COP26: ग्लासगो- जलवायु परिवर्तन से लड़ने के लिए आख़िरी बेहतरीन उम्मीद

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- Author, कैलम वॉटसन
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
स्कॉटलैंड के शहर ग्लासगो के फिनिस्टन इलाके में घुसते हुए आपको सामने क्रेन खड़ी दिखती है. लोहे के गर्डर से बने इस जालीदार ढांचे में अब जंग के धब्बे दिख रहे हैं.
इसके पीछे दो फ्यूचरिस्टक इमारतें खड़ी हैं. आर्माडिलो ऑडिटोरियम और हाइड्रो एरिना. ये दोनों इमारतें COP 26 कहे जा रहे संयुक्त राष्ट्र के जलवायु सम्मेलन में हिस्सा लेने वाले दुनिया भर के नेताओं की मेजबानी करेंगीं.
ग्लासगो को एक नजर देखने से लगेगा कि इसके दो रूप हैं. एक साथ दो नजारे. एक पुराना, एक नया. पुराना ग्लासगो एक इंडस्ट्रियल पावरहाउस रहा है जो अब धीरे-धीरे खुद को एक आधुनिक जीवंत शहर में तब्दील करता दिख रहा है.
लेकिन इस प्रतीक के गहरे मायने हैं. ग्लासगो में जलवायु परिवर्तन के संकट के समाधान तलाशने आए दुनिया भर के नेता बिल्कुल उसी जगह खड़े होंगे, जो औद्योगिक इतिहास का एक टुकड़ा है. ऐसा इतिहास जो जलवायु परिवर्तन से जुड़ा हुआ है.
सिर्फ 44 साल पहले ग्लासगो में फैली यह जमीनी पट्टी क्वीन्स डॉक कहलाती थी. चहल-पहल भरे बंदरगाह का इलाका, जहां से दुनिया के हर कोने में माल भेजा जाता था.
ग्लासगो भारी उद्योग, इंजीनियरिंग और शिप बिल्डिंग से जुड़े कारखानों से अटा पड़ा था. इनमें हजारों टन, कोयले, तेल और गैस की खपत होती थी. लेकिन ग्लासगो की इस कहानी में परिवर्तन और खुद को नए सांचे में डालने की कोशिश भी जुड़ी है. और अब यह अगले नौ साल के भीतर खुद को कार्बन न्यूट्रल शहर बना लेने की उम्मीद कर रहा है.
अमेरिका के जलवायु दूत जॉन कैरी ने संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन में ग्लासगो को वो आखिरी बेहतरीन उम्मीद करार दिया है, जहां से दुनिया मिलकर काम कर सकती है. "
तो फिर ग्लासगो जैसा शहर पुराना चोला उतार कर अपने ग्रीन भविष्य की ओर कैसे आगे बढ़े?
रिवर सिटी

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अक्सर यह कहा जाता है क्लाइड नदी ने ग्लासगो को बनाया और ग्लासगो ने क्लाइड को.
आज से 300 साल पहले क्लाइड नदी काफी चौड़ी और छिछली हुआ करती थी. रॉबिन्सन क्रूसो के लेखक डेनियल डेफो ने बताया है कि किस तरह वे लोग नदी से गुजर जाते थे और पांव तक नहीं भीगते थे. पानी इतना कम होता था कि यह घोड़ों के खुरों तक ही पहुंच पाता था.
ग्लासगो के व्यापारियों को अमीर बनाने वाली तंबाकू, चीनी और कॉटन की पेटियां नदी के दूसरे छोर पर उतारी जाती थीं. लेकिन 19वीं की सदी के मध्य तक यह सब बदल गया था.
चित्रकार थॉमस सलमन ने ग्लासगो की इस तस्वीर को उतारने के लिए 1860 में संभवत: एक हॉट एयर बैलून का इस्तेमाल किया था.
उस समय तक नदी सीधी की जा चुकी थी और यह इतनी गहरी हो चुकी थी कि इससे होकर सबसे बड़ा जहाज भी शहर के मध्य में पहुंच सकता था. उस समय पानी के जहाज तो थे ही लेकिन उनके बीच भाप इंजन से चलने वाले जहाज भी तैरते थे.
