बढ़ती आबादी के अनाज की ज़रूरतें कैसे पूरी करेंगे हम - दुनिया जहान

बढ़ती आबादी

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दुनिया की आबादी आज 7.7 अरब है, इस दशक के आख़िर तक ये आंकड़ा क़रीब साढ़े आठ अरब तक होने का अनुमान है. वहीं आने वाले चार दशकों में भारत की आबादी 1.7 अरब तक होने का अनुमान है.

आने वाले वक़्त में मुल्कों के सामने सबसे बड़ी चुनौती होगी, इतनी बड़ी आबादी के लिए अनाज जुटाने की.

1798 में अर्थशास्त्री थॉमस मैलथस ने कहा कि जनसंख्या जिस रफ़्तार से बढ़ती है, उस रफ़्तार से अनाज का उत्पादन नहीं होता , इसलिए दुनिया में आबादी के अनुपात से खाना हमेशा कम रहेगा.

मैलथस के अनुसार जनसंख्या वृद्धि की रफ़्तार एक से दो, दो से चार, चार से आठ और फिर आठ से सोलह होती है, वहीं खाद्यान्न उत्पादन की गति एक से दो, दो से तीन, तीन से चार और फिर चार से पांच होती है. यानी सौ साल बाद आबादी को खिलाने के लिए अनाज कम पड़ेगा.

मैलथस का मानना था कि सूखा, बीमारी, बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाएं आबादी को नियंत्रण में रखने में मदद करती हैं ताकी आबादी और अनाज उत्पादन का संतुलन बना रहे.

थॉमस मैलथस

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आबादी और अनाज को लेकर उनका ये आकलन हमेशा चर्चा में रहा लेकिन ये कभी सच नहीं बन पाया.

इसके क़रीब दो सौ साल बाद अमेरिकी प्रोफ़ेसर क्रिस्टोफ़र बैरट ने संयुक्त राष्ट्र में दी एक स्पीच में कहा कि आने वाले वक़्त में इंसान के सामने सबसे बड़ी चुनौती खाद्य संकट से निपटने की होगी. बैरट ने चेतावनी दी कि ये अस्तित्व बचाए रखने की लड़ाई जैसा होगा क्योंकि जल, ज़मीन और समुद्री संसाधन कम होते जाएंगे.

1960 के दशक की हरित क्रांति इसी सवाल का जवाब तलाशने की कोशिश थी, लेकिन भविष्य में इससे अनाज की हमारी ज़रूरतें पूरी नहीं हो सकेंगी.

दुनिया जहान में इस सप्ताह पड़ताल इस बात की कि क्या आने वाले वक्त में सभी का पेट भरने के लिए हम ज़रूरी अनाज उगा पाएंगे. कहीं ऐसा तो नहीं कि हमारे लिए भूख से लड़ना सबसे बड़ी चुनौती बन जाएगी?

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अनाज

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उत्पादन बढ़ाने की कोशिश

एंडी जार्विस कोलंबिया के इंटरनेशनल सेंटर फ़ॉर ट्रॉपिकल एग्रीकल्चर में पॉलिसी एनालिसिस रीसर्च के निदेशक हैं. ये संगठन 1960 के दशक में बना था जब सरकारें इस बात से परेशान थीं कि बढ़ती आबादी के लिए खाने की व्यवस्था कैसे हो.

इसका जवाब तलाशने लिए वैज्ञानिकों, सरकारों और संस्थाओं ने फ़ैसला किया कि उन्हें पैदावार बढ़ानी होगी. वैज्ञानिकों ने खेती के पारंपरिक तरीकों में बदलाव करने के साथ-साथ क्रॉस ब्रीडिंग कर उन्नत किस्मों के बीजों की तलाश शुरू की. इस कोशिश को हरित क्रांति का नाम दिया गया.

वे कहते हैं, "हमारी कोशिश अनाज के बड़े आकार के दानों को खोजने भर की नहीं थी. हरित क्रांति ने हमें फ़सलों की बेहतर किस्में दी और ऐसे पौधे बड़े और अधिक दानों का बोझ ले सकते थे. दस साल के भीतर अनाज का उत्पादन दोगुना हुआ. इस क्रांति ने लाखों लोगों की जान बचाई."

