कोरोना का टीका ग़रीब लोगों तक आख़िर कब और कैसे पहुँचेगा?

कोरोना का टीका

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    • Author, ज़ुबैर अहमद
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली

कुछ सप्ताह पहले तक दुनिया भर के देशों को कोरोना की वैक्सीन निर्यात करने वाला भारत अब ख़ुद ही टीकों की कमी से जूझ रहा है.

भारत उन देशों में गिना जाता है जिसकी टीके बनाने की क्षमता कई विकसित देशों से ज़्यादा है.

वैक्सीन का निर्यात अब रोक दिया गया है जिससे कई देशों को वैक्सीन नहीं मिल पा रही है, जबकि सबसे बड़ी आबादी वाले राज्य उत्तर प्रदेश ने टीका इम्पोर्ट करने का ग्लोबल टेंडर जारी किया है.

देश भर में टीका लगाने वाले सैकड़ों केंद्र वैक्सीन ना उपलब्ध होने के कारण बंद कर दिये गए हैं.

आप में से वो लोग जो रोज़ आरोग्य-सेतु ऐप और कोविन वेबसाइट पर टीके के लिए रजिस्टर कराने की नाकाम कोशिश कर रहे हैं उन्हें अंदाज़ा होगा कि यह कितनी बड़ी चुनौती है.

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कई देशों में नहीं शुरू हो सका टीकाकरण

दुनिया में ऐसे दर्जनों देश हैं जहाँ कोरोना टीकाकरण शुरू नहीं हो सका है क्योंकि उनके पास टीका खरीदने के लिए पैसे और इसे बनाने के लिए साधन नहीं हैं.

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के महानिदेशक पिछले साल से बार-बार ये कहते आ रहे हैं कि ग़रीब और कम आय वाले देश टीकाकरण में पीछे छूट गए हैं.

उन्होंने पिछले महीने ही धनी देशों की आलोचना करते हुए कहा था कि वो अपनी खुद की आबादी के लिए ज़रूरत से ज़्यादा वैक्सीन ऑर्डर कर रहे हैं और ग़रीब देशों की ओर ध्यान नहीं दे रहे हैं.

उन्होंने पिछले महीने कहा था कि दुनिया भर में लगाए गए टीकों का केवल 0.3% गरीब देशों में लोगों तक पहुँचा है.

बीबीसी को मिले आंकड़ों के मुताबिक़ 10 मई तक दुनिया भर में 1.30 अरब वैक्सीन डोज़ लगाए जा चुके थे जिनमें 32.6 करोड़ वैक्सीन के साथ चीन सबसे आगे है.

अमेरिका दूसरे स्थान पर है और अब तक उसने लगभग 26 करोड़ लोगों को टीके लगाए हैं.

यूरोपीय संघ ने 17.2 करोड़ और चौथे नंबर पर भारत ने 17 करोड़ लोगों को टीके दिए हैं. लेकिन अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका के कई ग़रीब देशों में वैक्सीन देने की रफ़्तार बहुत सुस्त है.

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अंतरराष्ट्रीय पहल

इस पृष्ठभूमि में कई अमीर देश विश्व स्वास्थ्य संगठन या डब्ल्यूएचओ के तहत आगे आए और ग़रीब देशों या कम आय वाले देशों की मदद की ज़िम्मेदारी ली.

उन्होंने कोवैक्स नाम के एक वैश्विक टीके की पहल की जिसमें डब्ल्यूएचओ, ग्लोबल वैक्सीन अलायंस या गावी और कई विकसित देश शामिल हैं.

कोवैक्स का उद्देश्य दान के माध्यम से 92 निम्न-मध्यम आय वाले देशों के लिए समान तरीक़े से कोविड -19 वैक्सीन पहुँचाना है, इस योजना के तहत वैक्सीन देने का काम फ़रवरी में शुरू किया गया है.

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घाना फरवरी में कोवैक्स टीके पाने वाला पहला देश था, करोड़ों वैक्सीन भेज दिए गए हैं और विशेषज्ञों को उम्मीद है कि वर्ष के अंत तक दो अरब डोज़ दिए जाएँगे.

इस पहल के लिए सबसे अधिक दान देने का वादा अमेरिका ने किया है उसके बाद जर्मनी और ब्रिटेन हैं. भारत ने इस पहल के लिए डेढ़ करोड़ डॉलर दिए हैं.