उस दौर में धरती आज से 1.2 डिग्री ठंडी थी, लेकिन हर तरफ कोयले का बोलबाला था.
क्लाइड सदियों से पानी के जहाज के निर्माण का केंद्र रही है. लेकिन जैसे ही लकड़ियों की जगह लोहे और स्टील ने ले ली, यह पूरी दुनिया का सिरमौर हो गई. क्लाइड में बनी चीज इनोवेशन और क्वालिटी की प्रतीक बन गई.

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20वीं सदी की शुरुआत तक क्लाइड में 200 से ज्यादा शिपयार्ड थे और इनमें दुनिया के 20 फीसदी पानी के जहाज बनने लगे थे.
1931 में क्लाइड नदी के किनारे सफर करने वाले एक युवा ऑस्ट्रेलियाई इंजीनियर ने उस दौर के माहौल को कुछ यूं बयां किया है-
" नदी किनारे का शोर लगभग बहरा कर देने वाला होता था. भारी कोलाहल में हर तरफ सिर्फ घिरनियों के घूमने वाली चरचराहट सुनाई पड़ती थी. "
" नदी के जरिये माल ढोने वाली छोटी नावें तेज आवाजों के साथ बड़ी अधीरता के साथ एक दूसरे को पीछे छोड़ आगे निकलने की होड़ में लगी होती थीं और बड़े जहाज अपनी गरजती आवाजों के साथ नदी पार करने में लगे होते थे. "
" भारी आवाजों के साथ पूरे शिपयार्ड में कील ठोकने की रैप-प्प-प्प, रैप-प्प-प्प की आवाज सुनाई पड़ती थी"
शहर के दूसरे इलाकों में इंजीनियरिंग वर्कशॉप थे, जहां इन जहाजों की फिंटिंग्स बनती थीं और इंजन तैयार होते थे.
यहां यूरोप की सबसे बड़ी लोकोमोटिव कंपनी हजारों स्टीम इंजन असेंबल किया करती थी.इनमें से कइयों को विशालकाय क्रेन से कार्गो में रखा जाता था. इनमें से कुछ अब भी वहां खड़े हैं, जहां COP26 हो रही है.
लेकिन इस औद्योगीकरण की इस धरती ने कीमत भी चुकाई.
1940 तक पूरी दुनिया में हर साल पांच अरब टन कार्बनडाइक्साइड का उत्सर्जन हो रहा था. लेकिन विक्टोरिया युग के ग्लासगो का स्केच बनाने के लिए जब थॉमस सलमन हॉट एयर बैलून पर चढ़े थे, तब से इसमें दस गुना इजाफा हो चुका था.

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दूसरे विश्वयुद्ध के बाद पुराने कारोबारी प्रतिस्पर्द्धियों ने अपनी शिपबिल्डिंग इंडस्ट्री को दोबारा खड़ा किया लेकिन तब तक पूर्वी एशिया में उनके नए प्रतिस्पर्द्धी खड़े होने शुरू हो गए थे.
नए दौर से तालमेल बिठाने में नाकाम रहने और निवेश न कर पाने की वजह से ग्लासगो में शिपबिल्डिंग कंपनियों के पारंपरिक मालिकों को संघर्ष करना पड़ रहा था. अब क्लाइड में सिर्फ तीन शिपयार्ड बच गए हैं.
1987 में फूस से बने 78 फीट लंबा एक इंजन छह हफ्ते तक फिनिस्टन के एक क्रेन से झूलता रहा और आखिरकार उसे वहां से हटा कर जला दिया गया.
आर्टिस्ट जॉर्ज विली के लिए यह भारी उद्योग की मृत्यु के विलाप की तरह था.
लेकिन उसी दशक ने उस शहर के आत्मविश्वास को लौटते हुए भी देखा. 1988 में COP26 स्थल की दूसरी ओर वीरान पड़ी बंदरगाह की जमीन को ग्लासगो गार्डन फेस्टिवल में तब्दील कर दिया गया.
