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'करियर सेंसेक्स का ग्राफ बन कर रह गया' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
उस समय हर तरफ़ भारत के शेयर बाज़ार की चर्चा थी. ये बात 2007 के शुरुआती दिनों की है. मैंने भी उसी साल मैनेजमेंट का कोर्स पूरा किया था. पटना से ग्रेजुएशन करने के बाद मैनेजमेंट करने की सनक सवार थी. इसकी पढ़ाई के बाद मैंने एक शेयर ब्रोकर कंपनी में काम करना शुरु किया. दरअसल मेरी पढ़ाई से पेशे का कोई ज़्यादा वास्ता था नहीं तो काम कर-करके ही मैंने दूसरों को बाज़ार का ज्ञान देना शुरु किया. लग तो ऐसा रहा था मानों पूरा भारत शेयर बाज़ार से पैसा पीट रहा है. दस दिन में सेंसेक्स तो कई बार हज़ार का फ़ासला तय करता चला गया. और सेंसेक्स के ग्राफ के साथ ही मेरा करियर भी आगे बढ़ता गया. दो कंपनियाँ तो एक साल के भीतर बदल ली. तीसरी कंपनी पिछले साल मार्च में चुनी. आप आज की तारीख़ में इसे आख़िरी भी कह सकते हैं क्योंकि चौका लगा नहीं पाया. बाज़ार के साथ मैं भी गिरा हमारे पेशे में संकट की शुरुआत तो साल 2008 के जनवरी से ही हो गई थी लेकिन मार्च से इसका भयावह चेहरा सामने आने लगा. मैं एक विदेशी बैंक की देसी शाखा में नोएडा में काम कर रहा था और इक्विटी डीविजन का ब्रांच मैनेजर था.
सेंसेक्स के ग्राफ़ की तरह जिस तरह का उफ़ान मैंने अपनी ज़िंदगी में देखा था, उसी तरह की गिरावट को भी महसूस कर रहा था. बाज़ार के हिचकोलों ने आत्मविश्वास पर चोट करना शुरु किया. मेरा काम बड़ी पूँजी वाले निवेशकों जिन्हें हम लोग ऑफ़िस में मोटा आसामी कहते हैं, को सलाह देना था. लेकिन अमरीका के संकट ने भारत का भी ये हाल किया कि सलाह लेने वाले इक्के-दुक्के रह गए. जिस फ़ोन की घंटियाँ ऑर्डर बुक करने के लिए लगातार बजती रहती थीं, अब उसी आवाज़ का इंतज़ार रहने लगा. पूरी टीम में घबराहट थी. अब लंच क्या कभी भी गप लड़ाने की फ़ुर्सत रहती थी और ब्रांच के सारे लोग गलियारों या नीचे लॉन में यही बात करते कि भविष्य में क्या होगा. ये फंडा तो क्लीयर था कि निजी कंपनियाँ मोटी तनख्वाह इसीलिए देती हैं क्योंकि उससे कहीं ज़्यादा वो काम लेती हैं जिसकी बकायदा कीमत आँकी जाती है. मेरी कीमत शेयर बाज़ार की उठापटक में सिर्फ़ कंपनियाँ ही दिवालिया नहीं हुईं और शेयरों के दाम ही नहीं गिरे बल्कि इनसे जुड़ी कंपनियों में काम करने वालों के दाम भी गिर गए. ज़रा सोचिए की साल 2008 में ही जनवरी जहाँ एक दिन में शेयरों की ख़रीद-बिक्री का आँकड़ा एक लाख करोड़ हुआ करता था तो अक्तूबर आते-आते 30-40 हज़ार करोड़ रह गया. कारोबार घटने का सीधा असर कंपनी पर पड़ा क्योंकि शेयर ख़रीदने-बेचने वाले ही नदारत होंगे तो ब्रोकरेज क्या ख़ाक मिलेगा. पहला असर तो दिवाली में ही दिखा. अस्थायी तौर पर रखे गए कर्मचारियों की छँटनी शुरु हुई. फिर भी दिल के एक कोने में उम्मीद थी कि बोनस मिलेगा लेकिन दिवाली की पूर्व संध्या पर ये उम्मीद भी जाती रही. इस बीच मेरा बैंक स्कॉटलैंड के एक बड़े बैंक के हाथो बिक चुका था. वहां का प्रबंधन धीरे-धीरे हावी हो रहा था और उनकी पूरी नज़र घाटे वाले विभागों की तालाबंदी पर थी. पहले तो काम सिमटा बता कर दिल्ली और नोएडा के ब्रांच का आपस में विलय करा दिया गया. ब्रांच मैनेजर होने के नाते जूनियर हमीं से ताज़ा ख़बर लेने आते थे जिनके सामने मैं अपनी पीड़ा छिपाने की कोशिश करता. लेकिन ऐसा ज़्यादा दिन नहीं चल सका... (विकास शंकर की आपबीती बीबीसी संवाददाता आलोक कुमार से उनकी बातचीत पर आधारित है. अगले मंगलवार को वो आपको बताएंगे कि बैंक प्रबंधन ने किस तरह उन्हें इस्तीफ़ा देने के लिए मजबूर किया.) |
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