जलवायु परिवर्तनः क्या भारत लक्ष्य को हासिल कर पाएगा?

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- Author, श्रुति मेनन
- पदनाम, बीबीसी रिएलिटी चेक
भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि भारत वर्ष 2070 तक कार्बन उत्सर्जन को नेट ज़ीरो करने के लक्ष्य को हासिल कर लेगा. हालाँकि, ग्लासगो में जलवायु परिवर्तन पर शिखर सम्मेलन में देशों से अपेक्षा की जा रही थी कि वो इस लक्ष्य को 2050 तक पूरा कर लें.
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कार्बन उत्सर्जक देश है, पहले नंबर पर चीन है, फिर अमेरिका. यूरोपीय संघ को एक साथ लेने पर भारत की गिनती चौथे नंबर पर होती है.
तेज़ी से बढ़ती जनसंख्या और कोयले और तेल पर निर्भर अर्थव्यवस्था के कारण भारत में उत्सर्जन तेज़ी से बढ़ने की उम्मीद है और इसे रोकने के लिए कड़े कदम उठाने की ज़रुरत है.
भारत ने अभी तक उत्सर्जन कम करने के लिए क्या किया?
भारत ने समग्र रूप से उत्सर्जन की कमी के लिए लक्ष्य रखने से कतराता रहा है. भारत का कहना है कि औद्योगिक देशों को इसका अधिक भार उठाना चाहिए क्योंकि उनका उत्सर्जन में अधिक हिस्सा रहा है.
भारत ने उत्सर्जन की तीव्रता को 2030 तक 2005 की तुलना में 33-35 प्रतिशत तक घटाने का लक्ष्य रखा है. लेकिन इसके कम होने का मतलब ज़रूरी नहीं है कि उत्सर्जन में कमी आए.
पिछले कुछ सालों में भारत का तेज़ आर्थिक विकास तेल पर निर्भर रहा है और ज़्यादातर उत्सर्जन का कारण भी यही है.

जलवायु परिवर्तन को लेकर काम करनेवाली संस्था आईपीसीसी (द इंटर-गवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज) का लक्ष्य उत्सर्जन के स्तर को ज़ीरो करने का है, यानी ऐसी स्थिति जहां कोई भी देश ग्रीनहाउस गैस के उत्सर्जन की मात्रा में बढ़ोतरी नहीं होने देगा. लक्ष्य है कि साल 2050 तक तापमान को 1.5 डिग्री सेल्सियस से ऊपर नहीं जाने दिया जाए.
130 से ज़्यादा देशों ने इसपर अमल करने का वायदा किया है. मगर भारत इनमें शामिल नहीं है.

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साल 2015 में भारत ने वादा किया था कि 2022 तक वो पवन ऊर्जा, सौर्य ऊर्जा और हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्लांट से 175 गीगावॉट बिजली पैदा करेगा.
सितंबर 2021 तक सिर्फ़ 100 गीगावॉट बिजली इन स्रोतों से पैदा की जा रही है.

लेकिन पेरिस समझौते के मुताबिक तय लक्ष्य को लेकर विभिन्न देशों के प्रदर्शन का आकलन करने वाला संगठन क्लाइमेट एक्शन ट्रैकर (सीएटी) इस लक्ष्य को "बहुत कम" मानता है.
सीएटी की सिंडी बैक्सटर का कहना है कि भारत 1.5 डिग्री के लक्ष्य को हासिल करने के लिए भारत जैसे विकासशील देशों को डी-कर्बनाइज़ करना होगा यानी अर्थव्यवस्था की कार्बन के स्रोतों पर निर्भरता को ख़त्म करना होगा.
बैक्सटर कहती हैं, "डीकार्बनाइज़ करने का भारत का कोई प्लान नहीं है. ना ही कोई ऐसा टार्गेट है जो बता सके कि कहां मदद की ज़रूरत है और कितनी मदद की ज़रूरत है."
क्या भारत के जंगल बढ़ रहे हैं?
भारत ने कई बार कहा है कि वो एक-तिहाई ज़मीन जंगल के क्षेत्र के तहत लाना चाहता है. लेकिन इसके लिए कोई समय सीमा तय नहीं की गई और इस क्षेत्र में बहुत प्रगति नहीं हुई है.
हालांकि दक्षिण भारत में पेड़ लगाने के कुछ प्रयास किए जा रहे हैं. पूर्वोत्तर राज्यों में भी कुछ इलाकों में जंगल वापस आए हैं. जंगल कार्बन सोखने का एक बड़ा ज़रिया है.

भारत का लक्ष्य 2030 तक 2.5 से 3 अरब पेड़ लगाने का है ताकि वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड सोख सकें.
ग्लोबल फ़ॉरेस्ट वॉच, जिसमें मेरीलैंड विश्वविद्यालय, गूगल और अमेरिकी जियोलॉजिकल सर्वे और नासा एक साथ काम कर रहे हैं, उनके अनुमान के मुताबिक भारत ने 2001 से 2020 के बीच 18 प्रतिशत वन खो दिए और 5 प्रतिशत पेड़ वाले इलाक़े कम हुए है.
लेकिन भारत सरकार का अपना सर्वे बताता है कि 2001 से 2019 देश में 5.2 प्रतिशत जंगल बढ़े हैं.
ऐसा इसलिए क्योंकि ग्लोबल फ़ॉरेस्ट वॉच सिर्फ़ उन्हीं पेड़ों को गिनता है जिनकी लंबाई 16 फ़ीट से अधिक है और भारत का आधिकारिक आंकड़ा जंगल से घनत्व पर आधारित होता है.
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ग्लास्गो में नवंबर में होने वाला Cop26 ग्लोबल समित जलवायु परिवर्तन पर काबू करने में अहम योगदान दे सकता है. क़रीब 200 देशों से उत्सर्जन कम करने के लिए उनकी नीति के बारे में पूछा गया है- इससे हमारे रोज़मर्रा के जीवन में बड़ा बदलाव आ सकता है.

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