'मैंने ज़िंदगी में ऐसी बारिश नहीं देखी'

चेन्नई बारिश

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पिछले हफ़्ते चेन्नई में लगातार तीन दिनों तक भारी बारिश हुई और इसकी वजह से लगभग पूरा शहर ही जलमग्न हो गया था.

चेन्नई में पिछले पांच सालों से रह रहे वरिष्ठ पत्रकार केवी लक्ष्मण का कहना है कि उन्होंने अपने जीवन में ऐसी बारिश नहीं देखी.

बीबीसी संवाददाता अनुराग शर्मा से बात करते हुए उन्होंने बारिश से पैदा हुई दिक़्क़तों को आंखों देखा हाल सुनाया.

पढ़ें चेन्नई की बारिश का आंखों देखा हाल-

चेन्नई

चेन्नई में रहते हुए ऐसा पहली बार हो रहा है कि शहर में इतनी भारी बारिश हुई और इसने हज़ारों चेन्नई वासियों की तरह हमें घर के अंदर क़ैद रहने पर मजबूर किया.

मैं 2010 में जब चेन्नई आया था तब से अड्यार के गांधी नगर में रह रहा हूँ और पिछले सप्ताह की बारिश ने यहां से आधे किलोमीटर दूर रिहाइशी कॉलोनियों में बाढ़ की स्थिति पैदा कर दी.

हालांकि भारी बारिश और जल भराव मेरे लिए कोई नई बात नहीं है, मैं दिल्ली के कई हिस्सों में रहा हूँ और दस साल तो पूर्वी दिल्ली के मयूर विहार में रहा, लेकिन जैसी बारिश चेन्नई में 8, 9 और 10 नवंबर को हुई, इतने सालों में मैंने वैसी बारिश कभी नहीं देखी थी.

अड्यार का गांधी नगर मद्रास (अब चेन्नई) की पहली प्लान्ड रिहाइशी कॉलोनी है. अड्यार नदी के किनारे बसे इस इलाक़े में रहते हुए हम इतने सौभाग्यशाली थे कि सड़कें सूखी हुई थीं लेकिन यहां से महज 1,000 मीटर दूर रिहाइशी इलाक़ों में लोगों को घुटने भर से लेकर कमर तक पानी से होकर अपने घरों में जाना पड़ा.

शुक्रवार को पहली बार बादल छंटने और धूप वाला दिन देखकर चेन्नई वासियों के चेहरे पर थोड़ी राहत आई. क़रीब एक पखवाड़े के बाद धूप में कपड़े सुखाने का उन्हें मौका मिला था.

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यहां तक कि गुरुवार को भी बूंदाबादी और हल्की बारिश हुई और यह शहरवासियों को और हताश करने के लिए पर्याप्त था.

मेरे मामले में घर पर बने रहने में सेहत की दिक्कत भी एक वजह थी.

लेकिन हां, आधे किलोमीटर दूर स्थित अस्पताल और क्लीनिक जाना किसी चुनौती से कम नहीं था क्योंकि बारिश के पानी में आधी डूबी एक छोटी कार से वहां जाना पड़ता था.

यह सौभाग्य की बात थी कि औरों की तरह मेरी कार बीच रास्ते में बंद नहीं हुई.

अगर मैं क्लीनिक पहुंच भी सका तो मुसीबत यहीं ख़त्म नहीं हुई क्योंकि मेरा इलाज करने वाले डॉक्टर को आठ किलोमीटर स्थित पोरूर से आना होता था जिसे आने में दो घंटे लग जाते थे जबकि आमतौर पर यह आधे घंटे का रास्ता है.

मुझे चेहरे के दाएं हिस्से की ओर लकवे का असर है और इसके इलाज के लिए बिज़ली वाले यंत्र से फ़िजियोथेरेपी दी जाती है.

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एकाध बार तो मुझे बिना इलाज के ही वापस लौटना पड़ा क्योंकि डॉक्टर ऐसा कर नहीं सका.

35 साल के डॉ राजकुमार शुरू से ही चेन्नई में रहते आए हैं, उन्होंने इलाज के दौरान मुझे बताया कि ऐसी बारिश की उन्हें याद नहीं है.

कुछ साल पहले 2011 में जब तूफ़ान की वजह से भारी बारिश हुई तो जानमाल का काफ़ी नुक़सान हुआ था. चेन्नई के सभी समुद्री तटों पर 50 से 60 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ़्तार से हवाएं चलीं और कुडाललुरु और पुडुचेरी भी प्रभावित हुआ.

इस विनाश का मैं गवाह रहा हूँ. विनाश के मामले में तो चेन्नई ने ऐसा कुछ नहीं सहा, लेकिन तीन दिन तक हुई भारी बारिश ने पांच दशकों में अस्त-व्यस्त तरीक़े से कई गुना बढ़ गए इस शहर की कमजोरियों को उजागर कर दिया.

