कोरोना लॉकडाउन: किसान, कोरोना और सरकार की कोशिशों से जुड़े सवाल

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- Author, सूर्यांशी पांडेय
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
भारत में कोरोना महामारी फैलने के बाद हुए लॉकडाउन से हाशिए पर पड़े लोगों को सबसे ज़्यादा नुक़सान हुआ. एक रिपोर्ट के मुताबिक़ घर जाने की उचित व्यवस्था नहीं होने, पुलिस की सख़्ती और भूख से 884 लोगों की जान गई.
द हिंदू बिज़नेस लाइन की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ अकेले महाराष्ट्र में मार्च और अप्रैल के लॉकडाउन के दौरान 109 किसानों ने आत्महत्या की.
लॉकडाउन के दौरान सरकार ने किसानों को ध्यान में रखते हुए तीन मुख्य घोषणाएं कीं :
1. 'एक राष्ट्र, एक बाज़ार' के तहत सरकार ने किसानों को देश के किसी भी हिस्से में अपनी उपज बेचने की छूट दी है. इसमें किसान और व्यापारी को उपज की ख़रीद-बिक्री के लिए राज्य की मंडी के बाहर टैक्स नहीं देना होगा.
2. सरकार ने खाद्य पदार्थों के उत्पादन और बिक्री को नियंत्रण मुक्त किया. तेलहन, दलहन, आलू, प्याज़ जैसे उत्पादों से स्टॉक सीमा हटाने का फ़ैसला किया.
3. कॉन्ट्रैक्ट फ़ार्मिंग
इन तीन फ़ैसलों को मूल तौर पर सरकार किसान विकास के लिए महत्वपूर्ण क़दम बता रही है.
तीन जून को कैबिनेट के इन फ़ैसलों की घोषणा के बाद कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा था, 'इससे कृषि क्षेत्र की सूरत बदलेगी और इसके साथ ही भारत के किसानों की मदद करने की दिशा में इसका दूरगामी प्रभाव होगा.'
20 जुलाई से पंजाब में किरती किसान यूनियन (एकता) क्रेंद्र सरकार के कृषि अध्यादेश के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन करेगा.

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'एक राष्ट्र, एक बाज़ार' से क्या किसानों को होगा फ़ायदा?
पहले यह जानते हैं कि 'एक राष्ट्र, एक बाज़ार' है क्या?
सरकार ने किसानों को मंडियों के अलावा भी अपने उत्पादन को कहीं भी बेचने की छूट दी है. 'एक राष्ट्र, एक बाज़ार' के तहत किसान अपनी उपज को जहां उसे उचित और लाभकारी मूल्य मिले वहां बेच सकता है. ई-नाम के ज़रिए डिजिटल बिक्री भी कर सकेगा. यही नहीं, किसान और व्यापारी को उपज की ख़रीद-बिक्री के लिए अपने राज्य की मंडी से बाहर किसी तरह का कर भी नहीं देना होगा. यह कृषि उत्पाद विपणन समिति अधिनियम में सुधार करते हुए किया गया है.
अभी तक मंडी(एपीएमसी) की जो व्यवस्था है उसमें किसान मंडी में अपनी बुवाई को लेकर जाता है जहां मंडी में उसके सामान की बोली लगती है जिससे किसान को अपनी उपज का सही दाम मिल सके. इसके बाद व्यापारी अनाज ख़रीदता है. मंडी इसके लिए किसान और व्यापारी दोनों से कर लेता है. यह कर (1% से लेकर 8% तक) हर राज्य में अलग-अलग है.
नए अधिनियम के तहत यह कर मंडी के बाहर व्यापार और बिक्री करने पर नहीं लगेगा.

