कोरोना वायरस कच्चे तेल की बादशाहत को ख़त्म कर देगा?

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- Author, मोहम्मद शाहिद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
दुनियाभर में फैली कोरोना वायरस की महामारी न केवल लोगों की जान का नुक़सान कर रही है बल्कि इसका असर कई अन्य क्षेत्रों पर भी हो रहा है.
दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाएं इस वायरस के कारण चरमरा गई हैं और काला सोना कहे जाने वाले कच्चे तेल के दाम 23 डॉलर प्रति बैरल तक आ गए हैं.
तेल के दाम कैसे बढ़ाए जाएं अमरीका, रूस समेत खाड़ी के कई देश इसकी कोशिश करते रहे हैं और अब आख़िरकार ये फ़ॉर्मूला निकला है कि इसका उत्पादन कम कर दिया जाए. क्योंकि उत्पादन कम होगा तो मांग बढ़ेगी और तेल के दाम ऊपर उठाने में मदद मिलेगी.
तेल उत्पादक देशों के संगठन ओपेक (ऑर्गेनाइज़ेन ऑफ द पेट्रोलियम एक्सपोर्टिंग कंट्रीज़) और अन्य तेल उत्पादक देश (मुख्यतः रूस और अमरीका) ने तय किया है कि तेल के उत्पादन में 10 फ़ीसदी की कटौती की जाएगी.
ओपेक और सहयोगी तेल उत्पादक देश हर दिन 97 लाख बैरल की कटौती तेल उत्पादन में करेंगे. इसके बाद यह उम्मीद की जा रही है कि पिछले 18 साल में सबसे नीचे आए तेल के दाम ऊपर उठेंगे.
हालांकि, इस समझौते की आधिकारिक रूप से घोषणा नहीं हुई है बल्कि अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप और अन्य देशों के प्रमुख नेताओं ने इसकी पुष्टि की है.
क्या समझौता लागू हो पाएगा?

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पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय के पूर्व सचिव एससी त्रिपाठी कहते हैं कि इस उत्पादन को कम करना और समझौता लागू करना बहुत मुश्किल लग रहा है.
वो कहते हैं, “यह समझौता मई-जून के लिए लागू हुआ है जिसके बाद कहा जा रहा है कि हर दिन उत्पादन 2 मिलियन प्रति बैरल और कम किया जाएगा. तेल का उत्पादन करने वाले देशों की अर्थव्यवस्था अच्छी नहीं चल रही है, वो चाहते हैं कि तेल के दाम बढ़ें लेकिन वो चाहते हैं कि उनका मार्केट शेयर भी कम न हो. ये देश धीरे-धीरे फिर से उत्पादन शुरू कर देंगे.”
क्यों साथ आए ओपेक और नॉन-ओपेक देश?
तेल उत्पादक देशों का संगठन ओपेक और रूस को ही अब तक ओपेक प्लस कहा जाता था. लेकिन ऐसा पहली बार देखने को मिला जब ओपेक प्लस में लगभग पूरी दुनिया शामिल थी.
इसमें अमरीका, रूस के अलावा नॉन ओपेक देश भी शामिल थे.
तेल के गिरते दामों को ऊपर उठाने के लिए अमरीका, रूस और ओपेक देश साथ आ गए. ऊर्जा एवं तेल मामलों के जानकार और बीजेपी से जुड़े नरेंद्र तनेजा इसकी तीन वजहें गिनाते हैं.

