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'ऊँची इमारतें डिज़ाइन करने का भूत सवार था' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बच्चों की तरह मुझे भी ऊँची-ऊँची इमारतें काफ़ी आकर्षित करती थी. लखनऊ में जब मम्मी-पापा के साथ रहता था और हम लोग कहीं घूमने निकलते थे तो बहुमंजिले मकान जहाँ भी दिखाई देते मैं उसे नीचे से ऊपर तक निहारता. मैंने सोचा कि इस तरह के निर्माण की डिज़ाइन बनाने के काम में काफ़ी मज़ा आता होगा क्योंकि उस समय करियर या पैसे की अहमियत पर ज़्यादा सोचता ही नहीं था. मैंने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से इंजीनियरिंग में डिप्लोमा किया. वहीं मुझे लगा कि आर्किटेक्चर में करियर बना सकता हूँ और इसके बूते पैसे भी बनाए जा सकते हैं. लेकिन इसके लिए डिप्लोमा से काम चलने वाला था नहीं सो मैं दिल्ली आया और जामिया मिलिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी में बैचलर ऑफ़ आर्किटेक्चर कोर्स में दाख़िला लिया. वर्ष 2007 में पढ़ाई पूरी की. इन तीन सालों में मैं भारत की आर्थिक तरक्की और तेज़ रफ़्तार विकास को समझ भी चुका था और अपने आस-पास देख भी रहा था. मिल गई नौकरी दिल्ली में पढ़ाई के दौरान ही मुझे कई कंपनियों से ऑफ़र मिल रहे थे. कोई टाउनशिप बना रहा था, कोई मॉल तो कोई रिहायशी अपार्टमेंट. मैं ख़ुद ही नोएडा, ग़ाज़ियाबाद, फ़रीदाबाद और दिल्ली में हर जगह कंक्रीट का काम होता देख रहा था. सारे दोस्तों और मेरे शिक्षकों ने भी कहा कि नौकरी तो तय ही है. फिर कोर्स पूरा होते ही मुझे नौकरी भी मिल गई. ये बात है अगस्त-सितंबर 2007 की है. उस समय घरों के दाम हर साल नहीं बल्कि हर महीने बढ़ रहे थे और रियल एस्टेट सेक्टर कुँलाचे भर रहा था. मैंने कई अपार्टमेंट के डिज़ाइन तैयार करने में मदद की क्योंकि करियर की शुरुआत असिस्टेंट के तौर पर ही हुई थी. सपना हुआ पूरा पिछले वर्ष अगस्त में मुझे एक आर्किटेक्चर फ़र्म से शानदार ऑफ़र मिला. मेरी खुशी का ठिकाना न था और मेरे घर वाले भी खुश थे. जब मैंने उन्हें लखनऊ फ़ोन कर बताया कि बतौर आर्किटेक्ट नौकरी मिली है और तनख़्वाह छह लाख रूपए सालाना के आस-पास होगी तो वो भी उछल पड़े.
उसी समय मैंने अमरीका में घर का कर्जा न चुका पाने के कारण पैदा हुए संकट के बारे में सुना था लेकिन मुझे लगता था कि सब प्राइम संकट अमरीका का ही टेंशन है. क्योंकि पिछले साल अगस्त में भारत में शेयर बाज़ार तो गिर रहा था लेकिन रियल एस्टेट सेक्टर चकाचक ही थी. जिस कंपनी ने मुझे नई नौकरी दी उसकी ओर से मेरी पोस्टिंग नोएडा में हुई जहाँ एक बड़ी कंपनी टाउनशिप बना रही है. अपार्टमेंट के छह टावर मेरे ज़िम्मे थे. हर टावर 18 मंजिला बन रहा था. इतना बड़ा प्रोजेक्ट बड़े ज़ोर शोर से शुरु हुआ. लेकिन अक्तूबर में स्थितियाँ अचानक बदलने लगी. हालाँकि ये बदलाव सिर्फ़ ऑफ़िस में महसूस किया जा रहा था. बाहर तो फ्लैट के दाम अभी भी वही थे. लेकिन मैंने भाँप लिया कि सात-आठ वर्षों से रियल एस्टेट सेक्टर की जारी उड़ान अब थम सकती है. नवंबर में तो कई कंपनियाँ हमारी कंपनी को पैसे नहीं दे पाई जिसका असर मेरी कंपनी पर पड़ना लाज़िमी थी. (फ़राज़ ख़ान की आपबीती बीबीसी संवाददाता आलोक कुमार से उनकी बातचीत पर आधारित है. शुक्रवार को वो बताएंगे कि किस तरह दिसंबर आते-आते नौकरी पर ख़तरा स्पष्ट हो चुका था.) |
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