कश्मीरी पंडितों का सवाल, मंदिरों की मरम्मत से क्या लौटेगा 90 के पहले का दौर

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- Author, माजिद जहांगीर
- पदनाम, बीबीसी हिन्दी के लिए, श्रीनगर से
कश्मीरी पंडित महाराज कृष्ण पंडिता श्रीनगर के एक मंदिर में चल रहे नवीनीकरण के काम से बहुत उत्साहित हैं.
उन्हें उम्मीद है कि इस तरह मंदिरों के नवीनीकरण से कश्मीर और कश्मीर से बाहर रहने वाले कश्मीरी पंडितों में एक नया विश्वास पैदा होगा और उन्हें धार्मिक शांति भी मिलेगी.
श्रीनगर के बाबडेम इलाक़े में स्थित मंगलेश्वर भैरव मंदिर में चल रहे काम के बारे में बीबीसी से बात करते हुए महाराज कृष्ण पंडिता बताते हैं, "जिस तरह आज इस मंदिर का नवीनीकरण हो रहा है, प्रशासन इसी तरह अगर हमारे दूसरे धार्मिक स्थलों के नवीनीकरण का काम हाथ में लेगा तो कश्मीर से बाहर रहने वाले कश्मीरी पंडित यहाँ आना शुरू करेंगे."
वो कहते हैं, "मंदिरों के नवीनीकरण और पुनर्निर्माण से काफ़ी फ़र्क़ पड़ सकता है. लोगों के दिलों में आस्था है. जो कश्मीरी पंडित कश्मीर से बाहर रहते हैं और पूजा-पाठ करने के लिए यहां नहीं आ पाते हैं, उन्होंने अपनी आस्था के वहाँ मंदिर बनाए हैं, आश्रम बनाए हैं."
''लेकिन यहां आने से मन को जो शांति मिलती है, मांगने से पूरा होता है, वह कश्मीर से बाहर उन कृत्रिम प्रतीकों से पूरा नहीं होता है."
वो बताते हैं, "हम सरकार से विनती करते हैं कि हमारे इन धर्म स्थलों पर ध्यान दिया जाए. मैं उन समितियों से भी आग्रह करता हूं कि वे कश्मीर आकर प्रशासन से संपर्क करें."
महाराज कृष्ण सामाजिक विकास संस्थान के जनरल सेक्रेटरी हैं और यह संस्था कश्मीर में कश्मीरी पंडितों के धर्म स्थलों के जीर्णोद्धार करने का काम करती है.
महाराज कृष्ण पंडिता नब्बे के दशक में कश्मीर घाटी से पलायन कर चुके हैं और अभी जम्मू में रहते हैं.
मंगलेश्वर भैरव मंदिर का नवीनीकरण
मंगलेश्वर भैरव मंदिर के नवीनीकरण का काम रोड्स एंड बिल्डिंग्स विभाग कर रहा है. विभाग के अधिकारियों का कहना है कि इस प्रोजेक्ट पर 1. 60 करोड़ रुपए ख़र्च होंगे.
रोड्स और बिल्डिंग्स विभाग के सुपरवाइज़र गुलज़ार अहमद ने बीबीसी से कहा, "सात सौ साल पुराने इस मंदिर को अपने असल रूप में बनाया जा रहा है. हमें उम्मीद है कि अगले तीन महीनों में इसका काम पूरा होगा."
गुलज़ार के मुताबिक़ वर्ष 2014 के विनाशकारी बाढ़ से इस मंदिर को काफ़ी नुक़सान पहुंचा था.