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इन घोषणाओं पर कृषि-अर्थशास्त्र विशेषज्ञ, सुधा नरायणन कहती हैं, 'किसान पहले भी एक राज्य से दूसरे राज्य अपनी उपज को बेचने जाता रहा है, हालांकि इस संशोधन से राज्य-कर की माफ़ी से फ़ायदा होगा. लेकिन किसान की आय में इससे बढ़ोतरी होगी यह कहना मुश्किल है. क्योंकि क्या एक व्यापारी कर-माफ़ी का हिस्सा अपनी ख़रीद में जोड़कर किसान को देगा? हालांकि किसान के लिए ज़्यादा विकल्प खुलेंगे. उनका मानना है कि किसानों से ज़्यादा इससे मंडी के व्यापारी प्रभावित होंगे.
पंजाब में मंडी के व्यापारियों ने इस बदलाव का विरोध किया है तो वहीं महाराष्ट्र में 20 जून को क़रीब 1000 से ज़्यादा व्यापारियों ने विपक्ष के नेता, देवेन्द्र फडणवीस से मुलाक़ात की. व्यापारियों ने मंडी में ख़रीद पर लगने वाले कर को माफ़ करने की माँग की है जिससे मार्किट में फ़सल-ख़रीद में समानता आए और मंडी का व्यापारी प्रभावित ना हो.
सरकारी दस्तावेज़ों के अनुसार देश में कुल 2477 मंडियां हैं और 4843 छोटे बाज़ार हैं जो मंडी द्वारा नियंत्रित किए जाते हैं.
एक राष्ट्र, एक बाज़ार पर कृषि विशेषज्ञ देविंदर शर्मा का कहना है कि इस क़दम से हम मंडी के ढांचे को ख़त्म करने की ओर बढ़ रहे हैं जो किसान और व्यापारी, दोनों के लिए अच्छा नहीं होगा. अगर मंडी में कर लगेगा और मंडी के बाहर कर नहीं लगेगा तो इससे प्रतिस्पर्धा का माहौल नहीं बल्कि भ्रम की स्थिति पैदा होगी. वह बताते हैं कि देश में क़रीब 85% किसान लघु और सीमांत किसान हैं, ऐसे में कितने किसानों के पास इतनी क्षमता होगी कि वह अपने राज्य से बाहर जाकर माल बेचेंगे?
यह ग़रीब किसानों को कोई फ़ायदा नहीं पहुंचाएगा. इसके साथ वह बताते हैं कि जो कर मंडी को जाता है इससे राज्य सरकारें रोड से लेकर कई व्यवस्थाओं को दुरुस्त रखती है.
हालांकि इस अधिनियम के आने के बाद कृषि विभाग के डेटा के अनुसार डिजिटल ख़रीद-बिक्री की सुविधा ई-नाम से 10 राज्यों की 177 मंडियां हाल में जुड़ी हैं.

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आवश्यक वस्तु अधिनियम में संशोधन से लाभक्या है ?
केंद्रीय मंत्रिमंडल ने तीन जून को आवश्यक वस्तु अधिनियम में संशोधन करते हुए अनाज, खाद्य तेल, तेलहन, दलहन, आलू और प्याज़ को नियंत्रण से मुक्त करने की घोषणा की. इन वस्तुओं पर राष्ट्रीय आपदा या अकाल जैसी परिस्थिति के अलावा स्टॉक की सीमा नहीं लगेगी.
इस पर सुधा नरायणनन का कहना है कि इससे निजी व्यापारियों को फ़ायदा पहुंचेगा, ख़ास तौर पर उन व्यापारियों को जिनके पास जमाख़ोरी के लिए बड़ी व्यवस्था है. मसलन निजी कंपनियां किसान से खाद्य तेल ख़रीद कर उसको जमा कर सकती हैं और बिना किसी वजह के मार्किट में उसका दाम बढ़ा सकती हैं जिससे मुनाफ़ा उनको होगा. किसानों को इससे कुछ ख़ास फ़ायदा नहीं होगा.
इससे एक फ़ायदा यह हो सकता है कि शायद कुछ निजी कंपनियां कोल्ड स्टोरेज में निवेश करें लेकिन वह ऐसा तभी करेंगीं जब उनको सरकार की तरफ़ से यह आश्वासन मिले कि आवश्यक वस्तु अधिनियम से हटाई गई वस्तुए दोबारा उस श्रेणी में नहीं जाएंगीं.

