जम्मू और कश्मीरः क्या ये महबूबा मुफ़्ती की राजनीति का 'द एंड' है?

महबूबा मुफ़्ती

इमेज स्रोत, Bilal Bahadur/BBC

    • Author, माजिद जहांगीर
    • पदनाम, श्रीनगर से, बीबीसी हिंदी के लिए

आने वाले वक़्त में महबूबा मुफ़्ती की राजनीति कैसी होगी?

कश्मीर के सियासी हलकों और आम लोगों के बीच इन दिनों अक्सर इस सवाल पर बहस छिड़ जाती है.

बीते एक महीने में महबूबा मुफ़्ती की पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी छोड़ने वाले नेताओं की लिस्ट लगातार लंबी होती जा रही है.

पीडीपी छोड़ने वाले लोगों में पूर्व विधायकों से लेकर महबूबा सरकार में मंत्री रहे नेता और संगठन के कद्दावर नाम भी शामिल हैं.

बाग़ी नेताओं में से कुछ ने तो दूसरे राजनीतिक दलों का दामन भी थाम लिया है.

अभी तक जिन बड़े नामों ने पीडीपी छोड़ी है, उनमें पूर्व मंत्री डॉक्टर हसीब द्राबू ,पूर्व मंत्री इमरान अंसारी, पूर्व मंत्री बशारत बुखारी, पूर्व मंत्री पीर मोहमद हुसैन, पूर्व विधायक आबिद अंसारी, पूर्व विधायक अब्बास वाणी और पूर्व पुलिस आईजी राजा एजाज़ शामिल हैं.

महबूबा मुफ़्ती

इमेज स्रोत, J&K Government Handout

पीडीपी-बीजेपी सरकार

सितंबर, 2016 में पीडीपी के वरिष्ठ नेता और पूर्व संसद तारिक़ हामिद कारा पार्टी छोड़कर कांग्रेस में शामिल हो गए थे.

कारा का इस्तीफ़ा ऐसे समय में सामने आया था जब कश्मीर में हिज़्बुल कमांडर की एनकाउंटर में मौत के बाद क़रीब छह महीने तक भारत विरोधी प्रदर्शनों की लहर चल रही थी.

कारा ने उस वक़्त पीडीपी से अलग होने की वजह ये बताई थी कि राज्य में पीडीपी-बीजेपी सरकार आरएसएस के एजेंडे पर चल रही है.

उन्होंने महबूबा सरकार पर ये भी इलज़ाम लगाया था कि कश्मीर में जारी प्रदर्शनों को रोकने के लिए सुरक्षा बल बड़े पैमाने पर ताक़त का इस्तेमाल कर रहे हैं.

पीडीपी में बढ़ती बगावत के चलते महबूबा मुफ़्ती ने कुछ दिन पहले पार्टी के वरिष्ठ नेता और संस्थापक सदस्य मुज़फ़्फ़र हुसैन बेग़ को पार्टी का सरपरस्त नियुक्त किया है.

Presentational grey line
Presentational grey line
जम्मू और कश्मीर

इमेज स्रोत, PIB

पीडीपी के अंर भगदड़

जम्मू और कश्मीर में पीडीपी और बीजेपी की गठबंधन सरकार बीते 19 जून को टूट गई थी.

इसके बाद से ही पीडीपी के अंदर भगदड़ मचने की शुरुआत हो गई थी.

साल 2014 के विधानसभा चुनावों में पीडीपी ने आम लोगों से ये कहकर वोट माँगा था कि पार्टी बीजेपी को कश्मीर से बाहर रखना चाहती है.

पीडीपी छोड़ने वाले ज़्यादातर नेता अपने फ़ैसले की वजह यही बता रहे हैं कि उनकी पार्टी अपने वादे से पीछे हट गई.

इन नेताओं का कहना है कि पीडीपी ने बाद में उसी बीजेपी से हाथ मिलाया, जिसके ख़िलाफ़ उन्होंने लोगों से वोट माँगा था.

Presentational grey line
Presentational grey line
वीडियो कैप्शन, भारत प्रशासित कश्मीर के उपमुख्यमंत्री के मुताबिक सही माहौल में ही हो सकती है पाक से बातचीत

पीडीपी नेताओं के बयान

महबूबा सरकार में मंत्री रहे पीर मोहम्मद हुसैन ने 19 दिसंबर को पार्टी छोड़ने पर कहा, "हमने चुनाव में लोगों से जो वादे किए थे, वो वादे पूरे नहीं किए. ख़ासकर, जब हमने लोगों से ये कहा कि बीजेपी को कश्मीर से बाहर रखने के लिए ज़रूरी है कि पीडीपी को वोट दिया जाए."

