कोरोना: आपकी थाली से रोटियाँ ग़ायब न हों, इसलिए ये समझना ज़रूरी है

इमेज स्रोत, Rubina A. Khan
- Author, जेम्स वॉन्ग
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
कोरोना महामारी के दौर से जुड़ी कुछ तस्वीरें ताउम्र याद रहेंगी. जैसे कि खाली सड़कें, बिना दर्शकों के स्टेडियम, दुनिया के बड़े नेताओं से लेकर आम लोगों के मास्क से ढंके चेहरे.
हम लोगों में से कई लोगों को दुकानों पर लगने वाली लंबी-लंबी कतारें, आस-पास के लोगों से भी मजबूरन मोबाइल पर बात करना और ख़ाली सुपरमार्केट... जैसी यादें हमेशा डराया करेंगी.
मगर लॉकडाउन के शुरू होते ही दुकानों की शेल्फ़ का खाली हो जाना कई सवाल भी उठा रहा है.

इमेज स्रोत, Chris Putnam/Barcroft Media via Getty Images
ब्रिटेन में तो पब और स्कूल के बंद होने और मास्क के अनिवार्य किए जाने के पहले ही सुपर मार्केट के शेल्फ खाली हो गए थे.
कुछ लोगों के घर में जब चावल और पास्ता ख़त्म हो गए, तब उन्हें स्थिति की गंभीरता का अहसास हुआ.
अफ्ऱीका जैसे देशों की हालत तो और भी बुरी थी. वहाँ के किसानों को बीज मिलने में दिक्कतें हुईं.
इस लेख में Google YouTube से मिली सामग्री शामिल है. कुछ भी लोड होने से पहले हम आपकी इजाज़त मांगते हैं क्योंकि उनमें कुकीज़ और दूसरी तकनीकों का इस्तेमाल किया गया हो सकता है. आप स्वीकार करने से पहले Google YouTube cookie policy और को पढ़ना चाहेंगे. इस सामग्री को देखने के लिए 'अनुमति देंऔर जारी रखें' को चुनें.
पोस्ट YouTube समाप्त
डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ़ कॉन्गो और दक्षिण सूडान की हालत सबसे ख़राब रही.
अमरीका में कई जानवरों को मार दिया गया क्योंकि उन्हें खाना देना मुमकिन नहीं था. लोगों को दूध नालियों में बहाना पड़ा.
इस महामारी ने हमें यह अहसास दिलाया कि हमारी फ़ूड सप्लाई चेन कितनी नाज़ुक है. लेकिन क्या हमने इससे कुछ सीखा है? क्या भविष्य में हम किसी ऐसी ही स्थिति का सामना करने के लिए बेहतर तैयार होंगे?
जानकार मानते हैं कि विकसित देशों में खाने की आपूर्ति की समस्या शुरुआती झटकों के बाद ठीक हो गई, लेकिन विकासशील देशों के सामने एक नई समस्या खड़ी होने लगी क्योंकि उनकी मज़दूरों पर निर्भरता बहुत अधिक है.

इमेज स्रोत, INDRANIL MUKHERJEE/AFP via Getty Images
मज़दूर फ़सल की बुआई, कटाई और उसे बाज़ार तक पहुँचाने में मदद करते हैं. मज़दूरों की कमी के कारण प्रोडक्शन लाइन पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ा.
बिहार के समस्तीपुर के एक किसान मनुवंत चौधरी का कहना है कि उन्हें शुरू में लॉकडाउन से खासा नुकसान हुआ. उनके प्रवासी मज़दूरों को काम के लिए पंजाब से आने का ज़रिया नहीं मिला.
इस दौरान ऐसा समय आया जब उनके छोटे से परिवार के पास 20 एकड़ ज़मीन पर फ़सल खड़ी थी, लेकिन उन्हें काटने वाला कोई नहीं था.
सिर्फ फ़सल काटना ही चुनौती नहीं थी, लॉकडाउन के ख़त्म हो जाने तक अनाज का भंडारण एक बड़ी चुनौती थी. तब न केवल ट्रांसपोर्ट के संसाधन बंद थे बल्कि आटा मिलें भी बंद पड़ी थीं.
वो बताते हैं, "लॉकडाउन के बाद चार दिनों के लिए मार्च के अंत तक मैं स्थानीय मज़दूरों की मदद से बाज़ार में 50 किलोग्राम बैंगन भेजने में कामयाब रहा. लेकिन जैसे ही महामारी के और फैलने की आशंका फैली और उन्होंने आना बंद कर दिया."
चौधरी को प्रवासी मज़दूरों को नौकरी देने के लिए दूसरे लोगों के साथ प्रतिस्पर्धा करनी पड़ी.

इमेज स्रोत, Saqib Majeed/SOPA Images/LightRocket via Getty Im
मजदूर की जगह लेंगे रोबोट?
फूड नेविगेटर मैगज़ीन के संपादक केटी एस्क्यू के मुताबिक जर्मनी जैसे देशों को भी प्रवासी मज़दूरों की कमी से जूझना पड़ा.
यूरोपीय कमीशन ने कई कदम उठाते हुए मज़दूरों को एक जगह से दूसरी जगह जाने में मदद की. लेकिन ये सभी देश तकनीकी रूप से सक्षम हैं.
इसका मतलब ये कि आने वाले समय में मज़दूरों की जगह मशीनों का इस्तेमाल किया जा सकता है.
मुमकिन है कि भविष्य में मशीनों पर निर्भरता बढ़ाई जाएगी.
न्यूज़ीलैंड में कटाई के लिए एक ऑटोमेटिक रोबोट बनाया गया जो कीवी को बिना किसी इंसानी मदद के तोड़ सकता है.
कंपनी के फाउंडर स्टीवन साउंडर्स कहते हैं, "रोबोट 24 घंटे काम कर सकते हैं, इंसानों से कहीं अधिक और उनसे ज़रूरत के मुताबिक काम कराया जा सकता है."
उनकी टीम कई और तरह के रोबोट भी बना रही है. वे कहते हैं, "दिक्कत ये कि हर फ़सल की कटाई का तरीका अलग होता है."