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कॉन्ट्रैक्ट फ़ार्मिंग को 'हां' कहें या'ना'!
कॉन्ट्रैक्ट फ़ार्मिंग की भी बात की जा रही है. कॉन्ट्रैक्ट खेती का मतलब ये है कि किसान अपनी ज़मीन पर किसी और के लिए खेती करेगा. कॉन्ट्रैक्ट खेती में किसान को पैसा ख़र्च नहीं करना पड़ता. इसमें कोई कंपनी या फिर कोई व्यापारी किसान के साथ अनुबंध करता है और किसान जो उगाता है उसपर दाम तय होता है. इसमें खाद, बीज से लेकर सिंचाई और मज़दूरी सब ख़र्च कॉन्ट्रैक्टर के होते हैं. कॉन्ट्रैक्टर ही किसान को खेती के तरीक़े बताता है. फ़सल की क्वालिटी, मात्रा और उसके डिलीवरी का समय फ़सल उगाने से पहले ही तय हो जाता है. कॉन्ट्रैक्ट फ़ार्मिंग के लिए दिशानिर्देश जल्द आएंगे.
कॉन्ट्रैक्ट फ़ार्मिंग को लेकर सुधा नरायणनन बताती हैं कि साल 2003 और 2018 में कुछ राज्यों ने कॉन्ट्रैक्ट फ़ार्मिंग पर काम करना शुरू किया था लेकिन कोई ख़ास परिणाम हाथ नहीं लगा था.
इसकी बड़ी वजह यह रही थी कि कॉन्ट्रैक्ट फ़ार्मिंग को लेकर कोई अनिवार्य पंजीकरण की व्यवस्था नहीं थी जिसकी वजह से किसानों को ग़लत तरीक़े से बरग़लाया भी जा सकता था.
सरकार की फ़िलहाल की कॉन्ट्रैक्ट फ़ार्मिंग की व्यवस्था में भी पंजीकरण कराने का कोई कड़ा नियम नहीं बताया गया है. हालांकि बड़ी कंपनियां जैसे कि 'पेप्सिको' ने जो भारत में कॉन्ट्रैक्ट फ़ार्मिंग का क़रार किया है, वह पंजीकरण और क़ानूनी तौर पर पक्की तरह से किया है.
दूसरा उन्होंने यह भी बताया कि अगर किसान किसी क़ानूनी पेंच में फँस भी जाता है तो उसके पास कोर्ट के चक्कर लगाने के लिए पर्याप्त रूप से पैसा भी नहीं होगा.
हालांकि सरकार अभी कॉन्ट्रैक्ट फ़ार्मिंग पर पूरी तरह से नियम लाई नहीं है.
कृषि विशेषज्ञ देविंदर शर्मा का कहना है कि अन्य फ़ैसलों के अलावा जो यह तीन अहम फ़ैसले सरकार की तरफ़ से लिए गए हैं, इससे किसान को कोई फ़ायदा नहीं पहुंचेगा. बल्कि यह निजी कंपनियों को फ़ायदा पहुंचाने की दृष्टि से लिए गए फ़ैसले हैं. क्रेंद्र सरकार किसान उद्योग का निजीकरण और व्यवसायीकरण करना चाहती है.

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अभी किसान की ज़रूरत क्या है?
किसान शक्ति संघ के अध्यक्ष पुष्पेंद्र सिंह का कहना है, 'कोरोना काल के चलते फल, सब्ज़ियों, दुग्ध उत्पादक, पशुपालक, मुर्गीपालक, मछली-पालक किसानों को बहुत नुक़सान हुआ है. इसकी भरपाई की दिशा में कोई ठोस धनराशि बांटी जानी चाहिए. गन्ना किसानों का बक़ाया भुगतान भी तत्काल किया जाना चाहिए. अभी की ज़रूरत है कि सरकार को किसान की बुवाई की ख़रीद के लिए तत्काल व्यवस्था करनी चाहिए.
कोरोना महामारी की वजह से किसानों को अपनी उपज बेचने में दिक़्क़तों का सामना करना पड़ रहा है. इस वजह से देश के अलग-अलग हिस्सों के किसान मंडी की मनमानी के ख़िलाफ़ प्रदर्शन कर रहे हैं.
हाल ही में खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय ने आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत प्याज़, आलू, टमाटर के अलावा भी जितनी और सब्ज़ियां और फल हैं उसकी ख़रीदारी के लिए एक योजना बनाई है. इसके तहत 'ऑपरेशन ग्रीन' चलाया जाएगा जिसमें फलों और सब्ज़ियों के उपज स्थान से मार्किट तक की ढुलाई के लिए इस्तेमाल होने वाले परिवहन पर 50% की छूट होगी. साथ ही बुवाई को भंडारगृह में रखने के लिए भी जो ख़र्च होगा उसमें 50% छूट मिलेगी. यह क़रीब छह महीने तक चलेगा.

