कश्मीर में ख़त्म हुआ सिनेमा का तीन दशक लंबा 'इंटरवल'

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- Author, रियाज़ मसरूर
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, श्रीनगर से
वालिद फ़ारूक़ जब आठ साल के थे, तब 1990 में कश्मीर में पाकिस्तान समर्थित सशस्त्र विद्रोह भड़क उठा था. चरमपंथियों ने घाटी के कई सिनेमा हॉल पर हमले किए, जिससे वहाँ के सभी सिनेमा हॉलों को बंद करने को मजबूर होना पड़ा.
कॉलेज के अपने दिनों में वालिद अक्सर अपने बड़े-बुज़ुर्गों से सिनेमा हॉल और वहाँ टिकट लेकर फ़िल्में देखने के उनके अनुभव के बारे में सुना करते थे.
वालिद कहते हैं, "मैं यक़ीन नहीं कर सकता कि मैं किसी सिनेमा हॉल में कोई फ़िल्म देख रहा हूँ. घाटी में हिंसा के कारण सिनेमा हॉल जब बंद हुए तब मैं बच्चा था. मेरे बड़े-बुज़ुर्ग थिएटर जाने के अपने अनुभव हमसे साझा किया करता थे. और मुझे हमेशा इस बात का मलाल होता था कि काश और बड़े होते तो उनके साथ सिनेमा देखने जा पाते. नई पीढ़ी सिनेमा को बहुत चाहती है और उनके पास मौक़ा होगा कि वे थिएटर जाकर फ़िल्म का लुत्फ़ ले सकें."
वालिद उन गिने-चुने लोगों में से हैं, जिन्होंने मंगलवार को जम्मू और कश्मीर के उप-राज्यपाल मनोज सिन्हा द्वारा उद्घाटन किए गए एक आधुनिक मल्टीप्लेक्स में आमिर ख़ान की हालिया रिलीज़ फ़िल्म लाल सिंह चड्ढा देखी. आम लोगों के लिए इस मल्टीप्लेक्स को 30 सितंबर से खोल दिया जाएगा.
1990 में चरमपंथी विद्रोह घाटी में जब फूटा, तब सिनेमा हॉलों को निशाना बनाया गया, जिससे मजबूर होकर सिनेमा हॉलों को बंद करना पड़ा.
इसके बाद प्रशासन ने कई प्रयास किए कि इन्हें फिर से खोला जाए, लेकिन ऐसा हो न सका. पिछले 33 सालों में यह पहली बार है जब श्रीनगर में कोई सिनेमा हॉल खोला गया है. यह आधुनिक मल्टीप्लेक्स शहर के हाई सिक्योरिटी ज़ोन में खोला गया है.

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'शांति बहाल होगी, ख़रीदी नहीं जाएगी'
राज्य के उप-राज्यपाल मनोज सिन्हा ने 1990 के बाद कश्मीर में शासन करने वाले नेताओं पर क़रारा प्रहार किया है.
उन्होंने कहा, "कश्मीर किसी भी प्रकार के मनोरंजन से वंचित रहा है. यहाँ जो लोग राज करते रहे, वे तो देश के बड़े शहरों में या विदेश जाकर छुटि्टयाँ बिताते रहे, लेकिन उन्होंने आम लोगों के हित में मनोरंजन उद्योग को फिर से खड़ा करने के बारे में कभी नहीं सोचा. यह नए युग की शुरुआत है."
मनोज सिन्हा ने इस दौरान कश्मीर के सभी 10 ज़िलों में सिनेमा हॉल खोले जाने का एलान किया.
नए खुले मल्टीप्लेक्स के मालिक विकास धर कश्मीरी हिंदू हैं.
उन्होंने बीबीसी को बताया कि इस मल्टीप्लेक्स का खुलना, हिंसा से प्रभावित इस राज्य के तीन दशक बाद सामान्य होने का संकेत है.
उन्होंने कहा, "देश के कुछ ही शहर ऐसे हैं, जहाँ के मल्टीप्लेक्स डॉल्बी एटमॉस सहित नवीनतम तकनीक से लैस हैं. अब श्रीनगर भी उन चुनिंदा शहरों में शामिल हो गया है. इससे स्थानीय कलाकारों को अपनी सृजन प्रतिभा को समझने और उसका प्रदर्शन करने में मदद मिलेगी. "

