कर्नाटक की उन लड़कियों की दास्तां जिन्होंने चुकाई है हिजाब विवाद की क़ीमत

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- Author, इमरान क़ुरैशी
- पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
कर्नाटक में हिजाब विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने बँटा हुआ फ़ैसला दिया है और अब इस मामले की सुनवाई बड़ी बेंच करेगी.
एक ओर जहाँ जस्टिस हेमंत गुप्ता ने हिजाब पर पाबंदी के ख़िलाफ़ याचिका को ख़ारिज कर दिया, वहीं जस्टिस सुधांशु धूलिया ने याचिका को स्वीकार किया.
इन सबके बीच कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु से क़रीब 400 किलोमीटर दूर बसे उडुपी क़स्बे में पिछले 10 महीने से हिजाब के विवाद ने बहुत-सी छात्राओं की ज़िंदगियों में उथल-पुथल मचा रखी है.
लेकिन, वो इस मुद्दे पर कुछ भी बोलने से बचती हैं क्योंकि उन्हें डर है कि बोलने पर उन्हें इसका ख़तरनाक अंजाम भुगतना पड़ सकता है.
उडुपी और उसका जुड़वाँ शहर मणिपाल, अरब सागर के किनारे आबाद हैं. दोनों शहरों को तटीय कर्नाटक में शिक्षा का बड़ा केंद्र माना जाता है.
पिछले साल पहली बार यहाँ हिजाब विवाद हुआ था.
तब उडुपी के एक प्री-यूनिवर्सिटी गवर्नमेंट कॉलेज की छह छात्राओं ने कॉलेज के मैनेजमेंट की ओर से हिजाब पहने बग़ैर कक्षाओं में उपस्थित होने के फ़ैसले का विरोध किया था.
छात्राओं के ख़िलाफ़ फ़ौरन ही बहुत से छात्रों ने भगवा गमछा पहनकर अपना विरोध जताया था. उस टकराव का असर आज भी नज़र आता है, भले ही ये उतने खुले रूप में ना हो.
मार्च में कर्नाटक हाई कोर्ट ने जब इस विवाद पर अपना फ़ैसला सुनाया था. उसके बाद से हिजाब पहनने के लिए आवाज़ उठाने वाली छात्राओं ने ख़ामोशी अख़्तियार कर ली है.
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'हिजाब के लिए अपना शहर छोड़ा'
छात्राओं के वकीलों ने उन्हें सलाह दी थी कि वो इस विवाद पर मीडिया से बात न करें तो बेहतर होगा क्योंकि मामला अब सुप्रीम कोर्ट में है.
लेकिन हिजाब को लेकर हुए हंगामे और विरोध प्रदर्शनों ने बहुत-सी अन्य छात्राओं की ज़िंदगियों पर इस तरह से असर डाला है कि उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती है.
बहुत-सी छात्राओं ने अपना कॉलेज बदलकर उन संस्थानों में दाख़िला ले लिया, जहाँ हिजाब पहनकर आने की इजाज़त है या फिर कई छात्राओं ने तो हिजाब पहनने के लिए अपना शहर ही छोड़ दिया है.
ऐसी भी कई लड़कियाँ हैं जिन्होंने हिजाब के विवाद के चलते पढ़ाई ही छोड़ दी है. वहीं ऐसी छात्राओं की तादाद भी अच्छी ख़ासी है जिन्होंने पढ़ाई और आर्थिक वजहों से कक्षा में हिजाब उतारकर जाने का रास्ता चुना.
हिजाब विवाद के चलते बहुत-सी छात्राओं को भारी आर्थिक क़ीमत भी चुकानी पड़ी है और उन्हें गहरी ठेस भी पहुंची है.
एक छात्रा ने नाम न बताने की शर्त पर बीबीसी हिंदी से कहा, "नहीं, प्लीज़ हमें माफ़ कर दीजिए. हम इस मसले पर कुछ नहीं बोलना चाहते. अगर हमने खुलकर अपने दिल की बात कही तो पता नहीं हमें उसका क्या अंजाम भुगतना पड़ जाए. हम अपनी पढ़ाई पर ध्यान देना चाहते हैं."
