पीएम मोदी की बीजेपी और राहुल गांधी की कांग्रेस क्या गारंटियों से चुनाव जीत पाएंगी?

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- Author, इमरान कुरैशी
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए, बेंगलुरु से
जैसे जैसे 2024 के लोकसभा चुनाव के प्रचार का शोर बढ़ेगा, मतदाताओं के ज़ेहन में एक शब्द सबसे ज़्यादा घर करने वाला है, और वो है गारंटी.
गारंटी ने सात दशकों के चुनावी इतिहास के जाने पहचाने शब्द वायदे की जगह ले ली है, राजनीतिक पार्टियां जिसका ज़िक्र अपने लंबे चौड़े मेनिफ़ेस्टो में करती थीं.
इस शब्द पिछले साल चर्चा में तब आया जब कर्नाटक विधानसभा चुनावों में कांग्रेस पार्टी की रणनीतिक टीम ने जनता से जुड़े पांच गंभीर मुद्दों पर ध्यान केंद्रित किया, जो बढ़ती महंगाई के कारण ग़रीब परिवारों पर बढ़ते आर्थिक दबाव और अन्य मुद्दों से जुड़े हुए थे.
पिछले अप्रैल में कर्नाटक में इस शब्द की लोकप्रियता इस स्तर पर पहुंच गई कि महिलाओं ने पार्टी प्रचारकों के सामने गुस्सा ज़ाहिर करते हुए कहा कि उन्हें गारंटी छपा काग़ज नहीं मिला.
मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, तेलंगाना और मिज़ोरम के विधानसभा चुनावों में यह चुनावी शब्दावली का हिस्सा बन गया. यहां तक कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी एक सार्वजनिक सभा में कहा था कि आजकल एक नया शब्द इस्तेमाल हो रहा है जिसे गारंटी कहा जाता है.
तब से सभी मीडिया प्लेटफॉर्मों, विशेषकर टेलीविज़न पर हर एक विज्ञापन, गांवों में पीने के पानी की आपूर्ति से लेकर किसानों को नकदी मदद और भारत को 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने तक का वादा "ये मोदी की गारंटी है" के साथ समाप्त हो रहा है.
कांग्रेस पार्टी के लिए इन गारंटियों ने कर्नाटक और तेलंगाना के विधानसभा में बखूबी काम किया लेकिन मध्य भारत के राज्यों में नतीजे देने में विफल रहा.
आकर्षक गारंटियां
कांग्रेस ने उसी नक्शेकदम को अपनाया लेकिन लोकसभा चुनावों के लिए अधिक विस्तृत कर दिया है. ताज़ा गारंटियों में हिस्सेदारी न्याय, किसान न्याय, श्रमिक न्याय, युवा न्याय और नारी न्याय है.
इन गारंटियों में राष्ट्रव्यापी जाति आधारित जनगणना, आरक्षण पर 50 प्रतिशत की सीमा हटाना, किसानों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी), कृषि की लागत को जीएसटी मुक्त करना, स्वास्थ्य का अधिकार, न्यूनतम मज़दूरी 400 रुपये प्रति दिन, केंद्र सरकार में 30 लाख नई सरकारी नौकरियां देना, सभी शिक्षित युवाओं को अप्रेंटिसशिप भत्ता, ग़रीब परिवारों की महिलाओँ को एक लाख रुपये प्रति वर्ष समेत अन्य वायदे शामिल हैं.
तो सवाल है कि क्या इन आकर्षक गारंटियों से पार्टियां चुनाव जीत सकती हैं.
जाने माने विश्लेषक और सीएसडीएस के पूर्व डायरेक्टर डॉ. संजय कुमार ने बीबीसी हिंदी से कहा, "एक क्रिकेट टीम में अगर आपके पास पांच अच्छे गेंदबाज़ हैं लेकिन अच्छे बल्लेबाज़ या फ़ील्डर नहीं हैं, या अच्छे बल्लेबाज़ हों और गेंदबाज़ी बहुत कमज़ोर हों, तो आप मैच नहीं जीत पाएंगे. आपको एक कॉम्बिनेशन की ज़रूरत होगी. इसलिए केवल गारंटियों के मार्फत न तो बीजेपी और ना ही कांग्रेस चुनाव जीतने की उम्मीद कर सकती है."