लेकिन डब्ल्यूएचओ के मुताबिक़ अगले वर्ष इस वैश्विक पहल को 35 अरब से 45 अरब डॉलर की ज़रुरत पड़ेगी ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि अगले साल के अंत तक दुनिया के सभी बालिग़ों को टीका लग जाए.

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वैक्सीन उत्पादन

इस वैश्विक पहल के तहत अमेरिकी ड्रग-निर्माता मॉडेर्ना अपने "सबसे कम कीमत वाले" मूल्य पर 50 करोड़ वैक्सीन डोज़ सप्लाई करेगा.

हालांकि इनमें से अधिकतर 2022 से पहले तक उपलब्ध नहीं होंगे. इसके अलावा कोवैक्स के लिए दूसरी कंपनियां भी वैक्सीन बना रही हैं, जिनमें भारत का सीरम इंस्टीट्यूट भी शामिल है जो कोविशील्ड वैक्सीन बना रहा है.

पिछले साल अगस्त और सितंबर में वैक्सीन बनाने वाली दुनिया की सबसे बड़ी कंपनी पुणे की सीरम इंस्टिट्यूट गावी और बिल एंड मेलिंडा गेट्स फॉउंडेशन के बीच 20 करोड़ वैक्सीन बनाने का समझौता तय हुआ.

इस समझौते के तहत सीरम इंस्टीट्यूट को अपनी क्षमता बढ़ाने के लिए पैसे दिए गए और क़रार हुआ कि 2021 के शुरुआती महीनों से सीरम इंस्टिट्यूट वैक्सीन भेजने लगेगा.

लेकिन ऐसा हुआ नहीं, सीरम इंस्टीट्यूट की तरफ़ से डिलीवरी में देरी होने लगी. इसके कई कारण बताए गए जिनमें अमेरिका से वैक्सीन बनाने के लिए कच्चे माल के निर्यात पर प्रतिबंध और भारत में वैक्सीन के गहरे संकट के बाद इसके निर्यात पर पाबंदी शामिल हैं.

सीरम इंस्टीट्यूट के अध्यक्ष अदार पूनावाला ने 16 अप्रैल को एक ट्वीट में अमेरिका के राष्ट्रपति से कच्चे माल पर लगी पाबंदी हटाने का अनुरोध किया.

उन्होंने लिखा, ''अगर हम अमेरिका के बाहर वैक्सीन उद्योग की ओर से इस वायरस को हराने में वास्तव में एकजुट हैं, तो मैं विनम्रतापूर्वक आपसे अनुरोध करता हूं कि आप कच्चे माल के निर्यात पर से एम्बार्गो हटा दें''.

राष्ट्रपति जो बाइडन ने उनकी पुकार सुन ली. कुछ सप्ताह पहले उन्होंने एक क़दम आगे बढ़कर वैक्सीन के पेटेंट को अस्थायी तौर पर शेयर करने का सुझाव दिया ताकि दुनिया भर में वैक्सीन की कमी पूरी की जा सके लेकिन यूरोपीय संघ का अहम देश जर्मनी इसके लिए राज़ी नज़र नहीं आता.

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हैदराबाद की भारत बायोटेक कंपनी वैक्सीन बनाने वाली देश की दूसरी सबसे बड़ी कपंनी है जो कोवैक्सिन टीका बना रही है.

इसने भी कोवैक्स प्रोग्राम से बाहर कई देशों को वैक्सीन निर्यात करने के समझौते किए, जिनमें से एक वियतनाम है जो वैक्सीन की सप्लाई ना करने पर इस कंपनी से नाराज़ है.

कंपनी ने बीबीसी के सवालों का अब तक जवाब नहीं दिया है.

वियतनाम की मिसाल

वियतनाम इस समय कोरोना की चौथी लहर से निपट रहा है.

टीकाकरण के लिए वह काफी हद तक कोवैक्स प्रोग्राम पर निर्भर था. इसके अलावा उसने भारत बायोटेक को भी वैक्सीन का ऑर्डर दिया था. इस कारण देश में अब तक 10 लाख से कम लोगों को टीका लग सका है जो कुल आबादी का केवल 0.32 प्रतिशत है.

राजधानी हनोई में 'वियत थिंक टैंक लिमिटेड' के राजनीतिक विश्लेषक डॉक्टर हा होआंग होप ने बीबीसी से बातचीत में कहा, "वियतनाम पर भारत से आए वैक्सीन में देरी हुई है लेकिन देश टीकाकरण के लिए कई जगहों से टीका हासिल कर रहा है."