दिल को लुभाने वाली बागवानी, राइड्स और मनोरंजन के दूसरे साधनों की वजह से इसे भारी सफलता मिली है और लगभग 43 लाख लोग यहां आए. इसके दो साल बाद ग्लासगो को यूरोपियन सिटी ऑफ कल्चर करार दिया गया.
यह शहर एक बार फिर खुद को गढ़ने में लगा है. अब यह भविष्य की ओर देख रहा है और नई इकोनॉमी के निर्माण में लगा है. आज ग्लासगो में रहने वाले 40 हजार से ज्यादा लोग फाइनेंशियल सेवाओं से जुड़े काम में लगे हैं.
यह सच है कि ग्लासगो ने क्लाइड को बनाया था. लेकिन इसने एक बार फिर इसे बनाया है. अब नदी के किनारे के घाटों और जहाजों के पड़ाव वाली जगहों को हटा दिया गया है. अब वहां फ्लैट बन गए हैं. चमचमाते दफ्तर हैं और यहां आने वाले लोगों के लिए आकर्षण की कई चीजें खड़ी कर दी गई हैं.
शहर अब अपने अतीत से निकल आया है. लेकिन इसका आगे का सफर सबसे चुनौती भरा साबित हो सकता है
हरा-भरा ग्लासगो

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शहर के दक्षिण में 107 निदरी रोड पर एक चाल खड़ी है. इमारत का अगला हिस्सा लाल बलुई पत्थर से बना है. यह इमारत एक तरह से ग्लासगो के प्रतीक की तरह है. लेकिन अब इस इमारत को तोड़ कर फिर से खड़ा किया जा रहा है.
ऐसी इमारतें उस दौर में इसलिए बनाई जाती थीं कि उसमें एक साथ कई लोग रह सकें. एक सदी पहले बनाई गई इन इमारतों को शहर में बढ़ते कामगारों की तादाद को देखते हुआ खड़ा किया गया था.लेकिन अपना कार्बन फुटप्रिंट कम करने में लगे इस शहर के लिए ये एक समस्या बन गई हैं.
शहर के एक चौथाई घर 1919 से पहले के बनाए हुए हैं. लिहाजा इन्हें मॉडर्न इंसुलेशन स्टैंडर्ड पर लाना कठिन काम होगा. लेकन निदरी रोड का प्रयोग यह दिखा रहा है यह काम आगे किस तरह किया जा सकता है.
इस ब्लॉक में आठ फ्लैट खाली हैं. साउथसाइड हाउसिंग एसोसिएशन पुरानी इमारतों में रेट्रोफिटिंग ( पुरानी इमारतों में नई टेक्नोलॉजी और खासियतें जोड़ना) के दौरान महत्वाकांक्षी इनरपीहिट ( EnerPHit ) मानकों तक पहुंचने की कोशिश कर रहा है.
जॉन गिल्बर्ट आर्किटेक्ट्स के ड्र्यू कार कहते हैं, " यह बेहद संतुलन साधने वाला काम है. एक तरफ आपको एनर्जी एफिशियंसी लानी है दूसरी ओर पुरानी विरासत को भी बचाए रखना है."
अगले साल जब इस इमारत में रहने वाले किरायेदार दोबारा आ जाएंगे तो इसका मंथली बिल कम होकर 10 से 15 पाउंड रह जाएगा.
इस इमारत की सामने की दीवार लाल बलुई पत्थर की है. लेकिन इसे स्ट्रीपिंग बैकिंग के जरिये बरकरार रखा जाएगा.अंदर से इसे इन्सुलेट करने के बाद इमारत के सामने और पीछे की दीवारों पर न जलने वाला मिनरल ऊन चढ़ाया जाएगी.
साइट मैनेजर गेरी ह्यू इमारतों को पिछले 30 साल से इन्सुलेट करते आ रहे हैं लेकिन उनका काम करने का तरीका काफी अलग है.

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वह कहते हैं, " हम इस इमारत को दोबारा संरक्षित करक सीखेंगे. हमें पूरी इमारत को दोबारा उसके स्वरूप से अलग कर कायम करना है. हमें काफी छोटे-छोटे टुकड़ों को जोड़ना है.इसे देख कर लगता है कि हे भगवान यह काम कैसे होगा. क्या यह दूसरी जगह भी कारगर होगा."
