भाजपा-शिवसेना गठबंधनः मतभेद से मनभेद तक!

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- Author, समर खडस
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार
उद्धव ठाकरे ने ये पहले से ही तय कर रखा था कि वह सोमवार से शुरू होने जा रहे महाराष्ट्र विधानसभा के अधिवेशन की पूर्व संध्या पर अपना निर्णय ले लेंगे.
इसीलिए विधानसभा के विशेष अधिवेशन के पहले का दिन तय किया गया था.
इस अधिवेशन में विश्वास मत का प्रस्ताव, विधानसभा अध्यक्ष का चुनाव जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों का फैसला होना है. उद्धव इसके पहले ही शिवसेना का रुख तय कर लेना चाहते थे.
लेकिन इसी बीच शिवसेना नेता अनिल देसाई का मंत्रिमंडल में शामिल होने की अटकलों के बीच दिल्ली पहुँचना और फिर उन्हें दिल्ली हवाई अड्डे से ही वापस मुंबई लौटना पड़ा.
इससे एक दिन पहले अंनत गीते ने भी प्रधानमंत्री से मिलने की कोशिश की लेकिन वे उस तरह से मोदी से नहीं मिल पाए जैसे वह मिलना चाहते थे.
सुरेश प्रभु

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सवाल उठता है कि अगर ये सब न हुआ होता तो राजनीतिक परिस्थितियां क्या स्वरूप लेतीं?
भाजपा ने जब-जब शिवसेना को सत्ता आने का न्यौता दिया है, शिवसेना ने अपने कदम आगे बढ़ाए हैं.
दिल्ली की सरकार के लिए पहले भाजपा ने उन्हें कहा कि हम आपको सरकार में शामिल करना चाहते हैं लेकिन आपके कोटे में से हम सुरेश प्रभु को लेना चाहते हैं.
सुरेश प्रभु तकनीकी तौर पर भले ही शिवसेना में हों लेकिन वे बीते तीन चार सालों से भाजपा के लिए काम कर रहे हैं.
प्रभु गुजरात में मोदी के लिए कई प्रोजेक्ट्स पर काम कर रहे हैं. और ये भी सच है कि सुरेश प्रभु के संबंध अपनी ही पार्टी से बहुत अच्छे नहीं हैं.
शिवसेना की मांग

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इसी वजह से शिवसेना ने सुरेश प्रभु के नाम पर इनकार कर दिया और अपनी तरफ से अनिल देसाई का नाम आगे बढ़ाया.
लेकिन अनिल देसाई के नाम पर हां कहने के बाद भी महाराष्ट्र की सरकार में शिवसेना को कितनी जगह और कौन से मंत्रालय देंगे, यह तय नहीं हो रहा था.
शिवसेना ने पहले 14 मंत्री पद मांगे, भाजपा नहीं मानी. बाद में 12 किए, फिर 10 किए लेकिन भाजपा नहीं मानी. आखिरकार शिवसेना की मांग सिमटकर आठ मंत्रियों तक हो गई.
लेकिन शिवसेना इस सूरत में गृह विभाग जैसे किसी बड़े मंत्रालय के लिए दबाव बना रही थी. भाजपा इस पर भी तैयार नहीं थी.
इन्हीं सब बातों के मद्देनज़र उद्धव ठाकरे ने भाजपा को अपनी शर्तें मानने के लिए 48 घंटों का वक्त दिया है, नहीं तो वो महाराष्ट्र विधानसभा में विपक्ष की जिम्मेदारी निभाएगी.
पवार का साथ!

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अगर ऐसा हुआ तो महाराष्ट्र की राजनीति में आने वाले सालों में दूरगामी नतीजे हो सकते हैं.
शिवसेना के विपक्ष में बैठने से तो असर पड़ेगा ही साथ ही साथ शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी भाजपा के साथ जाएगी. उसके बिना सरकार नहीं चल सकती है.
इसका एक नतीजा ये भी हो सकता है कि एनसीपी को मिलने वाला गैरभाजपा वोट उससे छिटक सकता है.
जिस एनसीपी पर भाजपा ने इतने गंभीर घोटालों के आरोप लगाए थे, उस एनसीपी के साथ भाजपा के जाने से उसके जनाधार पर भी असर पड़ सकता है.
आंकड़ों के खेल में देखें तो 122 विधायक भाजपा के पास हैं. 41 विधायक एनसीपी के पास हैं. लेकिन विचारधारा के लिहाज से एनसीपी के विधायक भाजपा के विरोध में हैं.
मनभेद

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विधानसभा के अंदर एनसीपी के विधायक तो भाजपा के खिलाफ ही बोलेंगे.
विपक्षी शिवसेना भी भाजपा के खिलाफ ही अपना स्टैंड रखेगी और दूसरी सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी कांग्रेस, वो भी भाजपा के खिलाफ होगी.
मुझे लगता है कि इस सूरत में विधानसभा को चलाना एक मुश्किल काम होगा. भाजपा और शिवसेना में मतभेद तो पहले भी थे लेकिन अब मनभेद भी हो गया है.
आने वाले समय में महाराष्ट्र की राजनीति में दक्षिणपंथी राजनीतिक दलों के सामने बड़ी चुनौतियां खड़ी होंगी और देखना होगा कि उसका सामना वे किस तरह से करेंगे.
आज मोदी का नाम भले ही चल रहा है और उनके लिए सारी अच्छी बातें हो रही हैं.
मुझे लगता है कि शिवसेना और भाजपा के मनभेद की वजह से दोनों ही राजनीतिक पार्टियों के लिए बुरे दिन आने वाले हैं.
(बीबीसी संवाददाता संदीप सोनी से बातचीत पर आधारित)
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