उन्नत किस्म के बीज की खोज कर गेहूं की पैदावार बढ़ाने के लिए डॉक्टर नॉर्मन बरलॉ को 1970 का नोबेल शांति पुरस्कार भी दिया गया. भारत के पंजाब जैसे इलाक़ों में किसानों ने नॉर्मन बरलॉ के दिखाए रास्ते पर काम किया और फ़सल की पैदावार बढ़ाई.

वीडियो कैप्शन, भारत की आबादी घटने वाली है, रिपोर्ट का दावा
डॉक्टर नॉर्मन बरलॉ

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हरित क्रांति का नतीजा ये हुआ कि 1950 से लेकर 1990 के बीच वैश्विक स्तर पर अनाज का उत्पादन 174 (चौहत्तर) फ़ीसदी बढ़ा जबकि इस दौरान आबादी में 110 फ़ीसदी की बढ़ोतरी हुई. विश्व बैंक के डेवेलप्मेन्ट रीसर्च ग्रुप की एक रिपोर्ट के अनुसार केवल भारत में 1965 से लेकर 1973 के बीच गेहूं का उत्पादन सात फ़ीसदी तक बढ़ा और धान का 18 फ़ीसदी.

लेकिन स्थिति अब पहले जैसी नहीं रह गई है.

एंडी कहते हैं, "समय बदल रहा है और स्थिति भी. जलवायु परिवर्तन के कारण अधिक पैदावार कर पाना मुश्किल होता जा रहा है. इधर जनसंख्या का बढ़ना जारी है और खेती के लिए जितनी ज़मीन अभी हमारे पास है उस पर हम आने वाले वक़्त में 11 अरब लोगों की ज़रूरत के लिए अनाज नहीं उगा पाएंगे."

सूखाग्रस्त इलाक़े की ज़मीन

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एंडी कहते हैं कि ऐसा नहीं है कि हमें भुखमरी का सामना करना पड़ेगा लेकिन हालात बदतर नहीं होंगे ये कहा नहीं जा सकता है.

एंडी कहते हैं, "2008 का वैश्विक खाद्य संकट ऐसा ही कुछ था. दुनिया के कई इलाक़ों में हुई हलचल से अनाज की कीमतें बढ़ीं और बाज़ार लड़खड़ा गए. नतीजा ये हुआ कि शहरी इलाक़ों में बड़ी संख्या में लोग ग़रीबी की कगार तक पहुंच गए, कई देशों में हिंसा और अस्थिरता भी बढ़ी."

1960 के मुक़ाबले आज बढ़ती आबादी का दवाब पहले से कहीं अधिक है और खेती के लिए उपयुक्त ज़मीन और संसाधनों की भी कमी है. ऐसे में हमारे सामने अनाज के उत्पादन बढ़ाने की चुनौती पहले से कहीं अधिक है.

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फलों सब्ज़ियों का भंडारण

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भंडारण की समस्या

कीनिया के एक मक्का किसान के घर पैदा हुई जेन एम्बुको कहती हैं कि उनका परिवार जी-जान लगा कर अधिक फ़सल तो उगाता था लेकिन उसे स्टोर न कर पाने के कारण उन्हें पूरी फ़सल बेचनी पड़ती थी. बाद में वो बाज़ार से अनाज ख़रीदते थे और इस तरह कभी न ख़त्म होने वाली ग़रीबी के दुष्चक्र में फंस जाते थे.

जेन एम्बुको आज नैरोबी विश्वविद्यालय में बागवानी की असोसिएट प्रोफ़ेसर हैं और उनके शोध का विषय है- खाने की मेज़ तक पहुंचने से पहले अनाज कैसे और क्यों बर्बाद हो जाता है.

वे कहती हैं, "एक आकलन के अनुसार पूरी दुनिया में 30 फ़ीसदी अनाज बर्बाद हो जाता है. लेकिन आप पाएंगे कि यूरोप और अमेरिका में खाना खपत के स्तर पर बर्बाद होता है क्योंकि विकसित देशों में उपभोक्ताओं के पास संसाधन हैं और वो ऐसा कर पाने में सक्षम हैं."

लेकिन अफ़्रीका जैसी जगहों पर बाज़ार तक पहुंचे उससे पहले एक तिहाई अनाज बर्बाद हो जाता है. उदाहरण के लिए आम के मौसम में उत्पादन अच्छी होने पर भी किसान अपनी फ़सल कम कीमत पर बेचने को बाध्य होता है या फिर उसे सड़ने देता है. कई बार तो उसकी अस्सी फ़ीसदी तक फ़सल नष्ट हो जाती है.