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ये मंगलेश्वर भैरव मंदिर बाबडेम झील के बीच में स्थित है और मंदिर तक जाने के लिए शिकारा में बैठना पड़ता है.
मंदिर की निगरानी करने वाले रियाज़ अहमद कहते हैं कि इस मंदिर का नवीनीकरण करने से मंदिर के अंदर भी घंटा बज सकता है.
उनका ये भी कहना था कि जिस तरह मस्जिद में सुबह सवेरे अज़ान होती है या गुरुद्वारा में पाठ पढ़ा जाता है उसी तरह इस मंदिर में भी पूजा हो सकती है. वो बताते हैं कि यहां हिन्दू, मुसलमान और सिख हमेशा से एक साथ रहते आए हैं.

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वर्ष 1989 में कश्मीर घाटी में भारत विरोधी चरमपंथी गतिविधियों के शुरू होने के बाद कई कश्मीरी पंडितों की चरमपंथियों ने हत्या कर दी थी.
इन हत्याओं के बाद कश्मीरी पंडितों ने पलायन किया और कुछ ही कश्मीरी पंडित घाटी में बाक़ी रह गए.
1990 के पहले की रौनक़ लौटेगी?
कश्मीर में रहने वाले कुछ पंडित कहते हैं कि मंदिरों में नवीनीकरण तो अच्छी बात है, लेकिन साथ ही वह ये भी पूछते हैं कि क्या मंदिरों के जीर्णोद्धार से 1990 से पहली वाली रौनक़ लौट आ सकती है?
कश्मीरी पंडित संघर्ष समिति (केपीएसएस) के अध्यक्ष संजय टिक्कू ने बीबीसी के साथ बातचीत में कहा, "बीते डेढ़ दशक में कश्मीर में काम करने वाली कुछ समितियों ने अपने-अपने मंदिरों का नवीनीकरण कर उन्हें दोबारा खोला, कुछ मंदिरों का सरकार ने नवीनीकरण कर उन्हें खोला.''
''लेकिन अगर आप मुझसे पूछेंगे कि क्या ऐसा करने से मंदिरों में फिर से वही रौनक़ लौट आएगी, जो 90 के दशक से पहले हुआ करती थी तो मुझे नहीं लगता कि ऐसा होगा."

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'नवीनीकरण के बजाय श्रीनगर में कश्मीरी पंडितों के लिए कॉलोनी बने'
लेकिन ऐसा क्यों नहीं होगा, इस सवाल का जवाब देते हुए वो कहते हैं, "जहाँ-जहाँ ये मंदिर थे, वहाँ कश्मीरी पंडित रहते थे. वह कश्मीरी पंडित हर दिन सुबह शाम उन मंदिरों में जाकर पूजा करते और उन मंदिरों की रखवाली भी वही करते थे. लेकिन अब जहां-जहां मंदिरों का नवीनीकरण किया गया है, मुझे नहीं लगता कि वहां कोई कश्मीरी पंडित रहता है."
वह आगे कहते हैं, "जिस तरह से नवीनीकरण को बढ़ा-चढ़ा कर पेश किया जा रहा है, बड़ा बजट दिखाया जा रहा है, क्या हक़ीक़त में इतना पैसा मंदिरों के नवीनीकरण पर ख़र्च भी किया गया है? हम आने वाले दिनों में आरटीआई के ज़रिए इसका जवाब मांगने जा रहे हैं."
संजय टिक्कू बताते हैं कि नवीनीकरण करने के बजाय बेहतर यह होता कि पहले श्रीनगर में ऐसी कॉलोनी बनाई जाती, जहाँ कश्मीरी पंडित आकर रहने लगते और फिर वहाँ मंदिरों का नवीनीकरण किया जाता जिससे मंदिरों की आस्था फिर से क़ायम हो जाती.

