कश्मीर में बढ़ते हमलों के बीच कैसे रह रहे हैं यूपी-बिहार के मज़दूर: ग्राउंड रिपोर्ट

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- Author, माजिद जहांगीर
- पदनाम, श्रीनगर से, बीबीसी हिंदी के लिए
12 अगस्त की रात - बिहार के रहने वाले मोहम्मद आशिक़ और मोहम्मद अंज़र उस घटनास्थल की तरफ़ घबराते हुए आ रहे थे, जहां 19 साल के उन्हीं की तरह कश्मीर में मज़दूरी करने वाले मोहम्मद अमरेज़ की संदिग्ध चरमपंथियों ने घुप्प अंधेरे में गोली मार कर हत्या कर दी थी.
मोहम्मद आशिक़ और मोहम्मद अंज़र चुपचाप घटनास्थल पर पहुंचे, दोनों लंबी दूरी तय करके आए थे. हालाँकि, मोहम्मद अमरेज़ न उनके रिश्तेदार थे और न ही जानने वाले. हां, इतना ज़रूर था कि वो उनके अपने शहर और अपने ही राज्य के थे.
मोहम्मद अंज़र का कहना था "जब बीते हफ़्ते पुलवामा में बिहार के एक मज़दूर को मारा गया, तो हमारे साथियों ने कहा था कि कुछ दिन और रुक कर देखेंगे कि क्या होता है. हम उनसे सहमत हो गए थे. अब फिर वही कुछ हुआ है. एक और मारा गया है. जब इस तरह की घटनाएं हों, डर तो लगेगा ही. जब से हम आए हैं, यहां सिर्फ़ मारधाड़ ही देख रहे हैं. जब इंसान की जान की कोई क़ीमत नहीं रहेगी यहां पर, तो हम यहां रह कर क्या करेंगे? कश्मीर हमने देखा और घूमा भी और कमाया भी. अब कश्मीर में क्यों रहेंगे?"

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हालाँकि, आम कश्मीरों से अंज़र को कोई शिकायत नहीं है. वो कहते हैं कि कश्मीर के लोग काफ़ी मिलनसार हैं और दिल के बड़े भी.
बीते एक साल से कश्मीर में मज़दूरी कर रहे अंज़र कहते हैं "हम तो मज़दूर लोग हैं, जहां काम मिलता है वहां चले जाते हैं. कश्मीर जैसी परदेस जगह भी तो हम इसलिए आते हैं कि कुछ कमाई करें. हमारे साथियों ने हमसे कहा था कि कश्मीर में पहाड़ हैं और खूबसूरत जगह है.लेकिन यहां तो सिर्फ़ खून ख़राबा होता है."
बीते शुक्रवार को बांदीपोरा के सदनार गाँव में आधी रात को बिहार के रहने वाले मोहम्मद अमरोज़ की अपने कमरे के बाहर गोली मार कर हत्या की गई. अमरोज़ को गोलियां उस समय मारी गईं, जब वो बाथरूम से बाहर आ रहे था.
सदनार गाँव श्रीनगर से क़रीब 35 किलोमीटर दूर है.

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अमरोज़ अपने दो भाइयों के साथ इस गाँव में किराए के एक कमरे में रहते थे. उनके दोनों भाई अब उनका शव लेकर गाँव चले गए हैं. तीनों ही भाई सदनार गाँव में बिस्तर बनाने का काम करते थे.
अमरोज़ के भाई मोहम्मद समर ने घटना के बाद मीडिया से बातचीत में बताया है , "रात के बारह बजे के बाद हम सोए थे और इस बीच एक और भाई ने मुझे बताया कि फ़ायरिंग की आवाज़ आ रही है. मैंने अपने भाई से कहा कि सो जाओ ,ये सब कुछ होता रहता है. उसने पूछा कि भाई(अमरोज़ ) तो यहां नहीं है. उसके बाद मैंने भाई से कहा कि तुम देख आओ, वह बाथरूम गया होगा. जब वो बाहर गया तो भाई को खून में लथपथ पाया. फिर हमने सेना को बुलाया और बाहर आ गए और भाई को उठाया. उसके बाद हम इसको एक नज़दीकी गाँव के अस्पताल में लेकर गए, जहां हमें श्रीनगर ले जाने के लिए कहा गया. श्रीनगर आते-आते उसने दम तोड़ दिया."
पुलिस ने इस घटना को लेकर एक ट्वीट जारी कर बताया " शुक्रवार की दरम्यानी रात को आतंकवादियों ने एक बिहार के एक मज़दूर को गोली मारकर उसे घायल कर दिया है.उन्हें अस्पताल इलाज के लिए ले जाया गया जहां उनकी मौत हो गई."

