क्या अच्छी-अच्छी बातें करके जलवायु परिवर्तन रोका जा सकता है?

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- Author, डिएगो आर्गुडास ऑर्टिज़
- पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर
जलवायु परिवर्तन, सारी दुनिया के लिए एक बड़ी समस्या बन चुका है. दुनिया भर में लोग इसे लेकर चिंतित हैं.
कुछ लोग अपने-अपने स्तर पर इसे बचाने के लिए प्रयास कर भी रहे हैं और उनकी कोशिशों की सराहना भी हो रही है.
और बाक़ी दुनिया ये उम्मीद लगाए बैठी है कि इन लोगों की कोशिशों से हमारा भविष्य सुरक्षित हो जाएगा.
लेकिन दूसरों की कोशिशों की तारीफ़ करने भर से काम चलने वाला नहीं है. हमें बेहतर भविष्य के लिए ना सिर्फ़ उम्मीद करनी है, बल्कि उसके लिए मिलकर कोशिश भी करनी होगी.
अभी तक धरती को बचाने के लिए महज़ बड़ी-बड़ी बातें हुई हैं. नीतियां बनाई गई हैं. लेकिन अमल नहीं हुआ है.
नतीजा ये रहा कि हालात बद से बदतर होते चले गए. शायद हम सभी के ज़हन में कहीं ना कहीं ये बात बैठी हुई है कि, जो चल रहा है बस वैसा ही चलता रहेगा. जब ठीक होना होगा, तो हो ही जाएगा.
दूसरे कोशिश कर ही रहे हैं. लिहाज़ा किसी ना किसी दिन उनकी कोशिशें कामयाब हो जाएंगे और सब ठीक हो जाएगा. ऐसी हमें उम्मीद है. सिर्फ़ उम्मीद.

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धरती बचाने को लेकर युवा पीढ़ी की कोशिशें
हमारे मुक़ाबले, नई पीढ़ी इस धरती को बचाने के लिए ज़्यादा फ़िक्रमंद है. तभी तो स्कूल के बच्चे आज सड़कों पर उतर आए हैं.
कह रहे हैं कि साफ़ हवा-पानी हमारा हक़ है. हम से हमारा हक़ में छीनिए.
इसकी सबसे चर्चित मिसाल हम ग्रेटा थनबर्ग के रूप में देख सकते हैं.
जो धरती की आब-ओ-हवा को बिगड़ने से बचाने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आवाज़ उठा रही हैं.
थनबर्ग ने महज़ 9 साल की उम्र में इस मुद्दे को उठाना शुरू कर दिया था. उस वक़्त थनबर्ग केवल तीसरी कक्षा में पढ़ रही थीं.
पर्यावरणविदों का मानना है कि अगर सही समय पर कार्बन उत्सर्जन को कम करने के प्रयास नहीं किए गए, तो पृथ्वी के सभी जीवों का अस्तित्व खतरे में आ जाएगा.
धरती को बचाने के लिए दुनिया भर में कई तरह के आंदोलन चल रहे हैं. लेकिन, ये आंदोलन बस चल ही रहे हैं.
थनबर्ग, 16 साल की बच्ची पर्यावरण के लिए इतनी फिक्रमंद है कि उसने ब्रसेल्स में कहा था कि 'हम दुनिया के नेताओं से भीख मांगने नहीं आए हैं. आपने हमें पहले भी नज़रअंदाज़ किया है और आगे भी करेंगे. अब हमारे पास वक्त नहीं. हम यहां आपको यह बताने आए हैं कि पर्यावरण खतरे में है.'
थनबर्ग असल में एक उम्मीद है, ऐसी उम्मीद जो जो अपना मक़सद हासिल करने के लिए जी तोड़ मेहनत कर रही है.
अगर क़ुदरत को बचाए रखना है तो हम सभी को उसके लिए मेहनत भी करनी होगी.

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क्या उम्मीद से जलवायु परिवर्तन रोका जा सकता है?
मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि सच्ची उम्मीद हमारे अंदर हर समय एक ज्वाला जगाए रखती है. उसे पूरा करने का जुनून सवार रहता है. तभी वो उम्मीद पूरी होती है.
उम्मीद और आशावाद में बुनियादी फ़र्क़ है. जब हम आशावादी होते हैं तो हमें लगता है कि किसी ना किसी दिन हमारी उम्मीद पूरी हो जाएगा.
लेकिन कैसे होगी इसका रोडमैप हमारे पास नहीं होता. वहीं सच्ची उम्मीद पूरा करने का रोडमैप हमारे पास होता है.
जलवायु परिवर्तन की सबसे बड़ी वजह बढ़ता कार्बन उत्सर्जन है. इस से बचने के विकल्प भी हम ने निकाल लिए हैं. सोलर पैनल लगा लिए हैं. इलेक्ट्रिक कारें बना ली हैं.
इस काम में सरकारें भी कुछ मदद कर देती हैं. लिहाज़ा ऐसे में आम इंसान कार्बन उत्सर्जन को कम करने में अपने योगदान के बारे में कुछ सोचते ही नहीं.
उम्मीद भी दो तरह कि होती है. झूठी उम्मीद और रचनात्मक उम्मीद. झूठी उम्मीद में हम अपनी आंख मूंद लेते हैं, और सारा मामला ईश्वर के भरोसे छोड़ देते हैं.
जबकि रचनात्मक सोच हमें हमारी आत्मा से मिलती है. जो उस उम्मीद को पूरा करने के लिए हमें बेचैन रखती है.
क़ुदरत को बचाने के लिए आज इसी रचनात्मक सोच की ज़रूरत है, जो थनबर्ग जैसे बच्चों में देखने को मिल रही है. इसके लिए हमें तिनका-तिनका मेहनत करनी होगी.
जैसा कि जलवायु परिवर्तन पर बनी एक डॉक्यूमेंट्री में भी दिखाया गया है कि मूंगे की चट्टानों को कितनी मुश्किलों और मेहनत के बाद बचाया जाता है.
दरअसल जिस रफ़्तार से मूंगे की चट्टानों का ख़ात्मा हो रहा है, उन्हें फिर से ज़िंदा करने के लिए बहुत कोशिश की जा रही हैं.
लेकिन ये कोशिशें ऊंट के मुंह में ज़ीरे जैसी हैं. इनकी रफ्तार भी बहुत धीमी है. फिर भी वैज्ञानिक कोशिश कर रहे हैं क्योंकि वो अपनी उम्मीदों को परवान चढ़ाना चाहते हैं.
पर्वायवरण बचाने के लिए हमें भी इसी तरह मेहनत करनी होगी. एक बेहतर उम्मीद के साथ सही दिशा में मेहनत और कोशिश की जाएगी तो रंग ज़रूर लाएगी.
लेकिन याद रहे कि कोशिश ज़रूर करनी होगी. आपको भी और हमें भी.
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