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अभी के लिए इस योजना का फ़ायदा आम, केला, अमरूद, लीची, कीवी, पपीता, खट्टा फल, अनानास, अनार, कटहल तो वहीं सब्ज़ियों में; फलियां, करेला, बैंगन, शिमला मिर्च, गाजर, फूल-गोभी, हरी मिर्च, ओकरा, आलू, प्याज़ और टमाटर उगाने वाले किसानों को मिलने की उम्मीद है.
यहां यह बताना ज़रूरी है कि सरकारी आंकड़ों के मुताबिक़ यानि की एगमार्कनेट के अनुसार भारत के पहले लॉकडाउन फ़ेज़ में खाद्य आपूर्ति श्रृंखला 60% से ज़्यादा प्रभावित हुई थी. लेकिन मई के अंत तक आते-आते यह संतुलित अवस्था में आ गई. वहीं खाद्य पदार्थों की मंहगाई पहले 10% बढ़ी और बाद में घट गई थी. यह रिपोर्ट 1804 मंडियों के आधार पर बनाई गई है.
पुष्पेंद्र सिंह की यह राय भी है कि सरकार को मुफ़्त में अनाज बांटने का काम पूरे साल तक जारी रखना चाहिए क्योंकि किसानों की ठीक से कमाई नहीं हो पाई है, ऐसे में भुखमरी का डर है.
26 मार्च को 1.70 लाख करोड़ रुपये की राहत पैकेज की घोषणा की गई थी. इसमें 80 करोड़ लाभार्थियों को तीन महीने तक पाँच किलो अतिरिक्त गेहूं या चावल और 1 किलो दाल प्रति परिवार देने, 20 करोड़ महिलाओं के जन-धन खातों में तीन महीने तक 500 रुपये प्रति माह देने, तीन करोड़ ग़रीब, बुज़ुर्गों, विधवाओं, दिव्यागों के खातों में एक-एक हज़ार देने, पीएम किसान योजना के तहत दो-दो हज़ार रुपये की क़िस्त लगभग नौ करोड़ किसानों को देने की घोषणा की थी.
30 जून को देशवासियों को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मुफ़्त अनाज वितरण को पाँच महीने और यानि नवंबर तक जारी रखने की घोषणा की.

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क्या कहता है किसान?
वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के अनुसार भारत में क़रीब 58% जनता कृषि उद्योग पर निर्भर है.
मध्य प्रदेश के रतलाम ज़िले के लाख्या गांव में किसानी करने वाले कोदार दामर ने बीबीसी को बताया कि कोरोना के चलते शुरू में बहुत परेशानी हुई. वह अपनी पाँच बीघा ज़मीन पर कपास, मक्का उगाते हैं. उन्होंने बताया कि "कोई डर से बाहर नहीं जाता था तो पूरी तरह से फ़सल का काम भी नहीं हो पा रहा था. किसी तरह से परिवार मिलकर कुछ किया, फिर मंडी तक सामान लेकर गए तो ख़रीदार कोई नहीं मिला." अब के हालात पर बात करते हुए वह कहते हैं कि "धीरे-धीरे कुछ छूट मिली तो मंडी गए, जिससे कुछ बिक्री हुई. फिर हमलोग एक निजी संस्था, 'रंग दे' से भी जुड़े हैं जिन्होंने हमारी मदद की. वो हमारी बुवाई उठवाते हैं और फिर पैसा हमारे खाते में आ जाता है."
जब उनसे हमने मुफ़्त में बंट रहे अनाज के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि मई में उनको एक किलो चावल मिला था, तो जून में गेंहूं और इस महीने चावल और दाल दोनों मिला है.
आंध्र प्रदेश के विशापट्टनम ज़िले के चिंतापल्ली मंडल गांव के किसान गी.सब्बाराव बताते हैं वह अपनी पत्नी, पिता, मां और पाँच बच्चों को लेकर नौ लोग हैं. वह अपनी तीन एकड़ ज़मीन पर किराए की खेती करते हैं. उन्होंने बताया कि "कोरोना से पहले हम लोग फ़सल कटाई के लिए 10-20 लोगों के झुंड में जाते थे ताकि काम पूरा हो जाए लेकिन कोरोना के डर से मुश्किल 2-3 लोग ही बाहर निकले. इसके कारण हमारे इलाके के सभी किसानों को बहुत परेशानी आई. जो काम मिल बांट के कर लेते थे वो 2 या 3 लोग अकेले कैसे करते?"

