जम्मू-कश्मीर में बाहरी लोगों के ज़मीन ख़रीदने का क्या है पूरा सच?

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- Author, माजिद जहांगीर और मोहित कंधारी
- पदनाम, जम्मू-कश्मीर से, बीबीसी हिंदी के लिए
मंगलवार, नौ अगस्त को लोकसभा की कार्यवाही के दौरान सरकार ने सदन को बताया था कि अगस्त 2019 में अनुच्छेद 370 को निरस्त करने के बाद से जम्मू-कश्मीर में बाहरी राज्यों के केवल दो लोगों ने दो संपत्तियां ख़रीदी हैं.
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 के तहत जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा हासिल था जिसे केंद्र सरकार ने पांच अगस्त 2019 को ख़त्म कर दिया था. केंद्र ने अनुच्छेद 370 के साथ-साथ 35-ए को भी समाप्त कर दिया था. केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर का राज्य का दर्जा भी बदलकर उसे दो केंद्र शासित प्रदेशों में बांट दिया था.
केंद्रीय गृह राज्यमंत्री नित्यानंद राय ने एक प्रश्न के लिखित उत्तर में मंगलवार को सदन को ये जानकारी दी थी.
प्रश्न पूछा गया था कि क्या देश के दूसरे राज्यों के अनेक लोगों ने अनुच्छेद 370 समाप्त होने के बाद केंद्रशासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर में संपत्तियां ख़रीदी हैं या ख़रीदना चाहते हैं?
अपने लिखित उत्तर में गृह राज्यमंत्री ने कहा था, "जम्मू-कश्मीर सरकार द्वारा प्रदान की गई सूचना के अनुसार अगस्त, 2019 के बाद से केंद्र शासित प्रदेश से बाहर के राज्यों के दो लोगों ने यहां दो संपत्तियां ख़रीदी हैं.''
सरकार से ये भी पूछा गया था कि क्या दूसरे राज्यों की सरकार और लोगों को जम्मू-कश्मीर में संपत्तियां ख़रीदने में कठिनाई आई थी? इस प्रश्न के जवाब में नित्यानंद राय ने सदन को बताया, "सरकार के सामने ऐसी कोई घटना नहीं आई है."

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सरकार का अनुच्छेद 370 पर तर्क
सदन में इस मामले में उठे सवाल और फिर सरकार के जवाब की इसलिए भी अहमियत बढ़ जाती है क्योंकि केंद्र सरकार ने जब अनुच्छेद 370 ख़त्म किया था, तो इस फ़ैसले को सही ठहराते हुए सरकार और ख़ासकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह ने इस बात पर ज़ोर दिया था कि अनुच्छेद 370 के कारण बाहर के लोग ना तो वहां ज़मीन-जायदाद ख़रीद सकते हैं और न ही कोई निवेश हो सकता है.
सरकार का तर्क था कि अनुच्छेद 370 राज्य के विकास में रुकावट है, इसलिए राज्य के चौतरफ़ा विकास के लिए इस अनुच्छेद को सरकार ने ख़त्म करने का फ़ैसला किया है.
सरकार ने तो ख़ुद इस बात को संसद में माना है कि पिछले दो सालों में केवल दो संपत्तियां ख़रीदी गईं हैं, लेकिन ज़मीन पर इसकी जांच करने पर पता चला कि सरकार के इस दावे में भी पूरी सच्चाई नहीं बताई गई है.
किन दो लोगों ने संपत्ति ख़रीदी है, सरकार ने इसका ब्यौरा तो नहीं दिया है. लेकिन बीबीसी हिंदी ने अपनी पड़ताल में पाया है कि दोनों संपत्ति जम्मू में ख़रीदी गई हैं.

