ईरान के सेबों से परेशान कश्मीर के किसान, गिरे फल के दाम

कश्मीरी सेब

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    • Author, माजिद जहांगीर
    • पदनाम, बीबीसी हिन्दी के लिए, श्रीनगर से

कश्मीर में सेब के उत्पादन में इस वर्ष रिकॉर्ड वृद्धि देखने को मिली है, लेकिन बाज़ार में इसकी क़ीमतों में तेज़ी से गिरावट देखी जा रही है.

श्रीनगर-जम्मू राष्ट्रीय राजमार्ग पर गाड़ियों की लगी लंबी क़तारों की वजह से सेब मंडियों में देर से पहुंच रहे हैं. राजमार्ग पर लग रहा लंबा वक़्त, इनके सड़ने या बुरी अवस्था में मंडियों में पहुंचने की वजह तो बन ही रहा है, ये इनकी क़ीमतों को भी प्रभावित कर रहा है.

लेकिन इन दिनों बाज़ार में कश्मीर के सेब के दामों में आई गिरावट की मुख्य वजह सिर्फ़ यही नहीं है. कश्मीर के किसानों और व्यापारियों का कहना है कि ईरान से आ रहे सेब, कश्मीर के सेबों की गिरती क़ीमतों का असली कारण हैं.

असल में, बीते एक वर्ष से भारतीय बाज़ार में ईरान से सेब आ रहे हैं. इसके बाद से ही कश्मीर के सेब किसानों, व्यापारियों में मायूसी की लहर छाई हुई है.

इस साल फ़रवरी के महीने में भी कश्मीर के सेब व्यापारियों और किसानों ने इस पर अपनी चिंता ज़ाहिर करते हुए भारत सरकार से इस बाबत ध्यान देने का आग्रह भी किया था.

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श्रीनगर के परिमपोरा फल मंडी में अपने सेबों की पेटियां क़रीने से रख रहे किसान फ़ारूक़ अहमद राठेर का परिवार वहां के हार्वन इलाक़े में दशकों से इस फ़सल (सेब) को उगाता आया है. उन्हें अब इस बात की काफ़ी चिंता है कि ईरान से भारत आ रहा सेब उनके फ़सल की बाज़ार को खाता जा रहा है.

फ़ारूक़ अहमद के मुताबिक़, उनके बाग़ों में क़रीब 4,000 सेब की पेटियों की पैदावार हो जाती है.

वे कहते हैं, "कस्टम ड्यूटी अदा किए बग़ैर ईरान से सेब भारत की मंडियों में आ रहे हैं. अगर ये सिलसिला जारी रहा तो हमें बड़े नुक़सान का सामना करना पड़ेगा."

फ़ारूक़ कहते हैं, "जिस तरह अमेरिका के माल पर कस्टम ड्यूटी लगाई जाती है, उसी तरह ईरान के सेब पर भी लगनी चाहिए. जब टैक्स लगेगा तो नतीजा ये होगा कि ईरान का सेब न यहां कम क़ीमतों में पहुंचेगा और न ही सस्ते में मिलेगा. उस स्थिति में हमें भी सेब की बेहतर क़ीमतें मिलेंगी."

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* कश्मीर में सेब के उत्पादन में इस वर्ष काफ़ी वृद्धि दर्ज की गई है.

* लेकिन सेब की क़ीमतों में 40 फ़ीसदी की रिकॉर्ड गिरावट दर्ज की गई है.

* इसका मुख्य कारण ईरान से हो रहे सेब के आयात को बताया जा रहा है.

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किसानों ने लिखा पीएम मोदी को ख़त?

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बीते वर्ष कश्मीर के किसानों और व्यापारियों के संगठन 'द कश्मीर वैली फ्रूट ग्रोअर्स-डीलर्स यूनियन' ने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक पत्र में लिखा कि अफ़ग़ानिस्तान और दुबई से आने वाले ईरानी सेब पर फ़ौरन प्रतिबंध लगाया जाए.