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इस कारण इस बार कोई कमाई नहीं हो पाई. "हमारा परिवार बहुत मुश्किल से दिन काट रहा है. हम पूरी तरह से सरकार द्वारा बांटे जा रहे मुफ़्त राशन पर निर्भर हैं (20 किलो चावल, 1 किलो चीनी, 2 किलो प्याज़, हल्दी, नमक, डाल). हम लोग एक दिन छोड़कर खाना खा रहे हैं ताकि अनाज ज़्यादा समय के लिए बचा सकें."
उनसे जब हमने पूछा कि आपको सरकार द्वारा लिए गए नए फ़ैसलों के बारे में कोई जानकारी है तो वह कहते हैं कि उनको कुछ नहीं पता, बस वह सरकार और राज्य से यह चाहते हैं कि किसी तरह वह खाना पहुंचाते रहे, उन्हें पैसा नहीं, खाना चाहिए.
पीएम किसान योजना के तहत सीमांत और सभी किसान जो इस योजना से जुड़े हैं उनके लिए 6000 प्रतिवर्ष सीधा खाते में पैसा पहुंचाने की व्यवस्था है. जिसकी इस बार की क़िस्त 2-2 हज़ार करके पहले ही पहुंचाई गई. पीएम किसान योजना के आंकड़ों के अनुसार 20,78,250 महिला किसान, वहीं, 18,31,615 पुरुष किसान पीएम किसान योजना से जुड़े हुए हैं.
हमने जब गी.सब्बाराव से पूछा कि क्या वह पीएम किसान योजना से जुड़े हैं तो उन्होंने कहा कि उनको इस योजना की कोई जानकारी नहीं है.
कृषि-अर्थशास्त्र विशेषज्ञ सुधा नरायणनन कहती हैं कि पीएम किसान योजना की पहल अच्छी है लेकिन इसका फ़ायदा क्या वाक़ई हर सीमांत किसान को पहुंच रहा है इसका सही आंकलन नहीं कर सकते क्योंकि पहले इस योजना को केवल सीमांत और लघु किसानों के लिए रखा गया था. लेकिन बाद में इससे सभी तरह के किसानों को जोड़ दिया गया. तो हम और आप जैसे लोग गांव में कोई ज़मीन लेकर अपने आपको किसान दिखा सकते हैं और ऐसे कुछ लोग जिनको इस योजना की ज़रूरत नहीं भी है तो वह इसका फ़ायदा ले लेते हैं.

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कोई अच्छी ख़बर?
वैश्विक आपदा के बीच पंजाब के कृषि विभाग ने छह जुलाई को एक डेटा जारी करते हुए बताया है कि 27 लाख हेक्टेयर में इस बार जो चावल उगाए गए उसमें से 20% ज़मीन पर वैश्विक आपदा के चलते 'डायरेक्ट सीडिंग ऑफ़ राइस' की तकनीक का किसानों ने इस्तेमाल किया.
इस तकनीक के इस्तेमाल के कारण 30% भूजल को बचाया गया है. साथ ही पंजाब के कृषि विभाग का यह दावा है कि भूजल के कम इस्तेमाल होने से पंजाब के किसानों को चावल की खेती में लगने वाला ख़र्च कम लगा.
हाल ही में खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय ने आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत प्याज़, आलू, टमाटर के अलावा भी जितनी और सब्ज़ियां और फल हैं उसकी ख़रीदारी के लिए एक योजना बनाई है. इसके तहत 'ऑपरेशन ग्रीन' चलाया जाएगा जिसमें फलों और सब्ज़ियों के उपज स्थान से मार्किट तक की ढुलाई के लिए इस्तेमाल होने वाले परिवहन पर 50% की छूट होगी. साथ ही बुवाई को भंडारगृह में रखने के लिए भी जो ख़र्च होगा उसमें 50% छूट मिलेगी. यह क़रीब 6 महीने तक चलेगा.
कैसे किसान को बचाया जा सकता है?
अगर किसान को आगे बढ़ाना है तो एमएसपी यानि कि न्यूनतम समर्थन मूल्य पर काम करना होगा.
न्यूनतम समर्थन मूल्य के अनुसार किसी भी फ़सल की अगर एमएसपी तय है मतलब उस दाम से नीचे दाम पर वह फ़सल किसी भी हालत में नहीं बिकेगी.
लॉकडाउन के बीच किसानों को राहत देने के लिए केंद्र सरकार ने 2 जून को 14 ख़रीफ़ फ़सलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में बढ़ोतरी की थी. इसके एक हफ़्ते बाद, मध्य प्रदेश के हज़ारों मक्का किसानों ने एमएसपी की माँग को लेकर आंदोलन किया.
क्या तय किए हुए एमएसपी पर फ़सल बिक रही है, इसपर सरकार की रिपोर्ट अपनी जगह है तो देविंदर शर्मा का कहना है कि कई किसान ज़्यादा जागरुक नहीं होते, उनका फ़ायदा उठाकर कुछ व्यापारी तय एमएसपी का उल्लघन करते पाए जाते हैं, हालांकि ऐसा होना नहीं चाहिए और इसके केस कम ही देखने को मिलते हैं.
अब बात किसान से जुड़े ऋण(लोन) पर भी होनी चाहिए.

