इलेक्टोरल बॉन्ड से चुनाव में बीजेपी को होगा अनुचित फ़ायदा- बीबीसी से बोले चिदंबरम

भारत के पूर्व वित्त मंत्री और कांग्रेस नेता पी. चिदंबरम

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    • Author, जुगल पुरोहित
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद चुनाव आयोग ने गुरुवार शाम अपनी वेबसाइट पर इलेक्टोरल बॉन्ड से जुड़ा डेटा जारी किया.

यह डेटा स्टेट बैंक ऑफ इंडिया ने उसे 12 मार्च को उपलब्ध करवाया था. हालांकि अभी भी बैंक ने इलेक्टोरल बॉन्ड के यूनिक (अल्फान्यूमेरिक) नंबरों की जानकारी नहीं दी है.

यह जानकारी देने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने एसबीआई को 17 मार्च का समय दिया है.

इलेक्टोरल बॉन्ड का डेटा सामने आने के बाद राजनीतिक फंडिंग को लेकर बहस एक बार फिर से तेज हो गई है.

देश के पूर्व वित्त और वरिष्ठ कांग्रेस नेता मंत्री पी. चिदंबरम मानते हैं कि इलेक्टोरल बॉन्ड ने बीजेपी को गलत तरीके से फायदा पहुंचाया है.

वहीं दूसरी तरफ गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि इलेक्टोरल बॉन्ड को राजनीति से काले धन की भूमिका ख़त्म करने के लिए लाया गया था और सुप्रीम कोर्ट को इस बॉन्ड को असंवैधानिक क़रार देने के बजाय इसमें सुधार लाने की कोशिश करनी चाहिए.

बीबीसी के साथ एक ख़ास बातचीत में चिदंबरम ने कहा कि इलेक्टोरल बॉन्ड लोकसभा में बीजेपी को दूसरी राजनीतिक पार्टियों के मुकाबले बेहतर स्थिति में रखेगा क्योंकि वो प्रचार पर ज्यादा पैसा खर्च कर सकेगी.

किस पार्टी को कितना चंदा मिला

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चिदंबरम ने कहा कि इलेक्टोरल बॉन्ड के आंकड़े सार्वजनिक होने के बाद सामने आई जानकारी से उन्हें कोई आश्चर्य नहीं हुआ.

उन्होंने कहा, ''जिन्होंने बॉन्ड ख़रीदे हैं, उन सबके सरकार के साथ नज़दीकी रिश्ते रहे हैं. खनन, फ़ार्मा, कंस्ट्रक्शन और हाइड्रोइलेक्ट्रिक कंपनियों के केंद्र सरकार से नज़दीकी रिश्ते होते ही हैं. कई बार कुछ मामलों में ऐसा राज्य सरकारों के साथ भी होता है.''

उन्होंने कहा, "लेकिन सवाल ये है कि सरकार ने ऐसी कपट भरी योजना बनाई ही क्यों? जिसमें राजनीतिक चंदा किसको दिया जा रहा है, इसे जाहिर नहीं किया जा रहा है. सरकार को तो ऐसी योजना बनानी चाहिए थी, जिसमें कोई भी राजनीतिक दलों को चेक, ड्राफ्ट और पे ऑर्डर से भुगतान कर सकता था."

वे कहते हैं, "राजनीतिक दलों और चंदा देने वालों को अपनी-अपनी बैलेंस शीट में इसे ज़ाहिर करना चाहिए था."

भारत के पूर्व वित्त मंत्री और कांग्रेस नेता पी. चिदंबरम

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चिदंबरम ने कहा, ''पहले कॉरपोरेट घराने राजनीतिक दलों को खुले और पारदर्शी तरीक़े से चंदा दे रहे थे, लेकिन वे अपने मुनाफे का कुछ निश्चित प्रतिशत रकम ही चंदा दे रहे थे."

"घाटा उठाने वाली कंपनी चंदा नहीं दे पा रही थी. हमें वापस वही तरीक़ा अपनाना चाहिए कि खुले और पारदर्शी तरीके से कोई भी चंदा दे पाए."