इसमें लिखा गया था कि अगर ईरानी सेब को भारत के बाज़ार में आने से नहीं रोका गया, तो जम्मू-कश्मीर और हिमाचल में सेब की खेती पर निर्भर किसानों को भारी नुक़सान उठाना पड़ेगा.

साथ ही ये भी लिखा गया कि ईरानी सेब यहां के किसानों के लिए बड़ी तबाही साबित हो सकते हैं.

इस पत्र में इसका ज़िक्र भी किया गया कि कश्मीर के ग़रीब किसान वहां के कोल्ड स्टोर्स में अपनी सेब की फ़सल को रखते हैं, ताकि सीज़न ख़त्म होने के बाद वो इसे बेचकर अच्छी क़ीमतों का लाभ उठा सकें. लेकिन इस दौरान बाज़ार में ईरान के सेब आ जाते हैं, जिससे कश्मीर के सेब की क़ीमतें गिर जाती हैं.

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कश्मीर में फलों से जुड़े यूनियन का क्या है कहना?

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बीबीसी हिंदी से बातचीत में द कश्मीर वैली फ्रूट ग्रोअर्स-डीलर्स यूनियन के अध्यक्ष बशीर अहमद कहते हैं, "बीते साल से ईरान के सेब ने हमारे बाज़ार में बड़े स्तर पर पैर पसारने शुरू कर दिए हैं."

वे कहते हैं, "दरअसल, बीते साल से ही कश्मीर के सेब की क़ीमतों में गिरावट आना शुरू हो गई. बीते साल दिवाली के बाद ईरानी सेब का भारत में आने का बड़ा सिलसिला शुरू हुआ. ईरान का सेब पहले भी आता था, लेकिन बहुत कम. कम संख्या में ईरान से सेबों के आने से हमारे उत्पादों पर इसका कोई ख़ास असर नहीं पड़ता था. हमारी फ़सल कम होती थी, तो भी हमें अच्छी क़ीमत मिल जाया करती थी. लेकिन बीते वर्ष ईरान के सेब बड़ी मात्रा में आए तो उसका हमारे उत्पाद की क़ीमत पर प्रतिकूल असर पड़ा."

वे कहते हैं, "इस साल सेब की पैदावार बीते वर्ष से भी अच्छी है. लेकिन ईरान के सेब इसी तरह आते रहे तो कश्मीर के सेब के किसान बर्बाद हो जाएंगे."

बशीर अहमद कहते हैं, "ईरान के सेब पहले अफ़ग़ानिस्तान और दुबई से भारत आते थे, लेकिन अब ये वाघा बॉर्डर से भी आ रहे हैं. उनका कहना था कि इस बात की जानकारी नहीं है कि वाघा से भारत में कैसे पहुंचाए जा रहे हैं."

वे कहते हैं, "ईरान से सेब बग़ैर टैक्स दिए भारत में पहुंच रहे हैं, जबकि कश्मीर के सेब व्यापारियों को टैक्स देना पड़ रहा है."

बशीर अहमद कहते हैं, "ईरानी सेबों की वजह से न केवल कश्मीरी सेब के बाज़ार गिरे हैं बल्कि हिमाचल के सेब की क़ीमतें भी गिरी हैं."

बशीर बताते हैं कि ईरान के सेब की भारत की मंडियों में इस तरह पहुंचने का यूनियन ने विरोध किया, भारत के कृषि मंत्री से भी मिले, लेकिन ज़मीन पर उसका कोई असर नहीं दिखा.

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किसान की चिंता, नेता भी चिंतित

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कुलगाम से सेब के एक अन्य किसान शब्बीर अहमद डार का कहना था, "जब से बीते साल ईरानी सेब की ख़बर हमने सुनी, तब से ही हमें अपने सेब उद्योग का भविष्य ख़तरे में दिखने लगा."

हर साल शब्बीर अहमद के बाग़ों से तीन से चार हज़ार डिब्बे सेब की पैदावार होती है. शब्बीर को डर है कि अगर ईरानी सेबों पर प्रतिबंध नहीं लगाया गया, तो आने वाले समय में कश्मीर के किसान सेब का धंधा छोड़ देंगे.

