने का वादा कर रहे हैं.

इसका मतलब है कि वो पेड़ लगाकर या दूसरे तरीकों से उतना कार्बन सोख लेने का प्रयास करेंगे जितना उस समय तक उनके यहां उत्सर्जन होगा.

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जलवायु पर चर्चा का इकलौता फ़ोरम

वैसे हकीकत ये है किसी एक मीटिंग से इतना कुछ हासिल नहीं होगा. COP सरकारों द्वारा जलवायु परिवर्तन का हल निकालने के लिए बनाया गया था.

और इस समस्या पर मिलकर हर साल चर्चा करने के लिए ये इकलौता फ़ोरम है.

लेकिन ये 200 देशों के बीच सहमति पर आधारित होता है, हर देश का अपना नज़रिया है. एक अधिकारी ने एक बार मुझसे कहा था, "एक साथ 200 बिल्लियों को संभालो."

कई देश जहां भारी मात्रा में तेल और कोयला हैं, वो पर्यावरण के एजेंडों के ख़िलाफ़ रहते हैं और उन्होनें चर्चा की रफ्तार धीमी करने की कोशिशें की हैं.

दूसरे जो ग़रीब हैं और जिनपर सबसे ज़्यादा असर होगा, वो मदद की तलाश में हैं.

ग्लासगो

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2005 में शुरू हुई मीटिंग

पहली COP मीटिंग 2005 में मॉन्ट्रिएल में कड़कड़ाती ठंड में हुई थी. वहां बातचीत ग्लेशियर के तापमान की तरह ही ठंडी थी.

वहां पर उन मुद्दों पर बात हो रही थी जिनका कभी हल नहीं निकलता और ऐसे सुझाव दिए जा रहे थे जिनसे कोई फ़ायदा नहीं होता.

जब सभी देश एक निष्कर्ष पर पहुंचें तो मैंने ब्रिटेन की पर्यावरण मंत्री मारग्रेट बेकेट के आंखों में आंसू देखे.

मैंने पूछा कि किसा बात का जश्न मनाया जा रहा है तो उन्होंने जवाब दिया - "ये सभी बातचीत जारी रखने के लिए तैयार हैं. इसलिए ये प्रोसेस चलता रहेगा."

उसके बाद कई कॉन्फ्रेंस हुए जिसके नतीजे मिलेजुले रहे. अच्छे काम भी हुए. मैंने अभी तक नौ में हिस्सा लिया और कुछ बहुत दुखी करने वाले लम्हें देखे है.

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नैरोबी में 2006 में जर्मनी के मंत्री ने गुस्से में कह दिया था कि लोग वहां आए ही क्यों हैं.

साल 2007 में बाली में संयुक्त राष्ट्र के एक मुख्य अधिकारी, जो काफ़ी थके हुए और तवान में थे, सभी के सामने रोने लगे.

और कोपनहेगन में ठीक से संचालन नहीं होने के कारण कई सदस्य वॉकआउट कर गए थे और बातचीन ख़त्म होने की कगार पर पहुंच गई थी.

ब्रिटेन सरकार के एक पूर्व एडवाइज़र जो कि डेनमार्क में बातचीत के केंद्र में थे, मानते हैं कि COP तमाम ख़ामियो के बावजूद ज़रूरी प्रक्रिया है.

अब शेफिल्ड विश्वविद्यालय में कार्यरत प्रोफ़ेसर माइक जेकब कहते हैं कि इसके बिना "उत्सर्जन अभी के स्तर से अधिक होता."

वो कहते हैं कि एक "सामूहिक प्रतिबद्धता" सरकारों को संकट पर फोकस करने में मदद करती है.

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अबतक क्या हुआ हासिल

इसी के कारण COP को पेरिस 2015 में एक बड़ी सफलता मिली.

फ्रांस की सरकार ने सावधानीपूर्वक समर्थन हासिल कर एक अलायंस बनाया और जलवायु परिवर्तन पर अपनी तरह की पहली संधि बनाने में कामयाब रहे जिसे पेरिस समझौता कहते हैं.

ये एक बड़ा मौका था क्योंकि इससे पहले सभी देश एक साथ मिलकर तापनाम को 2 डिग्री सेल्सियस या मुमकिन हुआ को 1.5 डिग्री सेल्सियस पर सीमित रखने के लिए साथ मिलकर काम करने को तैयार नहीं हुए थे.