एक पुरानी बिल्डिंग को एयरटाइट बनाने से कई समस्याएं भी आती हैं. इमारत में कन्डेशन (संघनन) और मॉल्डिंग की समस्या आती है इसलिए मैकेनिकल वेंटिलेशन और नमी को कम करना भी इस काम का एक हिस्सा बना जाता है.
बाथरूम सीलिंग के ऊपर बने सूटकेस के साइज की यूनिट्स गर्म नम हवा को सोखती है और उसकी गर्मी को ताजी हवा के तौर पर इस्तेमाल करती है. यह गर्म हवा फिर पाइप के जरिये लिविंग स्पेस में पहुंच जाती है.
कमरों को गर्म करने में हवा के स्रोत को गर्म करने की जरूरत पड़ती है. इसमें हिटिंग पंप और उच्च क्षमता के गैस ब्वॉयलर का इस्तेमाल होता है. लेकिन ये फ्लैट इतनी अच्छी तरह से इन्सुलेट हैं कि कम ही ऊर्जा की जरूत पड़ेगी.
शहर के उत्तरी इलाके में 1960 के दशक में बने तीन टावर ब्लॉक को भी रेट्रोफिट किया गया है और इसने उस इलाके में ऊर्जा बिल को कम कर दिया है. यह इलाका पहले से ही ईंधन की कमी से जूझता रहा है.
यहां की एक इमारत सीडर कोर्ट को भी मिनरल ऊन से लपेट दिया गया है. खिड़कियों में तिहरी ग्लैजिंग कर दी गई है. इसमें रहने वालों के अनुरोध पर 'विंटर गार्डन' बनाने के लिए बालकनी घेर दिए हैं. थर्मल इमेज में दिखने वाला चटख नीला रंग बताता है कि इस तकनीक से बिल्डिंग की काफी कम गर्मी जाया हो रही है.
जॉन वोंग उन 1300 निवासियों में शामिल हैं, जिन्हें क्वीन क्रॉस हाउसिंग एसोसिएशन की ओर से शुरू किए गए इस प्रोजेक्ट का फायदा हुआ है. वह कहती हैं कि इस तकनीक का सबसे बड़ा फर्क यह पड़ा कि अब फ्लैट अंदर से गर्म रहते हैं.
यहां रहने वाले वाले एक और किरायेदार जॉर्ज मैकगेविगन कहते हैं, " सच कहूं तो मैं अपना हिटिंग सिस्टम कभी ऑन नहीं करता क्योंकि हर चीज अब अंदर है और सिमटी हुई है. और इसमें वेंटिलेशन सिस्टम है. इसलिए गर्मी बनी रहती है. आपको सिर्फ अपनी खिड़कियों को खोल कर साफ करनी पड़ती है. "
यह प्रोजेक्ट बताता है कि क्या हो सकता है. लेकिन इसका खर्च भी है. सीडर कोर्ट में हर फ्लैट को रेट्रोफिट करने में 48 हजार पाउंड का खर्चा आया है. लेकिन जहां चाल जैसी इमारतें हैं उनकी यूनिटों को रेट्रोफिट करने में ज्यादा खर्च आएगा.
पुरानी इमारतों को रेट्रोफिट करने में एक और दिक्कत है.कई इमारतें ऐसी है, जहां मकान मालिक और किरायेदार दोनों रहते हैं. लिहाजा सबसे बड़ा सवाल है कि इसका खर्चा कौन देगा.
नदी की गर्मी
ग्लासगो में नदी से लगे कुछ मील की दूरी पर हाई-टेक एनर्जी के कलर चढ़े सीसों पर एक और विशाल क्रेन की छाया पड़ती दिख रही है.
यह क्लाइड के किनारे उस जगह खड़ा है, जहां प्रसिद्ध जॉन ब्राउन शिपयार्ड बना हुआ था. यहीं पर उस दौर के कुछ बड़े जलजहाजों का निर्माण हुआ था.
बहरहाल, जिस नदी ने कभी भारी कार्बन का उत्सर्जन करने वाले उद्योगों की जिंदगी दी थी, वह अब नई तैयार हो रही परियोजनाओं से कार्बन कम करने में मदद कर रही है.