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14 मई को किसानों को ख़रीफ़ की फ़सलों की बुवाई के लिए ऋण (लोन) उपलब्ध कराने के लिए नाबार्ड के ज़रिए 30,000 करोड़ रुपये की अतिरिक्त राशि उपलब्ध कराई जाने की घोषणा की गई. इस योजना के तहत तीन करोड़ लघु और सीमांत किसानों को लाभ पहुंचाने की बात कही गई.
इसके अलावा पीएम किसान योजना से जुड़े सभी किसानों को किसान-क्रेडिट कार्ड पर 2.5 करोड़ किसानों को दो लाख करोड़ रुपये का रियायती ऋण मिलने की बात हुई. इसमें मछुआरों और पशुपालक किसानों को भी शामिल किया जाएगा, इसपर मुहर लगी.
सुधा नराणयनन का कहना है कि किसान को चार फ़ीसद की दर से चार लाख तक का लोन दे रहे हैं. इसके साथ घरेलू ख़र्च के लिए लोन राशि का अधिकतम 10% तक इस्तेमाल कर सकते हैं. किसान क्रेडिट कार्ड जिनके पास होगा उनको यह फ़ायदा पहुंचेगा.
लेकिन नाबार्ड के ज़रिए जो 30,000 करोड़ रुपये की अतिरिक्त राशि उपलब्ध कराने की बात है वह इस साल मुमकिन हो पाएगा कि नहीं, यह इसकी प्रक्रिया पर निर्भर है.
उनके मुताबिक़ जो किसान को इस वक़्त जल्द से जल्द चाहिए वह है: अपनी फ़सल की ख़रीद, ख़रीफ़ की फ़सल के लिए सस्ते बीज, उर्वरक, सामान की ज़रूरत. राज्य स्तर पर इसको तेज़ी से करने की ज़रूरत है. साथ ही नरेगा के ज़रिए रोज़गार और मुफ़्त राशन प्राथमिकता हैं.
उन्होंने तमिलनाडु और केरल का उदाहरण देते हुए बताया कि इन राज्यों ने फ़ूड पैकेज सिर्फ़ ग्रामीण ही नहीं बल्कि शहरी इलाक़ों में भी बांटा. इस फ़ूड पैकेज में उन्होंने चाय पत्ती भी डाल दी. जिसके बाद उन शहरी इलाक़ों में चाय पत्ती की माँग बढ़ती नज़र आई जिसका फ़ायदा चाय पत्ती उगाने वाले किसानों को हुआ.
कोरोना और फिर अभी किसान टिड्डियों के आतंक से निपट ही रहा था. अब डीज़ल के बढ़ें दाम भी माथे पर चिंता की लकीर खींच रहे हैं. डीज़ल मंहगा होने से ट्रैक्टर, फिर परिवहन भी मंहगा पड़ेगा जिसको लेकर पंजाब में विरोध चल रहा है.
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