एक सामाजिक कार्यकर्ता ने भी नाम न ज़ाहिर करने की शर्त पर बताया, "बहुत-सी छात्राओं को इस बात की चिंता है कि अगर उन्होंने कोई विवाद खड़ा करने वाली बात कह दी तो पूरे समुदाय के बीच उनका नाम ख़राब हो जाएगा. किशोर उम्र की लड़कियों की ज़िंदगियाँ तलवार की धार पर लटकी हैं."
उन्होंने बताया, "अगर वो हिजाब उतारकर पढ़ने जाती हैं तो उन्हें अपने ही समुदाय के हमलों का सामना करना पड़ता है. उन्हें दूसरे समुदाय से भी समर्थन मिलने की कोई उम्मीद नहीं है. इसकी वजह भी जगज़ाहिर है."

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सामाजिक रिश्ते
हालाँकि, हिजाब को लेकर इस घबराहट के दौरान कई लड़कियों को ऐसी दोस्त मिली है जिन पर इस बात से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि वो हिजाब पहनती हैं या फिर उन्होंने हिजाब पहनना छोड़ दिया है.
डॉक्टर जी. शंकर गवर्नमेंट कॉलेज की एक छात्रा आयशा रिफ़ा ने बीबीसी हिंदी को बताया, "मेरे बहुत से हिंदू दोस्त हैं. वो मुझसे बहुत नरमी से पेश आते हैं. बहुत दोस्ताना बर्ताव करते हैं. वो तो मुझे आगाह भी करते हैं कि दो कक्षाओं के बीच कब मुझे शॉल ओढ़नी है और कब नहीं."
आयशा रिफ़ा ने हमेशा ख़ास लड़कियों के स्कूल में पढ़ाई की है और जब उन्होंने एम. कॉम की पढ़ाई शुरू की, तो भी रिफ़ा ने महिलाओं का कॉलेज ही चुना.
जब हाई कोर्ट ने अपने फ़ैसले से नियम तय कर दिए तो रिफ़ा ने हिजाब छोड़ने का फ़ैसला किया जिसे वो मिडिल स्कूल के समय से पहनती आ रही थीं. क्योंकि उनकी पसंद का पोस्ट ग्रेजुएट कोर्स सिर्फ़ एक कॉलेज में उपलब्ध था.
बैचलर कोर्स की पढ़ाई कर रही एक और छात्रा को भी अपने दोस्तों से कोई शिकवा नहीं था. ये छात्रा भी अपने समुदाय के विरोध के चलते, अपना नाम नहीं ज़ाहिर करना चाहती थी.
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अपनी एक पारिवारिक दोस्त के घर पर बीबीसी से बात करते हुए उस छात्रा ने कहा, ''हम छुट्टियों पर साथ-साथ बाहर घूमने जाते हैं. जब हम हिजाब पहनकर पढ़ने जाते थे, तब भी उनका बर्ताव सामान्य था. जब हमने हिजाब हटाए तो भी उनके व्यवहार में कोई तब्दीली नहीं आई. हमारी दोस्ती वैसी ही बनी रही.''
हालाँकि सभी लड़कियों की दास्तान ऐसी ख़ुशनुमा नहीं है.
एक अन्य लड़की ने नाम न बताने की शर्त पर बीबीसी से कहा, "हिजाब के विवाद के बाद, जब हम जैसी लड़कियाँ बिना हिजाब के पढ़ने आती रहीं तो कोई हमसे बात नहीं करता था. मुझे ये देखकर सदमा लगा कि हमारे हिंदू दोस्त हमसे भेदभाव करते थे और उन्होंने हमसे दूरी बना ली थी."
इस लड़की को भी ये डर था कि अगर उसने अपना नाम बताया तो कहीं उसका अंजाम बुरा न हो.
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हिजाब विवाद की आर्थिक क़ीमत
हिजाब विवाद के बाद जिन लड़कियों ने अपने सिर से पिन लगे दुपट्टे नहीं हटाने का फ़ैसला किया, उन्हें इसकी भारी आर्थिक क़ीमत चुकानी पड़ी है.
ग्रेजुएशन की पढ़ाई कर रही एक छात्रा ने कहा, "हमने अपने पूरे साल की फ़ीस और इम्तिहानी फ़ीस भी जमा कर दी थी. लेकिन, हमें उसका नुक़सान हो गया क्योंकि हमें ट्रांसफ़र सर्टिफ़िकेट लेकर दूसरे कॉलेज या दूसरे शहर में दाख़िला लेना पड़ा."
