प्रवीण सूद कौन हैं जिन्हें सीबीआई का नया डायरेक्टर बनाया गया है

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- Author, दीपक मंडल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
कर्नाटक के पुलिस महानिदेशक प्रवीण सूद सीबीआई के नए निदेशक बनाए गए हैं.
वो मौजूदा निदेशक सुबोध कुमार जायसवाल की जगह लेंगे.
महाराष्ट्र कैडर के आईपीएस अफ़सर जायसवाल 25 मई को रिटायर हो रहे हैं. सूद का कार्यकाल दो साल का होगा.
'द हिंदू' की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, चीफ जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़ और लोकसभा में विपक्ष (कांग्रेस) के नेता अधीर रंजन चौधरी के तीन सदस्यीय पैनल ने शनिवार को उनके नाम पर सहमति की मुहर लगा दी थी.
हालांकि 'द हिंदू' की रिपोर्ट में ये भी कहा गया है कि चौधरी ने सूद के नाम पर 'असहमति नोट' दर्ज किया था. अख़बार के मुताबिक़, अधीर रंजन चौधरी का कहना था कि प्रवीण सूद का नाम अफ़सरों के उस पैनल में शामिल नहीं था, जिनके नाम सीबीआई निदेशक पद शॉर्टलिस्ट किए गए थे.
उनका नाम आख़िर में जोड़ा गया था. मीटिंग से पहले इन उम्मीदवारों के नाम चयनकर्ताओं के पैनल को दिखाए गए थे.
'द हिंदू' के मुताबिक़, सीबीआई निदेशक पद की दौड़ में मध्य प्रदेश के डीजीपी सुधीर सक्सेना भी शामिल थे.

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कौन हैं प्रवीण सूद?
प्रवीण सूद 1986 बैच के कर्नाटक कैडर के आईपीएस अफ़सर हैं.
उन्हें तीन साल पहले कर्नाटक का डीजीपी बनाया गया था. सूद मूल रूप से हिमाचल प्रदेश के रहने वाले हैं.
सूद ने अपनी शिक्षा आईआईटी-दिल्ली से पूरी की है. उन्हें 2024 में रिटायर होना था, लेकिन सीबीआई के निदेशक के तौर पर उन्हें दो साल का कार्यकाल मिल गया है.
'द हिंदू' ने लिखा है कि यह भी दिलचस्प है कि सूद के चयन के लिए पैनल की बैठक उस दिन हुई जिस दिन कर्नाटक विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को जीत मिली.
माना जा रहा था कि कांग्रेस की सरकार बनने के बाद सूद के ख़िलाफ़ कार्रवाई की जा सकती थी. शायद इसलिए उन्हें बचाने के लिए समय रहते कर्नाटक से निकाल लिया गया.
कर्नाटक कांग्रेस के अध्यक्ष डी के शिवकुमार के बयानों से ऐसे संकेत मिलने लगे थे.

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डीके शिवकुमार के आरोप
'हिन्दुस्तान टाइम्स' की एक रिपोर्ट के मुताबिक़, पिछले महीने डी के शिवकुमार ने प्रवीण सूद के काम करने की शैली पर सवाल उठाते हुआ कहा था कि कांग्रेस सत्ता में आई तो उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई की जाएगी.
शिवकुमार, प्रवीण सूद पर राज्य में बीजेपी के लिए काम करने का आरोप लगाते रहे हैं.
पिछले महीने उन्होंने पत्रकारों से कहा,'' हमारे डीजीपी अपनी नौकरी में फ़िट नहीं हैं. वो पिछले तीन साल से बीजेपी की सेवा कर रहे हैं. अब और कितने दिनों तक बीजेपी के कार्यकर्ता बने रहेंगे.''
शिवकुमार ने कहा था, ''सूद ने कांग्रेस नेताओं पर 25 मुक़दमे लादे हैं. एक भी मुकदमा बीजेपी नेताओं पर नहीं किया गया है. हमने उनके काम और आचरण के बारे में चुनाव आयोग को लिखा है. अपना काम ठीक से नहीं करने के लिए उनके ख़िलाफ़ केस दर्ज होना चाहिए. ''
जब सूद की सीनियॉरिटी घटाई गई
प्रवीण सूद 2017 में भी विवादों में आए थे, जब कर्नाटक में सिद्धारमैया की सरकार थी. सूद उन दिनों बेंगलुरू के पुलिस कमिश्नर थे.
कन्नड़ समर्थक आंदोलनकारियों की गिरफ़्तारी के आरोप में उन्हें पुलिस कमिश्नर के ओहदे से निचले ओहदे पर भेज दिया गया था.
हालांकि सरकार ने इसे रूटीन ट्रांसफ़र बताया था, लेकिन उन्हें एडीजीपी (लॉजिस्टिक्स और कम्यूनिकेशन) बना कर नई तैनाती में भेज दिया गया.
सूद पर आरोप था कि उन्होंने कन्नड़ समर्थक आंदोलनकारियों को हिंदी के बिलबोर्ड और साइनबोर्ड पर कालिख पोतने के लिए गिरफ़्तार करवाया था.
जिस वक्त़ उन्हें पदावनत किया गया, उसके तीन महीने बाद वो डीजीपी बनने वाले थे.
सूद ने जिन लोगों को गिरफ़्तार करवाया था उन पर सांप्रदायिक हिंसा फैलाने का केस दर्ज कराया गया था.
जबकि लोगों का कहना था कि ये लोग हिन्दी 'थोपने' का विरोध कर रहे थे. ये किसी भी तरह सांप्रदायिक हिंसा भड़काने का काम नहीं है.

