कैसी थी कश्मीर की मिलिटेंसी जिसका महबूबा मुफ़्ती ज़िक्र कर रही हैं

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    • Author, ज़ुबैर अहमद
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली

आख़िर 'कश्मीर की मिलिटेंसी' कैसी थी कि उसे लेकर जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती को अब चेतावनी देनी पड़ी है.

शुक्रवार को महबूबा ने कहा कि अगर केंद्र सरकार इसी तरह से हस्तक्षेप करती रही तो उन्हें लगता है कि साल 1987 का दौर कश्मीर को दोबारा देखना पड़ेगा. तब एक सलाहुद्दीन और यासीन मलिक का जन्म हुआ था. कुछ उसी तरह के ख़तरनाक परिणाम पीडीपी को तोड़ने की कोशिशों से हो सकते हैं.

महबूबा मुफ़्ती के इस बयान को उनकी पूर्व सहयोगी भारतीय जनता पार्टी पर हमले के रूप में देखा जा रहा है.

महबूबा मुफ़्ती की ओर से 1987 का हवाला दिए जाने और यासीन मालिक के साथ सलाहुद्दीन जैसे लोगों के पैदा होने का ज़िक्र करने का क्या मतलब है?

उस समय कश्मीर में हालात कैसे थे जिसकी तरफ़ उन्होंने अपने धमकी भरे बयान में इशारा किया है?

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1987 का चुनाव और युवाओं को मोहभंग

साल 1987 में जम्मू-कश्मीर में विधानसभा का चुनाव हुआ था. कश्मीरी युवाओं ने इसमें बहुत उत्साह और गंभीरता से भाग लिया था.

इन युवाओं में एक थे आज के पाकिस्तान स्थित हिज़्बुल मुजाहिदीन के कमांडर सैयद सलाहुद्दीन. श्रीनगर के निवासी सलाहुद्दीन चुनाव में अपने असली नाम सैयद यूसुफ़ शाह के नाम से लड़े थे.

अलगाववादी नेता यासीन मालिक इस चुनाव में एक उत्साही प्रचारक थे. लेकिन चुनाव के नतीजों पर ज़बरदस्त धांधली का इलज़ाम लगा. अलगाववादी पार्टियों का गठजोड़ मुस्लिम यूनाइटेड फ़्रंट चुनाव में आगे बताया गया.

बाद में इसने हुर्रियत कॉन्फ़्रेंस की शक्ल ले ली. कुछ जानकारों के अनुसार इस चुनाव में कथित धांधली कश्मीर के इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना साबित हुई.

युवाओं ने बंदूक उठा ली और हिंसा के सहारे लड़ने का फ़ैसला किया.

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'तब ये एक लोकप्रिय आंदोलन था'

राजनीतिक विशेषज्ञ बशीर मंज़र के अनुसार इस घटना का परिणाम ये हुआ कि घाटी में हिंसा शुरू हो गयी. इसने साल 1989 में सशस्त्र मिलिटेंसी की शक़्ल ले ली.

बशीर ने कहा, "1990 के दशक की मिलिटेंसी आज की मिलिटेंसी से बहुत अलग थी. एक तो ये कि उस समय बहुत सारे लोग मिलिटेंसी में शामिल थे. आज तो सरकार के अनुसार 200-250 लोग ही मिलिटेंट हैं."

बशीर मंज़र ख़ुद भारत प्रशासित कश्मीर में रहते हैं. वो कहते हैं, "आप कह सकते हैं कि उस समय ये एक लोकप्रिय आंदोलन था. सारे लोग सड़कों पर उतर आए थे."

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भारत का पहला मुस्लिम गृह मंत्री

8 दिसंबर, 1989 को महबूबा मुफ़्ती की बहन रुबैया सईद का अपहरण हुआ था. इस घटना से कुछ दिन पहले ही उनके पिता मुफ़्ती मोहम्मद सईद देश के पहले मुस्लिम गृह मंत्री बने थे.

उन्होंने बेटी को छुड़ाने के लिए मिलिटेंट्स की शर्तें मान ली और एक दर्जन मिलिटेंट्स को जेलों से रिहा कर दिया गया. इससे मिलिटेंसी को काफ़ी बल मिला.

बशीर मंज़र कहते हैं, "इस घटना ने मिलिटेंसी को उस ऊंचाई पर पहुँचा दिया था जहाँ हर किसी को लगने लगा कि बस आज नहीं तो कल कश्मीर भारत से आज़ाद हो ही जाएगा."

