वो जादुई चीज़ जिसकी सबको ज़रूरत है, लेकिन वो ख़त्म हो रही है

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- Author, फ्रैंक स्वैन
- पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर
प्राकृतिक रबड़ में एक ख़ास मज़बूती, लचीलापन और जलरोधी (वाटरप्रूफ) गुण होता है. यह हमारी गाड़ियों के टायर बनाने के काम आता है. इससे हमारे जूतों के तले बनते हैं.
इंजिन और रेफ़्रिजरेटर के सील बनाने से लेकर तारों और बिजली के दूसरे कंपोनेंट को इन्सुलेट करने के लिए रबड़ का ही इस्तेमाल होता है. कंडोम, कपड़े, स्पोर्ट्स बॉल और मामूली इलास्टिक बैंड बनाने में भी इसी की ज़रूरत पड़ती है.
पिछले एक साल के दौरान इसकी अहमियत और बढ़ गई है. कोरोना संक्रमण से बचने के लिए डॉक्टर और नर्सों की ओर से इस्तेमाल की जाने वाली पीपीई किट भी इसी से बनते हैं.
दरअसल रबड़ अब अंतरराष्ट्रीय महत्व का ऐसा कमोडिटी बन चुका है कि यूरोपियन यूनियन को इसे बेहद महत्वपूर्ण कच्चे माल की सूची में शामिल करना पड़ा है.
लेकिन दुर्भाग्य से अब दुनिया भर में इसकी क़िल्लत पैदा होने के संकेत मिलने लगे हैं. बीमारियां, जलवायु परिवर्तन और रबड़ की गिरती क़ीमतों ने इसकी सप्लाई को ख़तरे में डाल दिया है.
कहीं ऐसा न हो कि दुनिया में रबड़ ख़त्म हो जाए और हम देखते रहें. ऐसी स्थिति आने से पहले ही वैज्ञानिकों ने इसका हल खोजना शुरू कर दिया है.

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प्राकृतिक रबड़ पर क्यों मंडरा रहा है ख़तरा?
लेकिन सवाल यह है इतनी अहम कमोडिटी के सामने ऐसा ख़तरा क्यों मंडरा रहा है. दुनिया भर में इस वक़त् हर साल दो करोड़ टन प्राकृतिक रबड़ की सप्लाई होती है. इस रबड़ का उत्पादन असंगठित छोटे किसान करते हैं.
ये उष्णकटिबंधीय वनों में ज़मीन के छोटे टुकड़ों पर रबड़ के पेड़ उगाते हैं. थाईलैंड, इंडोनेशिया, चीन और पश्चिम अफ्रीका में लाखों कामगार रबड़ उत्पादन में लगे होते हैं.
ये कामगार बड़ी सावधानी से रबड़ के पेड़ों की छाल में चीरा लगाते हैं और उससे निकलने वाला दूधिया द्रव जमा कर लेते हैं. फिर इन्हें पट्टियों की शक्ल में ढाल कर धूप में सूखा दिया जाता है.
ये किसान दुनिया भर में पैदा होने वाले प्राकृतिक रबड़ के 85 फ़ीसद का उत्पादन करते हैं. लेकिन इस सप्लाई पर अब संकट के बादल मंडरा रहे हैं.
क्योंकि ब्राज़ील के वर्षा वनों में पैदा होने वाला वहां का स्वदेशी रबड़ का पेड़ हेविया ब्राजिलिनेसिस अब नक़दी फ़सल के तौर पर नहीं उगाया जाता.
दरअसल दक्षिण अफ्रीका की वनस्पतियों में पाए जाने वाले एक झुलसा रोग ने 1930 में यहां के रबर उद्योग को लगभग ख़त्म कर दिया था.
हालांकि कड़े क्वारंटीन नियमों की वजह से इस रोग को दक्षिण अमेरिका तक ही सीमित रखने में मदद मिल गई लेकिन इसके एशिया में पहुँचने की आशंका से इनकार नहीं किया गया.