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कश्मीर में पर्यटकों की वापसी या सांस्कृतिक केंद्रों का पुनर्जीवन, लंबे अरसे से संभव नहीं हो पा रहा था क्योंकि राज्य का माहौल सामान्य नहीं हो पा रहा था. लगभग सभी सरकार पर्यटकों के आगमन को सामान्य होते माहौल के संकेतक के तौर पर पेश करेंगी.
सामाजिक कार्यकर्ता अब्दुल क़यूम शाह ने बीबीसी को बताया, "सामान्य कामकाज या सांस्कृतिक गतिविधियों का राजनीतिकरण करने से समस्याएँ पैदा होती हैं. जब आप किसी चीज़ को चरमपंथियों के ख़िलाफ़ जीत के तौर पर पेश करते हैं, तो वे इसे निशाना बनाकर जवाब देते हैं.''
उनका मानना है कि सांस्कृतिक और आर्थिक गतिविधियों को राजनीति से अलग रखना चाहिए.
वे कहते हैं, ''रीगल सिनेमा को 1996 में दुबारा खोला गया था. उस समय के मुख्यमंत्री फारूक़ अब्दुल्ला ने इसे चरमपंथियों की हार के रूप में पेश किया था. लेकिन हफ़्ते भर के भीतर चरमपंथियों ने हॉल के भीतर एक हथगोला फेंका, जिसमें पाँच लोग मारे गए. हमें आर्थिक या सांस्कृतिक विकास से जुड़ी चीज़ों से राजनीतिक मकसद को जोड़ने से बचना चाहिए.''
उपराज्यपाल सिन्हा ने इसी चिंता का ज़िक्र अपने संबोधन में किया.
उन्होंने कहा, ''हम शांति ख़रीदने में नहीं, शांति क़ायम करने में यक़ीन करते हैं. हमारा सिद्धांत है कि हम गुनहगारों को नहीं छोड़ेंगे, लेकिन हम बेगुनाहों को तंग भी नहीं करना चाहते.''
जम्मू और कश्मीर की पहली फ़िल्म नीति का ज़िक्र करते हुए सिन्हा ने कहा कि स्थानीय युवाओं को इस नीति से काफ़ी फ़ायदा होगा.
बॉलीवुड और कश्मीर के बीच दशकों पुराने संबंध को याद करते हुए उपराज्यपाल ने एलान किया, ''हमने फिल्म सिटी के लिए ज़मीन की पहचान कर ली है और जल्द ही कश्मीर की एक फ़िल्म सिटी होगी.''
उन्होंने हिंदी फ़िल्मों के महान अभिनेता शम्मी कपूर को श्रद्धांजलि भी दी, जिन्होंने श्रीनगर की सुंदर डल झील और गुलमर्ग की बर्फ से ढकी ढलानों में अपनी अधिकांश फिल्में शूट की थी.
शम्मी कपूर के निधन के बाद उनकी इच्छा के अनुसार उनके शरीर के अवशेषों को डल झील में डाला गया था.

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कश्मीरमें सिनेमा हॉल का संकटग्रस्त इतिहास
ऐसा नहीं है कि कश्मीर की इंटरटेनमेंट इंडस्ट्री की मुसीबतें 1990 में शुरू हुई थीं. वहां के सिनेमा हॉल तो अपनी स्थापना के समय 1932 से ही मुसीबत में घिरे थे.
श्रीनगर के केंद्र में मौजूद लाल चौक पर 1932 में पहली बार पैलेडियम टॉकीज़ नामक सिनेमा हॉल खोला गया था.
रिटायर्ड ब्यूरोक्रेट और इतिहासकार ख़ालिद बशीर का कहना है कि 1947 में जब महाराजा हरि सिंह ने शेख अब्दुल्ला को राज्य का आपातकालीन प्रशासक नियुक्त कर दिया, तब से लंबे समय तक पैलेडियम टॉकीज़ फ़िल्मों का प्रदर्शन बंद कर दिया था.
वे कहते हैं, "अक्तूबर 1947 में, कश्मीर को जब उथल-पुथल के दौर में धकेला गया था, तब पैलेडियम में भारतीय सिनेमा की पहली ब्लॉकबस्टर फ़िल्म 'किस्मत'का प्रदर्शन चल रहा था. इस फ़िल्म में अशोक कुमार और मुमताज़ शांति मुख्य भूमिका में थे. पाकिस्तान के क़बायलियों के हमले के बाद, महाराजा हरि सिंह श्रीनगर छोड़कर जम्मू भाग गए और शेख अब्दुल्ला ने हमलावरों से लड़ने के लिए मोर्चा संभाल लिया. और तब पैलेडियम टॉकीज़ शेख अब्दुल्ला के आपातकालीन प्रशासन का एक बेस बन गया.''
पैलेडियम सिनेमा कश्मीर के राजनीतिक इतिहास में एक अहम स्थान रखता है. भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने पैलेडियम सिनेमा के सामने ही वह मशहूर वादा किया था कि सामान्य स्थिति बहाल होने के बाद कश्मीर की तक़दीर को तय करने के लिए जनमत संग्रह कराया जाएगा.
उन्होंने जब यह ऐतिहासिक वादा किया था, तब शेख़ अब्दुल्ला, नेहरू के बगल में ही खड़े थे. शेख़ इतने ख़ुश थे कि नेहरू से अपनी दोस्ती को बयान करने के लिए अमीर ख़ुसरो का एक मशहूर शेर पढ़कर सुनाया.
अमीर ख़ुसरो का वो यह शेर कुछ यूं था-
''मन तू शुदम तू मन शुदी(तू मैं, मैं तू हो गया), मन तन शुदम तू जान शुदी(मैं जिस्म हूं, तू रूह मेरी),
ताकस न गोयद बाद अज़ीन(कहने को अब है क्या बचा), मन दिगारम तू दिगारी(न तू मुझसे, न मैं तुझसे जुदा).''