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बीजेपी सरकार के दौरान बने डीजीपी
जनवरी 2020 में सूद को कर्नाटक का डीजीपी बनाया गया था.
कहा गया कि सूद को असित मोहन प्रसाद की सीनियॉरिटी पर तवज्जो देकर डीजीपी बनाया गया.
उस समय कहा गया था कि प्रसाद अक्टूबर 2020 में रिटायर हो जाते. लिहाज़ा उनका छोटे कार्यकाल को देखते हुए सूद को डीजीपी बनाया गया.
सूद को उस हिसाब से चार साल का लंबा कार्यकाल मिला.
वो मई 2024 में रिटायर होते. लेकिन उससे पहले ही उन्हें सीबीआई महानिदेशक बना दिया गया.

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सूद की उपलब्धियां
कांग्रेस भले ही सूद पर बीजेपी के लिए काम करने का आरोप लगाती आई हो, लेकिन उनके समर्थकों का कहना है कि वो एक काबिल अफ़सर हैं.
'हिन्दुस्तान टाइम्स' की एक रिपोर्ट के मुताबिक़, सूद को 2013 में कर्नाटक स्टेट पुलिस हाउसिंग कॉरपोरेशन का एमडी बनाया गया था.
उस दौरान सिर्फ़ नौ महीने में ही उन्होंने इसका टर्नओवर 160 करोड़ से बढ़ा कर 282 करोड़ रुपये पर पहुंचा दिया था.
पुलिस कमिश्नर रहते हुए उन्होंने बेंगलुरू में 'नम्मा 100' नाम की सेवा शुरू करवाई, जो मुश्किल में फंसे लोगों के लिए रेस्पॉन्स सर्विस थी.
अपने कार्यकाल के दौरान बेहतर प्रदर्शन के लिए सूद को 1996 में मुख्यमंत्री की ओर से गोल्ड मेडल मिल चुका है.
बेहतरीन सेवा के लिए उन्हें 2002 में पुलिस मेडल मिला था.
2011 में उन्हें राष्ट्रपति पुलिस मेडल से नवाज़ा गया था.

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सीबीआई निदेशक की नियुक्ति को लेकर विवाद क्यों होते हैं?
2013 के लोकपाल और लोकायुक्त क़ानून में कहा गया था कि सीबीआई की नियुक्ति प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और सुप्रीम कोर्ट के चीफ़ जस्टिस का पैनल करेगा.
सीबीआई डायरेक्टर की नियुक्ति में पारदर्शिता लाने के लिए ये व्यवस्था की गई थी.
लेकिन अमूमन इस पद के लिए कैंडिटेट का चयन केंद्र सरकार के मंत्रालय की ओर से चयनित उम्मीदवारों के पूल से होता रहा है.
फ़िलहाल चयन का आधार वरिष्ठता, काम के प्रति ईमानदारी और भ्रष्टाचार के जांच का अनुभव होता है.
लेकिन इस मानदंड की आलोचना होती रही है क्योंकि अक्सर देखा गया गया है कि तुलनात्मक तौर पर जूनियर अधिकारी भी सीबीआई डायरेक्टर बनते रहे हैं.
इसके साथ ही सरकारों की ओर से कई बार सीबीआई की नियुक्ति की प्रक्रिया में छेड़छाड़ के मामले सामने आए हैं.
2018 में तत्कालीन सीबीआई डायरेक्टर आलोक वर्मा और सीबीआई के स्पेशल डायरेक्टर राकेश अस्थाना के बीच लंबी लड़ाई देखने को मिली थी.
अस्थाना सरकार के क़रीबी समझे जाते थे और वर्मा की ओर से भ्रष्टाचार के आरोप लगाने के बावजूद उन्हें स्पेशल डायरेक्टर बनाया गया था.
इसके बाद अस्थाना ने भी वर्मा पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए थे.

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23 अक्टूबर 2018 को वर्मा और अस्थाना दोनों को छुट्टी पर भेज दिया गया. इसके बजाय नागेश्वर राव को अंतरिम निदेशक बनाया गया.
राव उनकी तुलना में कम अनुभव वाले अफ़सर थे, लेकिन जानकारों के मुताबिक़ उन्हें भारतीय जनता पार्टी का आदमी माना जाता था.
14 नवंबर 2021 को मोदी सरकार ने एक अध्यादेश पेश किया जो सीबीआई डायरेक्टर को पांच साल का एक्सटेंशन देता है. हालांकि अभी उनकी नियुक्ति दो साल के लिए होती है.
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