'कश्मीर फ़ाइल्स' पर क्या कह रहे हैं जम्मू में बसे कश्मीरी पंडित

कश्मीर फाइल्स फ़िल्म का पोस्टर

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    • Author, मोहित कंधारी
    • पदनाम, जम्मू से, बीबीसी हिंदी के लिए

फिल्म निर्देशक विवेक रंजन अग्निहोत्री की फ़िल्म 'द कश्मीर फ़ाइल्स' के चर्चा में आने के बाद से नगरोटा के पास जगती टाउनशिप में रहने वाले कश्मीरी पंडित परिवारों ने एक बार फिर अपनी 'घर वापसी' का सपना देखना शुरू किया है.

जगती टाउनशिप का निर्माण 2011 में किया गया था जहां इस समय लगभग 4000 विस्थापित परिवार रहते हैं.

लेकिन बहुचर्चित फिल्म को लेकर हो रही तीखी बहस के बीच यहाँ रह रहे परिवारों को अब इस बात की भी चिंता सताने लगी है कि क्या इस फिल्म की वजह से उनका घर वापस लौटने का रास्ता आसान होगा या उसमें और अधिक अड़चनें पैदा होंगी.

तीन दशक बीत जाने के बाद भी केंद्र और राज्य सरकारें कश्मीरी हिन्दुओं की घर वापसी सुनिश्चित नहीं करा पाई.

जहाँ एक तरफ जगती टाउनशिप में रहने वाले विस्थापित फिल्म की प्रशंसा करते हैं तो वहीं दूसरी ओर वो यह कहने से भी नहीं चूकते कि 1990 से लेकर आज तक उनके नाम पर फिल्में तो बहुत बनीं लेकिन उनके जीवन में कुछ भी नहीं बदला है.

सुनील पंडिता

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इमेज कैप्शन, जगती कैंप में रहने वाले सामाजिक कार्यकर्ता सुनील पंडिता

'फिल्में बहुत बनीं, लेकिन बदला कुछ नहीं'

जगती कैंप में रहने वाले सामाजिक कार्यकर्ता सुनील पंडिता ने बीबीसी हिंदी से अपने दिल की बात करते हुए कहा कि 1990 से लेकर आज तक हमारे नाम पर सिर्फ फिल्मे बनीं हैं और कुछ नहीं हुआ है.

"आज भी एक फिल्म चर्चा में है. लेकिन मेरा यह मानना है सिर्फ एक फिल्म बनने से हमारी घर वापसी नहीं हो सकती. हमें 1990 से अब तक हर जगह सिर्फ एक 'पोलिटिकल टिश्यू पेपर' की तरह इस्तेमाल किया गया है. आज भी वही हो रहा है.

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"सरकारी अफसर से लेकर मीडिया और सियासतदानों ने हमें हर जगह बेचा है. यह कब तक होता रहेगा. हम स्थाई समाधान चाहते हैं, अपने घर लौटना चाहते हैं, और कुछ नहीं."

सुनील पंडिता अपने अनुभव के आधार पर कहते हैं कि '1990 से लेकर आज तक हमारे ओर कश्मीर के लोगों के बीच जो दूरियां थी उसे सिविल सोसाइटी के लोगों ने कड़ी मेहनत करके कम करने का काम किया था लेकिन इस फिल्म की वजह से वो दूरियां और बढ़ गयी हैं.'

जगती टाउनशिप

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'जम्मू में भी मिल रहीं धमकियां'

पंडिता इस समय कश्मीर में रह रहे कश्मीरी पंडित परिवारों का हवाला देते हुए कहते हैं, 'कम से कम 5000 परिवार इस समय कश्मीर घाटी में रह रहे हैं और वे सब डरे हुए हैं, उन्हें इस बात का डर सता रहा है, कि कहीं कुछ अनहोनी घटना न हो जाये.'

उनका कहना था कि यहाँ जम्मू में उन्हें भी धमकियां मिल रही हैं.

वे कहते हैं, "मैं भारत सरकार से पूछना चाहता हूँ कि 1990 में जब हमारा पलायन हुआ तब उसकी जिम्मेदार भी सरकार थी. उस समय उन्होंने हमारी रक्षा क्यों नहीं की". उस समय कहाँ से हमारे गांव में 30,000 से लेकर 50,000 लोग आते थे. नारेबाजी होती थी, कश्मीर की आज़ादी के नारे बुलंद किये जाते थे, लेकिन सरकार कहीं नज़र नहीं आती थी. यह सिर्फ भारत सरकार की नाकामयाबी थी."