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जम्मू-कश्मीर के राजस्व विभाग से सम्बंधित एक अधिकारी ने अपना नाम सार्वजनिक नहीं करने की शर्त पर बीबीसी हिंदी से कहा, "जिन लोगों ने उनके दफ़्तर में अपनी संपत्तियां दर्ज करने का आवेदन किया था वो पिछले 15 साल से ज़्यादा समय से जम्मू-कश्मीर में ही रह रहे हैं. जिन लोगों ने यह ज़मीन ख़रीदी है उनके पास स्थाई निवास प्रमाणपत्र (पर्मानेंट रेज़िडेंट सर्टिफ़िकेट) नहीं था, लेकिन उन लोगों ने अपने मूल निवासी प्रमाण पत्र (डोमिसाइल सर्टिफ़िकेट) बनवा लिए हैं."
यहां ये जानना ज़रूरी है कि जम्मू कश्मीर में अन्य राज्यों की तरह डोमिसाइल सर्टिफ़िकेट का प्रावधान उसका दर्जा बदलने के बाद किया गया है और किसी भी ज़मीन की खरीद के लिए डोमिसाइल सर्टिफ़िकेट की बाध्यता नहीं है क्योंकि बदली परिस्थितियों में भारत का कोई भी नागरिक जम्मू कश्मीर में ज़मीन खरीद सकता है.
राजस्व विभाग के अधिकारी ने बताया कि उन्होंने उनके दस्तावेज़ों की जांच पड़ताल करने के बाद ही उनकी संपत्तियां पंजीकृत करने की कार्रवाई पूरी की है.
जब बीबीसी हिंदी ने उनसे यह जानना चाहा की किस आदेश के तहत उन्होंने इन संपत्तियों को पंजीकृत किया है, तो उन्होंने बताया कि सरकार की पॉलिसी के अनुसार ही उन्होंने ऐसा किया है.
राजस्व विभाग के अधिकारी ने बीबीसी हिंदी से इस बात की भी पुष्टि की है कि यह संपत्ति आवासीय है और जम्मू साउथ में यह संपत्तियां ख़रीदी गई हैं.
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जब बीबीसी हिंदी ने ज़मीन बेचने वाले परिवार के सदस्य से संपर्क कर इस बात की पुष्टि करना चाही तो उन्होंने किसी भी सवाल का उत्तर देने से साफ़ इंकार कर दिया.
दूसरी ओर राजस्व विभाग के एक और वरिष्ठ अधिकारी ने इसे सुरक्षा से जुड़ा मामला बता कर उन लोगों के नाम सार्वजानिक न करने की बात कही.
क़ानून में क्या बदलाव हुए?
जम्मू-कश्मीर में जब अनुच्छेद 370 लागू था तो दूसरे राज्यों के लोग वहां ज़मीन नहीं ख़रीद सकते थे. सिर्फ़ राज्य के लोग ही वहां पर ज़मीन और अचल संपत्ति ख़रीद सकते थे.
पिछले साल 26 अक्टूबर को केंद्रीय गृहमंत्रालय ने 'जम्मू-कश्मीर रीऑर्गेनाइज़ेशन एडेप्टेशन ऑफ़ सेंट्रल लॉज़ थर्ड ऑर्डर, 2020' का नोटिफ़िकेशन जारी कर भूमि क़ानूनों से जुड़ी जम्मू-कश्मीर डेवेलपमेंट एक्ट की धारा 17 में बदलाव किए थे.
राज्य के 12 क़ानूनों को ख़त्म कर दिया गया और 26 नए क़ानून बदलावों के साथ लागू किए गए थे. जमीन ख़रीद-फ़रोख़्त की शर्तों में 'राज्य के स्थाई नागरिक' शब्द को हटा दिया गया.
इस नोटिफ़िकेशन के अनुसार देश के किसी भी हिस्से का कोई भी व्यक्ति केंद्र शासित प्रदेश में ज़मीन ख़रीद सकता है और वहां पर बस सकता है.
हालांकि सरकार ने अभी तक खेती की ज़मीन को लेकर कोई नीति नहीं बनाई है. इस आदेश के अनुसार जम्मू-कश्मीर में खेती की ज़मीन सिर्फ़ किसानों के पास ही रहेगी. बाहरी राज्यों के लोग जम्मू-कश्मीर में खेती को छोड़कर कोई भी और ज़मीन ख़रीद सकते हैं.