उस छात्रा ने कहा- हमें वो फ़ीस गँवानी पड़ी और नए कॉलेज को फिर से उतनी ही रक़म चुकानी पड़ी ताकि हमें दाख़िला मिल जाए.

छात्रा ने बताया कि ''ये तो तब है जब सही मायनों में हाई कोर्ट का ये फ़ैसला हमारे ऊपर लागू ही नहीं होता था. हम कोर्ट इसलिए नहीं गए क्योंकि हमने उस कॉलेज में कई साल तक पढ़ाई की थी. हम अपने अध्यापकों और संस्थान के प्रति कृतघ्न नहीं होना चाहते थे.''
छात्रा ने अपना नाम इसलिए नहीं बताया क्योंकि उन्हें डर था कि कहीं उसकी डिग्री न छिन जाए.
उन्होंने कहा, "हमारे अध्यापकों ने हमें बहुत प्यार दिया और पढ़ाया. प्रिंसिपल और दूसरे अध्यापकों ने हमसे कहा कि तुम बिना हिजाब के पढ़ने आओ. हाँ, पैसे के मामले में ये हमारे माँ-बाप के लिए मुश्किल भरा फ़ैसला था. लेकिन, हमारे पास दो ही विकल्प थे. या तो हम इतने बरसों की पढ़ाई से हासिल फ़ायदे को छोड़ दें या फिर हिजाब पहनने के निजी चुनाव से समझौता कर लें. हमने शहर छोड़ने का फ़ैसला किया."
ये उन छात्राओं का कहना है, जो मध्यम वर्ग या उच्च मध्य वर्ग से ताल्लुक़ रखती हैं. एक कहानी एक ऑटो रिक्शा चलाने वाले की बेटी की है जो हिजाब पहनकर अपनी पढ़ाई जारी रखने का मज़बूत इरादा रखती हैं.

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सलिहाथ कॉलेज में बी. कॉम फ़र्स्ट ईयर की छात्रा ज़िफ़ा नाज़ ने बताया, "मैंने अपना कॉलेज हिजाब विवाद के चलते बदला. हमारे कॉलेज में कुछ भी नहीं हुआ था. जब हाई कोर्ट ने हिजाब पर पाबंदी का आदेश दिया तो उसे हमारे कॉलेज में भी लागू किया गया. जैसे ही ये आदेश मैंने वॉट्सऐप पर देखा तो मैंने कॉलेज जाना छोड़ दिया. मैं फ़ाइनल का इम्तिहान भी नहीं दे पाई. मेरी पूरे साल की पढ़ाई बर्बाद हो गई और अब मुझे फ़र्स्ट ईयर के कोर्स की फिर से पढ़ाई करनी पड़ रही है."
ज़िफ़ा ने कहा- ''जी. शंकर कॉलेज में मैंने तीन हज़ार रुपए की फ़ीस भरी थी जिसे वापस कर दिया गया था. लेकिन यहाँ मुझे दाख़िले के लिए 26 हज़ार रुपए देने पड़े जिसमें आने-जाने के लिए 11 हज़ार रुपए का किराया भी शामिल है.''
ज़िफ़ा ने बताया कि ''पुराने कॉलेज में मैं अपने घर से पैदल ही चली जाती थी क्योंकि वो बहुत पास था. यहाँ तो मुझे बस से ही जाना पड़ता है क्योंकि ये शहर से काफ़ी दूर है. कॉलेज मैनेजमेंट ने मुझे फ़ीस में पाँच प्रतिशत की छूट दी है और मेरे पिता को इस बात की रियायत भी मिली है कि वो किस्तों में फ़ीस अदा कर सकें.''
फिर भी ज़िफ़ा ख़ुद को ख़ुशक़िस्मत मानती हैं. उनके पुराने कॉलेज की जिन 17 छात्राओं ने हिजाब विवाद की वजह से ट्रांसफ़र सर्टिफ़िकेट लिए, उनमें से ज़्यादातर को दूसरे कॉलेज में दाख़िला लेकर अपनी पढ़ाई जारी रखने का मौक़ा मिल गया.
ज़िफ़ा बड़े दु:ख के साथ कहती हैं- अब तीन से चार छात्राएँ ही उस कॉलेज में जा रही हैं क्योंकि वो प्राइवेट कॉलेज में पढ़ाई की फ़ीस अदा करने की हैसियत नहीं रखती हैं.
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