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वो कहते हैं, “पहली वजह यह है कि सऊदी अरब चाहता है कि तेल बाज़ार में उसकी हिस्सेदारी बरक़रार रहे. दूसरी वजह दुनिया की तेल पर निर्भरता बरक़रार रखनी है और तीसरी मुख्य वजह तेल के गिरते दामों को ऊपर लाना है ताकि उससे जुड़ी हुई संपत्तियों को बचाया जा सके. आरामको जो सऊदी अरब की सबसे बड़ी तेल कंपनी है उसकी वैल्यू को भी संभालना है.”
इस समय दुनिया में सबसे बड़ा तेल का उत्पादक देश अमरीका है. तेल के दामों को नीचे लाने के लिए अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप लगातार कोशिशें कर रहे थे क्योंकि तेल के दाम कम रहने से शेल समेत उसके कई उद्योग ठप पड़ सकते थे.
इस पर नरेंद्र तनेजा कहते हैं, “शेल ऑयल का उत्पादन अमरीका में छोटी-छोटी कंपनियां करती हैं क्योंकि यह एक कॉटेज इंटस्ट्री है. तेल लगातार 35 डॉलर प्रति बैरल से नीचे जाता रहा तो यह कंपनियां बंद हो जाएंगी. इस सूरत में कोरोना वायरस से पहले ही पीड़ित अमरीकी अर्थव्यवस्था तबाह हो जाएगी. इसका असर आने वाले अमरीकी राष्ट्रपति चुनावों पर भी पड़ सकता है. राष्ट्रपति ट्रंप ने इसलिए उत्पादन कम करने के लिए सऊदी अरब पर दबाव डाला.”
कोई नया बादशाह पैदा होगा?
हाल ही में जब सऊदी अरब और रूस के बीच तेल के दामों को लेकर तगड़ी तक़रार देखने को मिली तो तेल के दाम और नीचे चले गए.
इस समय कच्चा तेल रिकॉर्ड स्तर पर 23 डॉलर प्रति बैरल बिक रहा है जिसके दाम को अगस्त तक 40 डॉलर प्रति बैरल तक लाना है लेकिन इन सबके बीच उत्पादन कम करने को दुनिया में तेल के नए बादशाह के उभरने के तौर पर भी देखा जा रहा है.
नरेंद्र तनेजा कहते हैं कि तेल के दाम कम होने में कोरोना वायरस ने एक ट्रिगर का काम किया लेकिन रूस और सऊदी अरब के बीच झगड़े की वजह से भी तेल सस्ता हुआ और फिर रूस ने ठान लिया कि वो सऊदी अरब को सबक सिखाएगा कि तेल के मसले में सिर्फ़ उसी की नहीं चलेगी.
वो कहते हैं, “कोरोना वायरस की मार ने दुनिया की अर्थव्यवस्था को घुटनों पर ला दिया है. इस महामारी से निपटने में महीनों लगेंगे लेकिन जिस दिन भी इस महामारी से अर्थव्यवस्था बाहर निकलेगी उस दिन सबसे पहले जिस उद्योग को लाभ होगा वो तेल उद्योग होगा.”
“तेल के दाम उस समय ऊपर चढ़ने शुरू होंगे. तेल की बादशाहत की लड़ाई में आज यह स्पष्ट हो चुका है कि अमरीका उत्पादन के मामले में सऊदी अरब से भी आगे है. तेल उत्पादन में एक करोड़ प्रति बैरल की कमी लाने का समझौता भी अमरीका के दबाव में हुआ है.”
भारत पर क्या असर पड़ेगा?

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चीन और अमरीका के बाद भारत कच्चे तेल का सबसे बड़ा आयातक देश है. ऐसा अनुमान है कि कोरोना वायरस के कारण जारी लॉकडाउन के दौरान भारत में तेल की खपत में 30 से 35 फ़ीसदी की कमी आई है.
सस्ता तेल आना भारत के लिहाज़ से बहुत अच्छी ख़बर मानी जा सकती है लेकिन नरेंद्र तनेजा कहते हैं कि दूसरे तरीक़े से देखा जाए तो सस्ता तेल भारत के लिए ख़राब भी है.
वो कहते हैं, “भारत अपनी आवश्यकता का 86 फ़ीसदी तेल आयात करता है. भारत अपना अधिकतम तेल खाड़ी देशों से आयात करता है. अगर तेल के दाम लगातार कम रहे तो उन देशों की अर्थव्यवस्था चरमरा जाएगी. उनकी अर्थव्यवस्था चरमराने से भारत पर दो तरीक़े से फ़र्क़ पड़ेगा. पहला यह कि वो हमारे सबसे बड़े निर्यात बाज़ार हैं जिनसे हमारी अर्थव्यवस्था जुड़ी हुई है और दूसरा यह कि वहां 80 लाख भारतीय हैं जिनकी नौकरियां जा सकती हैं.”
“इन सबके अलावा सामरिक दृष्टि से खाड़ी देश हमारे लिए बहुत अहम हैं. अगर आर्थिक संकट वहां पैदा होता है तो चरमपंथी ताक़तें मज़बूत होंगी जो भारत नहीं चाहता. भारतीय अर्थव्यवस्था 60 डॉलर प्रति बैरल तक के दाम झेलने के लिए तैयार है.”
कई देशों का एकसाथ मिलकर तेल के उत्पादन में कमी लाने को पूरी दुनिया के लिए अच्छा संकेत नहीं समझा जा रहा है.