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उस ऐतिहासिक रैली के बाद, शेख़ अब्दुल्ला ने पैलेडियम टॉकीज़ के सामने बने एक बड़े मंच से सालों तक कई बार लोगों को संबोधित किया.
1989 की गर्मी में घाटी में सशस्त्र विद्रोह के शुरू होते ही एक कम नामचीन समूह 'अल्लाह टाइगर्स' ने तुरंत सभी सिनेमा घरों और शराब की दुकानों को बंद करने का आदेश जारी किया.
कई सिनेमा हॉलों पर हथगोले भी फेंके गए, जिससे कश्मीर के सभी हॉल बंद हो गए.
पैलेडियम टॉकीज़, 1993 में लगे रहस्यमयी आग में जलकर ख़ाक हो गया और तब से यह खंडहर हो रखा है.
फ़िलहाल सुरक्षा बलों की बड़ी संख्या उस जर्जर पैलेडियम भवन में तैनात है. असल में, 90 के दशक में भारतीय सेना ने श्रीनगर के खय्याम सिनेमा, फिरदौस सिनेमा, शाह सिनेमा और शिराज़ सिनेमा की इमारतों पर नियंत्रण कर लिया था.
चरमपंथ शुरू होने के शुरुआती सालों में कश्मीर के कई सिनेमा हॉलों को कथित तौर पर पूछताछ केंद्र के रूप में इस्तेमाल किया गया.
अब जर्जर पड़े फ़िरदौस सिनेमा से सेना हटा ली गई है और ख़य्याम के मालिक ने इसे अस्पताल में बदल दिया है.
श्रीनगर के अलावा, अनंतनाग, बारामूला और सोपोर में भी कई सिनेमा हॉल थे. 1980 के दशक में सीमावर्ती शहर कुपवाड़ा में भी एक सिनेमा हॉल खोला गया था. ये सभी सिनेमा हॉल अब खंडहर हालत में पड़े हैं.

