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मंगलवार, 10 फ़रवरी, 2009 को 06:14 GMT तक के समाचार
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'एक मिनट में जैसे सब ख़त्म हो गया'

कंप्यूटर
मंदी के कारण भारत समेत दुनिया भर में लाखों लोगों की नौकरियाँ जा रही हैं
तेरह जनवरी का दिन था और मैं रोज़ की तरह सुबह नौ बजे अपने नोएडा ऑफ़िस में हाज़िर था.

अन्य दिनों की तरह उस दिन भी दफ़्तर में काफ़ी हलचल थी. हमारी कंपनी के कामकाज के बारे में कोई जानकारी मिली थी. इसकी सूचना कंपनी के अमरीका स्थित इंडियानोपोलिस मुख्यालय से ई-मेल के ज़रिए दी गई थी.

दोपहर का लंच हमने अपने साथियों के साथ किया और फिर जुट गए काम पर.

शाम लगभग तीन बजे हमारे एचआर हेड ने मुझे बुलाया. मुझे लगा किसी नए प्रोजेक्ट की ज़िम्मेदारी मिलने वाली है क्योंकि काम के मामले में मैं उस्ताद समझा जाता था.

 सोचा कि पिछले साल जून में ही मैंने कंपनी ज्वाइन की थी और दिसंबर में मेरा प्रोबेशन ख़त्म हुआ था. काम को देखते हुए मैं पर्मानेंट स्टाफ़ बना था. फिर 15 दिनों में ऐसा क्या हुआ कि मुझे निकालने का फ़ैसला कर लिया गया?
सॉफ़्टवेयर इंजीनियर अजय शर्मा

मैं बॉस के केबिन में पहुँचा. मुझे उन्होंने बैठने को कहा और हाल-चाल भी पूछा. वो पहले की तरह ही बातें कर रहे थे.

लेकिन अचानक वो पूछ बैठे- "तुम तो शायद कहीं और नौकरी ढूंढ़ रहे थे. क्या हुआ? कहीं कुछ मिला."

मैंने उनसे कहा कि ऐसी कोई बात नहीं है. दरअसल कुछ महीने पहले कुछ दोस्तों ने ऑफ़िस में ऐसी हवा बना दी थी कि मैं कहीं और जा रहा हूँ.

'आप कहीं और देख लीजिए'

फिर वो सीधे मुद्दे पर आ गए. मुझसे कहा गया, "आप कहीं और देख लीजिए. मार्केट की हालत तो पता ही है. कंपनी दिक्कत में है. एक माह की सैलरी आपको दी जा रही है."

मिनटों में ऐसा लगा मानों पैरों तले ज़मीन खिसक गई

मेरी साँस अटक गई क्योंकि मुझे पता था कि इस माहौल में नई नौकरी ढूँढना नामुमकिन है.

सिर्फ़ इतना ही पूछा - "सर अचानक ऐसा क्यो हो गया? अभी तक तो आप मुझसे यहीं काम करते रहने और बाहर का चक्कर छोड़ने की बात किया करते थे?"

जवाब मिला, "देखो अजय, हम भी बंधे हुए हैं. फ़ैसला तो कंपनी का है. एक माह की सैलरी मिल ही रही है, इस बीच कुछ न कुछ तो ढूँढ़ ही लोगे."

ये सब इतना जल्दी हुआ कि मुझे कुछ सूझ नहीं रहा था. वहीं पर इस्तीफ़ा देने को कहा गया. मुझे पता था ऐसा नहीं करने पर हो सकता है कि बर्ख़ास्तगी की चिट्ठी थमा दी जाती.

मिनटों में गई नौकरी

इसलिए मैंने तुरंत इस्तीफ़ा दिया. डेस्क पर वापस आते ही मेरे चेहरे से ही साथियों ने भाँप लिया कि कुछ गड़बड़ है.

फिर मैंने उन्हें ये बात बताई. बैग पैक किया और टेलीफ़ोन पर ही गीता (पत्नी) को ये सूचना दे दी. फ़ोन पर ये बताकर मैंने ग़लती की, ये घर जाकर पता चला....

 बैग पैक किया और टेलीफ़ोन पर ही गीता (पत्नी) को ये सूचना दे दी. फ़ोन पर ये बताकर मैंने ग़लती की, ये घर जाकर पता चला.

उस दिन कोई रोकने वाला तो था नहीं, इसलिए चार बजे घर वापस लौटने लगा. ऑफ़िस के साथियों ने ढाँढस बंधाया.

मन में कई तरह के द्वंद्व थे....सीनियर सॉफ़्टवेयर इंजीनियर की नौकरी तुरंत कहाँ मिलेगी, क्या आगरा यूनिवर्सिटी से आईटी की पढ़ाई करना ही ग़लत फ़ैसला था, क्या मुझे वकालत के ख़ानदानी पेशे को अपनाना चाहिए था? इत्यादि, इत्यादि....

ये भी सोचा कि पिछले साल जून में ही मैंने कंपनी ज्वाइन की थी और दिसंबर में मेरा प्रोबेशन ख़त्म हुआ था. काम को देखते हुए मैं पर्मानेंट स्टाफ़ बना था. फिर 15 दिनों में ऐसा क्या हुआ कि मुझे निकालने का फ़ैसला कर लिया गया?

ख़ैर जिस दिन ये सब कुछ हुआ, उसी दिन मेरी बीवी एक नया संकट मोल लेने जा रही थीं.... संकट शब्द का इस्तेमाल दरअसल बदली परिस्थितियों में करना पड़ा.

इसकी चर्चा अगले अंक में करुंगा..

(अजय की आपबीती बीबीसी संवाददाता आलोक कुमार से उनकी बातचीत पर आधारित है. इसकी अगली कड़ी में शुक्रवार को अजय आपको बताएंगे कि नौकरी से हटाए जाने के बाद उनपर, उनके परिवार पर क्या बीत रही है. उस समय घर में कैसा माहौल था और तुरंत किन मुश्किलों का सामना उन्हें करना पड़ा.)

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