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अमरोज़ के मकान मालिक बिलाल अहमद ने बताया "करीब रात के एक बजने वाले थे जब मेरे फ़ोन की घंटी बजी. मेरे पास वाले मकान में रहने वाले बिहार के मज़दूरों का फ़ोन था. उन्होंने कहा कि आप जल्दी से आइए. घटनास्थल पर पहुंचने के बाद अमरोज़ खून में लथपथ था और उनके भाई रो रहे थे. मैंने पुलिस को फ़ोन किया लेकिन उन्होंने फ़ोन नहीं उठाया, जिसके बाद मैंने सेना के मेजर को फ़ोन किया और उन्होंने पूछा कि क्या बात है. मैंने उनसे कहा कि बिहार के एक मज़दूर को गोली लगी है जिसके बाद वो दो मिनट में यहां पहुंच गए."
बिलाल का कहना था उनके मकान में मज़दूरों के रहने की वजह से उनके बच्चों की पढ़ाई का ख़र्चा चलता था. उनका ये भी कहना था कि अब जब किराएदार ही मारा गया तो पैसा कहां से आएगा.
कश्मीर में हज़ारों प्रवासी मज़दूर काम करते हैं जो भारत के कई राज्यों से आते हैं. बिहार, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल के मज़दूरों की संख्या ज़्यादा है.

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2 जून 2022 को, जिला बडगाम के मगरेपोरा में ईंट बनाने के कारखाने में काम करने वाले बिहार के एक मज़दूर 17 वर्षीय दिलकुश कुमार की गोली मार कर हत्या की गई थी और उनके दो साथियों को ज़ख़्मी किया गया था.
हत्या की घटना के बाद दिलकुश के दूसरे साथी अपने घर वापस चले गए हैं. ईंट के उस कारखाने पर अब पंजाब और उत्तर प्रदेश के मज़दूरों से हमारी मुलाक़ात हुई,जो अब ईंट के इस कारखाने में काम करते हैं और वे बिना किसी डर के काम कर रहे हैं. एक मज़दूर ने बताया कि उन्हें नहीं पता कि किस को कब मारा गया. लेकिन कुछ मज़दूर चिंतित भी नज़र आए.
दिलकुश की हत्या के बाद ईंट कारखाने के मालिक मोहम्मद यूसुफ़ मीर को पुलिस ने कथित लापरवाही के इलज़ाम में हिरासत में भी लिया था.
बीबीसी को फ़ोन पर उन्होंने बताया कि प्रशासन ने हमें सीसीटीवी और लगाने के लिए कहा है. उनका कहना था कि पुलिस और दूसरी सुरक्षा एजेंसीज कभी -कभी कारखानों का चक्कर लगाती हैं और हालात का जायज़ा लेती हैं.

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मीर के मुताबिक़, उनके कारखाने में दो सौ से अधिक मज़दूर काम करते हैं. उनक कहना था कि दिलकुश की हत्या के बाद उन्हें दूसरे मज़दूरों को लाना पड़ा है.
पसीने भरे जिस्म और माथे की सिलवटों में छुपी थकान के निशान लिए उत्तर प्रदेश के रायबरेली के रहने वाले रामनाथ बताते हैं, "पूरा दिन हम मज़दूरी करके टूट जाते हैं और शाम के समय में एक तरफ़ खाना बनाना पड़ता है तो दूसरी ओर ये भी देखना पड़ता है कि कोई आ न जाए और हमें मार डाले."
रामनाथ से जब हमने पूछा कि क्या आप के दिमाग़ में ये सवाल आता है कि मज़दूरों को क्यों मारा जाता है, तो उनका जवाब था, "हमें क्यों मारा जाता है, इस सवाल को तो कश्मीर के लोगों को जानना चाहिए. हम लोग तो कश्मीर को बनाने आते हैं. किसी की इमारत बना रहे हैं, तो किसी के ईंट के कारखाने में कोयले जला रहे हैं या कोई मज़दूर सेब तोड़ने का काम रहा है."

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मगरेपोरा से क़रीब दस किलोमीटर दूर जिला पुलवामा के गडोरा में बीते हफ्ते बिहार के एक मज़दूर मुमताज़ अहमद की ग्रेनेड हमले में मौत हो गई जबकि उनके दो साथी घायल हो गए थे.
मुमताज़ अहमद सड़क किनारे टेंट लगाकर बिस्तर बनाने का काम करते थे. उनके टेंट के अंदर हैंड ग्रेनेड फेंका गया था.
गडोरा इलाके में आज भी दर्जनों प्रवासी मज़दूर रहते हैं. ये शाम के साढ़े छह बजे का समय था, जब हम गडोरा गाँव के काफ़ी अंदर गए और उस इमारत में दाख़िल हो गए जहां दर्जनों प्रवासी मज़दूर रहते हैं.
तीन मज़दूर गपशप लगा रहे थे. ज़्यादातर मज़दूर काम से वापस लौटे थे. यहां कई मज़दूरों से हमने बात की और जिनके विचार अलग-अलग थे.