साल 1989 में पाकिस्तान से ट्रेनिंग हासिल करके वापस लौटने वाले मिलिटेंट्स में से एक मोहम्मद फ़ारूक़ भी थे.

उन्होंने पिछले साल बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में कहा था कि पाकिस्तान से लौटकर वो सभी लोग काफ़ी जोश में थे.

मोहम्मद फ़ारूक़ ने कहा था, "मैं अपनी तंज़ीम का श्रीनगर कमांडर था. उस वक़्त मैंने कई ऑपरेशन लीड किए थे. मैं उनका हिस्सा था. हमें लगता था कि आम लोग हमारे साथ थे."

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भागते कश्मीरी पंडित

उस वक़्त पुलिस की कमर टूट चुकी थी और क़ानून व्यवस्था अधिकारियों के हाथ से निकलती दिख रही थी.

बशीर मंज़र के मुताबिक़, उस समय बहुत सारे मिलिटेंट ग्रुप्स हुआ करते थे जिनका पूरा कंट्रोल था और सेना व सुरक्षा बलों के लोग अंदर मोहल्लों में नहीं आ सकते थे.

कश्मीरी पंडितों के ख़िलाफ़ हमले शुरू हो गए थे. इसके बाद उनका घाटी से पलायन होने लगा था.

जिन मोहल्लों से वो जान बचाकर भागे थे, उनमे श्रीनगर का रैनावाड़ी इलाक़ा भी था.

उस समय एक रिपोर्टर के तौर पर मैंने रैनावाड़ी में कश्मीरी पंडितों के घरों को अंदर से देखा था. उन घरों को देखकर ऐसा लगता था कि अभी भूकंप आया है जिसके कारण लोग अपने घरों को छोड़कर फ़रार हो गये हैं.

कमरों में कपड़े, चप्पल, जूते इत्यादि बिखरे पड़े थे. किचन में बर्तन भी इधर-उधर बिखरे पड़े थे.

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आज का समय तब से भी ख़राब

मिलिटेंट्स ने उस इलाक़े में अपना एक ट्रेनिंग सेंटर बनाया हुआ था. मेरे वहाँ जाने से कुछ समय पहले ही मिलिटेंट्स की सफ़ाई की गयी थी.

उस समय वहाँ तैनात बीएसएफ़ के कमांडर शिवजी ने कहा था, "रैनावाड़ी को हम ने मिलिटेंट्स से आज़ाद करा लिया है."

हालात नार्मल होने में कई साल लगे. और 1996 में आख़िरकार विधानसभा का चुनाव कराया गया.

मोहम्मद अली वतानी कश्मीर पुलिस के एक रिटायर्ड अफ़सर हैं. उनके मुताबिक़ कश्मीर में हालात महबूबा मुफ़्ती सरकार के समय से ही ख़राब चल रहे हैं.

उनका दावा है कि आज के हालात 1990 के दशक से भी ख़राब हैं.

वो कहते हैं, "पहले कश्मीरी मिलिटेंट पाकिस्तान से ट्रेनिंग लेकर आता था. आज उसे पाकिस्तान जाने की ज़रूरत ही नहीं है क्यूंकि उसे ट्रेनिंग भी यहीं मिल जाती है और हथियार भी."

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'आज की मिलिटेंसी अराजक है'

मोहम्मद अली वतानी कहते हैं कि महबूबा मुफ़्ती का ये बयान कि भाजपा उनकी पार्टी को तोड़ना चाहती है, बेबुनियाद है. क्यूंकि मिलिटेंट तो युवा बन रहा है. पीडीपी टूटे या मज़बूत हो, इससे उन्हें कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता.

बशीर मंज़र एक तरह से वतानी से सहमत हैं. वो कहते हैं कि आज की मिलिटेंसी एक बेलगाम घोड़े की तरह है. कौन किसके लिए लड़ रहा है किसी को नहीं मालूम. आज की मिलिटेंसी अराजक है. उस ज़माने में वो आज से काफ़ी ज़्यादा आयोजित थी.

दोनों ये मानते हैं कि महबूबा मुफ़्ती के बयान से घाटी के लोगों पर कोई असर नहीं होगा.

पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्लाह ने भी ट्वीट करके कहा है कि महबूबा मुफ़्ती जब सत्ता में थीं, युवा मिलिटेंट उस समय ही बनना शुरू हो चुके थे.

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