उनका ये भी कहना था, "बीते एक साल में ये साबित हो गया कि ईरानी सेब ने हमें सौ प्रतिशत नुक़सान पहुंचाया है."

कश्मीर के राजनीतिक दलों के नेताओं ने भी ईरानी सेबों के ग़ैर-क़ानूनी रूप से देश में आने पर चिंता जताई है. नेशनल कॉन्फ्रेंस के प्रवक्ता इमरान नबी डार ने बताया कि सरकार को चाहिए कि वह ईरानी सेब पर कस्टम टैक्स लगाए.

इसी वर्ष फ़रवरी में इमरान नबी डार ने बताया था कि क़रीब तीन करोड़ सेब के डिब्बे कश्मीर में पड़े हैं, जो बाज़ार में ईरानी सेबों के आने से बिक नहीं पाए.

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उत्पादन बढ़ा, पर क़ीमत नहीं

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कई किसान बताते हैं कि बाज़ार में अब तक सेब की क़ीमतें गिरी हुई हैं.

फ़ारूक़ अहमद राठेर कहते हैं, "बाज़ार बहुत डाउन चल रहा है. जो पेटी बीते वर्ष तक हज़ार रुपये में बिक रही थी उसकी इस वर्ष साढ़े छह सौ रुपये ही मिल रहे हैं."

वे कहते हैं, "ऐसे कई किसान हैं जिनका गुज़र बसर पूरी तरह सेब की फ़सल पर ही निर्भर है. उनके पूरे साल का ख़र्च सेब की कमाई पर ही आश्रित है."

फ़ारूक़ अहमद कहते हैं, "सेब के पैकिंग की क़ीमत 30 से 40 प्रतिशत तक बढ़ गई है. लेकिन सेब की क़ीमतें नहीं बढ़ रहीं. यानी इसके उत्पादन पर लागत तो बढ़ गई पर उत्पाद की उचित क़ीमत नहीं मिल रही."

उनका कहना है कि "ईरान के सेबों ने भारतीय बाज़ार पर हाथ डालना शुरू कर दिया है. ये चिंता की बात और चेतावनी भी है."

वीडियो कैप्शन, कश्मीर में लाल-लाल सेब से लदे बागान तैयार
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उत्पादन बढ़ने से भी कम हैं क़ीमत

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जानकारों के मुताबिक़, वर्ष 2021 के मुक़ाबले इस वर्ष कश्मीर में 25 से 30 प्रतिशत सेब का उत्पादन बढ़ गया है.

बीते वर्षों में कश्मीर में लोगों ने धान के खेतों पर सेब के बाग़ बनाने शुरू कर दिए हैं. उसकी वजह ये बताई जा रही है कि धान की फ़सलों से उन्हें कोई ख़ास मुनाफ़ा नहीं मिलता था, जिसके कारण लोगों ने सेब के बाग़ बनाने शुरू कर दिए.

2015 में जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन मुख्यमंत्री मुफ़्ती मोहम्मद सईद ने 'हाई डेंसिटी सेब प्रॉडक्ट' का कश्मीर से परिचय कराया. तब से वहां किसानों ने हाई डेंसिटी के बाग़ बनाने शुरू कर दिए.

ये हाई डेंसिटी के सेब के पेड़ बहुत कम समय में फ़सल देने लगते हैं.

बशीर अहमद कहते हैं, "पैदावार तो बढ़ी लेकिन इसके उत्पादन की लागत भी बढ़ गई. ये लागत इस बार तो बीते वर्ष की तुलना में दोगुनी हो गई है."

वे कहते हैं, "पेस्टिसाइड्स (कीड़ों से बचाने के लिए सेबों पर छिड़के जाने वाला केमिकल) की क़ीमतें भी बढ़ रही हैं. बीते साल सरकार ने कार्डबोर्ड पर 12% जीएसटी लगाया था, जो इस बार 18% है. एक तरफ़ उत्पादन पर लागत बढ़ी तो दूसरी ओर पैदावार भी बढ़ गई. अगर मंडी में हर दिन 500 गाड़ियां सेब आएंगी, तो मांग बढ़ेगी लेकिन गाड़ियों की संख्या 1,500 से अधिक हो, तो डिमांड-सप्लाई का अनुपात बिगड़ जाएगा और इससे क़ीमतें गिरेंगी ही."