इसी तरह डेवेलपमेंट अथॉरिटी को केंद्रीय क़ानून के तहत ज़मीन का अधिग्रहण करने का अधिकार दिया गया है और इसके तहत अब लीज़ पर देने या अलॉट करने के लिए परमानेंट रेज़िडेंट का नियम आवश्यक नहीं रखा गया है.
इसी तरह डेवेलपमेंट एक्ट के तहत जम्मू-कश्मीर इंडस्ट्रियल डेवेलपमेंट कॉरपोरेशन औद्योगिक क्षेत्रों में तेज़ी से उद्योग लगाने और उनके लिए कमर्शियल सेंटर बनाने पर काम कर सकता है.
अप्रैल 2021 में जम्मू-कश्मीर की नई औद्योगिक और भूमि आवंटन नीति की घोषणा की गई थी.
निवेश के सरकार के दावे का सच
जम्मू-कश्मीर में उद्योग ओर वाणिज्य विभाग ने ट्वीट कर दावा किया कि विभाग के प्रमुख सचिव रंजन प्रकाश ठाकुर के नेतृत्व में दो जुलाई को हुई उच्चस्तरीय बैठक में जम्मू संभाग में 1548 करोड़ रुपए के 15 प्रोजेक्ट के लिए ज़मीन आवंटित करने को मंज़ूरी दी गई.
सरकार का कहना है कि इससे क़रीब पाँच हज़ार लोगों के लिए रोज़गार पैदा होंगे. इसके इलावा प्रशासन केंद्र शासित प्रदेश में 84 हज़ार लोगों को रोज़गार देने वाले 20,000 करोड़ के निवेश प्रस्तावों को मंज़ूरी देने के लिए प्रयासरत है.
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साथ ही, सरकार का दावा है कि जम्मू-कश्मीर में नए और पुराने औद्योगिक क्षेत्रों में 27,000 कनाल से अधिक भूमि का लैंड बैंक बन चुका है.
जम्मू-कश्मीर के उप-राज्यपाल मनोज सिन्हा ने हाल ही में दिए गए अपने एक इंटरव्यू में कहा था, "शुरुआत में हमारा आकलन था कि राज्य को क़रीब 25 हज़ार करोड़ का निवेश मिल सकता है. लेकिन देशभर के उद्योगपतियों से मिले रेस्पांस को देखते हुए हमने लक्ष्य 40 से 50 हज़ार करोड़ कर दिया है. इससे अगले कुछ वर्षों में 7-8 लाख रोज़गार पैदा होंगे."
उनके मुताबिक़ अब तक 20 हज़ार करोड़ के निवेश प्रस्ताव मिल चुके हैं. उप-राज्यपाल ने उसी इंटरव्यू में कहा था, ''समिति ने ऐसे प्रस्तावों को मंज़ूरी देना शुरू कर दिया है और कुछ को कारख़ाने लगाने के लिए ज़मीन भी दी जा चुकी है."
कश्मीर घाटी में क्या हैं हालात?
उप-राज्यपाल भले ही 50 हज़ार करोड़ के निवेश की बात करें, लेकिन कश्मीर घाटी में हालात बहुत ख़राब हैं.
पिछले दो वर्षों में कश्मीर में ज़मीनी स्तर पर क्या बदला, कितना निवेश किया गया और कितने नए बिज़नेस यूनिट्स खोले गए, यह जानने और समझने के लिए बीबीसी ने कश्मीर चैम्बर ऑफ़ कॉमर्स एंड इंडस्ट्रीज़ के पूर्व अध्यक्ष सईद शकील कलन्दर से बात की.
उनका कहना था, "ज़मीनी सच्चाई ये है कि आर्टिकल 370 के हटने के बाद जो कश्मीर इंडस्ट्रियल सेक्टर के हालात बने हैं, उनमें क़रीब-क़रीब 60 प्रतिशत बंद हो चुके हैं. बीते दो वर्षों से यहां सरकार की जो अपनी ख़रीदारी है, उसका सरकार राष्ट्रीय सत्र पर टेंडरिंग करती है और जब राष्ट्रीय सत्र पर टेंडरिंग की जाती है तो यहाँ का उद्यमी राष्ट्रीय स्तर के उद्यमियों से मुक़ाबला नहीं कर सकता है."