इमेज स्रोत, Delmarty/Alpaca/Andia/Universal Images Group via
कई दूसरे देशों में भी ऐसी ही मशीनों को बनाने के लिए प्रयोग किए जा रहे हैं. लेकिन मुमकिन है रोबोट का इस्तेमाल पैसे वाले किसान ही कर पाएंगे.
एसक्यू के मुताबिक, "नई तकनीक के साथ दिक्कत ये है कि क्या किसान इनमें निवेश करना चाहेंगे, वो पहले ही बहुत कम मार्जिन पर काम करते हैं."
मांस के सेक्टर में भी फ़िज़िकल डिस्टेंसिंग का पालन करना आसान नहीं होगा. ऐसे प्रोसेसिंग प्लांट में कोविड के मामले अधिक रहे हैं.

इमेज स्रोत, Zhang Yun/China News Service via Getty Images
लगभग 90% फ़सल की पैदावार जिस देश या महाद्वीप में होती है, वहीं उसकी ख़पत भी हो जाती है.
फूड सप्लाई चेन का अधिकांश भाग 'सही समय पर' पहुंचने की प्रणालियों पर निर्भर करता है.
इससे गोदामों की आवश्यकता भी कम होती है. फूड सप्लाई चेन एक ऐसा नेटवर्क है जो कि खाने को बिना देरी के दुकानों तक पहुंचाने में मदद करता है. इससे भोजन को ताज़ा रखने में मदद मिलती है.
शहरी किसानों और स्थानीय उत्पादकों ने लॉकडाउन में अपनी योग्यता साबित की है. कई लोगों ने सप्लाई चेन का उदाहरण देकर ये साबित करने की कोशिश की है कि सिस्टम पूरी तरह से टूट चुका है और हमें 'हाइपर लोकल' खाने (स्थानीय खाने) की ओर ध्यान देना होगा.
कुछ इनोवेटर्स इस बात को साबित करने की कोशिश कर रहे हैं कि आप स्थानीय खाने का बड़े स्तर पर इस्तेमाल कर सकते हैं. भूमिगत खेती एक तरीका है जिससे आप बड़े शहरों में बड़े पैमाने पर खेती कर सकते हैं, बस सही जगह की तलाश करनी होगी. हमें उपलब्ध भूमि का बेहतर उपयोग करना होगा.
नई तकनीक की बात करें तो खाने की आपूर्ति की नेटवर्क में उपग्रह अहम भूमिका अदा कर सकते हैं. अंतरिक्ष से ली गई तस्वीरों की मदद से हम भूमि के पोषक तत्व को माप सकते हैं या नए क्षेत्रों की पहचान कर सकते हैं जहाँ खेती संभव है.
कई लोगों पर इस महामारी का बहुत बुरा असर पड़ा है लेकिन कुछ इसमें आशा की एक किरण भी देख रहे हैं. वो मानते हैं कि ये बदलाव का एक दुर्लभ मौका हो सकता है जिसमें हम खाद्य प्रणाली को न केवल अधिक लचीला, बल्कि स्वस्थ और अधिक टिकाऊ बना सकते हैं.
उनका मानना है कि महामारी ने हमें बेहतर निर्माण करने का एक वास्तविक अवसर दिया है.
फूड चेन के मामले जो चीज़ मुझे सबसे अधिक निराश करती है, वो है घर से निकलने वाला कचरा. कचरे में फेंके गए खाद्य पदार्थों में से 70% खाया जा सकता था, कुल मिलाकर फूड चेन में सभी प्रकार के खाद्य पदार्थों का लगभग 40 फ़ीसदी कचरे में चला जाता है.

इमेज स्रोत, AM PANTHAKY/AFP via Getty Images
अधिक टिकाउ होने के लिए, हमें अपनी पैदावार की चीज़ों का अधिक से अधिक उपयोग करने की आवश्यकता है. यह जानते हुए कि दुनिया में हर नौ में से एक व्यक्ति भूखा रह जाता है.
अमरीकी कंपनी एपील ने फलों के छिलकों के गुणों का अध्ययन कर एक बेरंग और बेस्वाद कोटिंग का उत्पादन किया जिसे फल और सब्जी पर लगा कर उन्हें लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है. इसे बनाने के लिए भी प्राकृतिक चीज़ों का इस्तेमाल किया जाता है.
चाहे वो रोबोट फ्रूट पिकर हों, अंतरिक्ष विज्ञान पर आधारित मशीनें या भूमिगत खेती, कोविड -19 ने हमें सिखाया है कि जहाँ संकट है वहाँ अवसर भी है. फूड सप्लाई चेन सैंकड़ों सालों से मौजूद हैं, लेकिन आने वाले समय में इसमें कई आधुनिक बदलाव आएंगे.
(जेम्स वॉन्ग की 'फ़ॉलो द फ़ूड'स्पेशल इंवेस्टीगेशन पर आधारित. सौतिक बिस्वास, विलियम पार्क और रिचर्ड ग्रे की अतिरिक्त रिपोर्टिंग की मदद से)
(बीबीसी फ़्यूचर पर इस स्टोरी को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें. आप बीबीसी फ़्यूचर कोफ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)