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अब तक तेल के दाम तय करने में ओपेक देशों की बहुत बड़ी भूमिका रहती थे लेकिन इस बार ओपेक के बाहर के देशों ने इसमें बड़ी भूमिका निभाई है.
नरेंद्र तनेजा कहते हैं, “ओपेक और नॉन-ओपेक देशों ने जो आज किया है अगर वो आगे भी जारी रहता है तो वो चीन और भारत जैसे आयातक देशों के लिए बहुत बड़ा मुश्किल का सबब होगा. तब ये सारे देश मिलकर तेल के दाम बढ़ा भी सकते हैं.”
भारत को क्या करना चाहिए?
कच्चे तेल के दाम भारत के लिए एक सौगात की तरह है लेकिन भंडारण की क्षमता न होने से इसका अधिक लाभ भारत नहीं ले सकता है.
नरेंद्र तनेजा कहते हैं कि भारत में केवल नौ दिन के तेल भंडारण की क्षमता है और भारत में रोज़ाना 46 लाख प्रति बैरल तेल की खपत है, अगर तेल सस्ता भी हो जाए तो उसे रखने के लिए जगह नहीं है.
वहीं, एससी त्रिपाठी कहते हैं कि भारत के लिए यह सुनहरा मौक़ा है और उसे जल्द से जल्द अपनी भंडारण की क्षमता को बढ़ा देना चाहिए.
वो कहते हैं कि भारत ने हाल ही में 5 मिलियन टन स्ट्रैटेजिक रिज़र्व बनाया है, उसे इसे बढ़ाकर 15-20 मिलियन टन रखना चाहिए, यह अच्छा मौक़ा है कि भारत अपने रिज़र्व को भर दे और आगे स्ट्रैटेजिक रिज़र्व बनाने पर काम करे.
एससी त्रिपाठी कहते हैं, “चीन के पास 90 मिलियन टन स्ट्रैटेजिक रिज़र्व है. जब भी दाम कम होते हैं चीन इन रिज़र्व्स को भर देता है. यह दाम लगभग दो साल तक नहीं बढ़ने वाले हैं. साथ ही भारत को डीप सी इंडस्ट्री में निवेश नहीं करना चाहिए और आयात बढ़ा देना चाहिए.”
जनता को क्यों नहीं मिल पा रहा सस्ता तेल?
इस समय दुनियाभर में कच्चे तेल के दाम 23 डॉलर (तक़रीबन 1800 रुपये) प्रति बैरल के आसपास बने हुए हैं लेकिन भारत में तब भी पेट्रोल 70 रुपए प्रति लीटर और डीज़ल 62 रुपए प्रति लीटर के ऊपर बिक रहा है.
इस सूरत में भी भारतीयों को सस्ता तेल क्यों नहीं मिल पा रहा है? इस सवाल पर नरेंद्र तनेजा कहते हैं कि भारत में तेल की कीमतों में 50 फ़ीसदी टैक्स होता है.
वो कहते हैं, “भारत में टैक्स कम नहीं किया गया और भारत में तेल के दाम अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल के दाम के आधार पर तय नहीं किए जाते. साथ ही भारत में तेल को एक स्ट्रैटेजिक कमोडिटी माना जाता है. तेल कंपनियां भी यह ध्यान में रखकर चलती हैं कि तेल के दाम बढ़ने पर वो बहुत महंगा तेल उपभोक्ताओं को न दें.”
“कोरोना वायरस के कारण तेल सस्ता है लेकिन अगर दूसरी वजहों से भी तेल सस्ता होता तो भी इसे सस्ते में नहीं दिया जाता क्योंकि भारत में पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव को भी देखा जाता है.”
तेल के दाम कुछ भी रहे हों भारत में तेल पर लगने वाले टैक्स हमेशा ऊपर ही गए हैं. तेल से होने वाली कमाई भारत को राजकोषीय घाटे को कम करने में मदद करती है.
एससी त्रिपाठी कहते हैं कि 2014 तक डीज़ल पर 3 रुपए प्रति लीटर टैक्स था वहीं पेट्रोल पर 10.50 रुपए प्रति लीटर था, उसको बढ़ाकर 20-22 रुपए पेट्रोल पर और डीज़ल पर 17 रुपए प्रति लीटर कर दिया गया था जिसकी वजह से 2015-16 तक भारत सरकार को हर साल डेढ़ लाख करोड़ रुपए की अतिरिक्त कमाई हो रही थी जिससे माना जा रहा है कि मुद्रास्फ़ीति और राजकोषीय घाटा कम हुआ है, उसकी एक वजह ये टैक्स भी हैं.
वो कहते हैं, “पिछली महीने 3-4 रुपए प्रति लीटर टैक्स बढ़ाया है जिसकी वजह से भारत में 23 रुपए प्रति लीटर पेट्रोल पर और 18 रुपए प्रति लीटर टैक्स डीज़ल पर है. जनता भी तेल के दामों को लेकर आदी हो गई है. उसको लगता है कि तेल के दाम 70 रुपए के आसपास ही रहें और सरकार भी दाम उसी के आसपास बनाए रखती है.”
एससी त्रिपाठी कहते हैं कि तेल से सबसे अधिक पैसा सरकार के पास आता है, उसके बाद तेल कंपनियां अपना पैसा लेती हैं जिसके बाद डीलर का नंबर आता है और आम जनता तो आख़िर में ही होती है.



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