"लेकिन बाद में हमने बीजेपी से हाथ मिलाया और उनको कश्मीर की सत्ता में लाए. ये हम लोग थे जिनकी वजह से बीजेपी को कश्मीर की हुकूमत में आने का रास्ता मिला."

पीडीपी-बीजेपी सरकार में रहे मंत्री सईद बशारत बुखारी ने नेशनल कॉन्फ्रेंस में शामिल होने के मौके पर पर बताया कि पीडीपी छोड़ने के लिए आख़िर वो क्यों मजबूर हो गए.

उन्होंने कहा, "जहां मुझे विरोध करना था, मैंने किया. जहां मुझे बात नहीं सुननी थी, मैंने नहीं सुनी. मुझे लगता है कि महबूबा जी अब बहुत समझदार हो गई हैं. मेरी सोच की परवाज़ उनकी सोच तक नहीं पहुंच पा रही है. तो मैं उनको बार-बार परेशान क्यों करूं?"

जून में सरकार गिरने के बाद बग़ावत का झंडा उठाने वाले पूर्व मंत्री इमरान अंसारी ने पीडीपी पर 'खानदानी' पार्टी होने का आरोप लगाया था.

अंसारी ने ये भी कहा था कि पीडीपी खानदान के कुछ लोगों की पार्टी बनकर रह गई है, जहां दूसरे लोगों का दम घुंट रहा है.

Presentational grey line
Presentational grey line
वीडियो कैप्शन, कश्मीर घाटी में बीजेपी का मुस्लिम चेहरा

सत्ता में पीडीपी का सफ़र

साल 1997 में पार्टी के संस्थापक मुफ़्ती मोहम्मद सईद ने पीडीपी की बुनियाद रखी थी.

दो साल बाद बिजबिहाड़ा निर्वाचन क्षेत्र से पीडीपी नेता अब्दुल रहमान वेरी की जीत के साथ पार्टी ने जम्मू और कश्मीर विधानसभा में पहली बार अपना खाता खोला.

साल 2002 के विधानसभा चुनावों में पीडीपी ने 16, 2008 में 24 और 2014 में 28 सीटों पर कामयाबी हासिल की.

साल 2014 में मुफ़्ती मोहम्मद सईद ने बीजेपी के साथ हाथ मिलाकर जम्मू और कश्मीर में गठबंधन सरकार बनाई थी.

पहली जनवरी, 2016 को मुफ़्ती मोहम्मद सईद के निधन के बाद महबूबा मुफ़्ती ने पीडीपी-बीजेपी सरकार की कमान संभाली.

Presentational grey line
Presentational grey line
वीडियो कैप्शन, कश्मीर : बीजेपी कार्यकर्ताओं की मुश्किलें

राजनीतिक इमारत

'कश्मीर का मसला सुलझाने के लिए पाकिस्तान से बातचीत ज़रूरी है.'

पीडीपी ने राज्य में अपनी सियासी पारी शुरू करने के साथ ही इस बात पर अपनी राजनीतिक इमारत खड़ी करने की कोशिश की थी.

चुनावों में पार्टी ने ये नारा भी दिया, "बंदूक से न गोली से... बात बनेगी बोली से..."

इस तरह के नारों से कश्मीर में पीडीपी की छवि एक नरम राजनीतिक दल की बनने लगी और आम लोगों के बीच पार्टी को अपनी जगह बनाने में कामयाबी मिली.

लेकिन विश्लेषक कहते हैं कि जिन नारों और जिस सियासी फलसफे के साथ पार्टी ने लोगों की सोच पर पकड़ बनाई थी, उस सोच से वो दूर होती नज़र आने लगी थी. इसका नतीजा ये निकला कि पार्टी अब अपने वजूद की जंग लड़ने के लिए भी कमज़ोर पड़ गई है.