पंडिता सवाल पूछते हैं, "कैसे इतनी बड़ी मात्रा में सीमापार से हथियार भारत की सीमा के अंदर आये. सरकार कुछ भी कहे, 32 साल से हम जो अपने घोंसले को ढूंढ़ रहे हैं, वो इतनी जल्दी हमें नसीब नहीं होगा और अगर ऐसी फिल्में बनेंगी वो सिर्फ दोनों तरफ के लोगों के बीच दूरियां पैदा करेंगी ओर कुछ नहीं."

'हमारा दर्द दिखाने के लिए शुक्रिया'

राकेश टिक्कू

राकेश टिक्कू 27 साल के थे जब उन्हें अपने परिवार के साथ कश्मीर छोड़ना पड़ा. उस दौर को याद करते हुए राकेश टिक्कू कहते हैं कहते हैं, "ये तो फ़िल्म बनी हैं, हमने तो इसे उस दौर में देखा जब मैं 27 साल का था और श्रीनगर में रहता था. मुझे आज भी याद है, वो 19 जनवरी थी, रात के पौने नौ बजे थे, तब मस्जिदों से ऐलान लग रहा था ये निज़ाम-ए-मुस्तफ़ा है. ऐ काफ़िरों कश्मीर हमारा छोड़ दो. जो ये ऐलान लगा रहे थे वो पाकिस्तानी थे."

टिक्कू कहते हैं, "हमारे पड़ोसी ऐसे नहीं थे लेकिन उन्हें डरा दिया गया था कि अगर इन्हें शरण दी तो अंजाम इन जैसा ही होगा. नतीजा ये हुआ कि हमारी बहनों के साथ रेप हुए."

फ़िल्म के लिए निर्देशक विवेक अग्निहोत्री और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का शुक्रिया अदा करते हुए टिक्कू कहते हैं, "ये ज़ुल्म हमारे ऊपर हुआ था, आज दुनिया को पता चला, हम नरेंद्र मोदी का, फ़िल्म निर्देश का शुक्रिया अदा करते हैं कि उन्होंने हमारे दर्द को दुनिया को दिखाया. हमारी नई पीढ़ि दुनिया को बता सकेंगी कि हमारे साथ क्या हुआ था."

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उम्मीद की किरण

12 साल की उम्र में अंजलि रैना अपने परिवार के साथ कश्मीर घाटी से जम्मू आयी थीं. उन्होंने एक टेंट में रहते हुए अपनी शुरुआती पढ़ाई पूरी की.

वे याद करते हुए कहती हैं कि उन्हें याद हैं कि कड़कती धूप में दिन के 2 बजे क्लास होती थी. मुझे नहीं पता आखिर हमें ऐसी जिंदगी क्यों जीने को मिली, हमने क्या कसूर किया था. 32 सालों के बाद अंजलि को आशा की किरण नज़र आ रही है.

अगर इस सरकार ने अनुच्छेद 370 हटा दिया है तो वह हमें अपने घर वापस भी भेज देगी. इसमें समय लग सकता है लेकिन अब उम्मीद है ऐसा होगा.

वीडियो कैप्शन, द कश्मीर फ़ाइल्स फ़िल्म पर जम्मू के कश्मीरी पंडित क्या बोले?

बीबीसी हिंदी को अंजलि ने बताया 'द कश्मीर फाइल्स' एक सच्ची कहानी पर आधारित फिल्म है. वे मानती हैं कि इस फिल्म में पंडितों के विस्थापन के सही कारणों और इसके बाद उनकी आवाज़ को किस तरह से दबाया गया, यह सब बताया गया है.

अंजलि कहती हैं , "उस समय हम लोगों के साथ जो हुआ उस पर तब की सरकार ने पर्दा डाला था. सच दुनिया के सामने नहीं आने दिया. हमारी आवाज़ को दबा दिया गया. जब तक कश्मीर के अंदर जमा किया गया, बारूद बाहर नहीं निकलेगा कश्मीरी पंडित की घर वापसी नहीं होगी. अगर सरकार हमें वापस भेजना चाहती है और ऐसे हालात पैदा करती है तो मैं सिर्फ अपने घर वापिस जाने के लिए तैयार हूँ लेकिन किसी ट्रांजिट कैंप में रहना मुझे मंजूर नहीं होगा."