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रबड़ की ज़बरदस्त माँग लेकिन किसानों की नहीं होती कमाई
लेकिन ब्राज़ील के बाहर बाक़ी दुनिया के रबड़ उत्पादक अभी भी स्थानीय रोगाणुओं जैसे व्हाइट रूट डिज़ीज़ के ख़तरे का सामना कर रहे हैं. कुछ ऐसी बीमारियां भी हैं जो पाम ऑयल प्लांटेशन से आ जाती हैं. थाईलैंड में रबड़ उत्पादन पर जलवायु परिवर्तन की मार पड़ रही है.
हाल के वर्षों में यहां रबड़ का उत्पादन कभी सूखा तो कभी भारी बाढ़ का शिकार हो रहा है. बाढ़ की वजह से बड़े इलाक़े में ये रोगाणु फैल रहे हैं. रबड़ की बढ़ती माँग और इसकी सप्लाई में कमी किसानों के लिए अच्छी ख़बर होनी चाहिए.
ऐसी स्थिति में रबड़ का उत्पादन अच्छा-ख़ासा मुनाफ़ा दे सकता है लेकिन ऐसा नहीं है. रबड़ की क़ीमत थाईलैंड से दूर शंघाई फ्यूचर एक्सचेंज में तय होती है, जहां सटोरिये सोना, एल्यूमीनियम और ईंधन के साथ ही इसकी भी क़ीमतों पर दांव लगाते हैं.
रबड़ ख़रीदने वाली कंपनी हेलसियोन एग्री के को-फ़ाउंडर रॉबर्ट मेयर का कहना है कि रबड़ पैदा करने की लागत का इसकी क़ीमतों से कोई लेना-देना नहीं है. इस व्यवस्था की वजह से एक ही महीने में रबड़ की क़ीमत तीन गुना तक बढ़ सकती है.
लेकिन हाल के वर्षों में इसकी क़ीमत काफ़ी कम पर रोक कर रखी गई है. इस हालात ने रबड़ की सप्लाई को लेकर और संकट पैदा कर दिया है. मेयर के मुताबिक़ क़ीमत न बढ़ने से छोटे किसान ज़्यादा से ज़्यादा उत्पादन पर ज़ोर देते हैं.
किसान पेड़ों से ज़्याजा से ज़्यादा दूधिया द्रव निकालते हैं. इससे रबड़ के ये पेड़ कमज़ोर हो जाते हैं और इनमें रोग लगने की आशंका भी बढ़ जाती है. रबड़ की क़ीमतें कम होने की वजह से पुराने पेड़ों की उम्र ख़त्म हो जाने के बावजूद नए पौधे लगाने को तवज्जो नहीं दी जाती.
सस्ते रबड़ की वजह से कई किसानों ने तो इसके पौधे लगाने बिल्कुल छोड़ ही दिए हैं. वेल्स की बेंगोर यूनिवर्सिटी की एलेनर वारेन-थॉमस कहती हैं कि एक एकड़ ज़मीन में पाम ऑयल रबड़ के उत्पादन से बराबर ही रक़म मिलती है.
लेकिन रबड़ उत्पादन में ज़्यादा लागत आती है. चूंकि रबड़ की क़ीमतें गिर रही हैं इसलिए इसके उत्पादक अब पाम ऑयल उत्पादन की ओर रुख़ कर रहे हैं.

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रबड़ की क़िल्लत का हल आसान नहीं
दुनिया भर में इस वक़्त प्राकृतिक रबड़ की माँग के हिसाब से इसकी पूर्ति नहीं हो पा रही है. 2019 के आख़िर में इंटरनेशनल ट्राईपारटाइट रबर काउंसिल ( ITRC) ने कहा था कि 2020 में नौ लाख टन यानी कुल उत्पादन के सात फ़ीसद रबड़ की कमी हो सकती है.
लेकिन इसके बाद कोरोना महामारी का हमला हुआ और चूंकि लॉकडाउन की वजह से लोगों का सफ़र रुक गया था, इसलिए टायरों के लिए रबड़ की माँग कम हो गई. लेकिन जल्द ही इसकी माँग बढ़ गई.
लॉकडाउन ख़त्म होने के बाद सार्वजनिक परिवहन में सफ़र करने से बचने के लिए चीन में बड़ी तादाद में लोगों ने नई कारें ख़रीदीं.
मेयर कहती हैं इसी तरह का ट्रेंड दुनिया के दूसरे हिस्सों में भी दिख सकता है. अब रबड़ के गोदामों में इसकी कमी हो गई है. टायर निर्माताओं के पास जो इन्वेंट्री है, वह अब काफ़ी घट गई है.
सिथेंटिक रबड़ तो पेट्रोकेमिकल से बनाया जा सकता है लेकिन गुणवत्ता और टिकाऊपन में यह प्राकृतिक रबड़ का मुक़ाबला नहीं कर सकता.
बड़ा सवाल यह है कि प्राकृतिक रबड़ की जो क़िल्लत है उसके पीछे कुछ बुनियादी समस्याएं हैं और इन्हें सुलझाना इतना आसान नहीं है. हालांकि इस संकट को सुलझाने के लिए कुछ आपात क़दम उठने शुरू हो गए हैं.