"अनुच्छेद 370 को हटाए जाने के बाद क़रीब एक साल तक कारोबार ठप रहा है. पहले 370 का लॉकडाउन था और फिर कोविड का लॉकडाउन. यहां के वो सभी कारख़ाने बंद हो चुके हैं जो सरकार पर निर्भर थे. हमारे यहां क़रीब दो सौ कारख़ाने बिजली का सामान बनाते थे, वो बंद हो चुके हैं. जम्मू-कश्मीर में सैंकड़ों कारख़ाने लकड़ी के हैं, लेकिन एक अंदाज़े के मुताबिक़ बीते दो वर्षों में क़रीब चार करोड़ की लकड़ी का फ़र्नीचर बाहर से आया है. सरकार जिस विकास की बात कर रही है, वो विकास तो नज़र आना चाहिए. यहां तो विकास के बजाए ज़वाल (गिरावट) हो रहा है."
कश्मीर के वरिष्ठ आर्थिक विशेषज्ञ एजाज़ अय्यूब कहते हैं, "जम्मू-कश्मीर की जीडीपी बीते तीन वर्षों से सरकार ने सामने लाई ही नहीं क्योंकि दिखाने के क़ाबिल कुछ नहीं है. आर्टिकल 370 के हटने से हालात में जो ख़राबी आई थी वो ख़राबी कोविड की वजह से छुप गई है. बीते दो वर्षों में कश्मीर के निजी सेक्टर में बेशुमार लोगों की नौकरियां चली गई हैं. सरकार ने कुछ नौकरियां ज़रूर दी हैं, लेकिन वो कुछ भी नहीं हैं."
वो आगे बताते हैं, "सरकार ने कहा कि जम्मू-कश्मीर में निवेश होगा और उस हवाले से कश्मीर में एक 'ग्लोबल समिट' करने की बात कही गई. बाद में कहा गया कि हालात ठीक नहीं हैं और जम्मू-कश्मीर से बाहर कुछ शहरों में रोड शोज़ किए गए. दिल्ली में भी जनवरी 2020 में एक रोड शो किया गया, लेकिन इसके बावजूद निवेश नहीं आया. बाद में जम्मू-कश्मीर इंडस्ट्रियल एंटिटी बनाई गई और उसके लिए ज़मीन को भी ट्रांसफ़र किया गया और बताया गया कि बाहर से निवेश होगा, लेकिन सच्चाई ये है कि किसी ने निवेश नहीं किया."
"निवेश करने के लिए सिर्फ़ ज़मीन और सरकारी सब्सिडी की ज़रूरत नहीं होती है, बल्कि उसके लिए एक माहौल की ज़रूरत होती है. हरियाणा में अच्छे से काम करने वाला कोई व्यक्ति किसी ऐसी दूर जगह पर अपना कारोबार क्यों शुरू करेगा, जहां इंटरनेट के मुश्किलात रहते हैं, जहां मौसम और बिजली की समस्या रहती है."
ये पूछने पर कि बीते दो वर्षों में कश्मीर घाटी में किसी बाहर के व्यक्ति ने ज़मीन क्यों नहीं ख़रीदी और यहां काम शुरू क्यों नहीं किया, वो कहते हैं, "भारत के मेनलैंड से अगर कोई कश्मीर आकर रह सकता है, तो वो कश्मीरी पंडित हैं. वो लोग इस ज़मीन से जुड़े हैं, उनके जज़्बात जुड़े हैं. लेकिन इन सबके बावजूद वो (कश्मीरी पंडित) भी वापस नहीं आ रहे हैं? वो भारत के शहरों में शांति से रह रहे हैं, तो क्यों कोई बाहर का कश्मीरी आकर रहने लगेगा?"
"हमें तो छह महीने सर्दियों में घर के अंदर बैठना पड़ता है. यहां तो हम नहीं रह पा रहे हैं तो हम कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि बाहर का कोई आकर यहां ज़मीन ख़रीदेगा और रहने लगेगा."
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