सऊदी अरब को क्या रोक रहा है भारत? ऐसी रिपोर्ट पर चर्चा गर्म

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- Author, मोहम्मद शाहिद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
दक्षिण अफ़्रीका के जोहानिसबर्ग में इसी महीने 22-24 अगस्त को ब्रिक्स सम्मेलन होने जा रहा है लेकिन इस सम्मेलन की शुरुआत से पहले इसमें नए सदस्यों को जगह देने पर बहस शुरू हो गई है.
दुनिया की सबसे तेज़ी से उभरती कुछ अर्थव्यवस्थाओं ने मिलकर साल 2009 में एक संगठन बनाया था जिसमें ब्राज़ील, रूस, भारत और चीन जैसे देश शामिल थे. इस गुट को ब्रिक (BRIC) नाम दिया गया था.
दुनिया के अलग-अलग कोने की उभरती इन अर्थव्यवस्थाओं के गुट का मक़सद शांति और सुरक्षा को बढ़ावा देना, विकास और आपस में सहयोग करना था. साथ ही वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पश्चिम के प्रभाव को कम करना था.
एक साल बाद ही 2010 में इसमें दक्षिण अफ़्रीका भी शामिल हो गया और इसका नाम ब्रिक से ब्रिक्स (BRICS) हो गया. तब से लेकर अब तक इस गुट में कोई नया देश शामिल नहीं हुआ है. लेकिन अब इस गुट में नए देशों के शामिल करने को लेकर एक बहस शुरू हो गई है.
ब्रिक्स के गठन से लेकर अब तक इसे बेहद प्रभावी गुट नहीं माना जाता रहा है. हालांकि इसमें शामिल सदस्य देशों में दुनिया की 40 फ़ीसदी से अधिक आबादी रहती है, इनके पास 26 फ़ीसदी क्षेत्रफल है और कुल वैश्विक अर्थव्यवस्था में इनका योगदान तक़रीबन 30 फ़ीसदी है.
ऐसी रिपोर्ट्स हैं कि इस सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन वर्चुअली शामिल होंगे जबकि चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग इसमें शिरकत कर सकते हैं.
लेकिन चर्चा इस मुद्दे को लेकर नहीं है बल्कि इसमें किस नए देश को सदस्यता दी जाए या न दी जाए पर बहस हो रही है.

बहस कहां से शुरू हुई?
ब्रिक्स की अध्यक्षता करने के नाते इसी साल जून में दक्षिण अफ़्रीका ने ‘फ़्रेंड्स ऑफ़ ब्रिक्स’ नामक सम्मेलन आयोजित किया था. इसमें उन देशों ने भाग लिया था जो इस गुट में शामिल होना चाहते हैं.
तक़रीबन 30 देशों का कहना था कि वो ब्रिक्स में शामिल होना चाहते हैं जबकि अल्जीरिया समेत 22 देशों ने इसमें शामिल होने के लिए आधिकारिक तौर पर आवेदन किया था.
माना जा रहा है कि अर्जेंटीना, मिस्र, इंडोनेशिया, यूएई, अल्जीरिया, बांग्लादेश, ईरान और सऊदी अरब जैसे देश इस गुट का हिस्सा बनना चाहते हैं. लेकिन इस समूह के भारत और ब्राज़ील जैसे सदस्य देश इसमें नए देशों के लिए ‘ईज़ी एंट्री’ नहीं चाहते हैं.
बीते साल चीन ने कहा था कि वो चाहता है कि इस समूह में नए सदस्यों को जगह देने पर काम शुरू करना चाहिए जबकि भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने बीते महीने कहा था कि नए सदस्यों को शामिल करने की प्रक्रिया को लेकर ‘काम जारी’ है.
भारत में पाकिस्तान के उच्चायुक्त रहे अब्दुल बासित ने ब्रिक्स में नए देशों के शामिल करने पर जारी बहस को लेकर भारत के रुख़ पर अपना विचार रखा है.
अब्दुल बासित ने एक वीडियो पोस्ट कर कहा है, ''सऊदी अरब ब्रिक्स में शामिल होना चाहता है लेकिन भारत इसका विरोध किया है. भारत की आपत्ति को लेकर सऊदी ख़ुश नहीं है. अब देखना यह है कि सऊदी अरब से भारत का संबंध किस हद तक प्रभावित होता है. भारत अभी ब्रिक्स का विस्तार नहीं चाहता है. ब्रिक्स समिट के बाद भारत में जी-20 समिट होने जा रहा है. इसमें भी रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के आने को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है.''