गारंटी की बहस

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पूरे देश में अलग अलग घेरों में एक गंभीर बहस चल रही है कि क्या गारंटियां सरकार या राष्ट्र की अर्थव्यवस्था की क़ीमत पर लोगों को फायदा पहुंचाती हैं.
बेंगलुरु के राजनीतिक टिप्पणीकार रवींद्र रेशमी ने बीबीसी हिंदी से कहा, "अभी तक राजनीतिक पार्टियां चुनाव के दौरान खर्च करने और लगभग सत्ता को खरीदने के लिए काले धन का इस्तेमाल करती थीं. अब वो कैश ट्रांसफ़र और मुफ़्त देने का वादा कर ग़रीब लोगों के दिमाग और दिल को जीतने की कोशिश कर रही हैं."
रवींद्र का विचार है कि, "एक ग़रीब परिवार की एक महिला को हर साल एक लाख रुपये देने का वादा कर राहुल गांधी ने गारंटियों को एक नए स्तर पर पहुंचा दिया है. मान लीजिए समाज के इस हिस्से में 25 करोड़ महिलाएं हैं. सरकार को सिर्फ इस एक गारंटी पर सालाना 25 लाख करोड़ रुपये खर्च करना पड़ेगा. इसके लिए पैसा कहां से आएगा? कितने समय तक यह जारी रह सकता है?"
दूसरी तरफ़, उनका तर्क है कि प्रधानमंत्री का रवैया अलग है. "वो वहां पैसा खर्च करेंगे जहां उत्पादन और रोज़गार सृजन होता है. उन्होंने कोविड के बाद मंझोले और छोटे उद्योगों को चार किश्तों में 24 लाख करोड़ रुपये दिए थे. किसान सम्मान निधि में हर किसान को तीन किश्तों में 6000 रुपये दिए गए. उन्होंने स्पष्ट किया कि उनकी आत्मा यूं ही पैसे ट्रांसफ़र करने की इजाज़त नहीं देगी."
रवींद्र रेशमी का मानना है कि "मोदी ने टिकाऊ विकास का काम किया है. कांग्रेस पार्टी की गारंटियां दिवालिया होने का पासपोर्ट हैं."
लेकिन कोलकाता में रहने वाली राजनीतिक टिप्पणीकार शिखा मुखर्जी कहती हैं, "सबसे पहले, कांग्रेस और मोदी भारतीय मतदाताओं के एक ख़ास वर्ग को अपील कर रहे हैं यानी महिलाएं, युवा, किसान और ग़रीब. कांग्रेस ग़रीबों और बेरोज़गारों में फर्क करती है. और रोज़गार विहीन विकास की समस्या को हल न कर पाना मोदी सरकार की सबसे बड़ी असफलता है. रोज़गार विहीन विकास किसी भी देश के लिए अच्छी चीज़ नहीं है क्योंकि लंबे वक्त में यह राजनीतिक रूप से अस्थिरता का सबब हो सकता है."
वो मानती हैं कि कांग्रेस की गारंटी में कुछ भी ग़लत नहीं है क्योंकि वह सत्ता में थी तो अधिकार दे रही थी, नीतियां और कार्यक्रम बना रही थी.
"आपको दोनों गारंटियों में फ़र्क करने की ज़रूरत है. मोदी मतदातओं को बता रहे हैं कि उन्होंने अपनी गारंटियों को पूरा किया, इसलिए लोगों को उनकी बातों का भरोसा करना चाहिए. उन्होंने कौन सी गारंटियां पूरी कीं- राम मंदिर, सीएए, तीन तलाक़, अनुच्छेद 370. मोदी लोगों को ग़रीबी से बाहर निकालने की बात नहीं कर रहे. वो केवल अर्थव्यवस्था के आकार की बात कर रहे हैं."