वो कहते हैं, "भारतीय वैक्सीन उत्पादकों ने सप्लाई करने का वादा किया है लेकिन अभी तक वैक्सीन का कोई भी डोज़ नहीं दिया गया है. वियतनाम का टीकाकरण कोवैक्स, दक्षिण कोरिया और रूस के कुछ टीकों पर निर्भर है."

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वियतनाम में स्थानीय स्तर पर नए वैक्सीन बनाए जाने के लिए तीसरे चरण का ट्रायल शुरू हो चुका है.

डॉक्टर होप देश में जारी "चीन के वैक्सीन को ना कहो'' की मुहिम के समर्थक हैं. उनका कहना था कि चीन की दक्षिण-पूर्वी देशों में जारी वैक्सीन कूटनीति के जाल में फंसने से पहले वियतनाम को अपना वैक्सीन रोलआउट करना पड़ेगा, हम ये जून में शुरू कर सकते हैं."

अफ़्रीकी देश काफ़ी पीछे

कोवैक्स को असल चुनौती का सामना अफ्रीका में करना पड़ रहा है.

डब्ल्यूएचओ का कहना है कि अफ्रीकी देशों में कोविड-19 टीकों की सप्लाई ख़त्म हो रही है और आगे इन देशों को कितने डोज़ मिल सकेंगे इस पर चिंता है.

तंजानिया, बुरुंडी, बुर्किना फ़ासो, सेंट्रल अफ़्रीकन रिपब्लिक, चाड और इरिट्रिया को अभी तक टीके नहीं मिले हैं, मेडागास्कर को अब कोवैक्स के माध्यम से एस्ट्राजेनेका वैक्सीन के डोज़ भेजे गए हैं. अब तक आठ देशों ने पहले से ही कोवैक्स योजना से मिलने वाली वैक्सीन आपूर्ति का पूरा इस्तेमाल कर लिया है.

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डब्ल्यूएचओ के अनुसार कोवैक्स कार्यक्रम का लक्ष्य अफ़्रीका में 60 करोड़ डोज़ की आपूर्ति करना है, जो कम से कम 20% आबादी को टीका लगाने के लिए पर्याप्त है.

कोवैक्स प्रोग्राम के तहत टीके की आपूर्ति की डिलीवरी फ़रवरी में शुरू हुई और अफ्रीका के अधिकांश देशों ने वैक्सीन हासिल करने पर हामी भरी और इन्हें वैक्सीन सप्लाई की गई लेकिन ये ज़रुरत से काफी कम थी.

उस समय जिनेवा स्थित संस्था गावी की डिप्टी सीईओ अनुराधा गुप्ता ने कहा था कि कोविड के टीकों का समान विस्तार नैतिक ज़रुरत है.

वे कहती हैं, "कोवैक्स की शुरुआत इसीलिए की गई है. डब्ल्यूएचओ हमारी संस्था गावी के नेतृत्व में जारी प्रोग्राम वास्तव में एक वैश्विक समाधान है."

स्वास्थ्यकर्मी

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भारत का दर्जा बदला

कोवैक्स मुहिम में शामिल भारत पहले इस योजना को वैक्सीन सप्लाई कर रहा था लेकिन अब वह कोवैक्स योजना के ज़रिए वैक्सीन हासिल करेगा, गावी ने पिछले हफ्ते कहा कि भारत को कोविड -19 वैक्सीन की 25 करोड़ तक डोज़ पूरी तरह से रियायती दाम पर दी जाएगी.

हाल ही में रेल मंत्री पीयूष गोयल ने ये दावा किया कि भारत के पास वैक्सीन के उत्पादन के लिए जितनी बड़ी क्षमता और कुशल कामगार हैं उससे कम समय में टीकाकरण के लिए वह दुनिया की मदद कर सकता है लेकिन इस पर ट्विटर पर प्रतिक्रिया देने वाले कई लोग कह रहे हैं कि जब भारत खुद ही वैक्सीन की भारी कमी से निपट रहा है तो दुनिया की मदद कैसे कर सकता है?

कोवैक्स प्रोग्राम ने जिस रफ़्तार से ग़रीब देशों में वैक्सीन सप्लाई करने की योजना बनाई थी उसमें देरी के कारण उन ग़रीब देशों में चिंता है जहाँ कोरोना महामारी फैल रही है लेकिन वैक्सीन की कमी के कारण वो अपने नागरिकों का टीकाकरण नहीं कर पा रहे हैं.

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