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भारतीय विदेश मंत्री का मानना है कि एक विस्तारित समूह कैसा दिखे इसके लिए मानकों, मानदंडों और प्रक्रियाओं पर विचार-विमर्श करने की ज़रूरत है. इसी तरह का हवाला ब्राज़ील भी दे रहा है.
ब्राज़ील सरकार के आला अधिकारियों ने हाल ही में समाचार एजेंसी रॉयटर्स से कहा था कि ब्रिक्स समूह में अन्य उभरती हुई बड़ी अर्थव्यवस्थाओं को शामिल करने का मुद्दा इस महीने होने वाले सम्मेलन में बड़ी बहस का विषय होगा.
ब्राज़ील के एक आला अधिकारी नाम सार्वजनिक न करने की शर्त पर रॉयटर्स से कहते हैं, “एक विस्तार.. गुट को किसी और चीज़ में बदल सकता है. ब्राज़ील का रुख़ महत्वपूर्ण देशों के समूह में हमारी जगह को सुरक्षित रखने को लेकर रहा है.”
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भारत और ब्राज़ील विस्तार के पक्ष में क्यों नहीं?
ब्रिक्स समूह से जुड़ा कोई भी फ़ैसला सभी देशों की आपसी सहमति से ही हो सकता है. ब्राज़ील और भारत दोनों ही समूह के विस्तार को लेकर खुलकर नहीं बोल रहे हैं, आख़िर इसकी वजह क्या है?
इस सवाल पर विदेश मामलों के जानकार और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर गुलशन सचदेवा कहते हैं कि इसकी वजह पहचान बनाए रखना है.
वो कहते हैं, “जिन भी देशों ने ब्रिक्स में शामिल होने में दिलचस्पी दिखाई है वो सभी उभरती और मज़बूत अर्थव्यवस्थाएं हैं और वो सभी की चीन से क़रीबी है. अगर इस गुट में नए 6-7 देश जुड़ जाते हैं तो वो सभी चीन की ओर झुके रहेंगे और इस गुट का सबसे ताक़तवर देश चीन हो जाएगा.”
अमेरिका के साथ जारी ‘ट्रेड वॉर’ और पश्चिम के प्रभुत्व को कम करने के लिए चीन लगातार अपने राजनीतिक गुटों को मज़बूत कर रहा है तो वहीं यूक्रेन पर हमले के बाद रूस कूटनीतिक तौर पर अलग-थलग पड़ चुका है. इस वजह से दोनों देश एक मज़बूत गुट चाहते हैं.
इन सबके बीच भारत की स्थिति ब्रिक्स में कैसी होगी? इस सवाल पर प्रोफ़ेसर सचदेवा कहते हैं, “भारत के चीन से संबंध अच्छे नहीं रहे हैं. भारत ऐसा क्यों चाहेगा कि वो ऐसे गुट में नए सदस्यों को आने दे जिससे चीन को फ़ायदा हो."
"भारत दुविधा में भी है क्योंकि ऐसे देशों ने इस गुट में आने में दिलचस्पी दिखाई है, जिनके भारत से बहुत अच्छे संबंध हैं. चाहे सऊदी अरब, यूएई, ईरान या मिस्र हों सभी के साथ भारत के अच्छे संबंध हैं और भारत किसी को ये नहीं कह सकता है कि आपको आने नहीं देंगे. ये समूह अगर बड़ा होता है तो उससे भारत का क़द कम ही होगा.”

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भारत के द्विपक्षीय रिश्ते होंगे प्रभावित?
ऐसी रिपोर्ट्स हैं कि भारत ब्रिक्स गुट में उभरती अर्थव्यवस्थाओं के साथ-साथ अर्जेंटीना और नाइजीरिया जैसे लोकतांत्रिक देश चाहता है न कि सऊदी अरब, ईरान और यूएई जैसे वंशवादी शासन वाले देश.
अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार प्रोफ़ेसर एसडी मुनि कहते हैं कि ब्रिक्स के विस्तार को लेकर भारत की चिंताएं रही हैं. अगर इसमें ईरान, सऊदी अरब, इंडोनेशिया जैसे मुस्लिम देशों को जगह मिलेगी तो वो कल पाकिस्तान को भी इसमें जगह देने की मांग करेंगे.