किसान अपनी फसल के साथ

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किसानों को कोल्ड स्टोरेज की सुविधा चाहिए लेकिन या तो इसका खर्च अधिक है या फ़िर दूर दराज के इलाक़ों में बिजली न होने का कारण ये व्यवस्था मुमकिन नहीं.

जेन कहती हैं, "हम किसानों के समूह बना रहे हैं ताकि वो अपने संसाधन एकत्र कर भंडारण के स्टोर करने के नए तरीक़ों को अपना सकें और फिर अपनी फ़सल बचा सकें. बाद में उन्हें बाज़ार में इसकी अधिक क़ीमत मिल सकेगी. फ़सल की बर्बादी रोकने के लिए उसे प्रोसेस कर दूसरी चीज़ें भी बनाई जा सकती हैं."

हालांकि जेन कहती हैं कि दुनिया भर में अनाज की बर्बादी को पूरी तरह रोक पाना शायद संभव न हो.

संयुक्त राष्ट्र ने सस्टेनेबल डेवेलप्मेन्ट गोल में मुल्कों के लिए 2030 तक खाने की बर्बादी को आधा करने का उद्देश्य रखा है. ये लक्ष्य अगर हासिल हो पाया तो इससे अनाज की मात्रा में बड़ा इज़ाफा होगा.

वे कहती हैं, "हमें बढ़ती आबादी के लिए अधिक अनाज चाहिए. अभी की स्थिति में हमें लगता है कि हम उत्पादन बढ़ा सकते हैं. लेकिन इससे समस्या का हल नहीं होगा. अगर हम उत्पादन बढ़ाएं और इसका बड़ा हिस्सा बर्बाद हो जाए तो ये एक छेद वाली मटकी में पानी भरने जैसा होगा. मेरे लिए अनाज की बर्बादी रोकना इस छेद को बंद करने जैसा है, आने वाले खाद्य संकट से निपटने के लिए बेहद ज़रूरी है."

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गेंहू

प्राकृतिक तरीक़ों का इस्तेमाल

एमंडा कैवनॉ अमेरिका के इलेनॉय यूनिवर्सिटी में रीसर्चर हैं. उनकी टीम पेड़-पौधों में फ़ोटोसिन्थेसिस की प्राकृतिक प्रक्रिया पर शोध कर रही है. इस प्रक्रिया में पेड़-पौधे सूरज से रोशनी, ज़मीन से पानी और वायुमंडल से कार्बन डाइऑक्साइड लेकर खाना बनाते हैं.

एमंडा जेनेटिक इंजीनियरिंग के ज़रिए बीजों में इस तरह के बदलाव करने की कोशिश कर रही हैं जिससे फ़ोटोसिन्थेसिस की प्रक्रिया और बेहतर हो सके.

वे कहती हैं कि पौधे सूरज की रोशनी का 5 फ़ीसदी ही इस्तेमाल कर पाते हैं. और इसका कारण है एन्ज़ाइम रूबिसको जो पौधों में कार्बन डाइऑक्साइड सोखने में मदद करता है.

एमंडा कहती हैं, "आप कह सकते हैं कि हम रुबिस्को के कारण जीवित हैं. हमारे शरीर में जो भी कॉर्बन है वो कभी न कभी, किसी न किसी रूप में एन्ज़ाइम रुबिस्को से हो कर गुज़रा है. ये दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण एन्ज़ाइम है. 20 फ़ीसदी मामलों में पौधे की कोशिका कॉर्बन डाइऑक्साइड की जगह ऑक्सीजन मॉलिक्यूल ले लेती है और इस कारण उसमें अलग प्रक्रिया शुरू हो जाती है."

रुबिस्को का काम होता है सही चीज़ें इकट्ठा कर के उन्हें खाना बनाने के काम पर लगाना. अगर वो कॉर्बन डाइऑक्साइड की जगह ऑक्सीजन यानी ग़लत मॉलिक्यूल चुनता है तो पौधे को उससे छुटकारा पाना होता है और इसमें एनर्जी खर्च होती है.

