'द कश्मीर वाला' के संपादक फ़हद शाह, जिन्हें कथित 'देश विरोधी कंटेंट' शेयर करने के आरोप में किया गया है गिरफ़्तार

द कश्मीर वाला के संपादक फ़हद शाह

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    • Author, आमिर पीरज़ादा और माजिद जहांगीर
    • पदनाम, श्रीनगर से

भारत प्रशासित कश्मीर के पुलवामा में पुलिस ने वरिष्ठ पत्रकार और न्यूज़ पोर्टल 'द कश्मीर वाला' के मुख्य संपादक फ़हद शाह को सोशल मीडिया पर कथित देश विरोधी कंटेंट साझा करने के आरोप में ​​गिरफ़्तार किया है.

शाह को अदालत ने 10 दिनों के लिए पुलिस रिमांड में भेजने का आदेश दिया है.

पुलवामा पुलिस के अनुसार, ''क़ानून-व्यवस्था बिगाड़ने के आपराधिक इरादे के तहत लोगों के बीच भय पैदा करने और उन्हें उकसाने के लिए देशविरोधी कंटेंट (फ़ोटोग्राफ़, वीडियो और पोस्ट) शेयर करने पर फ़हद शाह समेत फ़ेसबुक के कई अन्य यूज़र्स और पोर्टल की पहचान की गई है.''

यह भी बताया गया, ''ये पाया गया कि चरमपंथी गति​विधियों को महिमामंडित करने और क़ानून लागू करने वाली संस्थाओं की छवि बिगाड़ने के लिए ये फ़ेसबुक यूज़र्स ऐसे पोस्ट अपलोड कर रहे हैं.''

इस मामले में पुलिस ने कई धाराओं के तहत एफ़आईआर संख्या 19/2022 दर्ज़ करके जांच शुरू की है.

वीडियो कैप्शन, कश्मीरी बच्ची बनी रिपोर्टर, वीडियो वायरल हो गया

"ग़लत रिपोर्टिंग" का आरोप

पुलिस ने अपने बयान में बताया है कि जांच के दौरान, 33 साल के फ़हद शाह नाम के एक अभियुक्त को गिरफ़्तार किया गया है. उन्हें पुलिस रिमांड पर रखा गया है, जबकि जांच जारी है.

इससे पहले, पुलिस ने 30 जनवरी को पुलवामा के नाइरा इलाके में हुई एक मुठभेड़ में चरमपंथी संगठन जैश-ए-मोहम्मद के कमांडर समेत चार चरमपंथियों को मार गिराने का दावा किया था.

उसके बाद पुलिस ने उस एनकाउंटर की कथित तौर पर "ग़लत रिपोर्टिंग" करने के आरोप में फ़हद शाह के अलावा तीन और पत्रकारों को थाने बुलाकर पूछताछ की थी. वे तीन पत्रकार हैं- मजीद हैदरी, कामरान यूसुफ़ और वक़ार सईद.

शाह को गिरफ़्तार करने से पहले पुलिस ने दो बार और थाने बुलाया था, लेकिन दोनों बार पूछताछ के बाद उन्हें छोड़ दिया गया था. लेकिन शुक्रवार 4 फ़रवरी की शाम जब उन्हें तीसरी बार पुलवामा पुलिस स्टेशन तलब किया गया, तो गिरफ़्तार कर लिया गया.

महबूबा मुफ़्ती

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देश-विदेश में हो रही गिरफ़्तारी की निंदा

जम्मू और कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती ने इस मामले पर तंज़ कसते हुए ट्वीट किया है. उन्होंने सरकार को आड़े हाथ लेते हुए लिखा है कि सच के पक्ष में खड़े होना अब ''देश विरोधी होना'' माना जा रहा है. उन्होंने कहा कि सरकार कितने फ़हद शाह को गिरफ़्तार करेगी.

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राज्य के एक और सीनियर नेता सज्जाद लोन ने राज्य प्रशासन को संबोधित करते हुए कहा, ''यह कश्मीर में देखा हमारा सबसे बुरा वक़्त नहीं है. हमने इससे भी ज़्यादा बुरा समय 90 के दशक में देखा था. तब भी कुछ नहीं बदला और अब भी कुछ नहीं बदलेगा. आप मेरे शब्द याद ​रखिएगा.''