Presentational grey line
Presentational grey line
वीडियो कैप्शन, आठ साल जेल के बाद अब चुनाव के मैदान में

दल बदलने वालों की दलील

विश्लेषक और पत्रकार खुर्शीद वानी कहते हैं, "पीडीपी जिन मुद्दों को लेकर लोगों के सामने गई थी, उन मुद्दों से उसने किनारा कर लिया. वो मानवाधिकार की बात करते थे और सबसे ज़्यादा अगर किसी सरकार के दौर में इसका उल्लंघन हुआ तो वो पीडीपी का ही दौर था जो बीते तीन सालों में गुज़रा."

"पीडीपी बातचीत की बात करती थी और दूसरे कई अहम मुद्दे थे, जिनको वो भूल गई. बीजेपी के साथ हाथ मिलाकर पीडीपी ने अपने सारे दावों पर सवाल खड़े कर दिए."

वानी कहते हैं कि जो लोग पीडीपी को छोड़ रहे हैं, उन्हें लग रहा है कि वो अपनी साख बचा लेंगे.

"मुझे नहीं लगता कि दलबदल करने वाले लोग इसमें कामयाब हो पाएंगे क्योंकि जहां वे जा रहे हैं, वहां भी वही पीडीपी वाला ही मामला है. नेशनल कॉन्फ्रेंस भी वही दलीलें देती आई हैं. उसने भी बातचीत की पैरवी की है. लेकिन लोगों को सुरक्षा देने में वो भी उसी तरह नाकाम रही है, जिस तरह पीडीपी."

Presentational grey line
Presentational grey line
वीडियो कैप्शन, कश्मीर में महफ़ूज़ नहीं

क्या महबूबा अकेले ज़िम्मेदार हैं?

पीडीपी के मौजूदा संकट के हवाले से कुछ हलकों में ये बहस भी चल रही है कि क्या पीडीपी के हालात के लिए सिर्फ महबूबा मुफ़्ती अकेले ज़िम्मेदार हैं?

वानी कहते हैं, "इलज़ाम तो महबूबा मुफ़्ती पर ही आएगा. दरअसल, पार्टी में संकट की शुरुआत पीडीपी-बीजेपी गठबंधन से हुई. गठजोड़ महबूबा मुफ़्ती ने नहीं बल्कि मुफ़्ती सईद ने किया था."

"और बहुत समय तक पीडीपी नेताओं ने ये जस्टिफाई करने की कोशिश की थी कि बीजेपी के साथ गठजोड़ किया गया, वो गठजोड़ उसूलों की बुनियाद पर किया था."

"लेकिन अब हालात ऐसे हो गए हैं कि महबूबा मुफ़्ती भी ये कहने लगी हैं कि बीजेपी के साथ हाथ मिलाना पीडीपी की एक बहुत बड़ी सियासी गलती थी."

"महबूबा मुफ़्ती पर सवाल उठे हैं, उठते रहेंगे, क्योंकि वो अपनी पार्टी के आर्ग्यूमेंट्स को बचा नहीं पाईं. दूसरी अहम बात ये है कि जब तक बीजेपी ने सरकार से समर्थन वापस नहीं ले लिया, महबूबा सत्ता के साथ चिपकी रहीं."

"वहां पर भी वो सियासी तौर बालिग साबित नहीं हो सकीं. इन्हीं वजहों से महबूबा मुफ़्ती की लीडरशिप पर उंगलियाँ उठ रही हैं. आने वाले दिनों में पीडीपी में और बिखराव हो सकता है."

Presentational grey line
Presentational grey line
वीडियो कैप्शन, कश्मीर में गोलियों की गूंज के बीच पसरा सन्नाटा

अस्तित्व का संकट

वानी ये भी कहते हैं कि पीडीपी इस समय अपने वजूद के संकट में फँस गई है.

हालांकि कुछ राजनीतिक विश्लेषक ये ज़रूर मानते हैं कि पीडीपी का संकट गहराता जा रहा है लेकिन वे इस बात से सहमत नहीं है कि ये महबूबा मुफ़्ती की राजनीति का अंत है.

कश्मीर सेंट्रल यूनिवर्सिटी में राजनीति और गवर्नेंस के प्रोफ़ेसर नूर मोहमद बाबा कहते हैं, "अंत कहना एक बड़ी बात है. जो लोग पार्टी छोड़कर जा रहे हैं, उनको लगता है कि इस पार्टी का सियासी मुस्तक़बिल अच्छा नहीं है."

"अगले चुनाव में जीतने का संभावना कम हो गई है. पार्टी के अंदर जो लोग हैं, वो भी इस बात को पढ़ पा रहे हैं. पार्टी में लीडरशिप का संकट पैदा हो गया है. ऐसा नहीं है कि पार्टी ही ख़त्म हो गई है. ख़त्म होने में भी काफी समय लगता है."