फोटोसिन्थेसिस

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एमंडा कहती हैं, "हमारा शोध कहता है कि इस प्रक्रिया में रोज़ाना पेड़-पौधों की तीस से पचास फ़ीसदी एनर्जी बर्बाद हो जाती है, जिसका इस्तेमाल खाना बनाने में हो सकता था. इससे अनाज उत्पादन बढ़ सकता था."

एमंडा की टीम ने जेनेटिक इंजीनिरिंग के ज़रिए ऐसा तरीक़ा खोज निकाला है जिससे रुबिस्को ये काम कम एनर्जी खर्च करके कर सकता है.

वे कहती हैं, "हाल में किए शोध में हमने पाया है कि इस बदलाव से फ़ोटोसिन्थेसिस की प्रक्रिया 40 फ़ीसदी तक बेहतर हो जाती है और पेड़-पौधे पहले से अधिक बढ़ते हैं."

उनकी टीम अब इसका परीक्षण लोबिया की फ़सल पर करने की तैयारी कर रही है. अफ़्रीका में सहारा रेगिस्तान के आसपास के इलाक़ों में बड़े पैमाने पर इसकी खेती की जाती है.

हरित क्रांति ने फ़सलों की पैदावार बढ़ाने में मदद की और अब जेनेटिक इंजीनिरिंग की मदद से वैज्ञानिक इसे और बेहतर करने की कोशिश कर रहे हैं. एमंडा को उम्मीद है नए खोज होते रहेंगे और खाद्य संकट का समाधान मिल सकेगा.

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धान की खेती

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विवधता बचाए रखने की ज़रूरत

पश्चिम बंगाल में रहने वाले डॉक्टर देबल देव बीज संरक्षक और किसान हैं. वो मानते हैं कि हरित क्रांति से उत्पादन बढ़ाने में मदद मिली लेकिन वो ये भी कहते हैं कि एक या दो उन्नत किस्म के बीजों को चुनने के कुछ बेहद बुरे परिणाम हो सकते हैं.

वे समझाते हैं, "बीज वो संसाधन हुआ करते थे जिन तक सभी की पहुंच थी, लेकिन 1960 के बाद से बीजों का एक बड़ा व्यापार खड़ा हुआ. कंपनियां बीजों पर शोध करने लगीं और फिर वो बीजों की बिक्री करने लगीं."

आज की तारीख़ में बीजों के वैश्विक व्यापार का साठ फ़ीसदी हिस्सा केवल तीन कंपनियों के हाथों में हैं. देबल मानते हैं कि बीज बाज़ार पर कंपनियों का एकाधिकार ख़तरे की घंटी है.

देबल कहते हैं, "आप देख सकते हैं कि भारत में एक लाख दस हज़ार धान की किस्में थीं और किसान आपस में इसका लेनदेन किया करते थे. लेकिन आज किसान कुछ ही कंपनियों ही बीज ख़रीद रहे हैं और इस कारण धान की कई किस्में लुप्त हो रही हैं. अब केवल धान की सात हज़ार किस्में ही बची हैं."

लेकिन धान की किस्मों का ख़त्म होना किस बात का संकेत है?

देबल को चिंता है कि धान की जेनेटिक डाइवर्सिटी यानी आनुवांशिक विविधता ख़त्म हो रही है और हो सकता है कि इनमें ऐसी कोई किस्म भी हो जिसमें कोई विशेष गुण हो.

वे बताते हैं, "एक सुदूर गांव में मुझे पता चला कि गर्भ के दौरान और प्रसव के बाद महिला को धान की एक खास किस्म खिलाई जाती है. मैंने उसके बीज इकट्ठा किए और अपनी खेत में लगाए. बाद में मुझे पता चला कि इसमें आयरन भारी मात्रा में है."

इसके बाद उन्होंने अलग-अलग किस्मों के बीजों को इकट्ठा कर उनकी खेती शुरू की. अब तक वो 1,460 किस्मों के धान के बीज इकट्ठा कर चुके हैं. इन सभी बीजों के अलग-अलग गुण हैं.

वे कहते हैं कुछ किस्में सूखा झेल सकती हैं, कुछ बाढ़ में भी उग सकती हैं तो कुछ में कीड़ों या बीमारियों से बचने की क्षमता होती है. लेकिन सवाल ये है कि इससे बढ़ती आबादी के लिए खाने की व्यवस्था करने में क्या मदद मिलेगी?