हां, लेकिन इसमें एक बात का हल नहीं निकल पाया, वो ये कि समझौता स्वैच्छिक है. कोई भी देश उत्सर्जन कम करने के लिए तेज़ी से कम करने के लिए बाध्य नहीं है.

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लेकिन प्रोफ़ेसर जेकब का मानना है कि एक ढांचा तैयार करने से इस प्रक्रिया को लय मिली जो कि अपने आप में एक सफलता है.

ऐसा इसलिए क्योंकि अधिक से अधिक सरकारें अब पेट्रोल-डीज़ल की गाड़ियों को हटाने या नवीकरणीय ऊर्जा के इस्तेमाल के लिए अपने टार्गेट सेट कर रही हैं, और इससे उद्योगपतियों को एक गंभीर मेसेज जाता है.

इसलिए सौर और पवन ऊर्जा में निवेश पिछले कुछ समय में बढ़ा है और ये सस्ते हुए हैं. अगर ग्लासगो में बातचीच विफल नहीं हुई तो एक ठोस सिग्नल जाएगा.

ये बड़े निवेशकों के लिए एक शुरुआत हो सकती है कि वो सैंकड़ों करोड़ो की रकम जीवाश्म ईंधन में निवेश करने से बचें - कुछ दिनों पहले यूरोप से सबसे बड़े पेंशन फंड ने ऐसा ही करने का एलान किया है.

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बदलाव दिख रहे हैं

बड़े कार निर्माता पहले से ही इलेक्ट्रिक गाड़ियों की तरफ़ ध्यान दे रहे हैं. शिपिंग इंडस्ट्री जो अभी तक इससे बचती रही है, उसपर भी बदलाव के लिए दबाव बढ़ रहा है.

ग्रीन सीमेंट और ग्रीन स्टील का इस्तेमाल सबसे ज्यादा प्रदूषण फैलाने वाली इंडस्ट्री में मुख्य धारा में आ रहे हैं.

लेकिन COP26 में सबसे बड़ा मुद्दा ये होगा कि ये बदलाव कितनी तेज़ी से आएंगे.

अगर अभी तक के किए गए सभी वादों को देखें तो 2030 तक उत्सर्जन 16 प्रतिशत तक बढ़ सकता है, वैज्ञानिकों का कहना है कि इसके 45 प्रतिशत कम होना चाहिए.

एक दूसरा चैलेंज होगा ग़रीब देशों को आर्थिक मदद देने का, जिन्हें बढ़ते जलस्तर, बाढ़ और सूखे के सबसे ज़्यादा ख़तरा है.

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उनके हाथ काफ़ी समय से निराशा लगी है. उन्होंने वादों को नहीं पूरा होते देखा है.

इसमें सबसे बड़ा वादा था 100 बिलियन डॉलर की सालाना मदद को जिसे अभी तक पहुंच जाना चाहिए था.

बांग्लादेश की प्रधानमंत्री के सलाहकार प्रोफ़ेसर सलीमुल हक इस पूरी प्रक्रिया को लेकर खुश नहीं दिखते.

वो कहते है, "इस सालाना पार्टी का कोई मतलब नहीं है. ऐसा नहीं है कि जलवायु परिवर्तन साल में बस एक बार का मुद्दा है. ये हर जगह, हर दिन हो रहा है. ये भविष्य की बात नहीं है- इसपर हर समय ध्यान देना ज़रूरी है."

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प्रोफ़ेसर हक को क्या उम्मीदें हैं?

वो कहते हैं, "मुझे लगता है कि वो कुछ अलग लेकर आएंगे लेकिन जो एलान वो करेंगे, आप पत्रकारों को उसकी जांच करनी चाहिए - वो जो कह रहे हैं, क्यो वो सच है?"

ये कॉन्फ्रेंस ध्यान केंद्रित करने में मदद करते हैं, लेकिन रातोंरात को कोई बदलाव नहीं आता है.

मोंट्रिएल के ऑबज़रवर ने सही कहा था, "ये एक प्रक्रिया है."

ग्लासगो से बहुत उम्मीदें हैं, साथ ही मिस्र में होने वाले COP27 और COP28 को लेकर भी बातें हो रही हैं, जो कि क़तर में हो सकता है.

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