वीडियो कैप्शन, पी चिदंबरम ने चुनावी चंदे के लिए ये फॉर्मूला सुझाया

बीबीसी ने चिदंबरम से पूछा कि क्या इलेक्टोरल बॉन्ड ने बीजेपी को आने वाले लोकसभा चुनावों में गलत तरीके से फायदे की स्थिति में पहुंचा दिया है.

इस पर उन्होंने कहा कि हां बीजेपी को इससे गैरवाजिब फायदा हुआ है.

चिदंबरम ने कहा, ''देखिए सवाल तो उठेगा कि आख़िर इलेक्टोरल बॉन्ड की कुल रकम का 57 प्रतिशत हिस्सा बीजेपी को ही क्यों मिला? तमाम पार्टियों को मिलाकर भी कम रकम मिली है. दूसरा सवाल यह भी उठेगा कि कहीं ये मिलीभगत का मामला तो नहीं था."

"अगर आप इलेक्टोरल बॉन्ड के जरिये पैसा देने और सरकार के कुछ फैसलों को मिलाते हैं तो कोई यह अनुमान लगा सकता है या मान सकता है कि यह मिलीभगत का मामला होगा.''

बीजेपी को कितना चंदा मिला

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इलेक्टोरल बॉन्ड की कहानी जिस से तरह से सामने आई है उससे क्या आने वाले लोकसभा चुनाव में बीजेपी फायदे में दिख रही है? 

बीबीसी के इस सवाल के जवाब में चिदंबरम ने कहा, ''निश्चित तौर पर उनको फ़ायदा है. पिछले पांच छह सालों में उन्होंने भारी संसाधन जमा कर लिया है. इलेक्टोरल बॉन्ड को इस तरह से डिज़ाइन ही किया गया था जिससे उनको मदद मिले. उन्होंने इसका पूरा फ़ायदा उठाया, इसके चलते वो बेहतर स्थिति में हैं.''

''चुनाव के वित्तीय प्रबंधन के पहलू में वे दूसरों से काफ़ी बेहतर स्थिति में है, कोई उनको चुनौती देने की स्थिति में नहीं है. वे अपने उम्मीदवारों की फंडिंग के मामले में दूसरों से कहीं अच्छी स्थिति में हैं.''

स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की भूमिका पर क्या कहा?

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स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की भूमिका पर क्या कहा?

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इस पूरे मामले में स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की भूमिका पर बोलते हुए चिदंबरम ने कहा, ''इसे ही संस्थानों पर कब्जा करना कहा जाता है. एसबीआई को सरकार के इशारों पर काम करने की क्या ज़रूरत थी?"

"मैं पहले दिन से कह रहा हूं. सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले से पहले से कह रहा हूं कि अगर वो आंकड़े सार्वजनिक करने का निर्देश देता है तो एसबीआई 24 घंटे में ऐसा कर सकता है."

उन्होंने कहा, "दरअसल प्रत्येक बॉन्ड का एक यूनिक नंबर होता है. इसलिए आपको यूनिक नंबर के हिसाब से ये आंकड़े जारी करने थे कि किस नंबर का बॉन्ड किसने खरीदा. इसके साथ ही ये सूची भी जारी करनी थी कि किस यूनिक नंबर के बॉन्ड को किस पार्टी ने इनकैश किया. बाक़ी इसे मिलाकर हम, आप और आम जनता देख लेती. एसबीआई ने चार महीने का समय मांगा था. उसके इस रवैये ने मुझे खासा निराश किया.''

कुछ लोग कहेंगे कि एसबीआई के सामने क्या विकल्प रहा होगा? वो तो बस जहां से आदेश आ रहा था उसका पालन कर रहा था.

बीबीसी के इस सवाल पर चिदंबरम बोले, ''कौन से आदेश?, उन्हें सुप्रीम कोर्ट से आदेश मिला था. देश में सुप्रीम कोर्ट से भी बड़ी कोई अथॉरिटी है क्या? मेरी तो एसबीआई को सलाह है कि वे हर बॉन्ड का अल्फा न्यूमेरिक यूनिक नंबर जारी कर दे. वो इससे पीछे ना हटे, नहीं तो उनका और मजाक़ बनेगा और आलोचनाओं का सामना करना पड़ेगा.