धान की किस्में

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देबल कहते हैं, "कई ऐसे इलाक़े होते हैं जिन्हें कृषि विज्ञानी मार्जिनल खेत कहते हैं. ये सूखाग्रस्त, बाढ़ग्रस्त या फिर समुद्रतटीय इलाक़े होते हैं जहां खारा पानी जमा रहता है. भारत में ये कुल कृषि योग्य भूमि का 24 फ़ीसदी है. हम कृषि विकास और जेनेटिक इंजीनियरिंग की बात करते हैं लेकिन अब तक हम कोई ऐसा उन्नत किस्म का बीज तैयार नहीं कर पाए हैं जो खारे पानी में उग सके. लेकिन पारंपरिक तौर पर हमारे पास ऐसी किस्में हैं जो इस तरह के माहौल में भी फ़सल दे सकती हैं."

मतलब ये कि प्राकृतिक कारणों से जिन जगहों पर अब तक खेती नहीं की जा सकी है उन जगहों पर पारंपरिक बीजों की मदद से खेती की जा सकती है.

देबल कहते हैं ये बीज हमें एक और बड़ी चिंता से मुक्त कर सकते हैं. एक या दो किस्मों पर निर्भर रहने के अपने ख़तरे हैं, अगर कोई बीमारी फ़सल को प्रभावित करे तो परिणाम भयंकर हो सकते हैं.

देबल कहते हैं, "इसका सबसे बढ़िया उदाहरण 1840 के दशक का आयरिश पोटैटो फैमीन है जिसे ग्रेट फैमीन भी कहते हैं. उस वक़्त आयरलैंड में केवल एक किस्म के आलू की फ़सल उगाई जाती थी."

आयरलैंड की मुख्य खाद्य फ़सल आलू है. 1845 में यहां एक ही किस्म के आलू की खेती होती थी. इसमें लेट ब्लाइट नाम की बीमारी से प्रतिरक्षा के गुण नहीं थे. इस साल यहां आलू की पचास फ़ीसदी फ़सल बर्बाद हो गई और उसके बाद लगातार कुछ सालों तक फ़सल नष्ट होती गई. नतीजा ये हुआ कि यहां भयंकर अकाल पड़ा.

अगर यहां एक से अधिक किस्म के आलू की खेती होती, तो हो सकता है कि किसी एक में इस बीमारी से लड़ने की ताक़त होती और हालात इतने बुरे नहीं होते.

देबल कहते हैं कि बीजों की किस्मों का संरक्षण बुरे वक़्त से बचने का सबसे बेहतर उपाय है.

देबल कहते हैं, "पारंपरिक किस्में ही हमारे लिए सबसे बेहतर और एकमात्र उपाय हैं. यही वो किस्में हैं जो पूरी दुनिया की आबादी को भोजन दे पाने में सक्षम हैं. बीते सैंकड़ों सालों ये यही किस्में लोगों का पेट भरती रही हैं."

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बढ़ती आबादी

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लौटते हैं अपने सवाल पर- क्या बढ़ती आबादी का पेट भरने के लिए हम ज़रूरी अनाज उगा पाएंगे?

केवल एक विकल्प पर भरोसा करना नाकाफी होगा. इसके लिए हमें सभी उपायों का इस्तेमाल करने की ज़रूरत है ताकि एक तरफ़ अनाज का उत्पादन बढ़ाया जाए तो दूसरी तरफ़ उसकी बर्बादी को कम किया जाए और उन ज़मीनों को खेती के दायरे में लाया जाए जो आज बेकार पड़े हैं.

साथ ही हमें इस बात का ध्यान भी रखना होगा कि हमारी फ़सलें न केवल रोग प्रतिरोधी हों बल्कि वो जलवायु परिवर्तन से लड़ सकें और सूखे और बाढ़ जैसी मुश्किल परिस्थिति में भी उग सकें.

इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि अनाज की मांग को पूरा करने की कोशिश बाज़ार भी करेगा. ऐसे में अनाज सुलभ हो और उसकी क़ीमतें कम हों, इसके लिए सरकारों, वैज्ञानिकों और संगठनों को साथ मिलकर एक नई क्रांति का आगाज़ करने की ज़रूरत होगी. हालांकि जिन विशेषज्ञों से हमने बात कि उन सभी का मानना है कि इसके लिए अभी राजनीतिक इच्छाशक्ति कम ही है.

प्रोड्यूसर - मानसी दाश

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