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'नए साल का तोहफ़ा भयानक था' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
इससे पहले मैंने आपको बताया था कि नवंबर आते-आते कई बिल्डर बक़ाएदार हो गए और मेरी कंपनी का खाता सूखने लगा. आपको बता दूँ कि अगस्त, 2008 से पहले मेरी कंपनी में 50 आर्किटेक्ट काम करते थे. अक्तूबर तक यह सौ का आँकड़ा पार कर गया. मुझे लग रहा था कि अभी नौकरी पर कोई ख़तरा नहीं है क्योंकि जो कंपनी नए लोगों को बहाल कर रही हो, वो पुराने बंदे को क्यों निकालेगी. लेकिन नवंबर के आख़िर तक माजरा कुछ और ही था. धीरे-धीरे लोग निकाले जाने लगे. मेरे बॉस ने इसके बावजूद मुझे भरोसा दिलाया कि तुम तो पुराने बंदे हो, चिंता की कोई ज़रूरत नहीं. मेरी नौकरी बची रहेगी, ये विश्वास करने का एकमात्र कारण यही था कि मैं जिस प्रोजेक्ट पर था वो पूरा नहीं हुआ था. कंपनी की रणनीति ये थी कि हाल में नियुक्त हुए तीन में से दो को नौकरी से निकाल दो. अभद्रता मेरे बॉस ने मुझे जो भरोसा दिलाया था, वो टिकाऊ साबित नहीं हो सका. मेरे काम को लेकर टीका टिप्पणी शुरु हुई. फिर ऑफ़िस आने-जाने के टाइम को लेकर टोका गया.
मेरे ऑफ़िस का टाइम नियम के मुताबिक सुबह नौ बज़े से शाम छह बज़े तक होता है लेकिन मैं रात के दस बजे तक भी रुकता था. एक दिन मुझे ऑफ़िस पहुँचने में दस-पंद्रह मिनट की देर हो गई. मेरे बॉस का कहना था, 'फ़राज़ भाई ये ठीक नहीं है. समय से आइए'. मैंने उनसे कहा, सर मैं निकलता तो बहुत देर से हूँ लेकिन मुझसे अभद्रता बरती गई और कहा गया, 'जवाब देते हो, सुनना सीखो'. मैंने समय से आना शुरु किया, चाहे जाने के टाइम पर बॉस की निगाह पड़ती हो या नहीं. लेकिन दस दिनों बाद ही मेरे प्रदर्शन को लेकर सवाल उठाए जाने लगे. दिसंबर के आख़िर तक मेरे साथ ऑफ़िस में बुरा बर्ताव होने लगा. हालाँकि ऐसा मैं मान रहा था. ऑफ़िस में तो लोग यही मान रहे थे मेरा ही बर्ताव ठीक नहीं है. ये कैसा तोहफ़ा दिसंबर के आख़िरी हफ़्ते में ये स्पष्ट हो चुका था कि मुझे नौकरी से निकाला जा सकता है. और वो घड़ी आ ही गई. 26 या 27 दिसंबर को मुझे बॉस ने बुलाया और नोएडा प्रोजेक्ट की प्रोग्रेस रिपोर्ट के बारे में पूछा. मैंने जवाब दिया कि साठ फ़ीसदी काम पूरा हो चुका है, चालीस फ़ीसदी बचा है जो दिए गए तीन महीने में पूरा हो जाएगा. लेकिन बॉस का कहना था, "मुझे लगता है कि तुम किसी और कंपनी में ज़्यादा बेहतर काम कर सकते हो. हमने तुम्हारी जगह किसी और को रख लिया है." मैंने जैसे ही कहा कि कम से कम मौजूदा प्रोजेक्ट पूरा करने दें, तो जवाब मिला, "तुम एक महीने के नोटिस पर हो. इस्तीफ़ा दे दो या बर्ख़ास्त करेंगे". मेरे ऑफ़िस ने मुझे नए साल का यही तोहफ़ा दिया जिसे स्वीकार करने के अलावा कोई चारा नहीं था. मैंने इस्तीफ़ा देना बेहतर समझा क्योंकि बर्ख़ास्तगी की चिट्ठी को लेकर साथ चलने से कहीं भी नौकरी मिलने में और दिक्कत होती. (फ़राज़ ख़ान की आपबीती बीबीसी संवाददाता आलोक कुमार से उनकी बातचीत पर आधारित है. फ़राज़ मंगलवार को बताएंगे कि वो फिलहाल क्या कर रहे हैं?) |
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