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'लोन का काम छोड़ो, नौकरी नहीं रही' | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
मैंने पहले आपको बताया है कि सॉफ़्टवेयर कंपनी से मुझे जिस दिन और जिस समय नौकरी से निकालने की सूचना दी गई, उसी समय मेरी पत्नी एक और ‘संकट’ मोल लेने जा रही थीं. दरअसल नौकरी पर्मानेंट होने के बाद हमने पहली योजना गाड़ी ख़रीदने की बनाई थी. नकद भुगतान करने की स्थिति थी नहीं, इसलिए 10-15 प्रतिशत नकद देकर बाक़ी लोन लेने की योजना बनाई. बैंक में सारा काम लगभग पूरा हो चुका था. फिर भी कुछ-एक कागज़ात और माँगे गए. तेरह जनवरी की सुबह ऑफ़िस के लिए निकलने से पहले मैंने सैलरी प्रूफ़ और बाक़ी ज़रूरी कागज़ों की फ़ोटोकॉपी कराई और पत्नी को ही बैंक जाकर सारा काम पूरा करने को कहा. लेकिन कहते हैं न नियति को कुछ और ही मंज़ूर था. नौ बजे ऑफ़िस के लिए घर से निकला था और शाम लगभग साढ़े तीन बजे जैसे सब कुछ ख़त्म हो चुका था. मेरी नौकरी जा चुकी थी. मैंने बीवी को फ़ोन किया और पहले हाल-चाल पूछा. उस समय वो रिक्शा पर बैठ बैंक ही जा रही थीं. मैंने भारी मन से उन्हें सारा हाल बताया और घर लौट जाने को कहा. बच्चों की पढ़ाई थोड़ी देर बाद मैं जब घर पहुँचा तो उदासी के माहौल था लेकिन मेरी बीवी ने ढाँढ़स बंधाया और थोड़ी ही देर में ये बात मेरे माता-पिता के घर तक भी पहुँच गई. मेरी पत्नी पंतनगर कृषि विश्वविद्यालय में लेक्चरर हैं, सो उन्होंने कुछ दिनों के लिए वहीं चलने को कहा. जब हम ये चर्चा कर रहे थे तो बगल में ही छह साल की बेटी और तीन साल का मेरा बेटा इन चीजों से बेख़बर खेलने में व्यस्त थे. मेरे दोनों बच्चे पत्नी के साथ पंतनगर में ही रह रहे थे. वो बच्चों के साथ कुछ दिनों बाद मेरे पास आ जाया करती हैं. मैं बेटी को तो इसी साल दिल्ली के ही स्कूल में दाख़िला दिलाना चाहता था और फिर बेटे को अगले साल शिफ़्ट कराने की सोच रहा था. अचानक ये सभी योजनाएँ असंभव लगने लगीं. घर से मेरे पिता जी का लगातार फ़ोन आ रहा था. कह रहे थे - 'आगरा चले आओ.' वो रिटायर्ड जज हैं. दोस्तों का सुझाव मेरे कुछ दोस्त तो उसी शाम घर पर आ गए. कुछ ने कहा कि चिंता क्या करनी है, पत्नी की नौकरी तो है ही. ख़ैर, ये बोलने की बाते हैं. आख़िर केवल पत्नी की नौकरी पर ही कब तक काम चलेगा?
मैंने आनन-फ़ानन में एक सादे कागज़ पर जमा पूँजी का जोड़-घटाव शुरु किया. कुल जमा 30-31 हज़ार रूपए पड़े थे. एक या दो महीने का काम चल सकता था. अब तो मासिक बचत स्कीमों की किस्त से लेकर राशन तक का जुगाड़ नौकरी के अभाव में ही करना था. सबसे पहले तो मैंनें मकान का किराया अलग किया क्योंकि ये तय था कि मेरा मकान मालिक किराया लेने में देरी बर्दाश्त नहीं करेगा. पता नहीं क्यों, मुझे लगा कि नौकरी गँवाने की बात मकान मालिक के कानों तक नहीं पहुँचनी चाहिए. दिल्ली या उसके आस-पास फ़्लैट ख़ीरदने के सपने दो अब टूट चुके थे. हाँ ये ज़रूर था कि घर से थोड़े दिनों के लिए मदद मिल सकती थी. तीन-चार दिन तो मुझे सदमे से उबरने में ही लग गए. उसके बाद ही मैं कुछ सामान्य हो सका. ज़्यादातर समय बिस्तर पर लेटे-लेटे मंदी के भँवर में भविष्य की खोज में बीत रहा था. हिम्मत बटोर कर फिर से नौकरी ढूँढने की योजना पर काम करने लगा जिसकी चर्चा मैं अगले अंक में करुंगा.. (अजय की आपबीती बीबीसी संवाददाता आलोक कुमार से बातचीत पर आधारित है. आख़िरी कड़ी में मंगलवार को अजय आपको बताएंगे कि नई नौकरी खोजने में वो सफल रहे या नहीं और फिलहाल गुज़र-बसर कैसे हो रहा है) |
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