शिखा मुखर्जी कहती हैं, "वो भारत में प्रति व्यक्ति मज़दूरी की बात नहीं कर रहे जो इतनी बदतर है कि बांग्लादेश जैसे देश से भी बहुत पीछे है. तथ्य ये है कि यह सुनिश्चित करना सरकार की ज़िम्मेदारी है कि लोगों के पास खाना हो, स्वास्थ्य सुविधाएं हों, शिक्षा हो और उनके पास काम करने का अवसर हो. अगर सरकार ये नहीं दे सकती है तो यह उसकी विफलता है, उसकी नीतियां असफल हैं."
गारंटियां और राजनीतिक विश्वास

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लेकिन शिखा मुखर्जी ये भी कहती हैं, "तर्क होना चाहिए. हां, लोगों को इस सरकार को बाहर करना चाहिए. लेकिन दूसरा पक्ष खुद को भरोसेमंद साबित नहीं कर पाया है. यही दिक्कत है."
राजनीतिक टिप्पणीकार डॉ. संजय कुमार के इस विचार से सहमत हैं कि किसी पार्टी के लिए अकेले गारंटियां ही जीत नहीं ला पाएंगी.
लखनऊ में रहने वाले वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक शरत प्रधान कहते हैं, "बीजेपी के लिए मेनिफ़ेस्टो मोदी हैं. ऐसा लगता है कि वो हर चीज़ अपनी जेब से दे रहे हैं. यह कहते हुए मुझे ये भी बताना होगा कि मोदी भक्तों की ओर से समुदायों में पैदा किए गए तीखे विभाजन के कारण लोग गारंटी को स्वीकार नहीं कर रहे."
"उत्तर भारत के पांच राज्यों के अपने दौरे में मैंने एक ही सकारात्मक पहलू देखा कि साम्प्रदायिकता शहरी क्षेत्रों में सतह पर है लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में नहीं."
शरत प्रधान कहते हैं, "लेकिन लोगों का मोदी में इतना भरोसा है कि उन्हें इससे फर्क नहीं पड़ता है कि समाज साम्प्रदायिक रूप से विभाजित है क्योंकि वो मुफ़्त राशन जैसे कुछ लाभ पा रहे हैं. सामाजिक विभाजन के परिणाम का लोगों को अहसास नहीं है. सच्चाई ये है कि कांग्रेस इतनी बंटी हुई ताक़त है कि पार्टी के लोग बीजेपी के एजेंडा से लड़ने की बजाय आपस में लड़ रहे हैं."
हलांकि शरत प्रधान ने कहा कि बेरोज़गारी और भर्तियों के प्रश्न पत्रों के लीक के मुद्दे ऐसे थे जो युवाओं को परेशान करते हैं, "लेकिन कांग्रेस ने कभी भी उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में अपना संगठन बनाने की परवाह नहीं की, यहां तक कि अपने प्रतिद्वंद्वी के ग़लत कामों को प्रचारित करने के लिए भी नहीं."
लोगों में मोदी के प्रति जैसा भरोसा है उसे लेकर डॉ. संजय कुमार की भी राय प्रधान जैसी ही है.
वो कहते हैं, "लोगों को कांग्रेस की गारंटियों से अधिक मोदी पर विश्वास है. पहले तो लोगों को ये मानने की ज़रूरत है कि जो पार्टी गारंटियां दे रही हैं, सत्ता में आने की उसकी संभावना है. मतदाताओं से बात करते हुए मुझे नहीं लगा कि उन्हें विश्वास नहीं है कि कांग्रेस सत्ता में आ रही है."
उन्होंने कहा, "प्रधानमंत्री मोदी की ओर से किए जा रहे वायदों के मुकाबले लोग, कांग्रेस की गारंटी का आंकलन आशंका के साथ कर रहे होंगे. यही अंतर है."
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