दो विशालकाय हिट पंप क्लाइड में बची गर्मी को निकाल रहे हैं और इससे सामने की इमारतों में इन्सुलेटेड अंडरग्राउंड पाइपों के जरिये पानी की सप्लाई में मदद मिल रही है.
वेस्ट डनबर्टनशायर काउंसिल के एक केयर होम और कुछ इमारतों को पहले से ही इस तकनीक के जरिये गर्म किया जा रहा है.आगे इस नेटवर्क में एक हजार और घरों को जोड़ दिया जाएगा.
अब इन इमारतों को गर्म रखने के लिए हरेक में ब्वॉयलर की जरूरत नहीं है.इनके पास साइज में छोटी एक इंटरफेस यूनिट है, जो हिट को कंट्रोल करती है और यह भी बताती है इसका कितना इस्तेमाल हुआ.
काउंसिल की लीजर सर्विसेज चलाने वाले जॉन एंडरसन कहते हैं कि आगे चल कर यह सिस्टम सस्ता पड़ेगा.
उनका कहना है, " हम गैस की बढ़ती कीमतों से बच गए हैं. हमारे पास इन ब्वॉयलरों को मेंटेन करने के लिए धन नहीं है. और अच्छी बात यह है कि यह तकनीक पर्यावरण को नुकसान भी नहीं पहुंचाती है."
डिस्ट्रिक्ट हिटिंग सिस्टम कोई नया कॉनसेप्ट नहीं है.कोपेनहेगन ने 1980 के दशक में ही इसका नेटवर्क बनाना शुरू कर दिया था.अब यह शहर के 97 फीसदी इलाके में चल रहा है. इसमें बिजली उत्पादन के दौरान बरबाद होने वाली गर्मी का इस्तेमाल होता है.
यही वजह है कि डेनमार्क की राजधानी दुनिया की पहली कार्बन न्यूट्रल शहर बनने की राह पर है. शायद यह 2025 तक पूरी तरह कार्बन न्यूट्रल हो जाएगा.
ग्लासगो भी कोपेनहेगन की तर्ज पर हिटिंग सिस्टम का नेटवर्क बनाना चाहता है. ग्लासगो के औद्योगिक शहर पोलमेडी के री-साइकिलिंग सेंटर की हिट का इस्तेमाल करने की योजना बन रही है. एक स्टडी पर विचार चल रहा है, जिसमें नदी से गर्मी निकालने केलिए गोरबल्स में एक जगह तय की गई है.
लेकिन ये परियोजनाएं अभी भी बेहद शुरुआती दौर में हैं और इनमें भारी निजी और सार्वजनिक निवेश की जरूरत होगी. इनमें काफी संभावनाएं हैं लेकिन बाधाएं भी कम नहीं हैंं.
ई-व्हेकिल की राह
निदरी रोड की चाल वाले प्रोजेक्ट से कुछ मील की दूरी पर ब्रिटेन का सबसे बड़ा बस डिपो है, जिसे अब देश के सबसे बड़े इलेक्ट्रिक व्हेकिल चार्जिंग हब में तब्दील किया जा रहा है. पूरी तरह बन जाने पर केलेडोनिया डिपो में एक साथ 300 ई-बसें चार्ज हो सकेंगी.
ग्लासगो की सबसे बड़ी ऑपरेटर, फर्स्ट के पास 24 ई-बसें हैं और मार्च तक इसकी इस तरह की और 150 बसें सर्विस से जुड़ जाएंगीं.
ड्राइवर जेम्स लिलिज ने गोवान में इन बसों को 1970 के दशक में चलाने का काम शुरू किया था. उस दौरान हजारों कामगार शिफ्ट खत्म होने पर इन बसों को पकड़ने के लिए शिपयार्ड के गेट पर जमा हो जाते थे.
वह बताते हैं, " उन दिनों में सुबह-सुबह इन बस डिपो पर जाते ही हर तरफ धुआं ही धुआं दिखता था. इतन गहरा कि आपको सामने कुछ भी नहीं दिखता था."
चार घंटे की चार्जिंग इन बसों को दिन भर चलाए रखने के लिए काफी है.