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अगर कोई शहरी योजना है तो इसे गोपनीय रखा गया है और इसे रियल इस्टेट बिल्डरों और नेताओं ने नज़रअंदाज़ किया है, जो नदियों के पाटों पर क़ब्ज़ा करने और रिहाइशी कॉलोनियां और ऑफ़िस काम्प्लेक्स बनाने में ज़रा भी नहीं सोचते.

इसलिए, जब ऐसा लगा कि मानो समंदर ने पूरे शहर को अपनी आगोश में ले लिया है तो मुश्किल से ही हैरानी हुई.

इलाज के लिए जाते समय मैंने अपने आसपास के इलाक़े में घूमते हुए नावों पर लोगों को अड्यार नदी के उस पार सुरक्षित जाते हुए देखा.

सौभाग्य से गांधी नगर, पड़ोसी कोट्टुरपुरम जैसी मध्वर्गीय कॉलोनी की तरह निचले इलाक़े में नहीं है. वहां बारिश बंद होने के दो दिन बाद भी लोग अपने घरों से पानी निकलने का इंतज़ार कर रहे थे.

चेन्नई में जल जमाव कोई नई बात नहीं है. यहां हल्की बारिश से गांधी नगर जैसे इलाक़े में भी पानी भर जाता है. यह वही इलाक़ा है जो तीन दिनों तक हुई भारी बारिश में सबसे सुरक्षित था, जबकि बाक़ी चेन्नई डूब सा गया था.

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मेरे दोस्त पर्यावरणविद् नित्यानंद जयरमन ने बताया कि चूंकि जलाशयों और झीलों को बिल्डरों ने पाट दिया और उनका अतिक्रमण कर लिया इसलिए बारिश के पानी को निकलने की जगह ही नहीं बची है.

इसीलिए उन्हें इस बात शक होता है कि क्या इसी तरह की दूसरी भारी बारिश चेन्नई झेल पाएगा.

यह शंका इसलिए है क्योंकि उत्तर पूर्वी मानसून को ख़त्म होने में अभी डेढ़ महीने का वक़्त है.

तमिलनाडु के उत्तरी तटीय इलाक़े में किसी तरह का कम दवाब वाला क्षेत्र बनता है तो यह शहर के लिए और बड़ी मुसीबत लेकर आएगा, जो कि अब धीरे-धीरे अपने ढर्रे पर लौटने की कोशिश कर रहा है.

यह स्वाभाविक है कि मैं इस तरह की बारिश के लिए पहले से अधिक तैयार हूँ और ऐसे हालात दोबारा आते हैं तो पिछली बारिश से सबक हासिल करे हुए मैं शहर के निचले इलाक़ों से दूर ही रहूंगा.

मौसम विभाग की पहली चेतावनी पर मैं जो काम निश्चित रूप से करूंगा वो ये कि ज़रूरी सामान को जमा कर लिया जाए. मैं जानता हूँ कि चेन्नई के अधिकांश लोग निश्चित रूप से ऐसा ही करेंगे.

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मैं कई दिनों तक ब्रेड नहीं पा सका क्योंकि आपूर्ति बाधित हो गई थी.

कुछ दिनों तक तो बिजली भी नहीं थी, लेकिन ये ऐसी चीज नहीं थी जो पूरी तरह बारिश के कारण हुई.

ये समस्या बिजली की ख़राब केबल लाइनों की वजह से हुई. इसे बेमन से बिजली बोर्ड के कर्मचारी ठीक करते हैं और यह फिर भी उन्हें लगातार चुनौती देती रहती है.

बिजली बोर्ड के कर्मचारियों की एक बहादुरी को तो मानना पड़ेगा कि उन्होंने बारिश के दौरान इनकी मरम्मत की. मरम्मत के लिए इन्हें खोदना पड़ता है और फिर उन्हें ज़मीन के अंदर डालना पड़ता है.

लेकिन एक चीज के बारे में मैं बिल्कुल निश्चित हूँ. मैं उन कुछ सौभाग्यशाली लोगों में से एक था जिन्हें अन्य लोगों के मुक़ाबले थोड़ी कम परेशानी उठानी पड़ी. कई लोगों के तो घर तीन दिनों तक आधे डूबे रहे और उनकी गाड़ियां पूरी तरह डूबी रहीं.

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अधिकांश चेन्नईवासियों ने इस बारिश से सबक सीखा, लेकिन क्या नगर निगम ने कुछ सीखा?

हम उम्मीद करते हैं कि शायद उन्होंने कुछ सीखा होगा, लेकिन शहर के लिए समस्या इसके अतीत में छिपी हुई है.

आंखें बंदकर या उग आने वाले ‘अवैध शहर’ से नज़रें फेर लेने वाला नगर निगम ख़ुद से ही इस समस्या का समाधान कर पाएगा यह मुश्किल ही लगता है.

और साफ तौर पर कहा जाए तो चेन्नई कॉर्पोरेशन का कामकाज बहुत थोड़े इलाक़े तक सीमित है, जबकि इसे बाहरी इलाक़ों के लिए भी ज़िम्मेदार माना जाता है, जो कि अलग अलग निकायों के अंतर्गत आते हैं.

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