Presentational grey line
Presentational grey line
वीडियो कैप्शन, कश्मीर: पैलेट गन की शिकार 20 महीने की हीबा

बाबा कहते हैं कि पार्टी को सुधारा भी जा सकता है, "जब पीडीपी मैदान में आई थी तो उसके आगे नेशनल कॉन्फ्रेंस काफी कमज़ोर हो गयी थी. लेकिन अब पीडीपी एनसी के आगे कमज़ोर पड़ गई है और एनसी का मुस्तक़बिल फिलहाल ठीक नज़र आ रहा है."

"कश्मीर के सियासी हालात में अनिश्चितता बहुत रहती है. अब पीडीपी के लिए ये चुनौती है कि वो इस संकट से कैसे निकल पाती है."

बाबा ये भी कहते हैं कि शायद मुफ़्ती सईद आज होते तो ऐसी स्थिति का पीडीपी को सामना नहीं करना पड़ता.

"मुफ़्ती सईद का अनुभव बहुत ज़्यादा था. ये सब चीज़ें इन हालात में वे संभाल सकते थे. बीजेपी भी उनको छोड़ कर नहीं जाती. मुफ़्ती सईद की मौत के साथ ही बीजेपी-पीडीपी के अविश्वास बढ़ने लगा. मुफ़्ती सईद की शख्सियत लोगों को क़बूल थी. महबूबा मुफ़्ती में वो बात नहीं है."

वीडियो कैप्शन, मोदी की सोच वाजपेयी जैसी नहीं- महबूबा

क्या कहती है पीडीपी

पीडीपी के प्रवक्ता रफ़ी अहमद मीर पार्टी में पैदा हुए संकट के बारे में कहते हैं कि पार्टी छोड़कर जितने भी नेता जा रहे हैं, उन सब की एक ही वजह नहीं हो सकती है.

रफ़ी अहमद ने बीबीसी से कहा, "कुछ लोग चुनाव नज़दीक आते ही किसी सियासी जमात में असुरक्षित महसूस करने लगते हैं. कुछ का लीडरशिप से विवाद होता है. सब की अपनी-अपनी वजहें होती हैं."

ये पूछने पर कि क्या बीजेपी के साथ गठबंधन के कारण ही नेता पार्टी छोड़ रहे हैं, मीर कहते हैं, "मुझे नहीं लगता है. जो लोग गठबंधन सरकार में शामिल थे, उनकी तो कोई वजह नहीं बनती. अगर ऐसा होता तो वो सरकार बनते ही अलग हो गए होते."

"मेरा ही नहीं बल्कि पार्टी का भी ये स्टैंड है कि बीजेपी के साथ जाने से पार्टी को काफी नुकसान होआ है. लोगों को हमारा गठबंधन ठीक नहीं लगा. हम ज़्यादा कुछ हासिल नहीं कर सके."

Presentational grey line
Presentational grey line
वीडियो कैप्शन, 'हम पाकिस्तान क्यों चले जाएं ?'

सरकार बनाने की एक और कोशिश

21 नवंबर 2018 को पीडीपी ने एनसी और कांग्रेस के समर्थन से एक बार फिर जम्मू और कश्मीर में सरकार बनाने की कोशिश की थी, जो कामयाब नहीं हुई.

पीडीपी अध्यक्ष महबूबा मुफ़्ती ने दावा किया था कि उनकी पार्टी ने राज्यपाल को पत्र लिखकर सरकार बनाने का दावा पेश किया था.

सरकार बनाने के महबूबा के दावे के साथ ही बीजेपी के क़रीबी पीपुल्स कॉन्फ्रेंस के मुखिया सज्जाद लोन ने भी बीजेपी के समर्थन से सरकार बनाने का दावा पेश किया था.

दोनों के सरकार बनाने का दावा पेश करने के साथ ही राज्यपाल ने विधानसभा को भंग कर दिया था.

जम्मू और कश्मीर में बीते 20 दिसंबर से राष्ट्रपति शासन लगा हुआ है. 19 दिसंबर को राज्य में राज्यपाल शासन समाप्त हो गया था.

वीडियो कैप्शन, भारतीय कश्मीरी ने क्यों चुना पाकिस्तानी पति?

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)