"अब आपके सामने कोई धुआं नहीं है. न ही कोई शोर. गियर चेंज करने की भी आवाज जैसी कोई चीज नहीं है. सबकुछ इतना आसान. यह पर्यावरण के लिए भी काफी अच्छा है."
ग्लासगो में कार्बन का जितना उत्सर्जन होता है, उसमें यातायात की एक तिहाई हिस्सेदारी है. अगले साल काउंसिल हाइड्रोजन से चलने वाली कूड़े की 19 लॉरियों की डिलीवरी ले लेगी. यह ट्रायल के तौर पर हो रहा है ताकि यह देखा जा सके कि क्या डीजल के ट्रकों के बदले इनका इस्तेमाल किया जा सकता है.
लेकिन इलेक्ट्रिक या हाइड्रोजन व्हेकिल को अपनाना भी पूरा समाधान नहीं है. इनकी मैन्यूफैक्चरिंग में भी कार्बन लागत आती है.लेकिन शहर के छह लाख लोगों में से 2,60,000 लोगों के पास गाड़ियां हैं.
शहर में 160 मील ( 257 किलोमीटर) के साइकिल लेन बनाने की योजना है. इसके अलावा M8 मोटरवे पर एक नया 'रूफ गार्डन' भी बनाया जा सकता है ताकि 1960 के दशक में दो हिस्सों में बंट चुके इस शहर को फिर से जोड़ा जा सके
लेकिन पूरी योजना की सफलता इस बात पर निर्भर करती है ग्लासगो में रहने वाले लोगों की पुरानी आदतें किस हद तक छुड़वाई जा सकेंगीं.
दुनिया देख रही है
स्कॉटलैंड के लिए जलवायु परिवर्तन का मतलब वातावरण के ज्यादा गर्म होने से है. यहां इसकी वजह से गर्मियां सूखी होती हैं और फिर अचानक बारिश होने लगती है. जलवायु परिवर्तन से यहां जाड़े में थोड़ी नरमी आएगी. वातावरण ज्यादा भीगा होगा और मौसम में बहुत जल्दी काफी बड़े परिवर्तन होंगे.
तीन साल पहले शहर के आकर्षण के केंद्रो में से एक ग्लासगो साइंस सेंटर गर्मी से बुरी तरह तप रहा था क्योंकि तापमान 31.9 डिग्री सेंटीग्रेड तक पहुंच गया था और इसने इसकी वाटरप्रूफ परत पिघला दी थी.
ग्लासगो में इस गर्मी के दौरान सबसे अधिक औसत तापमान दर्ज किया गया. यह ग्लासगो में 1884 में तापमान का रिकार्ड रखने की शुरुआत के बाद से सबसे ज्यादा औसत तापामान था. लेकिन ड्रमचैपल इलाके के लोगों को बाढ़ भी झेलनी पड़ी क्योंकि भारी बारिश की वजह से यहां के नाले पूरी तरह भर गए थे.
आने वाले दशकों के दौरान इस शहर को अपनी इमारतों और इन्फ्रास्ट्रक्चर को जलवायु परिवर्तन के प्रभाव से जूझने के लिए लाखों पाउंड खर्च करने होंगे. इन इमारतों को डिजाइन करते समय शायद ही सोचा गया होगा कि इन्हें भविष्य में इन बड़े बदलावों से जूझना होगा.
आज ग्लासगो के 45 हजार घर और कारोबारी प्रतिष्ठान किसी न किसी तरह बाढ़ का जोखिम झेल रहे हैं. काउंसिल का मानना है कि 2080 तक यह खतरा बढ़ कर 60 हजार घरों और कारोबारी प्रतिष्ठानों तक पहुंच सकता है .
क्लाइड नदी में लहरों का उतार-चढ़ाव होता है और यह पूरे ग्लासगो शहर से होकर गुजरती है. शहर के पूरब में एक बांध इसके पानी के बहाव को नियंत्रित करता है लेकिन इसके नीचे नदी का जलस्तर हर दिन में दो या इससे अधिक बार 13 फीट या उससे ऊपर चला जाता है.