पी चिदंबरम

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इलेक्टोरल बॉन्ड प्रकरण के सबक

बीबीसी ने चिदंबरम से पूछा कि उनकी नज़र में इलेक्टोरल बॉन्ड प्रकरण के क्या सबक हैं? क्योंकि इस पूरे मामले की जड़ में राजनीतिक दलों और उनके चुनावी कैंपेन की फंडिंग है.

इस पर उन्होंने कहा, ''पूरी दुनिया में चुनाव प्रचार काफी महंगे हो गए हैं. चुनाव खर्च आगे बढ़ते जाएंगे और हमें इस बात को स्वीकार कर लेना चाहिए. चुनावी प्रचार के तौर-तरीक़ों ने छिपी हुई शक्ल अख्तियार कर ली है. अब तो ये पार्टी कार्यकर्ताओं और वोटरों को पैसा बांटने तक जा पहुंचा है."

चिदंबरम ने कहा, "चुनाव लोकतंत्र का उत्सव है. सबसे पहले हमें इसमें खुलापन लाना होगा. नंबर दो, हमें व्यावहारिक तौर पर हर उम्मीदवार के खर्च की सीमा को भी बढ़ाना होगा. उम्मीदवार को वह पैसा ख़र्च करने देना चाहिए."

उन्होंने कहा, "तीसरे नंबर पर हमें चुनाव के लिए राज्यों की ओर से फंड जारी करने यानी स्टेट फंडिंग के बारे में सोचना होगा.''उन्होंने कहा, "लोगों को पार्टियों के लिए चेक या ड्राफ्ट के ज़रिए खुले तौर पर पार्टियों को पैसे देने की इज़ाज़त मिलनी चाहिए. हां ये जरूरी है कि वो अपने वित्तीय स्टेटमेंट में इसका खुलासा करें. साथ ही चंदा लेने वाली पार्टी को भी अपने रिटर्न में इसका ज़िक्र करना होगा."

बीबीसी ने पूछा कि क्या कांग्रेस स्वेच्छा से चुनावी चंदा देने वालों के नाम सार्वजनिक करेगी?

इसके जवाब में चिदंबरम ने कहा, “अगर सुप्रीम कोर्ट या चुनाव आयोग ऐसा चाहेगा तो हमें ऐसा करना चाहिए.”

क्या है इलेक्टोरल बॉन्ड

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क्या है इलेक्टोरल बॉन्ड

इलेक्टोरल बॉन्ड राजनीतिक दलों को चंदा देने का एक वित्तीय ज़रिया है. यह एक वचन पत्र की तरह है जिसे भारत का कोई भी नागरिक या कंपनी भारतीय स्टेट बैंक की चुनिंदा शाखाओं से ख़रीद सकता है और अपनी पसंद के किसी भी राजनीतिक दल को गुमनाम तरीक़े से दान कर सकता है.

भारत सरकार ने इलेक्टोरल बॉन्ड योजना की घोषणा 2017 में की थी. इस योजना को सरकार ने 29 जनवरी 2018 को क़ानूनन लागू कर दिया था.

इस योजना के तहत भारतीय स्टेट बैंक राजनीतिक दलों को धन देने के लिए बॉन्ड जारी कर सकता था.

केवाईसी की जानकारियों के साथ कोई भी खाताधारक इस बॉन्ड को खरीद सकता था. इलेक्टोरल बॉन्ड में भुगतानकर्ता का नाम नहीं होता था.

योजना के तहत भारतीय स्टेट बैंक की निर्दिष्ट शाखाओं से 1,000 रुपये, 10,000 रुपये, एक लाख रुपये, दस लाख रुपये और एक करोड़ रुपये में से किसी भी मूल्य के इलेक्टोरल बॉन्ड ख़रीदे जा सकते थे.

भारत सरकार ने इस योजना की शुरुआत करते हुए कहा था कि इलेक्टोरल बॉन्ड देश में राजनीतिक फ़ंडिंग की व्यवस्था को साफ़ कर देगा.

हालांकि 15 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट ने इलेक्टोरल बॉन्ड की वैधता पर अपना फ़ैसला सुनाते हुए इस पर रोक लगा दी थी. सर्वोच्च अदालत ने इसे असंवैधानिक बताते हुए रद्द कर दिया था.

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