वहीं अमेरिका स्थित पत्रकारों के अंतरराष्ट्रीय संगठन 'कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट' (सीपीजे) ने शाह की गिरफ़्तारी पर चिंता जाहिर करते हुए एक बयान जारी किया है.

इस ग़ैर सरकारी संस्था के एशिया प्रोग्राम कोआर्डिनेटर स्टीवन बटलर ने कहा, ''शाह की गिरफ़्तारी बताती है कि प्रेस की आज़ादी और पत्रकारों के मूल अधिकारों को लेकर वहां के प्रशासन का व्यवहार कितना अनादर भरा है.''

बटलर ने जम्मू और कश्मीर प्रशासन से शाह और दूसरे सभी पत्रकारों को तुरंत रिहा कर देने की मांग की है.

सीपीजे ने ये भी कहा, ''उन्होंने एफ़आईआर देखी जिसमें शाह पर आईपीसी के तहत राजद्रोह और लोगों को भड़काने के कथित आरोप लगाए गए हैं. इसके अलावा यूएपीए क़ानून के तहत ग़ैर क़ानूनी काम करने का भी आरोप लगाया गया है. यदि ये आरोप साबित हो गए तो उन्हें सात साल तक की सज़ा दी जा सकती है.''

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परिजनों का क्या कहना है?

फ़हाद शाह के परिवार वालों ने बीबीसी से बातचीत में बताया कि उनकी गिरफ़्तारी का ये मतलब है कि कश्मीर की एक आज़ाद आवाज़ को दबाया जा रहा है.

उनके भाई आकिब कहते हैं, "ये सब जो एक पत्रकार के साथ हो रहा है, ये सच को दबाने की कोशिश है. 'द कश्मीर वाला' किसी ख़ौफ़ और तासूब (पक्षपात) के बिना रिपोर्टिंग करता रहा है और आज भी वैसा ही कर रहा है. ये 'द कश्मीर वाला' की आवाज़ खामोश करने के लिए लिया गया क़दम है. जब कोई आज़ाद रिपोर्टिंग करता है, तो उनके साथ ऐसा नहीं होना चाहिए. फ़हद को इस तरह डराने की कोशिश पहले भी हो चुकी है. पहले छोटे-छोटे समन भेजे जाते थे. फ़हद ने आज़ादी से काम करना चाहा, जिसका नतीज़ा आप के सामने है."

वो आगे बताते हैं, "मेरे भाई ने किसी सपोर्ट के बिना "द कश्मीर वाला" इसलिए निकालना शुरू किया ताकि वो किसी की तरफ़दारी किए बग़ैर ख़बर को लोगों तक पहुंचा सके. वैसे भी 'आर्टिकल 370' हटने के बाद यहां सियासी तब्दीलियां हो चुकी हैं. फ़हद की गिरफ़्तारी कश्मीर में सच की आवाज़ को बंद करने का फ़रमान जैसा है."

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पुलवामा मुठभेड़ में क्या हुआ?

पुलवामा के नाइरा इलाके में मुठभेड़ ख़त्म होने के बाद पुलिस ने 30 जनवरी को बताया था कि उसमें चरमपंथी संगठन जैश ए मोहम्मद के चार चरमपंथी मारे गए.

इस मुठभेड़ में मारे जाने वाले चौथे शख़्स इनायत अहमद मीर थे. अपने बयान में पुलिस ने बताया था कि इनायत हाल ही में चरमपंथी गतिविधियों में शामिल हुआ था. हालाँकि, पुलिस ने इनायत के रिकार्ड के बारे में कुछ नहीं बताया था.

पुलिस बयान के बाद इनायत अहमद मीर, जिनके घर मुठभेड़ हुई थी, के परिजनों ने श्रीनगर के पुलिस कंट्रोल रूम के बाहर प्रदर्शन करके इनायत का शव वापस लौटाने की मांग की. इनायत की माँ ने मीडिया से कहा कि उनका बेटा "बेक़सूर" है.

परिजनों के इन दावों को स्थानीय मीडिया ने प्रकाशित किया था. "द कश्मीर वाला" ने भी उन दावों के साथ पुलिस के बयान को भी प्रकाशित किया.