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कितना बड़ा है कश्मीर का सेब उद्योग?

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इन दिनों रोज़ सेब से लदे 1,500 ट्रक कश्मीर से भारत की विभिन्न मंडियों तक पहुंच रहे हैं. आने वाले दिनों में इनकी संख्या 3,000 तक पहुंचने की संभावना जताई जा रही है.

कश्मीर की 80 प्रतिशत आबादी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से सेब उद्योग से जुड़ी है. यहां इस उद्योग से लाखों लोगों को रोज़गार मिलता है.

10 हज़ार करोड़ का कश्मीर सेब उद्योग इस बार 25 लाख टन फ़सल की उम्मीद कर रहा है. साल 2021 में कश्मीर के सेब उद्योग ने 21 लाख टन सेब का रिकॉर्ड उत्पादन किया था.

श्रीनगर-जम्मू राष्ट्रीय राजमार्ग

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इमेज कैप्शन, श्रीनगर-जम्मू राष्ट्रीय राजमार्ग पर आश्वासन देने के बाद भी ट्रकों को रोका जा रहा है.
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जम्मू-श्रीनगर एनएच पर रुके हैं ट्रक

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कश्मीर के सेब व्यापारियों का कहना है कि बीते कई दिनों से उनकी गाड़ियां श्रीनगर-जम्मू राष्ट्रीय राजमार्ग पर रुकी हैं, जिसकी वजह से गाड़ियों में सेब ख़राब होने लगते हैं. ऐसे में मंडियों तक पहुंचने पर उनकी क़ीमत और गिर जाती हैं.

राजमार्ग पर गाड़ियों को रोके रखने पर कश्मीर के सेब व्यापारियों ने हाल के दिनों में कश्मीर की मंडियों में प्रदर्शन भी किए थे. यूनियन के मुताबिक़, सरकारी आश्वासन के बाजवूद ज़मीन पर कुछ नज़र नहीं आ रहा है.

ट्रैफ़िक पुलिस के आला अधिकारियों ने सेब के ट्रकों को किसी रुकावट के बिना आगे बढ़ने के निर्देश जारी किए थे.

कश्मीर ज़ोन के बागवानी के निदेशक ग़ुलाम रसूल मीर ने बताया कि आश्वासन दिए जाने के बाद भी राजमार्ग पर ट्रकों को रोका जा रहा है और ईरानी सेब के मुद्दे पर केंद्र सरकार कुछ कह सकती है, वो कुछ नहीं कह सकते.

दरअसल, श्रीनगर-जम्मू राजमार्ग पर बीते कई वर्षों से मरम्मत का काम चल रहा है. इसकी वजह से बड़ी गाड़ियों को हर रोज़ पास नहीं करवाया जाता है.

बीते चार वर्षों से कश्मीर के सेब उद्योग को लगातार नुक़सान उठाना पड़ रहा है. 2019 में जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद-370 हटाए जाने के बाद कश्मीर लंबे समय तक बंद रहा और किसान अपने बाग़ों की सही से देखभाल नहीं कर सके. इसके बाद अगले दो सालों (2020 और 2021) में कोविड की वजह से किसानों की फ़सल पर असर पड़ा.

शब्बीर अहमद कहते हैं, "इन सब के बावजूद असली ख़तरा तो ईरानी सेब हैं. राजमार्ग पर गाड़ियों को रोकने का मसला हो या दूसरा मामला, सब हल हो जाएगा. लेकिन ईरानी सेबों को अगर नहीं रोका गया, तो वो दिन दूर नहीं, जब कश्मीर के सेब उद्योग को बुरे दिन देखने पड़ेंगे."

वीडियो कैप्शन, COVER STORY: जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 हटने के तीन साल बाद रोज़गार का हाल

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