वो कहते हैं, “भारत शुरुआत में इसके विस्तार में नहीं था लेकिन वो ख़ुद को भी अलग-थलग नहीं दिखाना चाहता था इसलिए वो थोड़ा नरम पड़ा है. वहीं ब्राज़ील ने भी अर्जेंटीना को जगह दिए जाने की बात के बाद नरमी दिखाई है. भारत ने कहा कि इसको लेकर एक मापदंड होना चाहिए, जीडीपी का स्तर भी तय होना चाहिए.”
“केवल लोकतांत्रिक देशों को शामिल करने की बात की ही नहीं जा सकती है क्योंकि इस गुट में पहले से ही चीन और रूस जैसे देश शामिल हैं, जिन्हें लोकतांत्रिक देश नहीं कहा जा सकता है. ये देश पहले से ही इस गुट में हैं इसलिए केवल लोकतांत्रिक देशों को शामिल करने का नियम आधार नहीं बन सकता है.”
भारत के सऊदी अरब और यूएई जैसे मध्य-पूर्व के देशों के साथ मज़बूत रिश्ते हैं. क्या उनकी सदस्यता का समर्थन न करके भारत के उनके साथ द्विपक्षीय रिश्ते प्रभावित होंगे?
इस सवाल पर प्रोफ़ेसर मुनि कहते हैं, “इससे द्विपक्षीय रिश्ते बिल्कुल प्रभावित नहीं होंगे क्योंकि भारत किसी एक देश को निशाना बनाकर नए सदस्यों को शामिल करने के नियम बनाने को नहीं कहेगा. वहीं जो देश शामिल होना चाहते हैं, उनके सामने भी कम चुनौतियां नहीं हैं. इंडोनेशिया जैसे देश को ब्रिक्स में शामिल होने के लिए आसियान गुट से पहले अनुमति लेनी होगी.”

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पश्चिम के ख़िलाफ़ जाएगा भारत?
भारत के पश्चिम से रिश्ते बेहद मज़बूत हुए हैं. अर्थव्यवस्था, रक्षा और तकनीक सहयोग के मामले में उसके अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया और यूरोपीय संघ के साथ कई समझौते हुए हैं.
वहीं चीन के हिंद-प्रशांत क्षेत्र में बढ़ते प्रभुत्व को कम करने के लिए भारत पश्चिम के क्वॉड समूह में शामिल हुआ है जिसमें उसके अलावा अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और जापान शामिल हैं.
ब्रिक्स की शुरुआत का उद्देश्य यही था कि पश्चिम के प्रभाव वाली अर्थव्यवस्था से अलग हटकर उभरती अर्थव्यवस्थाओं को साथ आना चाहिए ताकि उनका प्रभुत्व बढ़े.
प्रोफ़ेसर एसडी मुनि कहते हैं, “भारत पश्चिम के क़रीब अधिक गया है और नए देशों को शामिल करने को लेकर नियम बनाने की वजह भी पश्चिमी देश नज़र आते हैं. भारत नहीं चाहता है कि वो पश्चिम के ख़िलाफ़ जाए और रूस-चीन का प्रभुत्व ज़्यादा बढ़े.”
ब्रिक्स के नए सदस्यों के सवाल को लेकर भारत क्या रुख़ अपनाएगा? इस सवाल पर प्रोफ़ेसर मुनि कहते हैं, “रूस, चीन और दक्षिण अफ़्रीका नए सदस्यों को चाहते हैं. अगर ब्राज़ील भी इसके पक्ष में जाता है तो भारत इसके ख़िलाफ़ नहीं जाएगा. भारत अपनी कुछ शर्तों को ज़रूर रखेगा. इसमें वो रूस और चीन को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के सुधारों को मानने की शर्त भी रख सकता है.”
जोहानसबर्ग में 22 से 24 अगस्त तक होने वाले ब्रिक्स शिखर सम्मेलन को लेकर प्रोफ़ेसर सचदेवा कहते हैं कि इस महासम्मेलन में ब्रिक्स के विस्तार पर सहमति ज़रूर बनेगी लेकिन उसके विस्तार में समय लगेगा, एक तरह से ये महासम्मेलन सिर्फ़ प्रक्रिया की शुरुआत भर होगा.
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