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इनायत की बहन ने मोड़ा मामले का रुख़

हालाँकि, इस पूरे मामले ने उस समय एक नया मोड़ ले लिया, जब इनायत की बहन का वीडियो वायरल हो गया. उनके परिवार के दूसरे सदस्यों के उलट वे दूसरी कहानी बता रही थीं. हालाँकि, ये साफ़ नहीं हो सका कि ये वीडियो कहां रिकॉर्ड किया गया.

उस वीडियो में उनका कहना था कि इनायत भी घर में मौजूद थे और उन्होंने घर से बाहर आने से इनकार कर दिया था. उनकी बहन का उस वीडियो में ये भी कहना था कि उनका भाई चरमपंथियों के साथ ही बैठा था और उनके साथ ही मरना चाहता था.

उस वीडियो में इनायत की बहन से सवाल पूछने वालों की आवाज़ पुरुषों की थीं. वीडियो में लड़की के सिवा किसी दूसरे का चेहरा नहीं दिख रहा था.

पुलिस आईजी विजय कुमार ने मुठभेड़ के बाद प्रेस कॉन्फ़्रेन्स में बताया कि इनायत को आत्मसमर्पण का मौक़ा दिया गया था, लेकिन वे बाहर नहीं आए. उन्होंने ये भी कहा कि घर वालों ने भी उनसे आत्मसमर्पण करने को कहा, लेकिन उनकी भी बात उन्होंने नहीं मानी. साथ ही वे सुरक्षाबलों पर गोलियां चलाते रहे और चरमपंथियों के साथ मकान में घूमते रहे.

द कश्मीर वाला के संपादक फ़हीद शाह

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फ़हद शाह कौन हैं

फ़हद शाह ने 2010 में "द कश्मीर वाला" मैगज़ीन अंग्रेज़ी में शुरू की थी. बाद में उन्होंने उसी नाम से न्यूज़ पोर्टल भी शुरू किया.

वे कई अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थानों के लिए भी लिखते रहे हैं. ऐसे प्रकाशनों में टाइम, अल जज़ीरा, द गार्डियन, दी नेशन, फ़ॉरेन अफ़ेयर्स, फ़ॉरेन पॉलिसी, द अटलांटिक, द डिप्लोमेट आदि प्रमुख हैं.

शाह ने कश्मीर के एक कॉलेज से पत्रकारिता की डिग्री हासिल की थी. उसके बाद 2009 में उन्होंने श्रीनगर के अंग्रेज़ी दैनिक "ग्रेटर कश्मीर" में बतौर ट्रेनी रिपोर्टर पत्रकारिता का अपना सफ़र शुरू किया.

फिर उन्हें 2013 में लंदन यूनिवर्सिटी के छह फ़ेलिक्स विद्वानों में चुना गया. 2017 में फ़हद शाह अमेरिका के एक फ़ेलोशिप प्रोग्राम के लिए भी चुने गए.

शाह को उनके पोर्टल में छपी कई रिपोर्ट्स के लिए पुलिस उन्हें पहले भी कई बार तलब कर चुकी है. कुछ दिन पहले "द कश्मीर वाला" के एक ट्रेनी रिपोर्टर सज्जाद गुल को भी पुलिस ने उनके एक वीडियो ट्वीट के लिए हिरासत में लिया था.

वीडियो कैप्शन, अधिकारियों का कहना है कि क़ानून-व्यवस्था के मद्देनज़र इस तरह की गिरफ्तारियां ज़रूरी हैं.

कुछ दिनों बाद, अदालत से जमानत मिलने पर पुलिस ने सज्जाद गुल को एक दूसरे मामले में पब्लिक सेफ़्टी एक्ट (पीएसए) के तहत गिरफ़्तार कर जम्मू के कोट भलवाल जेल भेज दिया गया.

अगस्त 2019 में जम्मू और कश्मीर का विशेष दर्जा ख़त्म करने के बाद पुलिस ने अभी तक कश्मीर के कई पत्रकारों को उनकी रिपोर्टिंग के लिए तलब किया है और उनके घरों पर छापे भी मारे हैं.

वहीं "द कश्मीर वाला" के एक स्टाफ़ ज़ुनैद काटजू ने बीबीसी को बताया कि वे अपने संपादक की रिहाई के लिए क़ानूनी रास्ते तलाश रहे हैं.

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