फॉरकास्टिंग अथॉरिटी सेपा ( Cepa) का कहना है कि समुद्र का बढ़ता जलस्तर और तूफान की वजह से नदी के कॉरिडोर में बाढ़ का खतरा हो सकता है. यह इलाका 'मीडियम रिस्क' पर है. इसमें वह जगह भी है, जहां COP26 हो रही है.
ज्यादा बारिश से नदी में आने वाली बाढ़ से और भी इलाके जद में आ सकते हैं. बाढ़ के पानी के फैलाव के खतरे वाले इलाके बढ़ गए हैं और आगे इसमें और इजाफा होने वाला है.
ग्लासगो कोई अकेला शहर नहीं है जिसने क्लाइमेट इमरजेंसी घोषित की है और 2030 को कार्बन न्यूट्रेलिटी का डेडलाइन बनाया है.लेकिन यह काफी बड़ा लक्ष्य है. क्या यह पूरा हो पाएगा?
नेट जीरो कार्बन का मतलब होता है कि जितनी कार्बनडाइक्साइड पैदा हो उतनी हटा दी जाए. यह काम पेड़ लगाने या कार्बन कैप्चरिंग से हो सकती है.
अब तक ये चीजें आसानी जीत की तरह रही हैं क्योंकि कोयला से चलने वाले बिजली संयंत्रों को बंद करके इलेक्ट्रिसिटी नेटवर्कों को कार्बन रहित बना दिया गया. इसकी जगह रीन्युबल एनर्जी का इस्तेमाल हो रहा है.
फिलहाल स्थिति यह है कि 22 हजार पेड़ को लगाने के एक प्रोजेक्ट के अलावा अभी तक उन कदमों का ज्यादा ब्योरा सामने नहीं आया है, जिनके जरिये ग्लासगो इस दशक तक बरकरार रहने वाले कार्बन उत्सर्जन को कम करने की रणनीति बना रहा है.
लेकिन एक चीज तय है कि कार्बन न्यूट्रेलिटी की ओर अगला कदम बढ़ाने के लिए काफी दम लगाना होगा और इसमें अरबों पाउंड खर्च होंगे.
शहर के नेता ' जस्ट ट्रांजिशन' का वादा कर रहे हैं. लोगों को इस बात का भरोसा दिला रहे हैं कि इसका ज्यादा भार गरीब नागरिकों पर नहीं पड़ेगा.
गरीब लोगों पर सार्वजनिक पैसा खर्च किया जा सकता है.लेकिन सरकारों ने यह साफ कर दिया है कि हर किसी का खर्चा सार्वजनिक फंड से नहीं उठाया जाएगा.
कभी औद्योगिक शहर रहे ग्लासगो के बेहतर पर्यावरण के लिए रोडमैप तो तैयार हो चुका है लेकिन यह सरकारों और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लिए जाने वाले फैसलों पर निर्भर होगा.
काउंसिल की सस्टेनेबिलिटी एंड कार्बन रिडक्शन कन्वेनर अन्ना रिचर्डसन कहती हैं, " नेट-जीरो कार्बन तक पहुंचने के लक्ष्य में आने वाले चुनौतियों में से एक है निवेश की. स्थानीय सरकारों के सामने धन की व्यवस्था करने की ऐसी चुनौती पहले कभी नहीं दिखी थी.
पचास साल पहले ट्रेड यूनियन नेता जिमी रीड ने ऊपरी क्लाइड इलाके में बने शिपयार्ड में हजारों नौकरियों को बचाने के लिए धरना दे रहे कामगारों के संबोधित किया था. कामगारों से अनुशासन और गरिमा बनाए रखने की अपील करते हुए उन्होंने कहा था "कोई हुड़दंग नहीं होगा. कोई तोड़-फोड़ नहीं होगी. कहीं भी कोई झुंड नहीं बनाएगा क्योंकि पूरी दुनिया हमें देख रही है."
उनके ये भाषण शिपयार्ड के कामगारों की नौकरियों को तो बचाने में कामयाब रहे थे. लेकिन अब ये शिपयार्ड लगभग खत्म हो चुके हैं.
COP26 की मेजबानी कर रहा ग्लासगो अब एक बदला हुआ शहर है.लेकिन एक बार फिर दुनिया इसे देख रही है.
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