अब सूरज चाचू ही पंखा चलाएंगे, लाइट जलाएंगे!

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- Author, आर एन भास्कर
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार
नए साल की शुरुआत के साथ ही पर्यावरण और ऊर्जा के सतत स्रोतों के बारे में चर्चा भी ज़ोर-शोर से शुरू हो गई है.
पिछले साल दो दिसंबर को पेरिस में जलवायु परिवर्तन पर सम्मेलन में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फ्रांस के राष्ट्रपति फ्रांसुआ ओलांद के साथ मिलकर इंटरनेशनल सोलर एलायंस (आईएसए) को हरी झंडी दिखाई थी.
इसके पीछे मंशा यह थी कि सौर ऊर्जा का ज़्यादा से ज़्यादा इस्तेमाल करके कार्बन और ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन कम किया जाए.
इससे कर्क रेखा और मकर रेखा के बीच पड़ने वाले 121 देशों को फ़ायदा पहुंचने की उम्मीद है.
मोदी ने कहा है कि भारत इस नई पहल को अपने नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ सोलर एनर्जी के परिसर में शुरू करेगा और इसके लिए ज़मीन मुहैया कराएगा.
परियोजना से जुड़ा आधारभूत ढांचा खड़ा करने के लिए भारत क़रीब 200 करोड़ रुपए भी देगा.

तो क्या सौर ऊर्जा आने वाले सालों में भारत की ऊर्जा संबंधी ज़रूरतें पूरी कर पाएगी?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इससे जुड़े तीन उद्देश्य हासिल करने का लक्ष्य रखा है -
पहले मोदी ने दुनिया के सामने बार-बार कार्बन और ग्रीनहाउस उत्सर्जन कम करने के लिए भारतीय संकल्प को दोहराया.
इस पर चर्चा हो सकती है कि मोदी ने भारत के लिए 2020 तक सौर ऊर्जा का नया लक्ष्य 100 गीगावॉट निर्धारित किया है.
भारत ने इस साल सौर ऊर्जा क्षमता को दो गीगावॉट तक बढ़ाने का लक्ष्य रखकर कइयों को प्रभावित किया है और अगले साल तक इसे बढ़ाकर नौ गीगावॉट तक करने की उम्मीद है.
दूसरे, मोदी जानते हैं कि उन्हें बाक़ी 90 गीगावॉट सौर ऊर्जा पाने के लिए धन की ज़रूरत पड़ेगी.

यहां उल्लेखनीय है कि भारत को जलवायु परिवर्तन से निपटने के खातिर 2.5 ट्रिलियन अमरीकी डॉलर की महत्वाकांक्षी योजना के लिए विकसित देशों से आर्थिक मदद की ज़रूरत होगी.
इसलिए आईएसए मौजूदा हालात में किसी देश की जलवायु परिवर्तन से निपटने में आने वाली आर्थिक ज़रूरतें पूरा करने के लिए अहम रणनीति है क्योंकि विकसित देश ग्लोबल वार्मिंग की रफ़्तार कम करने के मक़सद से वित्तीय मदद देने को इस नाज़ुक वक़्त में राज़ी हैं और मजबूर भी.
तीसरे, फ्रांस और भारत, दोनों देश जर्मनी के ऊर्जा मंत्री हरमन शीर के शुरू किए गए आंदोलन का नेतृत्व संभालने में सफल रहे हैं.
हरमन और जर्मनी को पिछले 15 साल में हुई सौर क्रांति का श्रेय जाता है.

इलेक्ट्रिकल इंजीनियर शीर ने सौर ऊर्जा में निवेश का फ़ैसला लिया था. उन्हें लगा कि अगर हाइड्रोकार्बन इंडस्ट्री को मिलने वाली सब्सिडी का एक छोटा सा हिस्सा भी सौर ऊर्जा को दिया जा सके तो यह ऊर्जा संबंधी हालात पूरी तरह बदल सकता है. वे सही थे.
भला हो जर्मनी के सौर पैनल की मांग का, जिसकी वजह से इसका उत्पादन बड़े पैमाने पर शुरू हो गया. चीन ने इसके उत्पादन में बाज़ी मार ली.
सौर पैनल की लागत क़रीब साढ़े चार सौ रुपए प्रतिवॉट से घटकर क़रीब 60 रुपए प्रतिवॉट हो गई है. आज कोई भी सौर ऊर्जा ऊद्योग में होने वाली वृद्धि देख सकता है.
जैसा अमरीका में देखने को मिल रहा है, सौर ऊर्जा की लागत दिन पर दिन कम होती जा रही है.

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तीन महीने पहले ऊर्जा विशेषज्ञों ने अमरीका में ऊर्जा संबंधी चार समझौतों पर हुए हस्ताक्षर से राहत की सांस ली.
ये समझौते 20 साल के लिए हैं और इससे प्रति यूनिट खपत की क़ीमत 2.80 पैसे भी कम हो जाएगी. हालांकि अभी भी सौर ऊर्जा से जुड़ी दो समस्याएं परेशान करने वाली हैं.
एक है, सूरज की किरणों के घटने-बढ़ने में बड़ा अंतर होना. अगर बादल छा जाएं तो सौर ऊर्जा का उत्पादन लगभग शून्य हो जाएगा.
उद्योग-धंधे और घरों की ऊर्जा संबंधी ज़रूरतें इस अस्थिर आपूर्ति के भरोसे नहीं छोड़ी जा सकतीं.
दूसरी समस्या सौर ऊर्जा के उत्पादन की मात्रा से जुड़ी है जो एक ही वक़्त में उद्योग-धंधों के लिए ज़रूरी हो सकती है.
साफ़ है कि सौर पैनल से पैदा होने वाली ऊर्जा नियमित, विश्वसनीय और बहुत उच्च क्षमता वाली हो, इसे पक्का करने का कुछ रास्ता होना चाहिए. इन समस्याओं का जल्द समाधान निकल सकता है.

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कम से कम चार बैटरी निर्माता मौजूदा लागत के 25 फ़ीसदी से भी कम में उच्च क्षमता वाले बैटरी बनाने का वादा कर रहे हैं.
लगता है ऐसा होने पर सौर ऊर्जा को कहीं से भी इकट्ठा करने और सौर ऊर्जा की प्रवाह में आने वाली अनियमितता से निपटने में सफलता मिल सकती है.
ज़ाहिर है कि तब ऊर्जा संबंधी ज़रूरतें सौर ऊर्जा के इर्द-गिर्द सिमट जाएंगी.
भारत की सौर ऊर्जा के क्षेत्र में अहम भूमिका निभाने की संभावना है.
भारत में अमरीका के राजदूत रिचर्ड वर्मा ने इस पर मुहर लगाते हुए कहा, "राष्ट्रपति ओबामा मानते हैं कि पेरिस जलवायु समझौते के तहत भारत जैसे देशों की सामाजिक-आर्थिक विकास की क्षमता की सुरक्षा होनी चाहिए."
"ठीक इसी वक़्त समझौते के तहत सभी देशों को सतत विकास के लिए कार्बन उत्सर्जन कम करने की दिशा में गंभीर और महत्वकांक्षी योजनाओं को साकार रूप देना है. ये उद्देश्य चुनौतीपूर्ण हैं लेकिन असंभव नहीं हैं."
(ये लेखक के निजी विचार हैं)
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