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नया मल्टीप्लेक्स क्या सफल हो पाएगा?
नए खुले मल्टीप्लेक्स के मालिक विकास धर को इससे बड़ी उम्मीद है, क्योंकि इसमें सभी नवीनतम तकनीकों का इस्तेमाल हुआ है.
वे कहते हैं, ''हमारे पास सिनेमा हॉल को मैनेज करने के लिए 60 लोग हैं. हम बेहतरीन गुणवत्ता की सेवा देना चाहते हैं.''
लेकिन श्रीनगर में कई लोग यह सवाल पूछ रहे हैं कि क्या यहां फ़िल्म देखने के लिए वैसी भीड़ जुट पाएगी, जैसी 1990 से पहले जुटा करती थी.
सिनेमा के एक प्रशंसक फिरदौस अहमद कहते हैं, ''नए सिनेमा हॉल के बाहर सेना की भारी क़िलेबंदी है और यह पॉश इलाक़े में स्थित है, जहां पुलिस और प्रशासन के शीर्ष अधिकारी रहते हैं. आम जनता को अभी भी इतना यक़ीन नहीं है कि वे सुरक्षा की चिंता ही न करें. वो इसलिए कि कश्मीर बहुत अप्रत्याशित सी जगह है.''
लोग आम तौर पर मनोरंजन को पसंद करते हैं, लेकिन पिछले 30 सालों में चरमपंथियों द्वारा अचानक ग्रेनेड से हमला कर देने का डर पैदा हुआ है. ऐसे में वे फ़िल्म देखने के लिए अभी कुछ हफ़्ते का इंतज़ार करना चाहते हैं.
पहले की सरकारों ने भी सिनेमा हॉल को फिर से खोलने के कई प्रयोग किए, लेकिन हिंसा और लोगों की ख़राब आमद के चलते वे प्रयोग नाकाम साबित हुए.
नीलम सिनेमा और ब्रॉडवे सिनेमा का उद्घाटन 1960 के दशक में हुआ था. मुफ्ती मोहम्मद सईद की सरकार ने दोनों को फिर से खोलने की कोशिश की, लेकिन कुछ महीनों बाद वे दोनों बंद हो गए. नया खुला मल्टीप्लेक्स ब्रॉडवे सिनेमा के ठीक पीछे बना है. ब्रॉडवे सिनेमा अब एक 'बार' बन गया है.
कश्मीर में कई लोगों का मानना है कि नया सिनेमा हॉल इसलिए सफल हो सकता है कि पिछले तीन सालों में यहां हिंसा का ग्राफ़ काफी नीचे चला गया है. वहीं अलगाववादी नेताओं को राजनीति से दूर कर दिया गया है.
उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने अपने भाषण में कहा, "5 अगस्त, 2019 कश्मीर के अतीत में एक ऐतिहासिक दिन है. यहां उस दिन से बदलाव शुरू हो गया और हम ईमानदारी से लोगों से जुड़ी हर चीज़ों को दुरुस्त करने की कोशिश कर रहे हैं. अब कश्मीरियों के पास मनोरंजन के वे सभी साधन होंगे, जो कि देश के किसी भी नागरिक के पास हैं."
इस बारे में युवा पत्रकार साहिल ख़ान कहते हैं, "आजकल तमाम गैजेट्स उपलब्ध होने के बावजूद, यहां के युवा अक्सर अकेलापन महसूस करते हैं. मल्टीप्लेक्स में 3 घंटे फ़िल्म देखना वैसे युवाओं के लिए तनाव दूर करने का एक ज़रिया होगा, जो शिक्षा के क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा और बेरोज़गारी के बोझ से दबे पड़े हैं. कश्मीरियों ने बहुत ख़राब दौर देखा है, सिनेमा उस झटके से उबरने का सबसे अच्छा तरीक़ा साबित हो सकता है.''

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स्थानीय फ़िल्म उद्योग को बढ़ावा
स्थानीय फिल्म निर्माता, कलाकार और इस उद्योग से अपना जीवनयापन चलाने वाले इस क़दम से काफी उत्साहित हैं. उनका मानना है कि कश्मीर में सिनेमा हॉल के फिर से खुलने से स्थानीय फिल्म निर्माताओं की रचनात्मकता को बढ़ावा मिलेगा.
पिछले 10 सालों में राज्य के कई युवा फिल्म निर्माताओं ने अच्छे कंटेंट बनाकर काफी लोकप्रियता हासिल की है. फिल्म निर्माता हुसैन ख़ान इस नए मल्टीप्लेक्स में अपनी फ़िल्मों की स्क्रीनिंग कराने को लेकर उत्सुक हैं.
वे कहते हैं, "न केवल बॉलीवुड और हॉलीवुड की फिल्में बल्कि स्थानीय फिल्मों को भी नए सिनेमा हॉल में दिखाया जाना चाहिए. इससे लोगों की आमद बढ़ेगी और स्थानीय फ़िल्म उद्योग को भी बढ़ावा मिलेगा."
वहीं जाने-माने सिनेमैटोग्राफर और एडिटर मुहम्मद यूनिस ज़रगर कश्मीर में बॉलीवुड की वापसी से ख़ुश हैं, लेकिन उनकी कुछ चिंताएं भी हैं.
वे कहते हैं, "फिल्म क्रू मुंबई या चेन्नई से कश्मीर तक पूरे रास्ते उड़ान भरते हैं. सरकार उन्हें सभी सुविधाएं, स्थान और प्रोत्साहन देती है. लेकिन वे स्थानीय टैलेंट को काम पर नहीं रखते. हमारे यहां बेहतरीन एक्टर और सिनेमैटोग्राफर हैं, जिन्होंने बॉलीवुड में बड़े बैनरों को प्रभावित किया है. यदि वास्तव में कश्मीर के सिनेमा को फिर से ज़िंदा करने की कोशिश करनी है, तो 'लोकल एंगेजमेंट' की नीति बननी चाहिए.''
उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने पहले कभी टिकट ब्लैक करने वाले एक शख़्स का हवाला देकर कश्मीर में सिनेमा हॉल के आर्थिक महत्व को समझाने का प्रयास किया.
उन्होंने कहा, ''मैं उनसे कुछ दिन पहले मिला था. उनका नाम मैं नहीं लूंगा, पर उन्होंने मुझे अपने अतीत के बारे में बताया. उन्होंने यहां सिर्फ़ एक हफ़्ते तक फ़िल्म के टिकटों को ब्लैक करके इतनी कमाई कर ली कि उससे एक ऑटो रिक्शा ख़रीद लिया.''
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