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सब अपने अपने कमरों में अपनी थकान को दूर करने और रात का खाना बनाने की तैयारी में लगे थे. कोई लेटा था , कोई पानी भर के ला रहा था तो कोई सब्ज़ी काट रहा था.
बिहार के रहने वाले मोहम्मद साकिब के अंदर डर नाम की कोई चीज़ नहीं दिखी. वो बीते 13 वर्षों से कश्मीर आ रहे हैं.
मोहम्मद साकिब का कहना था, "मेरे साथ अभी तक कुछ हुआ नहीं, इसलिए मुझे डर भी नहीं है. जो डर रहे हैं, उसकी वजह तो वही लोग जानते हैं कि उनको डर क्यों है ? मेरे पास कोई अजनबी भी आ जाए तो मुझे अछा लगता है. मैं उसकी मेहमाननवाज़ी करता हूँ. परिवार वाले तो चिंतित रहते हैं. वो ये सोचते हैं कि हमारे साथ भी इस तरह की घटना घट सकती है."
साकिब कहते हैं कि एक दिन में छह सौ रूपये कमाते हैं और महीने भर क़रीब 15 हज़ार की रक़म बनती है. उनका ये भी कहना था कि हर महीने वो अपने परिवार को 12 हज़ार भेज पाते हैं.
मोहम्मद साकिब अपने साथियों के साथ एक कमरे में रहते हैं. हर एक को महीने में 600 रुपया किराया देना पड़ता है.

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पश्चिम बंगाल के एक दूसरे मज़दूर ने बताया कि उन्हें कश्मीर दूसरा घर लगता है. बातचीत में उन्होंने बताया कि वह साल का ज़्यादा समय कश्मीर में गुज़ारते हैं.
पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न ज़ाहिर करने की शर्त पर बीबीसी को बताया कि कश्मीर में चरमपंथियों के हाथों प्रवासी मज़दूरों को मारने की घटनाओं का मक़सद ये है कि देश और दुनिया को बताया जा सके कि कश्मीर में हालात ठीक नहीं हैं और इस तरह की घटनाओं से वे सरकार को बैकफुट पर लाना चाहते हैं.
उनका ये भी कहना था कि जब बाहर के किसी को मारा जाता है तो वो एक बड़ी ख़बर बन जाती है और बाहर ग़लत संदेश जाता है. साथ ही उनका ये भी कहना था कि इस तरह की घटनाओं से ज़्यादा फ़र्क़ पड़ने वाला नहीं है.
पुलिस ने आधिकारिक रूप से प्रवासी मज़दूरों या फिर आम नागरिकों की हत्याओं पर बार-बार दोहराया है कि घटना अंजाम देने वाले चरमपंथियों की पहचान की गई है और उनको बहुत जल्द मारा जाएगा. कई सारी घटनाओं पर पुलिस ने दावा भी किया कि उन चरमपंथियों को मारा गया है, जिनका आम नागरिकों या प्रवासी मज़दूरों को मरने में हाथ था.

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हाल के वर्षों में प्रवासी मज़दूरों पर हमले
अक्टूबर 2019 से लेकर अब तक कश्मीर में 20 से अधिक प्रवासी मज़दूर टार्गेटेड किलिंग्स में मारे जा चुके हैं, जिनमें कुछ ट्रक चालक मज़दूर भी शामिल हैं.
जम्मू -कश्मीर में 5 अगस्त 2019 को अनुच्छेदा 370 के हटाए जाने के बाद अक्टूबर 2019 को कुलगाम में पश्चिम बंगाल के पांच मज़दूरों की एक साथ गोली मार कर हत्या की गई थी.
26 जुलाई 2022 को संसद में प्रवासी मज़दूरों की जम्मू कश्मीर में हत्याओं के आंकड़े पेश करते हुए केंद्र सरकार ने बताया कि वर्ष 2017 से अब तक (26 जुलाई 2022 तक ) 28 प्रवासी मज़दूर जम्मू -कश्मीर में मारे गए हैं जिन में सात मज़दूर बिहार के रहने वाले थे.
चरमपंथियों के इन हमलों में कम-से-कम आठ प्रवासी मज़दूर घायल भी हुए हैं. वर्ष 2021 में भी जब प्रवासी मज़दूरों की हत्याएं हुई थी तो कई प्रवासी मज़दूर कश्मीर छोड़ चले गए थे.
कश्मीर में प्रवासी मज़दूरों की हत्याएं पहले भी होती रही हैं. विशेष राज्य का दर्जा ख़त्म होने से हटने के बाद इन घटनाओं में तेज़ी देखने को मिली है.
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