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लोगों में अब भी असुरक्षा की भावना
संजय टिक्कू उन कश्मीरी पंडितों में हैं जो कभी कश्मीर घाटी छोड़कर नहीं गए.
कश्मीरी पंडित संघर्ष समिति (केपीएसएस) के मुताबिक़, कश्मीर में कुल 1774 मंदिर हैं. समिति का कहना है कि क़रीब नब्बे प्रतिशत मंदिरों में तोड़-फोड़ की गई थी या जला दिए गए थे और पांच प्रतिशत मंदिर सुरक्षाबलों के क़ब्ज़े में हैं. समिति के मुताबिक़, केवल पांच फीसदी मंदिर ऐसे हैं, जहां पंडित रहते हैं.
टिक्कू का कहना है कि विभिन्न समितियों ने अब तक कुल पैंतीस मंदिरों का नवीनीकरण किया है.
उन्होंने बताया, "मेरे घर के पास भी मंदिर हैं, लेकिन आज हम वहां खुल के जा भी नहीं पाते हैं. सबसे पहले हम निशाने पर हैं. पुलिस की एडवाइज़री है कि हम सुबह नौ बजे से पहले घर से न निकलें और शाम पांच बजे से पहले घरों के अंदर वापस चले जाएँ. तो आप मुझे बताएं कि सवेरे और शाम की पूजा कहां होगी?"

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स्थानीय नागरिकों के सहयोग से बने मंदिर
बीते दो वर्षों में कश्मीर में कई कश्मीरी पंडितों को निशाना बनाकर मारा गया है. इस वजह से कश्मीर में रहने वाले कश्मीरी पंडितों में एक ख़ौफ़ का माहौल है.
पुलिस ने इन हत्याओं के लिए चरमपंथियों को ज़िम्मेदार ठहराया है.
हाल के दिनों में सीमावर्ती ज़िले कुपवाड़ा के टेटवाल में भी एक मंदिर का जीर्णोद्धार किया गया है. इस मंदिर का नाम शारदा यात्रा मंदिर है. इस मंदिर का ऑनलाइन उद्घाटन भारत के गृहमंत्री अमित शाह ने किया था.

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इस मंदिर के इंचार्ज और सेवा शारदा कमेटी के चेयरमैन रविंदर पंडिता ने मीडिया को बताया कि इस मंदिर को वर्ष 1947 में क़बाइली हमले में जलाया गया था और अब उसी जगह पर एक मंदिर और एक गुरुद्वारा भी बनाया गया है.
पंडिता का कहना था कि स्थानीय लोगों का इस पुनर्निर्माण में काफ़ी साथ रहा. टेटवाल में ही रहने वाले एक स्थानीय नागरिक एजाज़ अहमद ने बताया कि उन्हें इस बात की ख़ुशी है कि उन सब लोगों ने मिलकर इस मंदिर को दोबारा बनाया है.
एजाज़ अहमद के मुताबिक़ उन लोगों ने मिलकर डेढ़ साल में एक मंदिर और एक गुरुद्वारा बनाया.

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कई मंदिर अब भी जीर्णोद्धार के इंतज़ार में
श्रीनगर के हब्बा कदल में भी स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के तहत एक मंदिर का नवीनीकरण किया जा रहा है.
इस इलाक़े में कश्मीरी पंडितों की एक बड़ी संख्या रहती थी. इस इलाक़े में मुसलमानों की भी अच्छी ख़ासी आबादी है.
लेकिन श्रीनगर और श्रीनगर से बाहर ऐसे कई मंदिर देखे जा सकते हैं, जो ख़स्ताहाल हैं और उनमें किसी तरह का नवीनीकरण आज तक नहीं किया गया है.

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श्रीनगर के रैनावारी में अमर कौल नाम का मंदिर आज भी ख़स्ता हालत में है. इस मंदिर के एक हिस्से को वर्ष 1994 में जला दिया गया था और इसका आज तक जीर्णोद्धार नहीं किया गया है.

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हालाँकि, इस मंदिर में एक स्थानीय कश्मीरी पंडित रतन लाल कौल पुजारी और केयरटेकर के रूप में काम करते हैं. क़रीब तेरह वर्ष पहले मंदिर की समिति ने इसे दोबारा खोलने का फ़ैसला किया था.
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