अंजलि बताती हैं कि इतने वर्षों में वो सिर्फ एक बार अपने घर गयी थी लेकिन वहां उन्होंने देखा कि किसी और ने कब्ज़ा कर रखा है. मुझ से वो सब नहीं देखा गया. आज भी रोना आता हैं.

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प्यारेलाल पंडित

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इमेज कैप्शन, प्यारेलाल पंडित

'अधूरी कहानी बयां करती है फ़िल्म'

प्यारे लाल पंडिता जो अपने परिवार के साथ 2011 से जगती टाउनशिप में रह रहे हैं, उन्होंने बीबीसी हिंदी को बताया कि इस फिल्म में कश्मीर की अधूरी कहानी बयान की गयी है.

कश्मीरी पंडितों के साथ-साथ कश्मीर के मुस्लिम और सिख समुदाय से जुड़े लोग भी विस्थापित हुए थे लेकिन इस कहानी में उनका कहीं ज़िक्र नहीं है.

उन्होंने सरकार से अपनी मांग दोहराते हुए अपील की कि इतना लंबा समय बीत जाने के बाद अब सरकार को उनके परमानेंट सेटलमेंट के बारे में कड़ा फैसला लेना चाहिए ताकि दोबारा उन्हें भारत के नाम पर कश्मीर घाटी से नहीं भगाया जाये.

पंडिता कहते हैं कि सरकार कोई पॉलिसी बनाने से पहले दिल्ली में बैठकर फैसला न करें, बल्कि जो लोग विस्थापित कैंपों में, जगती टाउनशिप में रहते हैं, उनकी पीड़ा को देखते हुए उनके हक़ में फैसला करे न कि उन लोगों के साथ बैठकर फैसला करे, जो कभी कैंपों में रहे ही नहीं और दिल्ली में बैठकर उनकी रिप्रजेंटेशन करते हैं.

शादीलाल पंडिता

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एक कश्मीरी विस्थापित शादी लाल पंडिता ने बीबीसी हिंदी को बताया कि कश्मीरी पंडितों के साथ ज़ुल्म हुआ जिसकी वजह से हमें वहां से निकलना पड़ा.

भाजपा सरकार से तीखा सवाल पूछते हुए पंडिता ने बीबीसी हिंदी से साफ़ लफ़्ज़ों में कहा, 'हम सरकार से पूछना चाहते हैं कि आप कहते थे, पहले की सरकारों ने कश्मीरी पंडितों को उजाड़ा लेकिन जब से केंद्र में आप की सरकार चल रही है आप ने भी कश्मीरी पंडितों की सुध नहीं ली है. कश्मीरी पंडितों का शोषण किया. हम रिलीफ मांग रहे हैं, जवानों के लिए नौकरियां मांग रहे और सुरक्षा की मांग कर रहे लेकिन हमारी कोई नहीं सुनता.'

फिल्म का हवाला देते हुए पंडिता ने कहा कि यह 2024 के चुनावों की तैयारी हो रही है. यह दुनिया को बताएँगे कि कश्मीरी पंडितों के साथ ज़ुल्म हुआ है.

पंडिता पूछते हैं, '1990 में पाकिस्तान ने हमें उजाड़ा, पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित दहशतगर्दों में हमें टारगेट बनाया न कि कश्मीर के रहने वाले मुसलमानों ने. बीजेपी वाले कुछ दिनों से सब को बता रहे हैं, यह सब कांग्रेस ने किया है लेकिन क्या किसी ने उनसे पूछा उस समय केंद्र में सरकार आप की थी. जनता दल को भाजपा ने बाहर से समर्थन दिया था और वी पी सिंह प्रधानमंत्री थे. उस समय की नेशनल फ्रंट की सरकार ने हमारी रक्षा क्यों नहीं की?'

(बीबीसी हिंदी ने जम्मू के जागती शरणार्थी शिविर में कुछ लोगों से फ़िल्म 'कश्मीर फ़ाइल्स' के बारे में बात की थी. इन लोगों से घाटी के विस्थापित कश्मीरी पंडित के तौर पर बात की गई थी. वीडियो के वायरल होने के बाद ये बात हमारे ध्यान में लाई गई है कि इन लोगों का ताल्लुक दो प्रमुख राजनीतिक दलों--कांग्रेस और बीजेपी--से भी है, बीबीसी ने इनसे इन दलों के प्रतिनिधि के तौर पर बात नहीं की थी, न ही ये लोग सभी कश्मीरी पंडितों की भावनाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं.)

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