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'मैनेजमेंट के हथकंडों ने मजबूर कर दिया' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
मेरे बैंक को शेयर कारोबार वाले विभाग में घाटा हो रहा था, ये तो स्पष्ट चुका था. गाहे-बगाहे अस्थायी कर्मचारियों की छँटनी से भय का भूत भी मेरे जैसे 25 कर्मचारियों पर सवार था. पर प्रबंधन ने असली वार करना शुरु किया अक्तूबर-नवंबर से जब भारत का शेयर बाज़ार गोता लगा रहा था. सर्दियों के मौसम में ऑफ़िस के नीचे चायवाले का अड्डा ही ऐसी जगह थी जहाँ हम लोग ऑफ़िस के अंदर की हलचल पर चर्चा करते थे. वहीं एक सहयोगी राजेश (परिवर्तित नाम) ने एक दिन ख़बर पक्की होने का दावा करते हुए कहा कि हमारा बैंक इक्विटी डिवीज़न बंद करने जा रहा है. सभी के होश फ़ाख़्ता हो गए लेकिन हमने ये कह कर अपने दिलों को धैर्य दिलाया कि जो ये बात बता रहा है वो एक नंबर का झूठा है. यही नहीं उसी चायवाले के पास राजेश को छाँट कर हम लोगों ने दो घंटे के भीतर और एक और बैठक की. इस बार सिर्फ़ यही चर्चा होती रही कि राजेश ने इससे पहले भी ऑफ़िस के बारे में क्या-क्या ऐसा कहा था जो ग़लत साबित हुआ. कमाल के हथकंडे लेकिन जो होना था, वही हुआ. नए साल की सौगात प्रबंधन की ओर से एक-एक कर इक्विटी डिवीज़न के सभी सदस्यों को मिलने लगी. मेरे कुछ दोस्तों को मुंबई स्थित एचआर विभाग के बॉस ने फ़ोन किया और उन्हें बैंक की हालत समझाई, पर क्यों? संदेश का आशय यही था कि ख़ुद ही नौकरी छोड़ दो.
इसी जनवरी की बात है, मैं ऑफ़िस पहुँचा ही था कि मुंबई ऑफ़िस से मेरे नाम की चिट्ठी मिली. उसमें ये लिखा था कि आपका तबादला कोल्हापुर किया जा रहा है. मैंने सोचा कि कोल्हापुर में इक्विटी डिवीज़न का कौन सा ऑफ़िस खुल गया. फिर मैं अपने बॉस से बात की. उन्होंने कहा कि बात सही है, तुम्हें जाना होगा. मैंने अनुरोध किया कि ये तो बताइए वहाँ करना क्या होगा. जवाब मिला... जाओ न यार, वहीं समझ लेना. अगले ही दिन जब मैं दोबारा ऑफ़िस पहुँचा तो कहा गया कि कोल्हापुर के बदले चाहो तो एनआर (अनिवासी भारतीय) डिवीज़न में चले जाओ. इस बीच जिनको ज्वाइन किए छह माह से कम हुए थे, उन्हें सीधे तीन महीने की सैलरी देकर निकाला जा रहा था. मैं यही सोच रहा था कि मेरी योग्यता इक्विटी में है फिर ये मुझे यहाँ-वहाँ जाने को क्यों कह रहे हैं? नामुमकिन लक्ष्य मैंने आख़िरी बार निर्णायक बात करने की सोची और अपने बॉस के बॉस से बात की. उन्होंने फिर पहले वाली बात दोहराई कि कोल्हापुर ऑफ़िस ज्याइन करो और वहाँ बैंक को जमा दो. बड़ा विचित्र महसूस हो रहा था. जब दिल्ली-नोएडा में शेयर कारोबार नहीं चल रहा है तो कोल्हापुर में कौन से अरबपति-खरबपति शेयर बाज़ार में पैसा लगाने के लिए मेरे बैंक का इंतज़ार कर रहे होंगे. मन ही मन सोचा कि नई नौकरी मिलने तक इस ऑफ़र को स्वीकार कर लूंगा. कहीं और नौकरी मिल जाएगी तो कोल्हापुर से वापस आ जाऊँगा. मैंने ऑफ़िस में जाने की हामी भर दी. लेकिन ये क्या, मैंने महसूस किया कि मेरे बॉस इससे कुछ असहज हो गए. दाल में काला था ज़रूर. फिर मुझे बुलाया गया और कोल्हापुर के टार्गेट बताए गए. आप भी सुनेंगे तो हैरान रह जाएँगे. मुझसे कहा गया कि वहाँ ऐसे क्लायंट बैंक से जोड़ने हैं जिनका बैलेंस कम से कम डेढ़ करोड़ रूपए हो. आपको जानकर आश्चर्य होगा कि दिल्ली ऑफ़िस में मोटे आसामी का मतलब था दस लाख रुपए बैलेंस वाले निवेशक. इस्तीफ़ा अब आप ही बताइए दिल्ली में दस लाख वाले निवेशक ढूंढने मुश्किल पड़ गए तो कोल्हापुर में डेढ़ करोड़ रूपए वाला कौन मिलेगा. मैंने ये सवाल दागा तो एक और बम फूटा. मुझे बताया गया कि कोल्हापुर में मेरे लिए ऑफ़िस ने टार्गेट भी तय कर दिए हैं जबकि नोएडा ऑफ़िस में कोई टार्गेट ही नहीं था. मेरे मन ने कहा कि हो सकता है गुजरात की तरह कोल्हापुर में ऐसे लोग हों जो बिना चर्चा में आए अपनी अंटी में करोड़ों लेकर घूमते हों. मैंने कुछ जानने वालों को ढूँढ़ा और वास्तविकता जाननी चाही. जानकारी वही सामान्य ज्ञान वाली ही मिली कि चप्पलों के अलावा कुछ ख़ास नहीं है. मैंने अपने बॉस से ये बात बताई और पूछा कि मेरे साथ ऐसा क्यों कर रहे हैं, जवाब मिला.. यार नहीं कर सकते तो रिज़ाइन कर दो.. अब इसके अलावा कोई चारा भी नहीं था. एक सीख मिल गई कि मैनेजमेंट के वार से बचना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है. इस्तीफ़े के लिए मजबूर करने की बात सुनी थी, अब इसे महसूस कर रहा था. (विकास शंकर की आपबीती बीबीसी संवाददाता आलोक कुमार से उनकी बातचीत पर आधारित है. आख़िरी कड़ी में शुक्रवार को अजय आपको बताएंगे कि नई नौकरी खोजने में वो सफल रहे या नहीं और फ़िलहाल गुज़र-बसर कैसे हो रही है.) |
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