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बुनियादी समस्याएं
ज़ाहिर है, प्राकृतिक रबड़ की कमी को पूरा करने के लिए और पेड़ लगाने की कोशिश होगी. जब इसकी सप्लाई कम होगी और दाम बढ़ने लगेंगे तो किसानों को और पेड़ लगाने के लिए उष्णकटिबंधीय वर्षा वनों को काटने के लिए प्रेरित किया जाएगा.
वारेन- थॉमस का कहना है कि वनों की कटाई के लिए पाम ऑयल प्लांटेशन ज़्यादा बदनाम हो रहा है लेकिन रबड़ के ज़्यादा पेड़ लगाना भी जैव विविधता के लिए उतना ही बड़ा ख़तरा है.
2011 में चीन में प्राकृतिक रबड़ की बढ़ी माँग ने दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों में बड़ी तादाद में वनों की कटाई को बढ़ावा दिया था. अकेले कंबोडिया में ही एक चौथाई वन काट दिए गए थे.
इसके बावजूद रबड़ उत्पादन में वर्षों लगना है क्योंकि पेड़ों को तैयार होने में सात साल तक लग जाते हैं.
अब दुनिया भर में इसका उत्पादन बढ़ाने के तरीक़े ढूंढे जा रहे हैं. कहीं मौजूदा प्रजाति के पेड़ नहीं लगाए जा रहे हैं तो कहीं एथेपॉन जैसे केमिकल का इस्तेमाल किया जा रहा है ताकि पेड़ों से ज़्यादा दूधिया द्रव निकले. कहीं कजाख डेंडोलियन जैसी प्रजाति का इस्तेमाल हो रहा है.
यह पारंपरिक पेड़ों की तुलना में प्रति एकड़ उत्पादन का दसवां हिस्सा पैदा करती है लेकिन यह तीन महीने में तैयार हो जाती है. साथ ही बड़ी मात्रा में बीज भी पैदा करती है, जिससे पेड़ लगाने और उत्पादन बढ़ाना आसान हो जाता है.

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रबड़ के वैकल्पिक स्रोत तलाशने पर ज़ोर
विकासशील देशों के धनी होते जाने के साथ ही प्राकृतिक रबड़ की माँग और बढ़ जाएगी.क्योंकि इन देशों में ज़्यादा से ज़्यादा लोग कार ख़रीदेंगे और ज़ाहिर है इसके साथ ही टायरों की खपत भी बढ़ेगी. लिहाज़ा प्राकृतिक रबड़ के उत्पादन और कारोबार को लेकर बदलाव के संकेत दिखने लगे हैं.
ब्रिजस्टोन, कॉन्टिनेंटल और और गुइईयर जैसे रबड़ की बड़ी ख़रीदार कंपनियों ने प्राकृतिक रबड़ की टिकाऊ खेती से जुड़े मंचों से समझौते किए गए हैं, जो हाल में वनों की कटाई कर उनकी ज़मीन पर उगाए जाने वाले पेड़ों से निकाला जाने वाला रबड़ नहीं ख़रीद रहे हैं.
मेयर अब कॉफ़ी और कोकोआ की तरह रबड़ के लिए लिए एक दाम तय करने का अभियान चला रही हैं. इससे विकासशील देशों में रबड़ पैदा करने वाले छोटे किसानों की जीविका की गारंटी मिलते रहे और इसकी सप्लाई भी मज़बूत बनी रहे. वारन-थॉमस भी इससे इत्तेफ़ाक़ रखती हैं.
अमेरिका की ओहियो यूनिवर्सिटी में बायोइमरजेंट मैटेरियल की प्रोफ़ेसर कैटरीना कोर्निश का कहना है कि दुनिया भर में इस्तेमाल होने वाला दस फ़ीसदी रबड़ वैकल्पिक स्त्रोत से आता है. प्राकृतिक रबड़ की क़िल्लत ही इस पीढ़ी के लिए एक मात्र मौक़ा है जब इन वैकल्पिक स्रोतों में निवेश बढ़ाया जाए.
वह कहती हैं, "हमारे पास इतने डेंडिलियोन बीज हैं कि 40 हेक्टेयर के वर्टिकल फ़ार्म में रबड़ पैदा किया जा सकता है. या फिर 3000 हेक्टेयर में व्हायुली (Parthenium argentatum) की खेती की जा सकती है. लेकिन इस दिशा में कुछ अरबपतियों को प्रेरित करना होगा. मै चाहती हूं कि मरने से पहले रबड़ के वैकल्पिक स्रोतों को स्थापित कर दूं. हमें इस पर जल्द से जल्द काम करना होगा. अगर रबड़ की फ़सल नाकाम हो जाती है तो विकसित दुनिया पर जो नकारात्मक असर होगा, उसका अंदाज़ा लगाना मुश्किल है."
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